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शनिवार, 29 जुलाई 2017

चेतना और पदार्थ की परिभाषा

हमारी त्वचा 

          चेतना का अर्थ आप जानते होंगे ,चेतना अर्थात हमें उद्वेलित करने वाली गर्व ,लज्जा,क्रोध,हर्ष, प्रेम, घृणा आदि भावनाएं ,हमारे नेत्र,नाक,कान, जिव्हा,स्पर्श आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त अनुभूतियाँ ,और अंततः हमारे मस्तिष्क को सदा व्यस्त रखने वाले विचार यह सब चेतना है । चेतना से बाहर जो कुछ भी है वह सब पदार्थ है । पदार्थ मतलब हमारे चारों ओर उपस्थित वस्तुएं या पिंड जिनमें भौतिकीय ,यांत्रिकीय रासायनिक तथा शरीर क्रियात्मक प्रक्रियाएं घटती रहती है उन्हें ही भौतिकीय परिघटनाएं अथवा पदार्थ या भूतद्रव्य कहा जाता है । हमारी चेतना के निर्माण में इन ज्ञानेन्द्रियों की प्रमुख भूमिका है बिना इनकी सहायता के हम अनुभूतियों को अपने मस्तिष्क में दर्ज नहीं कर सकते .
जैसे जैसे मनुष्य के शरीर का विकास होता है वह अन्य मनुष्यों के संपर्क में आकर विभिन्न कार्य सीखता है , रंग, ध्वनि व गंध में भेद करने लगता है इस तरह उसकी भावनाएं परिष्कृत होती हैं । जब उसका शरीर दुर्बल पड़ने लगता है ,अनुभूतियों और विचार करने की क्षमता पर भी उसका प्रभाव पड़ता है । इस तरह हम देखते हैं कि मनुष्य की चेतना का आलंबन उसका यह भौतिक शरीर ही है . अन्य प्राणियों से इतर मनुष्य के भीतर यह क्षमता है कि वह कुछ करने से पहले उसके बारे में सोच सकता है । मनुष्य की मुक्ति की आकांक्षा और समाज में व्याप्त शोषण और अन्याय के खिलाफ विचार करने की क्षमता और फलस्वरूप उपजे क्षोभ ने ही उसे शोषकों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया । इतिहास गवाह है कि मेहनत कश इंसान और प्रभुत्व संपन्न वर्ग के बीच हमेशा से संघर्ष रहा है, उसकी भौतिक स्थितियों ने ही हमेशा उसे संघर्ष के लिए प्रेरित किया है । इस संघर्ष में उसकी चेतना की प्रमुख भूमिका है ।
ज्ञानेन्द्रियों के विषय में और अधिक जानने के लिए यहाँ ज्ञानेन्द्रियों पर क्लिक करें (चित्र भारतकोश से साभार)

शरद कोकास 

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

क्या आप भी अमर होना चाहते हैं

यद्यपि स्वयं का जन्म मनुष्य के वश में नहीं है न ही वह इसके लिए उत्तरदायी है लेकिन जन्म लेने के पश्चात यह जीवन और यह शरीर उसे इतना प्रिय लगने लगता है कि लाख कष्टों के बावज़ूद वह इसे जीवित रखने का भरसक प्रयास करता है । यह स्वाभाविक भी है । वह उन समस्त सुख-सुविधाओं का उपभोग करना चाहता है जो उसके पूर्वजों द्वारा अनवरत परिश्रम से जुटाई गई हैं । वह स्वयं भी इस मनुष्य जाति के विकास हेतु कटिबद्ध है , आनेवाली पीढ़ी के लिए वह अधिक से अधिक सुविधाएँ जुटाने की इच्छा रखता है और उसके लिए नित नये आविष्क़ार कर भविष्य के मनुष्य की बेहतरी के लिए कुछ करना चाहता है । मनुष्य के भीतर सारी सुख - सुविधाओं के साथ जीते हुए अमर होने की एक सुप्त इच्छा भी होती है , । हालाँकि वह इस बात को बेहतर जानता है कि न कोई अमर हो सकता है न कोई इस जन्म में सुख पाने के विचार को स्थगित कर अगले जन्म में सुख पाने की अभिलाषा कर सकता है । हमें जो चाहिए वह इसी एकमात्र जन्म में चाहिए क्योंकि मनुष्य या किसी भी प्राणी का सिर्फ एक ही जन्म होता है ।


लेकिन यहीं कहीं कुछ चालाक लोग उसकी इस सुप्त इच्छा को भुनाते हुए उसे पाप - पुण्य , मोक्ष , पुनर्जन्म आदि के जाल में फंसाते हैं । वे उन्हें बरगलाते हुए कहते हैं कि भाइयों इस जन्म में आपको सुख मिले न मिले अगले जन्म में जरूर मिलेगा , बस जरा दान - पुण्य करें । यह वे लोग हैं जो आपको कर्म से विमुख करते हैं और भाग्यवादी बनाते हैं । यह लोग ईश्वर और धर्म के नाम पर आपका शोषण करते हैं । इस दिशा में विचार करने की आवश्यकता है कि यह स्थितियाँ किन कारणों की वज़ह से हैं । वैसे भी हम विचारवान मनुष्य हैं ,अपने पूर्वजों की तरह इस दिशा में लगातार प्रयत्नशील हैं और मनुष्य होने के कर्तव्य का निर्वाह कर रहे हैं । एक मनुष्य के रूप में हर व्यक्ति एक चेतना संपन्न व्यक्ति है और एक सुदृढ़ मस्तिष्क का मालिक है ।


शरद कोकास

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

कामिनी से लेकर कमीने तक


                                      
मनुष्य के मस्तिष्क ने अपने ऐतिहासिक विकासक्रम में भाषा की क्षमता अर्जित की है । आदिम मनुष्य ने अपने दैनिक क्रियाकलाप में शामिल व्यवहार में संकेतों को धीरे धीरे शब्द दिये । कालांतर में यही शब्द कार्य व्यवहार में लाये गये । स्मृति में शब्दों का समावेश तथा शब्दों द्वारा वाक्य संरचना की इस क्षमता का विकास हमारे मस्तिष्क में हमारे बचपन में ही हो जाता है और हम अक्षर जोड़ जोड़ कर शब्द बनाने लगते हैं । हमारे माता- पिता और समाज के लोग इस क्षमता के विकास में हमारे सहायक होते हैं । शाला में यह कार्य भलिभाँति सिखाया जाता है और मस्तिष्क अपनी यह विशेष क्षमता प्राप्त कर लेता है । जिन बच्चों मे यह क्षमता देरी से विकसित होती है वे पूरे शब्द बोलने में देर लगाते हैं या शब्दों का ग़लत उच्चारण करते हैं ।

पाल ब्रोका

सर्वप्रथम शरीरक्रिया विज्ञानी फ्लोरेंस ने कबूतरों पर प्रयोग कर मस्तिष्क के विभिन्न क्रियाकलापों पर अध्ययन किया । उन्होंने यह निष्कर्ष दिया कि मस्तिष्क के विभिन्न भागों की अलग अलग विशेषतायें होती हैं तथा इनके गुण भी अलग अलग होते हैं । अलग अलग स्थानों के अलग अलग कार्यों के बावज़ूद स्नायुमंडल समग्र रूप से कार्य करता है । फ्लोरेंस के कार्यों को पाल ब्रोका ने आगे बढ़ाया और उन्होंने सन 1861 में मस्तिष्क के भाषा क्षेत्र की खोज की । उन्होंने बताया कि बायें मस्तिष्कीय गोलार्ध के बगल में भाषा का केन्द्र अवस्थित होता है । मनोवैज्ञानिक ब्रोका के इस योगदान के फलस्वरूप मस्तिष्क के इस केन्द्र को मनोविज्ञान के क्षेत्र में ' ब्रोकाज़ एरिया ' के रूप में जाना जाता है । ब्रोका के इस कार्य को अन्य शरीर क्रिया विज्ञानियों फ्रिट्श तथा हिटज़िग ने आगे बढ़ाया ।
मस्तिष्क के इस क्षेत्र में अक्षरों से शब्द बनाने का काम होता है । मान लीजिये मैं आपको चार अक्षर देता हूँ ल ब ग और र और कहता हूँ कि इनसे कोई शब्द बनाईये तो आप तुरंत कहेंगे “ब्लॉगर “ । उसी तरह मैं आपको तीन शब्द दूँ ' म ' ' क ' और ' न ' तो आप मकान, नमक , कान ,नाक, कमान, काका, नाना, मामा, कमान, नमक, और कामिनी से लेकर कमीने तक सारे सम्भाव्य शब्दों की रचना कर डालेंगे । उसी तरह ' म ' ' न ' और ' र ' अक्षरों से आप मन , नर , मर ,राम ,मार , मरन , रमन ,नरम ,मीनार आदि शब्द बना सकते हैं ।
अक्षरों से शब्दों के निर्माण में उनका उच्चारण विशेष महत्व रखता है । एक बच्चे ने अपने अध्यापक से कहा “ सर ‘ नटूरे ‘ यानि क्या होता है ? “ अध्यापक ने कभी इस तरह का शब्द नहीं सुना था अत: उसने कहा " ऐसा कोई शब्द नहीं होता । अगर इस तरह के फालतू सवाल करोगे तो स्कूल से निकाल दिये जाओगे ।“ तब उस छात्र ने निराश होकर कहा “ सर इससे तो मेरा ‘ फुटूरे ‘ खराब हो जाएगा । “ बहुत देर बाद अध्यापक की समझ में आया कि वह ' नेचर ' ( NATURE ) और ' फ़्यूचर ' (FUTURE ) की बात कर रहा है ।
इसी तरह शब्दों से वाक्य बनाने का काम भी मस्तिष्क के इसी क्षेत्र में सम्पन्न होता है । यदि मैं आपको तीन शब्द दूँ प्रदत्त , जल और प्रकृति “ तो आप तुरंत कह उठेंगे “ जल प्रकृति प्रदत्त है “ । सामान्य मनुष्य के अलावा एक कवि ,लेखक या वक्ता के लिये यह जानना बहुत ज़रूरी है कि यह कार्य मस्तिष्क किस प्रकार करता है । साधारण मनुष्य और लेखक दोनो के पास शब्द-भंडार लगभग समान होता है लेकिन लेखक कविता ,कहानी ,निबंध , ब्लॉग इत्यादि लिखता है और सामान्य व्यक्ति यह सब नहीं लिख पाता । इसका सरल सा कारण है कि लेखक अपने मस्तिष्क की इसी क्षमता का उपयोग कर व्यवस्थित रूप से शब्दों का उपयोग कर वाक्य संरचना करता है । एक लेखक के लिये वाक्य संरचना के अलावा ज्ञान, कल्पना , बिम्ब निर्माण तथा विषय की जानकारी आदि अन्य गुणों का होना भी आवश्यक है । लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सामान्य व्यक्ति मस्तिष्क की इस क्षमता का उपयोग नहीं करता । यदि वह इस क्षमता का उपयोग नहीं करेगा तो अपने विचारों को वाक्यों के द्वारा अभिव्यक्त नहीं कर पायेगा । मस्तिष्क की इस कार्यप्रणाली का हम अपने जीवन में सबसे अधिक प्रयोग बोलने में ही करते हैं । इसी क्षमता के कारण हम अपने शब्द भंडार , व्याकरण व भाषा के ज्ञान का सार्थक उपयोग करते हैं । - शरद कोकास

( चित्र गूगल छवि से साभार )