बुधवार, 13 मई 2026

सूरज से आती है ओम की आवाज़

आपको याद होगा कुछ साल पहले एक अफवाह फैलाई गई थी कि "नासा-के-वैज्ञानिकों" ने माना है कि सूरज से " ॐ " की आवाज निकलती है?

बहुत सारे लोगों ने धूप मे खड़े होकर सूर्य से निकलने वाली इस आवाज़ को सुनने की कोशिश की लेकिन उन्हे कुछ सुनाई नहीं आया । 

दरअसल नासा (NASA) के वैज्ञानिकों ने कभी यह नहीं कहा कि सूरज से "ॐ" (Om) की आवाज आती है। यह दावा पूरी तरह से गलत और भ्रामक है।

यह अफवाह क्यों उड़ी और इसकी असलियत क्या है, इसे आप नीचे दिए गए बिंदुओं से समझ सकते हैं:

नासा का असली डेटा: 2018 में, नासा ने सूर्य की आंतरिक गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले कंपनों (vibrations) का एक ऑडियो जारी किया था। वैज्ञानिकों ने बताया कि यह एक धीमी, धड़कन जैसी हूम (Humming) की आवाज है, जो सूर्य के भीतर सामग्री के प्रवाह और लहरों के कारण पैदा होती है।

आवाज का रूपांतरण (Sonification): चूंकि अंतरिक्ष एक निर्वात (vacuum) है, वहां ध्वनि यात्रा नहीं कर सकती। नासा ने सूर्य के डेटा और चुंबकीय लहरों के कंपनों को सोनिफिकेशन (Sonification) तकनीक के जरिए इंसानी कानों के सुनने योग्य आवाज में बदला था।
अफवाह की शुरुआत: सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इस "हूम" की आवाज को हिंदू धर्म के पवित्र मंत्र "ॐ" से जोड़ दिया। जब पुडुचेरी की पूर्व उपराज्यपाल किरण बेदी और कुछ अन्य हस्तियों ने इस दावे वाला वीडियो साझा किया, तो यह अफवाह जंगल की आग की तरह फैल गई। बहुत सारे लोगों ने इसे सिद्ध कारण के लिए एडिट करके वीडियो मे ओम की ध्वनि भी जोड़ दी  । बाद में कई लोगों ने इस गलती के लिए माफी भी मांगी।

वैज्ञानिक स्पष्टीकरण: नासा ने स्पष्ट किया है कि उनके द्वारा रिकॉर्ड किए गए विभिन्न नमूनों में से कोई भी आधिकारिक रूप से "ॐ" नहीं है। यह केवल सुनने वाले की अपनी व्याख्या (interpretation) हो सकती है, वैज्ञानिक तथ्य नहीं।

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कुछ वैज्ञानिक तर्क इस तरह भी दिए जाते हैं   

1.किसी वस्तु के गिरने, टूटने, टकराने, वायु के प्रवाह आदि से निकली लम्बी आवाज से भी ‘स्वरों’ के रूप में ध्वनि  पैदा हो सकती है | कभी-कभी सुनसान जगह पर भी हमें एक विशेष प्रकार की ‘लयबद्ध’ ध्वनि सुनायी देती है, प्रायः वहां भी ध्वनि का ‘उच्चारण’ “स्वर” के रूप में होता है न की “व्यंजन” | इसे पल्सेटाइल टिनिटस (Pulsatile Tinnitus) कहते हैं या मस्तिष्क का स्वतः ध्वनि बनाना (Phantom Sound)कहते हैं । 
2. प्रायः वह ध्वनि हमारे लिए कानों द्वारा सुनने पर, हमारी सोच और मानसिकता पर निर्भर करती हैं | जैसे गला दबाने पर गों गों की आवाज़ निकलती है , यह आपको ओम ओम भी सुनाई दे सकता है । 

3. वैसे ‘सूर्य’ आग का गोला है | हम भी जब ‘आग’ जलाते हैं तब आग की ‘लपटों’ से ध्वनि भी सुनायी देती है | जैसे लकड़ी जलने की आवाज़ तिड तिड आती है या सूं सूं की आवाज़ आती है ।  यह ध्वनि भी हमारे कानों द्वारा सुनने और हमारी मानसिकता और साथ में ‘वायु’ के प्रवाहानुसार अलग-अलग परिभाषित हो सकती है | 

वैसे ध्वनि कानों से सुनने के लिए एक माध्यम की जरुरत भी होती है जैसे मनुष्यों के स्वर के लिए उनका स्वर यन्त्र ज़िम्मेदार होता है वैसे ही जानवरों के भी । जैसे किसी ‘कुत्ते’ के भोंकने पर यदि किसी बालक से पूछे की कुत्ता कैसे भोंक रहा था ? तब वह कह सकता है की ‘कुत्ता’ “भों-भों…” की आवाज निकाल रहा है | वही किसी अन्य बालक से पूछने पर “वऊ-वऊ”, “भू-भू”, “हु-हु” जैसे शब्द सुनने को मिल सकते है जिन्होंने कुत्ते की ध्वनि का विश्लेषण किया हो !ठीक इसी प्रकार वस्तुओं के गिरने, टूटने, टकराने से निकली आवाज को भी हम विभिन्न ‘स्वरों’ और ‘व्यंजनों’ के रूप में जोड़कर आभाषित कर सकते हैं । 
इनमे कौनसी बात सही है कौनसी गलत है यह देखते हैं

मानसिकता और व्याख्या (Perception): यह बात बिल्कुल सही है कि हमारा मस्तिष्क किसी भी अपरिचित ध्वनि को हमारे द्वारा पहले से सुने गए शब्दों या अर्थों में ढालने की कोशिश करता है। इसे मनोविज्ञान में 'Pareidolia' (पैरिडोलिया) कहते हैं। जैसे बादलों में चेहरा दिखना, वैसे ही शोर में कोई शब्द सुनाई देना।

पैरिडोलिया (Pareidolia) क्या है?

यह हमारे मस्तिष्क की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है जिसमें वह अस्पष्ट या बेतरतीब (random) आवाजों या दृश्यों में एक जाना-पहचाना पैटर्न खोजने की कोशिश करता है।
उदाहरण: बादलों में किसी जानवर की आकृति दिखना, बिजली के स्विच बोर्ड में मुस्कुराता हुआ चेहरा नजर आना, या पंखे की आवाज़ में किसी का नाम सुनाई देना।
इस पेड़ मे स्त्री नज़र आती होगी 
सूरज के मामले में: जब लोगों ने सूरज की 'हूमिंग' (गुनगुनाहट) सुनी, तो उनके मस्तिष्क ने उसे उनके सबसे परिचित धार्मिक शब्द 'ॐ' के सांचे में ढाल दिया। यह सुनने वाले की मानसिक धारणा का परिणाम था।

स्वर (Vowels) बनाम व्यंजन (Consonants): यह बात वैज्ञानिक रूप से सही है कि प्राकृतिक आपदाओं, हवा या आग से निकलने वाली ध्वनियाँ अक्सर 'निरंतर' (Continuous) होती हैं, जो 'स्वरों' (Vowels जैसे- अ, ओ, ऊ) जैसी लगती हैं। 'व्यंजन' (Consonants जैसे- क, ख, प) बोलने के लिए जीभ, होंठ या दांतों के घर्षण की ज़रूरत होती है, जो निर्जीव वस्तुओं में नहीं होता।

अनुकरण (Onomatopoeia): कुत्ते के भोंकने वाला उदाहरण एकदम सही है। अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों में एक ही जानवर की आवाज़ को अलग-अलग शब्दों में लिखा जाता है। उदाहरण के लिए, बिल्ली को हम "म्याऊं" कहते हैं, जबकि अंग्रेज़ी में "Meow" और जापानी में "Nya" कहा जाता है। यह सुनने वाले के विश्लेषण पर निर्भर करता है।

माध्यम की आवश्यकता: यह भौतिक विज्ञान का अटल सत्य है कि ध्वनि को यात्रा करने के लिए हवा, पानी या ठोस जैसे माध्यम की ज़रूरत होती है।

उपरोक्त तर्कों मे कहीं कहीं थोड़ा तकनीकी अंतर है

शून्य (Vacuum) में ध्वनि: आग की लपटों का उदाहरण दिया, जो धरती पर सही है। लेकिन सूर्य अंतरिक्ष में है जहाँ 'हवा' नहीं है, इसलिए वहाँ से कोई भी आवाज़ सीधे हमारे कानों तक नहीं पहुँच सकती। नासा ने जो आवाज़ सुनाई, वह 'ध्वनि' नहीं बल्कि 'डेटा' (Magnetic Waves) को साउंड में बदला गया रूप था।

नासा ने चुंबकीय तरंगों को आवाज़ में कैसे बदला? (Sonification)
चूंकि अंतरिक्ष में निर्वात (vacuum) है, वहां ध्वनि की तरंगें यात्रा नहीं कर सकतीं। नासा ने इसे 'सोनिफिकेशन' तकनीक से मुमकिन बनाया:

डेटा कैप्चर: नासा के SOHO (Solar and Heliospheric Observatory) जैसे उपग्रह सूरज की सतह पर होने वाले कंपन और चुंबकीय तरंगों (electromagnetic waves) को रिकॉर्ड करते हैं।

रूपांतरण: इन तरंगों की फ्रीक्वेंसी बहुत कम होती है (इंसानी कान इन्हें नहीं सुन सकते)। वैज्ञानिक सॉफ्टवेयर का उपयोग करके इन तरंगों की गति को हजारों गुना बढ़ा देते हैं और उन्हें साउंड वेव में बदल देते हैं।

परिणाम: यह ठीक वैसा ही है जैसे रेडियो स्टेशन सिग्नल को आवाज़ में बदलता है। जो आवाज़ हमें सुनाई देती है, वह असल में "डेटा का ऑडियो वर्जन" है।

गला दबाने या आग की आवाज़: यह सही है कि ये आवाज़ें 'ॐ' जैसी सुनाई दे सकती हैं, लेकिन वे 'ॐ' होती नहीं हैं। यहाँ 'सुनाई देने' (Subjective) और 'होने' (Objective) के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है। यह पूरी तरह सुनने वाले के सांस्कृतिक और धार्मिक बैकग्राउंड पर निर्भर करता है।

निष्कर्ष

अधिकांश बातें सही और तार्किक हैं। ध्वनि का भौतिक रूप (Vibration) एक सच्चाई है, लेकिन उस ध्वनि का 'अर्थ' निकालना (जैसे उसे ॐ, भों-भों या हूमिंग कहना) पूरी तरह से मानव मस्तिष्क और उसकी धारणा पर निर्भर करता है। सूरज के मामले में भी यही हुआ—वैज्ञानिकों के लिए वह "Solar Hum" (सौर गुंजन) था, जबकि कुछ आम लोगों के लिए वह "ॐ" बन गया।

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क्या अन्य ग्रहों की भी आवाज़ रिकॉर्ड की गई है?

हाँ, नासा और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों ने सौरमंडल के लगभग सभी प्रमुख ग्रहों की 'आवाज़ें' (डेटा रूपांतरण के माध्यम से) जारी की हैं:

मंगल (Mars): 'परसेवेरेंस रोवर' ने मंगल पर असली माइक्रोफोन भेजे हैं। पहली बार हमने वहां की हवाओं और रोवर के चलने की असली आवाज़ सुनी है। यह डेटा रूपांतरण नहीं, बल्कि असली साउंड रिकॉर्डिंग है क्योंकि मंगल पर पतला वायुमंडल मौजूद है।

शुक्र (Venus): नासा के 'पार्कर सोलर प्रोब' ने शुक्र के ऊपरी वायुमंडल से गुजरते समय रेडियो सिग्नल रिकॉर्ड किए थे, जो एक डरावनी सीटी जैसी सुनाई देते हैं।

बृहस्पति (Jupiter): इसके चुंबकीय क्षेत्र की आवाज़ बहुत तेज़ और 'जंगली जानवरों के दहाड़ने' जैसी लगती है।

शनि (Saturn): शनि की रिंग्स और रेडियो उत्सर्जन से निकलने वाली आवाज़ें किसी पुरानी साइंस-फिक्शन फिल्म के बैकग्राउंड म्यूज़िक जैसी सुनाई देती हैं।

आपका 

शरद कोकास 

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सोमवार, 4 मई 2026

ओ तेरे की छींक दिया ना ?


हमारे यहाँ एक अंधविश्वास है अगर कोई घर से बाहर जा रहा है और अचानक कोई छींक दें तो कहते हैं कि अब जरूर कुछ अनहोनी होगी या कुछ दुर्घटना होगी । इसके अलावा एक अंधविश्वास और भी है कि यदि कोई काम कर रहा है और छींक आ जाए तो कहते हैं कि अब यह काम पूरा नहीं होगा । उसी तरह से छींक को लेकर यह भी कहा जाता है कि किसी को छींक आ जाए तो समझो कोई याद कर रहा है दरअसल यह सब अंधविश्वास है छींकना क्या होता है हम इस पोस्ट में देखते हैं।

वास्तव मे छींकना एक नैसर्गिक क्रिया है, छींकने से कुछ अनहोनी नहीं होती ना ही किसी काम में बाधा आती है - छींकने से शरीर की सुप्त पेशियां सक्रिय हो जाती है।


छींक आना शरीर की एक स्वाभाविक और सुरक्षात्मक प्रक्रिया है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसके मुख्य कारणों को नीचे समझा जा सकता है:


1. नाक की सफाई (सेंसर की तरह काम करना)


हमारी नाक के अंदर एक महीन झिल्ली होती है जिसे म्यूकस मेंब्रेन कहते हैं। जब इस झिल्ली में कोई बाहरी कण जैसे धूल, मिट्टी, धुआं, परागकण (pollen) या तेज गंध वाली चीज घुस जाती है, तो वहां मौजूद नसें (Trigeminal nerve) मस्तिष्क को एक संकेत भेजती हैं।


2. मस्तिष्क की प्रतिक्रिया


जैसे ही मस्तिष्क को यह संकेत मिलता है कि नाक में कुछ "अनचाहा" है, वह शरीर की मांसपेशियों को उसे बाहर निकालने का आदेश देता है। इसमें आपके फेफड़े, छाती की मांसपेशियां, पेट, डायाफ्राम और गले की मांसपेशियां एक साथ काम करती हैं।


3. हवा का तेज दबाव


छींकते समय हम अनजाने में एक गहरी सांस लेते हैं और फिर उसे बहुत तेजी से बाहर छोड़ते हैं। यह हवा लगभग 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बाहर निकलती है, जो नाक के रास्ते में फंसी किसी भी बाहरी चीज को बाहर धकेल देती है।


4. छींक कब कब आती है ?


शरीर के आभामण्डल में आकस्मिक परिवर्तन से भी छींक आती है,जैसे कुछ लोगो को नहाने के तुरंत बाद, या सोकर उठने के तुरंत बाद छींक आती है । किसी को सुबह किसी को शाम को छींक आती है, किसी को अगरबत्ती की गंध से किसी को परफ्यूम की गंध से ,किसी को बारिश या मिट्टी की गंध से भी छींक आती है


छींक से जुड़ी कुछ रोचक बातें:


आंखें बंद होना: छींकते समय हमारी आंखें अपने आप बंद हो जाती हैं। यह एक रिफ्लेक्स (प्रतिवर्त क्रिया) है जिसे हम चाहकर भी रोक नहीं सकते।


सूरज की रोशनी: कुछ लोगों को तेज धूप या रोशनी देखने पर भी छींक आती है। इसे 'फोटिक स्नीज रिफ्लेक्स' (Photic Sneeze Reflex) कहा जाता है।


बीमारियां: सर्दी-जुकाम या एलर्जी होने पर नाक की झिल्ली में सूजन आ जाती है, जिससे वह बहुत संवेदनशील हो जाती है और बार-बार छींक आती है।


सावधानी: छींक को कभी भी रोकना नहीं चाहिए, क्योंकि इसका दबाव कान के पर्दों या आंखों की नसों पर बुरा असर डाल सकता है। हमेशा छींकते समय रुमाल का उपयोग करें ताकि कीटाणु दूसरों तक न फैलें।


कई बार जोर से छींकने पर आंखों के सामने तैरते हुए सफेद डॉट्स या 'फ्लोटर्स' (Floaters) दिखाई देना एक सामान्य अनुभव है। विज्ञान की भाषा में इसे 'फॉसफेंस' (Phosphenes) कहा जाता है। इसके पीछे मुख्य रूप से दो वैज्ञानिक कारण होते हैं:


1. यांत्रिक दबाव (Mechanical Pressure)


जब आप बहुत जोर से छींकते हैं, तो आपके चेहरे और सिर की नसों में अचानक बहुत अधिक दबाव (Intraocular pressure) बढ़ जाता है।
छींकते समय आपकी आंखें अपने आप कसकर बंद होती हैं।
यह बाहरी दबाव आपकी आंखों के पीछे मौजूद रेटिना (Retina) को उत्तेजित कर देता है।
चूंकि रेटिना का काम प्रकाश के संकेतों को समझना है, इसलिए जब उस पर भौतिक दबाव पड़ता है, तो वह मस्तिष्क को गलत संकेत भेजता है जिसे हमारा दिमाग 'प्रकाश की चिंगारी' या 'तैरते हुए कणों' के रूप में देखता है।


2. रक्त के प्रवाह में बदलाव


छींकते समय आप अचानक बहुत ऊर्जा लगाते हैं, जिससे आपके रक्तचाप (Blood Pressure) में पल भर के लिए तेजी से बदलाव आता है।
इससे आंखों की सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं में ऑक्सीजन और खून की आपूर्ति एक सेकंड के लिए प्रभावित होती है।
इस स्थिति को 'ब्लू फील्ड एंटोप्टिक फेनोमेनन' (Blue Field Entoptic Phenomenon) भी कहा जा सकता है, जिसमें हमें अपनी ही सफेद रक्त कोशिकाओं (White Blood Cells) की परछाईं तैरती हुई दिखाई देने लगती है।


क्या यह चिंता का विषय है?


सामान्यतः, छींकने के तुरंत बाद दिखने वाले ये फ्लोटर्स या रोशनी की चमक कुछ ही सेकंड में गायब हो जाती है और यह बिल्कुल सामान्य है।


तात्पर्य यह कि छींक आने का सम्बन्ध विषैले पदार्थ को बाहर फेंकना नही होता या कोई अंधविश्वास नहीं होता बल्कि यह संवेदनशील तंतुओं की वजह से होता है, नाक में तिनका डालेंगे तब भी छींक आयेगी । इसका सम्बन्ध एलर्जी से है न किसी का छींक की वज़ह से काम बिगड़ जाने की वज़ह से ।

शनिवार, 2 मई 2026

क्या पीपल रात मे केवल ऑक्सीजन छोड़ता है ?


क्या पीपल रात में केवल ऑक्सीजन देता है? एक वैज्ञानिक विश्लेषण



अक्सर यह कहा जाता है कि पीपल रात में भी ऑक्सीजन देता है, जबकि अन्य पेड़ रात मे कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2) छोड़ते हैं। इस बात मे कितनी सच्चाई है, आइए इसे फोटोसिंथेसिस (प्रकाश संश्लेषण) के आधार पर समझते हैं:

*1 .फोटोसिंथेसिस (प्रकाश संश्लेषण) क्या है ?* - सभी पेड़ पौधे हमारी ही तरह सजीव हैं और हमारी ही तरह इनके लक्षण हैं जैसे जन्म,पोषण वृद्धि और अंत में मृत्यु । यह अपने बढ़ने के लिए या जीवित रहने के लिए वातावरण से कार्बन डाय आक्साइड लेते हैं और सूरज की रौशनी तथा पत्तियों मे उपस्थित क्लोरोफिल की सहायता से उसे कार्बोहाइड्रट के रूप मे सहेज कर रखते हैं । यही उनका भोजन है और दैनिक गतिविधियों के लिए ऊर्जा है । अपना फूड बनाने की इस प्रोसेस में ऑक्सीजन बाय प्रॉडक्ट के रूप में उत्पन्न होती है तथा एनर्जी कार्बोहाइड्रट के रूप में उनके भीतर जमा हो जाती है ।



लेकिन ऐसा नहीं है कि पौधे सिर्फ कार्बन डाई ऑक्साइड ही लेते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं बल्कि वे इसका उल्टा भी करते हैं जैसे कि वे ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाईओक्सिड छोड़ते हैं यह तब होता है जब वे अपने भीतर सहेजें गए केमिकल्ज़ का इस्तेमाल अपनी वृद्धि और अन्य गतिविधियों के लिए करते हैं।



यह प्रोसेस रेसपिरेशन ही है जैसा कि हम करते हैं । इसके अंतर्गत वे ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ते हैं । पेड़ पौधे ऑक्सीजन लेने और छोड़ने तथा कार्बन डाइऑक्साइड लेने और छोड़ने का काम सतत करते हैं सामान्यतः पेड़ पौधे यह काम अपने पत्तियों में बने वॉल्वो के माध्यम से करते हैं जिन्हें स्टोमेटा कहा जाता है । दिन मे सूरज के प्रकाश में उनके स्टोमेटा सेल बंद रहते हैं इसलिए फ़ोटो सिंथेसिस की प्रक्रिया शुरू रहती है और वे co2 लेते हैं लेकिन रात मे रौशनी न होने के कारण इसका विपरीत होता है वे ऑक्सीजन लेते हैं और Co2 छोड़ते हैं । गैसों के एक्सचेंज वाला प्रोसेस कई तरह से होता है । इसमें पेड़ पौधे दो तरह का पाथ वे इस्तेमाल करते हैं । विज्ञान मे पेड़ पौधों के भीतर होने वाली अलग अलग रासायनिक क्रियाओं के आधार पर इन्हे C3 और C4 पाथ वे कहा जाता है । संसार में लगभग 85 % पेड़ों की प्रजाति सी थ्री पाथवे का ही इस्तेमाल करती है लेकिन इनके अलावा एक पाथ वे और होता है जिसे CAM Pathway कहा जाता है

​2 . सामान्य पेड़ों और पीपल में या इस तरह के अन्य पौधों में क्या अंतर है?

यह हमने देखा कि ज्यादातर पेड़ दिन मे फोटो सिन्थेसीस के माध्यम से अपना भोजन ग्रहण करते हैं , कार्बन डाय आक्साइड ग्रहण करते हैं और आक्सिजन छोड़ते हैं तथा रात में केवल श्वसन (Respiration) करते हैं, जिससे वे CO_2 छोड़ते हैं। लेकिन पीपल (और एलोवेरा, स्नेक प्लांट जैसे पौधे) CAM (Crassulacean Acid Metabolism) नामक एक विशेष प्रक्रिया या पाथ वे का पालन करते हैं।

*3. यह CAM (Crassulacean Acid Metabolism) नामक एक विशेष प्रक्रिया क्या है*


हमने देखा कि C3 पाथ वे का इस्तेमाल करने वाले पेड़ पौधे दिन में अपना स्टोमटा खोल कर रखते हैं जिससे वे कार्बन डाई ऑक्साइड ग्रहण करते हैं तथा ऑक्सीजन छोड़ते हैं लेकिन CAM पाथ वे का इस्तेमाल करने वाले पेड़ पौधे दिन में अपना स्टोमैटा बंद करके रखते हैं । इस पाथवें का इस्तेमाल उन पेड़ पौधों द्वारा किया जाता है जो बहुत सूखी जगहों में या जहाँ पर पानी का अभाव होता है वहाँ पैदा होते हैं या फिर दीवार पर या पेड़ों के तनों आदि पर पैदा होते हैं या वहाँ जहां पानी की बहुत कमी होती है। स्टोमैटा बंद करके रखने के कारण उनके पत्तों मे नमी बनी रहती है और धूप मे वे सूख नहीं पाते ।



लेकिन सवाल यह है कि इस प्रक्रिया में दिन में रंध्र छिद बंद होने के कारण वातावरण से कार्बन डाय आक्साइड लेना और ऑक्सीजन छोड़ना तो नहीं हो पाता तो वे यह काम रात को करते हैं अर्थात उनके स्टोमेटा के छिद्र रात मे खुलते हैं वे रात मे कार्बन डाय आक्साइड लेते और उनसे कई तरह के एसिड बनाकर अपने भीतर जमा कर लेते हैं जैसे पीपल रात में श्वसन तो करता है, लेकिन वह अपनी छोड़ी हुई और वातावरण की CO_2 को बाहर निकालने के बजाय भीतर सोख लेता है। वह इस CO_2 को 'मैलिक एसिड' के रूप में अपने पत्तों में स्टोर कर लेता है। इस रासायनिक प्रक्रिया के दौरान उप-उत्पाद (By-product) के रूप में ऑक्सीजन (O_2) मुक्त होती है। यद्यपि इसकी मात्रा दिन में छोड़ी है ऑक्सीजन की मात्रा से बहुत ही कम लगभग न के बराबर रहती है ।यह प्रोसेस उस समय अधिक होती है जब ऐसे पेड़ पौधे कठिन परिस्थिति मे जैसे दीवार पर सूखी जगह पर या जहां पानी की कमी होती है बढ़ते हैं । आपने भी दीवार पर उगे पीपल के पेड़ को देखा होगा।

4 . मैलिक एसिड का उपयोग:

हमने देखा कि कैम पाथ वे का इस्तेमाल करने वाले पेड़ पौधे जब मैलिक एसिड को अपने भीतर रात मे सहेज कर रख लेते हैं तो उसका उपयोग क्या करते हैं । अगले दिन जब सूरज निकलता है, तो यह पेड़ पौधे अपने रंध्र (Stomata) बंद कर लेते हैं ताकि पानी वातावरण मे न उड़े और फिर रात में जमा किए गए इसी 'मैलिक एसिड' को तोड़कर CO_2 निकालते है और अपना भोजन बनाते है।

5. फिर आक्सिजन का क्या होता है


यह प्रश्न स्वाभाविक है कि फ़ोटो सिंथेसिस के दौरान बनी हुई ऑक्सीजन का क्या होता है ? कैम पाथवे का इस्तेमाल करने वाले पेड़ पौधे जब स्टोमेटा बंद कर लेते हैं तो फिर ऑक्सीजन कैसे रिलीज करते हैं ? हाँ वे ऑक्सीजन रिलीज़ अवश्य करते हैं लेकिन दिन में कुछ कम और रात में जब उनके रंध्र पूरी तरह खुल जाते हैं कुछ अधिक आक्सिजन रिलीज करते हैं । इस तरह से उनकी यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है



6 . लेकिन क्या यह पीपल के पेड़ पर भी लागू होता है या यह केवल एक मिथ है?

यह पूरी तरह मिथ नहीं है, दरअसल यह प्रोसेस तब अधिक होती है जब पीपल का पेड़ छोटा होता है या वह ऐसी जगह पर उगता है जैसे दीवाल पर या किसी सूखी जगह पर जहाँ पर नमी बिल्कुल नहीं होती उस समय उसको नमी की आवश्यकता होती है और वह CAM पाथवे का उपयोग करता है। लेकिन जैसे जैसे वो बड़ा होता जाता है ऐसा माना जाता है कि तब वह C3 pathway में स्विच कर लेता है और अन्य पेड़ों की तरह ही व्यवहार करता है । यद्यपि यह एक विशेष जैविक अनुकूलन है और ऐसी स्थिति मे पीपल अन्य पेड़ों की तरह रात में CO_2 पैदा तो करता है, लेकिन उसे वातावरण में अधिक मात्रा में रिलीज नहीं करता, बल्कि उसकी ज्यादातर मात्रा 'रीसायकल' कर लेता है। इससे वातावरण में ऑक्सीजन का स्तर बना रहता है।

इसी श्रेणी में स्नेक प्लांट,कुछ विशेष तरह के कैक्टस प्लांट, आर्किड, एलोवेरा और पाइनेपल जैसे पौधे भी आते हैं जो पीपल से अधिक कैम पाथवे का उपयोग करते हैं । इनमें हम कई तरह की उन झाड़ियों को भी शामिल कर सकते हैं जो बहुत सूखी जगहों पर भी उगी रहती हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि क़ैम पाथवे का उपयोग करने वाले पेड़ पौधे अन्य पौधों की तुलना में अधिक ऑक्सीजन रिलीज करते हैं , वे भी अन्य पौधों की तरह ही ऑक्सीजन रिलीज करते हैं लेकिन यदि वे दिन में ज़्यादा नहीं कर पाते तो रात को कर लेते है अर्थात कुल मिलाकर 24 घंटे मे रिलीज होने वाली आक्सिजन की मात्रा उतनी ही रहती हैं।

पीपल की तरह इस तरह के अन्य पौधे भी एक 'प्राकृतिक एयर प्यूरीफायर' की तरह है जो किसी एक पाली मे नहीं बल्कि 24 घंटे वातावरण से CO_2 कम करने और ऑक्सीजन का संतुलन बनाए रखने में सक्षम है।

*वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं अंधविश्वास भगाएं*

शरद कोकास

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं की जाती


एक दिन एक मित्र ने कहा  " एक दिन डिस्कवरी पर जेनेटिक बीमारियों से सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम
देख रहा था ... उस प्रोग्राम में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा की जेनेटिक बीमारी न हो इसका एक ही इलाज है और वो है "सेपरेशन ऑफ़ जींस" मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नही करना चाहिए ..क्योकि नजदीकी
रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नही हो पाता और जींस लिंकेज्ड बीमारियाँ जैसे हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस, और एल्बोनिज्म होने का १००% चांस होता  है .. फिर मुझे बहुत ख़ुशी हुई जब उसी कार्यक्रम में ये दिखाया गया कि आखिर हिन्दूधर्म में हजारों सालों पहले जींस और डीएनए के बारे में कैसे लिखा गया है ? हिंदुत्व में कुल सात गोत्र होते है और एक गोत्र के लोग आपस में शादी नही कर सकते ताकि जींस सेपरेट (विभाजित) रहे.. उस वैज्ञानिक ने कहा कि आज पूरे विश्व को मानना पड़ेगा की हिन्दूधर्म ही विश्व का एकमात्र ऐसा धर्म है जो "विज्ञान पर आधारित" है !"

आइये उन मित्र के इस कथन की वैज्ञानिक आधार पर जांच पड़ताल करते हैं.। 

वास्तव मे जींस और डी एन ए की खोज बहुत बाद में हुई है , हिन्दू धर्म से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है । हिन्दुओ में ही नहीं बल्कि विश्व के सभी लोगों में इतना रक्त सम्मिश्रण हो चुका है कि अब रक्त सम्बन्धियों में विवाह होने के बावजूद इस तरह की जेनेटिक बीमारी होने की कोई संभावना बहुत कम है । विश्व के बहुत से समुदायों में रक्त सम्बन्धियों में विवाह होते हैं लेकिन इन बीमारियों का प्रमाण उतना ही है जितना रक्त सम्बन्धियों में विवाह न होने का । जींस का सेपरेशन लगातार होता है , मधुमेह जैसी बीमारी भी सगे भाई बहनों में सभी को नहीं होती , इसके अन्यान्य कारण हैं । ऐसा कोइ भी धर्म नहीं है जो विज्ञान पर आधारित हो । धर्म की रुढियों और मान्यताओं को विज्ञान नकारता है । 

चलिए इसे धर्म के आधार पर देखते हैं - 

हिन्दू धर्म और विशेष रूप से उत्तर भारतीय समाजों में 'समान गोत्र' (सगोत्र) में विवाह न करने की परंपरा के पीछे पौराणिक मान्यताएं और आधुनिक आनुवंशिक (Genetic) तर्क, दोनों ही दिए जाते हैं।

इसे समझने के लिए हम इसे तीन मुख्य हिस्सों में देख सकते हैं:

1. धार्मिक एवं पौराणिक आधार


धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 'गोत्र' का अर्थ उस मूल ऋषि से है जिससे किसी कुल का वंश आरंभ हुआ।

  • सहोदर भाव: एक ही गोत्र के होने का अर्थ है कि वे व्यक्ति एक ही पूर्वज की संतानें हैं। इस नाते वे आपस में भाई-बहन माने जाते हैं।

  • ऋषि परंपरा: माना जाता है कि सभी हिन्दू सप्तऋषियों की ही संतानें हैं। इसलिए एक ही गोत्र में विवाह को 'अगम्य गमन' (Incest) की श्रेणी में रखा गया है।

चलिए अब इसे वैज्ञानिक आधार पर देखते हैं 

2. वैज्ञानिक आधार (Genetics)


विज्ञान के दृष्टिकोण से इसे 'Inbreeding Depression' के जोखिम से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि 'गोत्र' पूरी तरह से वैज्ञानिक शब्द नहीं है, लेकिन इसके पीछे का तर्क आनुवंशिक है:

  • समान जींस का प्रभाव: एक ही कुल या वंश में विवाह करने से परिवार के 'रिसेसिव जींस' (Recessive Genes) के आपस में मिलने की संभावना बढ़ जाती है। यदि कुल में कोई आनुवंशिक बीमारी है, तो वह अगली पीढ़ी में उभरने का खतरा ज्यादा होता है।

  • विविधता (Diversity): विज्ञान मानता है कि दो अलग-अलग वंशों (Gene Pools) के बीच विवाह होने से संतान अधिक स्वस्थ और मानसिक रूप से सुदृढ़ होती है क्योंकि उसे जींस की विविधता मिलती है।

  • क्रोमोसोम का तर्क: गोत्र मुख्य रूप से पिता से पुत्र में जाने वाले Y-Chromosome पर आधारित माना जाता है। एक ही गोत्र में विवाह करने से Y-Chromosome का नवीनीकरण नहीं हो पाता।


चलिए अब इसे अन्य धर्मों और संस्कृति के आधार पर देखते है 


3. अन्य धर्मों में रक्त संबंधियों में विवाह और उसके प्रभाव


हाँ, कई संस्कृतियों और धर्मों (जैसे इस्लाम, या दक्षिण भारत के कुछ समुदायों) में चचेरे-ममेरे भाई-बहनों के बीच विवाह (Consanguineous Marriage) मान्य है। इसके प्रभावों पर शोध बताते हैं:

पक्षप्रभाव
आनुवंशिक विकाररक्त संबंधियों में विवाह से बच्चों में जन्मजात दोष (Congenital disabilities), अंधापन, या चयापचय (Metabolism) संबंधी बीमारियों का खतरा उन लोगों की तुलना में अधिक होता है जो पूरी तरह अलग वंश में विवाह करते हैं।
प्रतिरोधक क्षमताजींस में विविधता कम होने के कारण ऐसी संतानों की बीमारियों से लड़ने की क्षमता (Immunity) तुलनात्मक रूप से कम हो सकती है।
सामाजिक तर्कइन समुदायों में संपत्ति के बंटवारे को रोकने और पारिवारिक एकता को बनाए रखने के लिए इसे प्राथमिकता दी जाती है।

हालांकि, आधुनिक समय में हजारों वर्षों के बाद एक ही गोत्र के लोगों के बीच जींस का सीधा संबंध बहुत कम रह गया है, फिर भी जैविक स्वास्थ्य की दृष्टि से अलग-अलग वंशों में विवाह करना हमेशा श्रेष्ठ क्यों माना जाता है?


वास्तव मे हजारों वर्षों के मानव प्रवास और अंतर्जातीय विवाहों के कारण 'शुद्ध वंश' जैसा कुछ बचा नहीं है, फिर भी आनुवंशिकी (Genetics) के कुछ नियम आज भी प्रभावी हैं।

इसे हम दो मुख्य बिंदुओं से समझ सकते हैं:

1. रक्त सम्मिश्रण और 'रिसेसिव जींस' (Recessive Genes) का खेल क्या है ?

भले ही सदियों से रक्त का सम्मिश्रण हुआ हो, लेकिन Recessive Genes का खतरा अभी भी खत्म नहीं हुआ है।

छिपे हुए गुण:
हमारे शरीर में हर जीन के दो सेट होते हैं। कुछ बीमारियाँ (जैसे थैलेसीमिया या सिस्टिक फाइब्रोसिस) तभी होती हैं जब माता और पिता दोनों से खराब जीन मिले।


संभावना का तर्क: यदि आप अपने गोत्र से बाहर विवाह करते हैं, तो इस बात की संभावना बहुत कम हो जाती है कि आपके साथी के पास भी वही 'छिपा हुआ खराब जीन' होगा जो आपके पास है। लेकिन एक ही कुल में, वह खराब जीन पीढ़ी दर पीढ़ी सुप्त (Dormant) अवस्था में चलता रह सकता है और समान जीन मिलते ही बीमारी के रूप में प्रकट हो सकता है।

2. भाई-बहनों में बीमारी अलग अलग क्यों होती है?

हालांकि ऐसा न मानने का एक कारण यह भी है कि ऐसी संभावना बहुत कम होती है जैसे कि सगे भाई बहनों में से भी मधुमेह या इसी तरह की बीमारी सभी को क्यों नहीं होती ? यह एक बहुत ही तार्किक और गहरा सवाल है।

यह तर्क बिल्कुल सही है कि सगे भाई-बहनों को भी एक जैसी बीमारियाँ नहीं होतीं। इसका कारण 'Genetic Recombination' है:

रैंडम मिक्सिंग:
जब बच्चा पैदा होता है, तो उसे माता-पिता से 50-50% जींस मिलते हैं, लेकिन यह कौन से 50% होंगे, यह पूरी तरह रैंडम (यादृच्छिक) होता है।

उदाहरण: मान लीजिए माता-पिता के पास मधुमेह (Diabetes) का जीन है। मुमकिन है कि एक बच्चे को वह हिस्सा मिले जिसमें मधुमेह के जीन सक्रिय हों, और दूसरे को वह हिस्सा मिले जो स्वस्थ हो।

जोखिम बनाम निश्चितता:
विज्ञान 'निश्चितता' की बात नहीं करता, बल्कि 'जोखिम' (Probability) की बात करता है। सगे भाई-बहनों या एक ही गोत्र में विवाह करने से बीमारी होने की संभावना (Risk Factor) बढ़ जाती है, यह जरूरी नहीं कि बीमारी होगी ही।

अब अंतिम बात यह कि क्या आज के समय में गोत्र मायने रखता है?

आज के वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में, 'गोत्र' से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण 'निकटता' मायने रखती है।


दूरी का लाभ: सगे भाई-बहन सबसे निकट हैं (अधिक जोखिम), चचेरे-ममेरे भाई बहन थोड़े दूर (कम जोखिम), और एक ही गोत्र के अनजान लोग बहुत दूर (नगण्य जोखिम)।

आधुनिक स्थिति: क्योंकि अब जनसंख्या बहुत बढ़ चुकी है और लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर बस चुके हैं, इसलिए एक ही गोत्र के दो अनजान लोगों के बीच जींस का मिलन होना अब उतना खतरनाक नहीं रहा जितना शायद हजारों साल पहले रहा होगा जब कबीले छोटे थे।

यही कारण है कि आज के जेनेटिक एक्सपर्ट गोत्र के बजाय 'Family Medical History' और 'Genetic Screening' पर ज्यादा जोर देते हैं।

क्या आपको लगता है कि सामाजिक परंपराओं को अब वैज्ञानिक परीक्षणों (जैसे ब्लड टेस्ट) के आधार पर बदल जाना चाहिए?

आज के समय में 'एक ही गोत्र' में विवाह करने से किसी बड़ी बीमारी का खतरा उतना नहीं है जितना कि 'निकट रक्त संबंध' (जैसे सगे या चचेरे रिश्तेदारों) में विवाह से है। गोत्र की परंपरा अब वैज्ञानिक से ज्यादा एक सांस्कृतिक पहचान बनकर रह गई है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अब गोत्र देखने के बजाय 'Genetic Screening' (कुंडली के बजाय जींस का मिलान) की सलाह देता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि माता-पिता के जींस में कोई ऐसी समानता तो नहीं जो बच्चे के लिए घातक हो। 

शरद कोकास

गुरुवार, 21 मई 2020

तुम्हारी चोटी में सितारे गूँथ दूँगा

हमारे प्रेमी गण अपनी प्रेमिकाओं से अक्सर कहते थे ..तुम्हारे लिए आसमां से तारे तोड़कर ले आऊंगा ..यह अलग बात है कि शादी के बाद वे नुक्कड़ के किराने की दूकान से किराना तक नहीं लाते .. मैंने एक बार ऐसे ही एक प्रेमी से पूछा भाई तुम यह तारे तोड़ने और उन्हें प्रेमिका की चोटी में गूंथने की बात तो करते हो लेकिन जानते हो तारे किसे कहते हैं ..जब उसने अनभिज्ञता में सर हिलाया तो मुझे यह पोस्ट लिखनी पड़ी


उसी तरह अक्सर लोग कहते हैं आजकल मेरे ग्रह खराब चल रहे हैं .. यह बताने के लिए भी यह जानना ज़रूरी था कि ग्रह क्या है .. सो चलिए यहाँ एक संक्षिप्त जानकारी पढ़ें ..


सूर्य या किसी अन्य तारे के चारों ओर परिक्रमा करने वाले खगोल पिण्डों को ग्रह कहते हैं। अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ के अनुसार हमारे सौर मंडल में आठ ग्रह थे जिनकी संख्या अब बारह से अधिक हो गई है । बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, युरेनस और नेप्चून। इनके अतिरिक्त तीन बौने ग्रह और हैं सीरीस, प्लूटो और एरीस । प्राचीन खगोलशास्त्रियों ने तारों और ग्रहों के बीच में अन्तर इस तरह किया ।


तारा क्या है ?


तारे (Stars) स्वयंप्रकाशित (self-luminous) उष्ण गैस की द्रव्यमात्रा से भरपूर विशाल, खगोलीय हैं। इनका निजी गुरुत्वाकर्षण (gravitation) इनके द्रव्य को संघटित रखता है। मेघरहित आकाश में रात्रि के समय प्रकाश के बिंदुओं की तरह बिखरे हुए, टिमटिमाते प्रकाशवाले बहुत से तारे दिखलाई देते हैं।रात में आकाश में चमकने वाले अधिकतर पिण्ड हमेशा पूरब की दिशा से उठते दिखाई देते हैं, एक निश्चित गति प्राप्त करते हैं और पश्चिम की दिशा में अस्त होते हैं। इन पिण्डों का आपस में एक दूसरे के सापेक्ष भी कोई परिवर्तन नहीं होता है। इन पिण्डों को तारा कहा गया।


घुमक्कड़ होने के कारण इन्हें ग्रह कहते हैं


पर कुछ ऐसे भी पिण्ड हैं जो बाकी पिण्डों के सापेक्ष में कभी आगे जाते थे और कभी पीछे - यानी कि वे घुमक्कड़ थे। Planet एक लैटिन का शब्द है, जिसका अर्थ होता है इधर-उधर घूमने वाला। इसलिये इन पिण्डों का नाम Planet और हिन्दी में ग्रह रख दिया गया।


शनि के परे के ग्रह दूरबीन के बिना नहीं दिखाई देते हैं, इसलिए प्राचीन वैज्ञानिकों को केवल पाँच ग्रहों का ज्ञान था, पृथ्वी को भी उस समय ग्रह नहीं माना जाता था।


नासा के केपलर अभियान के तरह दो सितारों की परिक्रमा कर रहे एक नए ग्रह की खोज की है। यह ग्रह 'हैबिटेबल जोन' (रिहायश के लायक क्षेत्र) में दो सितारों की परिक्रमा कर रहा है।


इस ग्रह की पहचान केपलर 453बी के रूप में हुई है और यह केपलर मिशन द्वारा खोजा गया दो सितारों का परिक्रमा करने वाला 10वां ग्रह है।वैज्ञानिकों ने धरती की ही तरह दिखने वाले एक नए ग्रह की खोज की है। ये ग्रह G2 नाम के सितारे की परिक्रमा कर रहा है और इन दोनों के बीच भी उतनी ही दूरी है, जितनी पृथ्वी और सूर्य के बीच। G2 सूर्य की तरह ही एक सितारा है। इस ग्रह की खोज केपलर टेलिस्कोप (Kepler 452b) की मदद से की गई है, जो साल 2009 से दूसरी दुनिया की खोज में लगा हुआ है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, ये नया ग्रह हमारी पृथ्वी से 1,400 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है।


ग्रहों की यह खोज निरंतर जारी है भविष्य में और कई नए गृह खोजे जाने की संभावना है ।


ज्योतिष में पृथ्वी नाम का कोई ग्रह नहीं


ज्योतिष के अनुसार ग्रह की परिभाषा अलग है। भारतीय ज्योतिष और पौराणिक कथाओं में नौ ग्रह गिने जाते हैं, सूर्य, चन्द्रमा, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, राहु और केतु।


विज्ञान की दृष्टि से देखा जाये तो सूर्य ग्रह नहीं बल्कि तारा है । चन्द्रमा गृह नहीं बल्कि उपग्रह है तथा , राहू और केतु नामक ग्रह काल्पनिक हैं और इनका सौर मंडल में कोई अस्तित्व नहीं है । जिस ग्रह पृथ्वी पर हम रहते हैं उसका भी इन नवग्रहों में उल्लेख नहीं है ।


भारत के अलावा विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओं यथा ,मिस्त्र , बेबिलोनिया ,मेसोपोटामिया , यूनान आदि में खगोलशास्त्र पर बहुत काम हुआ है और ब्रह्माण्ड उसकी उत्पत्ति स्वरूप आदि के बारे में मान्यताएं विकसित हुईं ।

शरद कोकास




मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

ज़िंदगी क्या है जान गए ना ?


आप में से ऐसा कोई नहीं होगा जिसने कभी ज़िंदगी के बारे में न सोचा हो । कोई कहेगा ज़िन्दगी एक पहेली है कोई कहेगा जीवन पानी का बुलबुला है ,जीवन एक उड़ती हुई पतंग है वगैरह वगैरह । जीवन के बारे में हर कवि ने दो चार पंक्तियाँ तो लिख ही डाली हैं । निदा फाज़ली साहब का मशहूर शेर है ..


”जीवन क्या है,चलता फिरता एक खिलौना है
दो आँखों में एक से हंसना एक से रोना है ।


मुझे भी जीवन के बारे में कविताएँ बहुत अच्छी लगती हैं और जीवन को परिभाषित करने वाली एक कविता तो मुझे बेहद पसन्द है ..


” ज़िन्दगी क्या है जान जाओगे / रेत पे लाके मछलियाँ रख दो “


मैंने भी अपनी लम्बी कविता “ पुरातत्ववेत्ता ‘ में जीवन के बारे में लिखा है .."


और जीवन भी कोई गोलगप्पा नहीं / जिसे आप पुदीने की चटनी मिले पानी में डुबायें /और परम संतृप्तता के भाव में गप से खा जाएँ । “


जीवन की परिभाषा ढूँढने वाले कवियों को अपना काम करने दीजिये, हम अपना काम करते हैं । जीवन कहाँ से आया यह हम देख चुके हैं , अब हम जीवन की वैज्ञानिक परिभाषा देखते हैं । पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ हो चुका था लेकिन मानव जीवन के आगमन में अभी समय था । पेड़-पौधे ,कीड़े-मकोड़े, रेंगने वाले जीव तैरने वाले जीव और उड़ने वाले जीवों का आगमन हो रहा था । यह सब सजीव थे और इनमें जीवन के सभी लक्षण मौजूद थे । हम मनुष्य हैं इसलिए हमें तो मनुष्य के जीवन से मतलब है इसलिए मनुष्य के जन्म का समाचार जानने से पहले हम जान लें ,आखिर यह सजीव होना क्या है ?


ध्यान रखिये जीव का अर्थ यहाँ आत्मा नहीं है - जीवन के बारे में अगर आप जानते हैं तो आपको यह भी पता ही होगा कि हम मनुष्य,अन्य प्राणि,कीट-पतंगे और पेड़-पौधे सभी सजीवों की श्रेणि में आते हैं । सजीवों के कुछ विशेष लक्षण होते हैं जैसे जन्म लेना,बढ़ना, सांस लेना, भोजन , उत्सर्जन , गति, उत्तेजना तथा संतानोपत्ति और अंतत: मृत्यु आदि। ये सजीव अपने आसपास से अपने जीवन के लिए आवश्यक वस्तुयें ग्रहण करते हैं । सजीवों के सभी लक्षण जीवन के फलस्वरुप ही होते हैं । सजीवों के शरीर में जीवन के लिए आवश्यक क्रियाशीलता बनी रहती है । यह क्रियाशीलता उनके पदार्थ जीव द्रव्य विभिन्न तत्वों तथा यौगिकों का विशिष्ट संगठन हैं। इस प्रकार जीव संगठित द्रव्य है तथा जीवन उसकी क्रियाशीलता । जीवन के होने के लिए एक शरीर आवश्यक है। शरीर से बाहर जीवन नहीं हो सकता । शरीर और जीवन का तालमेल ही एक सजीव को होने का अर्थ प्रदान करता है । जीवन को बेहतर तरीके से जानने के लिए जरूरी है शरीर को जानना ।


जीवन में प्रोटीन , डी.एन.ए. और जल की महत्ता


मैं आपको पुरानी हिन्दी फिल्मों का एक दृश्य याद दिलाना चाहता हूँ । कटघरे में एक स्त्री खड़ी है और वह चीख चीख कर कह रही है "इस बच्चे का पिता यही है मी लॉर्ड ।" दूसरे कटघरे में एक विलेन टाइप का पुरुष चेहरे पर कुटिल मुस्कान लिए खड़ा है । उसका वकील कह रहा है "लेकिन इसका तुम्हारे पास क्या सबूत है ?" अब फिल्मों में ऐसा दृश्य नहीं होता इसलिए कि अब समय बदल गया है और विज्ञान ने साबित कर दिया है कि बच्चे के डी.एन.ए. से पिता का डी.एन.ए. मिलाकर यह जाना जा सकता है कि उसका वास्तविक पिता कौन है । अब तो टी.वी.धारावाहिक देखने वाले बच्चे भी इस बात को बखूबी जानते हैं कि बच्चे के पिता का पता लगाने के लिए दोनों के डी.एन.ए. का मिलान आवश्यक है । अब देखते हैं कि यह डी एन ए क्या बला है ? इससे पूर्व यह जानना ज़रूरी है कि कोशिका क्या है ।

शरद कोकास 


गुरुवार, 7 सितंबर 2017

आप भी करोड़पति बनना चाहते हैं?


 
करोडपति बनाने की इच्छा किसकी नहीं होती लेकिन धर्म और परम्पराओं के नाम पर या अज्ञानतावश कई बार हम ऐसे विश्वास पाल लेते हैं जिनसे हमें कुछ मिलना तो दूर बल्कि हमारा आर्थिक नुकसान ही होता है । यद्यपि हम अज्ञानतावश उनसे अनजान रहते हैं ।


एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है । बरसों पहले दीपावली के समय की बात है । मैं घर से दूर किसी अन्य शहर में अपने मित्र के यहाँ था । वह मित्र अविवाहित था अकेला ही रहता था और गृह में कोई गृहलक्ष्मी नहीं थी लेकिन धन की देवी लक्ष्मी पर उसकी आस्था थी । पूजन संपन्न होने के पश्चात मैंने अपने मित्र से कहा चलो शहर की रौशनी देखकर आते हैं । हम लोग जब निकलने लगे तो मैंने उससे कहा "दरवाज़ा बन्द कर ताला तो लगा दो ।" उसने सहजता से कहा "आज के दिन लक्ष्मी कभी भी आ सकती है इसलिए द्वार पर ताला नहीं लगाया जाता ।" मैंने कहा “ और चोर आ गए तो ? “ और सचमुच ऐसा ही हुआ । जब हम लोग लौटे तो चोर लक्ष्मीजी के पास रखी नकदी पर हाथ साफ कर चुके थे । वह बैचलर था सो उससे ज्यादा तो उसके घर में कुछ था भी नहीं । मैंने हँसते हुए कहा 'देख लो , यह क्यों भूल गए कि जिस दरवाज़े से लक्ष्मी आ सकती है उससे जा भी तो सकती है ।'


मित्रों , यह बरसों पुरानी बात है अब शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो लक्ष्मी जी के आगमन की प्रतीक्षा में अपने घर के द्वार खुले छोड़कर चले जाए इसलिए कि अब सब जानते हैं धन मेहनत से कमाया जाता है ऐसे ही नहीं मिल जाता ।


हालाँकि अब भी लोग लाटरी में विशवास करते हैं , उम्मीद करते हैं कि उन्हें लाटरी मिल जाएगी , या कहीं से गडा हुआ धन मिल जाएगा । हम में से कई लोग हैं जो अभी भी करोडपति बनने की उम्मीद में जाने कहाँ कहाँ किन किन फर्जी कंपनियों में अपना धन लगाते रहते हैं । मोबाइल पर मेसेज आता है कि आपको लाटरी लग गई है , फलाने अकाउंट में इतना इतना पैसा जमा करा दीजिये और लोग करवा देते हैं फिर पता चलता है कि यह भी एक फ्राड था । क्या यह भी एक तरह का अन्द्धविश्वास नहीं है ?


तात्पर्य यह कि हमें सायास विश्वास और अन्धविश्वास के इस दुष्चक्र से निकलना बहुत ज़रूरी है अन्यथा हम जीवन भर उन्हीं मान्यताओं और जर्जर हो चुकी परम्पराओं को ढोते रहेंगे और इसका नुकसान उठाते रहेंगे । हालाँकि इससे कोई विशेष नुकसान नहीं है , क्योंकि इतनी बुद्धि तो हम में है कि जैसे ही हमें नुकसान की सम्भावना दिखाई देती है हम सतर्क हो जाते हैं ।


शरद कोकास


*(शरद कोकास की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक "मस्तिष्क की सत्ता" से)*

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