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बुधवार, 13 मई 2026

सूरज से आती है ओम की आवाज़

आपको याद होगा कुछ साल पहले एक अफवाह फैलाई गई थी कि "नासा-के-वैज्ञानिकों" ने माना है कि सूरज से " ॐ " की आवाज निकलती है?

बहुत सारे लोगों ने धूप मे खड़े होकर सूर्य से निकलने वाली इस आवाज़ को सुनने की कोशिश की लेकिन उन्हे कुछ सुनाई नहीं आया । 

दरअसल नासा (NASA) के वैज्ञानिकों ने कभी यह नहीं कहा कि सूरज से "ॐ" (Om) की आवाज आती है। यह दावा पूरी तरह से गलत और भ्रामक है।

यह अफवाह क्यों उड़ी और इसकी असलियत क्या है, इसे आप नीचे दिए गए बिंदुओं से समझ सकते हैं:

नासा का असली डेटा: 2018 में, नासा ने सूर्य की आंतरिक गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले कंपनों (vibrations) का एक ऑडियो जारी किया था। वैज्ञानिकों ने बताया कि यह एक धीमी, धड़कन जैसी हूम (Humming) की आवाज है, जो सूर्य के भीतर सामग्री के प्रवाह और लहरों के कारण पैदा होती है।

आवाज का रूपांतरण (Sonification): चूंकि अंतरिक्ष एक निर्वात (vacuum) है, वहां ध्वनि यात्रा नहीं कर सकती। नासा ने सूर्य के डेटा और चुंबकीय लहरों के कंपनों को सोनिफिकेशन (Sonification) तकनीक के जरिए इंसानी कानों के सुनने योग्य आवाज में बदला था।
अफवाह की शुरुआत: सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इस "हूम" की आवाज को हिंदू धर्म के पवित्र मंत्र "ॐ" से जोड़ दिया। जब पुडुचेरी की पूर्व उपराज्यपाल किरण बेदी और कुछ अन्य हस्तियों ने इस दावे वाला वीडियो साझा किया, तो यह अफवाह जंगल की आग की तरह फैल गई। बहुत सारे लोगों ने इसे सिद्ध कारण के लिए एडिट करके वीडियो मे ओम की ध्वनि भी जोड़ दी  । बाद में कई लोगों ने इस गलती के लिए माफी भी मांगी।

वैज्ञानिक स्पष्टीकरण: नासा ने स्पष्ट किया है कि उनके द्वारा रिकॉर्ड किए गए विभिन्न नमूनों में से कोई भी आधिकारिक रूप से "ॐ" नहीं है। यह केवल सुनने वाले की अपनी व्याख्या (interpretation) हो सकती है, वैज्ञानिक तथ्य नहीं।

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कुछ वैज्ञानिक तर्क इस तरह भी दिए जाते हैं   

1.किसी वस्तु के गिरने, टूटने, टकराने, वायु के प्रवाह आदि से निकली लम्बी आवाज से भी ‘स्वरों’ के रूप में ध्वनि  पैदा हो सकती है | कभी-कभी सुनसान जगह पर भी हमें एक विशेष प्रकार की ‘लयबद्ध’ ध्वनि सुनायी देती है, प्रायः वहां भी ध्वनि का ‘उच्चारण’ “स्वर” के रूप में होता है न की “व्यंजन” | इसे पल्सेटाइल टिनिटस (Pulsatile Tinnitus) कहते हैं या मस्तिष्क का स्वतः ध्वनि बनाना (Phantom Sound)कहते हैं । 
2. प्रायः वह ध्वनि हमारे लिए कानों द्वारा सुनने पर, हमारी सोच और मानसिकता पर निर्भर करती हैं | जैसे गला दबाने पर गों गों की आवाज़ निकलती है , यह आपको ओम ओम भी सुनाई दे सकता है । 

3. वैसे ‘सूर्य’ आग का गोला है | हम भी जब ‘आग’ जलाते हैं तब आग की ‘लपटों’ से ध्वनि भी सुनायी देती है | जैसे लकड़ी जलने की आवाज़ तिड तिड आती है या सूं सूं की आवाज़ आती है ।  यह ध्वनि भी हमारे कानों द्वारा सुनने और हमारी मानसिकता और साथ में ‘वायु’ के प्रवाहानुसार अलग-अलग परिभाषित हो सकती है | 

वैसे ध्वनि कानों से सुनने के लिए एक माध्यम की जरुरत भी होती है जैसे मनुष्यों के स्वर के लिए उनका स्वर यन्त्र ज़िम्मेदार होता है वैसे ही जानवरों के भी । जैसे किसी ‘कुत्ते’ के भोंकने पर यदि किसी बालक से पूछे की कुत्ता कैसे भोंक रहा था ? तब वह कह सकता है की ‘कुत्ता’ “भों-भों…” की आवाज निकाल रहा है | वही किसी अन्य बालक से पूछने पर “वऊ-वऊ”, “भू-भू”, “हु-हु” जैसे शब्द सुनने को मिल सकते है जिन्होंने कुत्ते की ध्वनि का विश्लेषण किया हो !ठीक इसी प्रकार वस्तुओं के गिरने, टूटने, टकराने से निकली आवाज को भी हम विभिन्न ‘स्वरों’ और ‘व्यंजनों’ के रूप में जोड़कर आभाषित कर सकते हैं । 
इनमे कौनसी बात सही है कौनसी गलत है यह देखते हैं

मानसिकता और व्याख्या (Perception): यह बात बिल्कुल सही है कि हमारा मस्तिष्क किसी भी अपरिचित ध्वनि को हमारे द्वारा पहले से सुने गए शब्दों या अर्थों में ढालने की कोशिश करता है। इसे मनोविज्ञान में 'Pareidolia' (पैरिडोलिया) कहते हैं। जैसे बादलों में चेहरा दिखना, वैसे ही शोर में कोई शब्द सुनाई देना।

पैरिडोलिया (Pareidolia) क्या है?

यह हमारे मस्तिष्क की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है जिसमें वह अस्पष्ट या बेतरतीब (random) आवाजों या दृश्यों में एक जाना-पहचाना पैटर्न खोजने की कोशिश करता है।
उदाहरण: बादलों में किसी जानवर की आकृति दिखना, बिजली के स्विच बोर्ड में मुस्कुराता हुआ चेहरा नजर आना, या पंखे की आवाज़ में किसी का नाम सुनाई देना।
इस पेड़ मे स्त्री नज़र आती होगी 
सूरज के मामले में: जब लोगों ने सूरज की 'हूमिंग' (गुनगुनाहट) सुनी, तो उनके मस्तिष्क ने उसे उनके सबसे परिचित धार्मिक शब्द 'ॐ' के सांचे में ढाल दिया। यह सुनने वाले की मानसिक धारणा का परिणाम था।

स्वर (Vowels) बनाम व्यंजन (Consonants): यह बात वैज्ञानिक रूप से सही है कि प्राकृतिक आपदाओं, हवा या आग से निकलने वाली ध्वनियाँ अक्सर 'निरंतर' (Continuous) होती हैं, जो 'स्वरों' (Vowels जैसे- अ, ओ, ऊ) जैसी लगती हैं। 'व्यंजन' (Consonants जैसे- क, ख, प) बोलने के लिए जीभ, होंठ या दांतों के घर्षण की ज़रूरत होती है, जो निर्जीव वस्तुओं में नहीं होता।

अनुकरण (Onomatopoeia): कुत्ते के भोंकने वाला उदाहरण एकदम सही है। अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों में एक ही जानवर की आवाज़ को अलग-अलग शब्दों में लिखा जाता है। उदाहरण के लिए, बिल्ली को हम "म्याऊं" कहते हैं, जबकि अंग्रेज़ी में "Meow" और जापानी में "Nya" कहा जाता है। यह सुनने वाले के विश्लेषण पर निर्भर करता है।

माध्यम की आवश्यकता: यह भौतिक विज्ञान का अटल सत्य है कि ध्वनि को यात्रा करने के लिए हवा, पानी या ठोस जैसे माध्यम की ज़रूरत होती है।

उपरोक्त तर्कों मे कहीं कहीं थोड़ा तकनीकी अंतर है

शून्य (Vacuum) में ध्वनि: आग की लपटों का उदाहरण दिया, जो धरती पर सही है। लेकिन सूर्य अंतरिक्ष में है जहाँ 'हवा' नहीं है, इसलिए वहाँ से कोई भी आवाज़ सीधे हमारे कानों तक नहीं पहुँच सकती। नासा ने जो आवाज़ सुनाई, वह 'ध्वनि' नहीं बल्कि 'डेटा' (Magnetic Waves) को साउंड में बदला गया रूप था।

नासा ने चुंबकीय तरंगों को आवाज़ में कैसे बदला? (Sonification)
चूंकि अंतरिक्ष में निर्वात (vacuum) है, वहां ध्वनि की तरंगें यात्रा नहीं कर सकतीं। नासा ने इसे 'सोनिफिकेशन' तकनीक से मुमकिन बनाया:

डेटा कैप्चर: नासा के SOHO (Solar and Heliospheric Observatory) जैसे उपग्रह सूरज की सतह पर होने वाले कंपन और चुंबकीय तरंगों (electromagnetic waves) को रिकॉर्ड करते हैं।

रूपांतरण: इन तरंगों की फ्रीक्वेंसी बहुत कम होती है (इंसानी कान इन्हें नहीं सुन सकते)। वैज्ञानिक सॉफ्टवेयर का उपयोग करके इन तरंगों की गति को हजारों गुना बढ़ा देते हैं और उन्हें साउंड वेव में बदल देते हैं।

परिणाम: यह ठीक वैसा ही है जैसे रेडियो स्टेशन सिग्नल को आवाज़ में बदलता है। जो आवाज़ हमें सुनाई देती है, वह असल में "डेटा का ऑडियो वर्जन" है।

गला दबाने या आग की आवाज़: यह सही है कि ये आवाज़ें 'ॐ' जैसी सुनाई दे सकती हैं, लेकिन वे 'ॐ' होती नहीं हैं। यहाँ 'सुनाई देने' (Subjective) और 'होने' (Objective) के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है। यह पूरी तरह सुनने वाले के सांस्कृतिक और धार्मिक बैकग्राउंड पर निर्भर करता है।

निष्कर्ष

अधिकांश बातें सही और तार्किक हैं। ध्वनि का भौतिक रूप (Vibration) एक सच्चाई है, लेकिन उस ध्वनि का 'अर्थ' निकालना (जैसे उसे ॐ, भों-भों या हूमिंग कहना) पूरी तरह से मानव मस्तिष्क और उसकी धारणा पर निर्भर करता है। सूरज के मामले में भी यही हुआ—वैज्ञानिकों के लिए वह "Solar Hum" (सौर गुंजन) था, जबकि कुछ आम लोगों के लिए वह "ॐ" बन गया।

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क्या अन्य ग्रहों की भी आवाज़ रिकॉर्ड की गई है?

हाँ, नासा और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों ने सौरमंडल के लगभग सभी प्रमुख ग्रहों की 'आवाज़ें' (डेटा रूपांतरण के माध्यम से) जारी की हैं:

मंगल (Mars): 'परसेवेरेंस रोवर' ने मंगल पर असली माइक्रोफोन भेजे हैं। पहली बार हमने वहां की हवाओं और रोवर के चलने की असली आवाज़ सुनी है। यह डेटा रूपांतरण नहीं, बल्कि असली साउंड रिकॉर्डिंग है क्योंकि मंगल पर पतला वायुमंडल मौजूद है।

शुक्र (Venus): नासा के 'पार्कर सोलर प्रोब' ने शुक्र के ऊपरी वायुमंडल से गुजरते समय रेडियो सिग्नल रिकॉर्ड किए थे, जो एक डरावनी सीटी जैसी सुनाई देते हैं।

बृहस्पति (Jupiter): इसके चुंबकीय क्षेत्र की आवाज़ बहुत तेज़ और 'जंगली जानवरों के दहाड़ने' जैसी लगती है।

शनि (Saturn): शनि की रिंग्स और रेडियो उत्सर्जन से निकलने वाली आवाज़ें किसी पुरानी साइंस-फिक्शन फिल्म के बैकग्राउंड म्यूज़िक जैसी सुनाई देती हैं।

आपका 

शरद कोकास 

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शनिवार, 2 मई 2026

क्या पीपल रात मे केवल ऑक्सीजन छोड़ता है ?


क्या पीपल रात में केवल ऑक्सीजन देता है? एक वैज्ञानिक विश्लेषण



अक्सर यह कहा जाता है कि पीपल रात में भी ऑक्सीजन देता है, जबकि अन्य पेड़ रात मे कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2) छोड़ते हैं। इस बात मे कितनी सच्चाई है, आइए इसे फोटोसिंथेसिस (प्रकाश संश्लेषण) के आधार पर समझते हैं:

*1 .फोटोसिंथेसिस (प्रकाश संश्लेषण) क्या है ?* - सभी पेड़ पौधे हमारी ही तरह सजीव हैं और हमारी ही तरह इनके लक्षण हैं जैसे जन्म,पोषण वृद्धि और अंत में मृत्यु । यह अपने बढ़ने के लिए या जीवित रहने के लिए वातावरण से कार्बन डाय आक्साइड लेते हैं और सूरज की रौशनी तथा पत्तियों मे उपस्थित क्लोरोफिल की सहायता से उसे कार्बोहाइड्रट के रूप मे सहेज कर रखते हैं । यही उनका भोजन है और दैनिक गतिविधियों के लिए ऊर्जा है । अपना फूड बनाने की इस प्रोसेस में ऑक्सीजन बाय प्रॉडक्ट के रूप में उत्पन्न होती है तथा एनर्जी कार्बोहाइड्रट के रूप में उनके भीतर जमा हो जाती है ।



लेकिन ऐसा नहीं है कि पौधे सिर्फ कार्बन डाई ऑक्साइड ही लेते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं बल्कि वे इसका उल्टा भी करते हैं जैसे कि वे ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाईओक्सिड छोड़ते हैं यह तब होता है जब वे अपने भीतर सहेजें गए केमिकल्ज़ का इस्तेमाल अपनी वृद्धि और अन्य गतिविधियों के लिए करते हैं।



यह प्रोसेस रेसपिरेशन ही है जैसा कि हम करते हैं । इसके अंतर्गत वे ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ते हैं । पेड़ पौधे ऑक्सीजन लेने और छोड़ने तथा कार्बन डाइऑक्साइड लेने और छोड़ने का काम सतत करते हैं सामान्यतः पेड़ पौधे यह काम अपने पत्तियों में बने वॉल्वो के माध्यम से करते हैं जिन्हें स्टोमेटा कहा जाता है । दिन मे सूरज के प्रकाश में उनके स्टोमेटा सेल बंद रहते हैं इसलिए फ़ोटो सिंथेसिस की प्रक्रिया शुरू रहती है और वे co2 लेते हैं लेकिन रात मे रौशनी न होने के कारण इसका विपरीत होता है वे ऑक्सीजन लेते हैं और Co2 छोड़ते हैं । गैसों के एक्सचेंज वाला प्रोसेस कई तरह से होता है । इसमें पेड़ पौधे दो तरह का पाथ वे इस्तेमाल करते हैं । विज्ञान मे पेड़ पौधों के भीतर होने वाली अलग अलग रासायनिक क्रियाओं के आधार पर इन्हे C3 और C4 पाथ वे कहा जाता है । संसार में लगभग 85 % पेड़ों की प्रजाति सी थ्री पाथवे का ही इस्तेमाल करती है लेकिन इनके अलावा एक पाथ वे और होता है जिसे CAM Pathway कहा जाता है

​2 . सामान्य पेड़ों और पीपल में या इस तरह के अन्य पौधों में क्या अंतर है?

यह हमने देखा कि ज्यादातर पेड़ दिन मे फोटो सिन्थेसीस के माध्यम से अपना भोजन ग्रहण करते हैं , कार्बन डाय आक्साइड ग्रहण करते हैं और आक्सिजन छोड़ते हैं तथा रात में केवल श्वसन (Respiration) करते हैं, जिससे वे CO_2 छोड़ते हैं। लेकिन पीपल (और एलोवेरा, स्नेक प्लांट जैसे पौधे) CAM (Crassulacean Acid Metabolism) नामक एक विशेष प्रक्रिया या पाथ वे का पालन करते हैं।

*3. यह CAM (Crassulacean Acid Metabolism) नामक एक विशेष प्रक्रिया क्या है*


हमने देखा कि C3 पाथ वे का इस्तेमाल करने वाले पेड़ पौधे दिन में अपना स्टोमटा खोल कर रखते हैं जिससे वे कार्बन डाई ऑक्साइड ग्रहण करते हैं तथा ऑक्सीजन छोड़ते हैं लेकिन CAM पाथ वे का इस्तेमाल करने वाले पेड़ पौधे दिन में अपना स्टोमैटा बंद करके रखते हैं । इस पाथवें का इस्तेमाल उन पेड़ पौधों द्वारा किया जाता है जो बहुत सूखी जगहों में या जहाँ पर पानी का अभाव होता है वहाँ पैदा होते हैं या फिर दीवार पर या पेड़ों के तनों आदि पर पैदा होते हैं या वहाँ जहां पानी की बहुत कमी होती है। स्टोमैटा बंद करके रखने के कारण उनके पत्तों मे नमी बनी रहती है और धूप मे वे सूख नहीं पाते ।



लेकिन सवाल यह है कि इस प्रक्रिया में दिन में रंध्र छिद बंद होने के कारण वातावरण से कार्बन डाय आक्साइड लेना और ऑक्सीजन छोड़ना तो नहीं हो पाता तो वे यह काम रात को करते हैं अर्थात उनके स्टोमेटा के छिद्र रात मे खुलते हैं वे रात मे कार्बन डाय आक्साइड लेते और उनसे कई तरह के एसिड बनाकर अपने भीतर जमा कर लेते हैं जैसे पीपल रात में श्वसन तो करता है, लेकिन वह अपनी छोड़ी हुई और वातावरण की CO_2 को बाहर निकालने के बजाय भीतर सोख लेता है। वह इस CO_2 को 'मैलिक एसिड' के रूप में अपने पत्तों में स्टोर कर लेता है। इस रासायनिक प्रक्रिया के दौरान उप-उत्पाद (By-product) के रूप में ऑक्सीजन (O_2) मुक्त होती है। यद्यपि इसकी मात्रा दिन में छोड़ी है ऑक्सीजन की मात्रा से बहुत ही कम लगभग न के बराबर रहती है ।यह प्रोसेस उस समय अधिक होती है जब ऐसे पेड़ पौधे कठिन परिस्थिति मे जैसे दीवार पर सूखी जगह पर या जहां पानी की कमी होती है बढ़ते हैं । आपने भी दीवार पर उगे पीपल के पेड़ को देखा होगा।

4 . मैलिक एसिड का उपयोग:

हमने देखा कि कैम पाथ वे का इस्तेमाल करने वाले पेड़ पौधे जब मैलिक एसिड को अपने भीतर रात मे सहेज कर रख लेते हैं तो उसका उपयोग क्या करते हैं । अगले दिन जब सूरज निकलता है, तो यह पेड़ पौधे अपने रंध्र (Stomata) बंद कर लेते हैं ताकि पानी वातावरण मे न उड़े और फिर रात में जमा किए गए इसी 'मैलिक एसिड' को तोड़कर CO_2 निकालते है और अपना भोजन बनाते है।

5. फिर आक्सिजन का क्या होता है


यह प्रश्न स्वाभाविक है कि फ़ोटो सिंथेसिस के दौरान बनी हुई ऑक्सीजन का क्या होता है ? कैम पाथवे का इस्तेमाल करने वाले पेड़ पौधे जब स्टोमेटा बंद कर लेते हैं तो फिर ऑक्सीजन कैसे रिलीज करते हैं ? हाँ वे ऑक्सीजन रिलीज़ अवश्य करते हैं लेकिन दिन में कुछ कम और रात में जब उनके रंध्र पूरी तरह खुल जाते हैं कुछ अधिक आक्सिजन रिलीज करते हैं । इस तरह से उनकी यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है



6 . लेकिन क्या यह पीपल के पेड़ पर भी लागू होता है या यह केवल एक मिथ है?

यह पूरी तरह मिथ नहीं है, दरअसल यह प्रोसेस तब अधिक होती है जब पीपल का पेड़ छोटा होता है या वह ऐसी जगह पर उगता है जैसे दीवाल पर या किसी सूखी जगह पर जहाँ पर नमी बिल्कुल नहीं होती उस समय उसको नमी की आवश्यकता होती है और वह CAM पाथवे का उपयोग करता है। लेकिन जैसे जैसे वो बड़ा होता जाता है ऐसा माना जाता है कि तब वह C3 pathway में स्विच कर लेता है और अन्य पेड़ों की तरह ही व्यवहार करता है । यद्यपि यह एक विशेष जैविक अनुकूलन है और ऐसी स्थिति मे पीपल अन्य पेड़ों की तरह रात में CO_2 पैदा तो करता है, लेकिन उसे वातावरण में अधिक मात्रा में रिलीज नहीं करता, बल्कि उसकी ज्यादातर मात्रा 'रीसायकल' कर लेता है। इससे वातावरण में ऑक्सीजन का स्तर बना रहता है।

इसी श्रेणी में स्नेक प्लांट,कुछ विशेष तरह के कैक्टस प्लांट, आर्किड, एलोवेरा और पाइनेपल जैसे पौधे भी आते हैं जो पीपल से अधिक कैम पाथवे का उपयोग करते हैं । इनमें हम कई तरह की उन झाड़ियों को भी शामिल कर सकते हैं जो बहुत सूखी जगहों पर भी उगी रहती हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि क़ैम पाथवे का उपयोग करने वाले पेड़ पौधे अन्य पौधों की तुलना में अधिक ऑक्सीजन रिलीज करते हैं , वे भी अन्य पौधों की तरह ही ऑक्सीजन रिलीज करते हैं लेकिन यदि वे दिन में ज़्यादा नहीं कर पाते तो रात को कर लेते है अर्थात कुल मिलाकर 24 घंटे मे रिलीज होने वाली आक्सिजन की मात्रा उतनी ही रहती हैं।

पीपल की तरह इस तरह के अन्य पौधे भी एक 'प्राकृतिक एयर प्यूरीफायर' की तरह है जो किसी एक पाली मे नहीं बल्कि 24 घंटे वातावरण से CO_2 कम करने और ऑक्सीजन का संतुलन बनाए रखने में सक्षम है।

*वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं अंधविश्वास भगाएं*

शरद कोकास

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं की जाती


एक दिन एक मित्र ने कहा  " एक दिन डिस्कवरी पर जेनेटिक बीमारियों से सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम
देख रहा था ... उस प्रोग्राम में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा की जेनेटिक बीमारी न हो इसका एक ही इलाज है और वो है "सेपरेशन ऑफ़ जींस" मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नही करना चाहिए ..क्योकि नजदीकी
रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नही हो पाता और जींस लिंकेज्ड बीमारियाँ जैसे हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस, और एल्बोनिज्म होने का १००% चांस होता  है .. फिर मुझे बहुत ख़ुशी हुई जब उसी कार्यक्रम में ये दिखाया गया कि आखिर हिन्दूधर्म में हजारों सालों पहले जींस और डीएनए के बारे में कैसे लिखा गया है ? हिंदुत्व में कुल सात गोत्र होते है और एक गोत्र के लोग आपस में शादी नही कर सकते ताकि जींस सेपरेट (विभाजित) रहे.. उस वैज्ञानिक ने कहा कि आज पूरे विश्व को मानना पड़ेगा की हिन्दूधर्म ही विश्व का एकमात्र ऐसा धर्म है जो "विज्ञान पर आधारित" है !"

आइये उन मित्र के इस कथन की वैज्ञानिक आधार पर जांच पड़ताल करते हैं.। 

वास्तव मे जींस और डी एन ए की खोज बहुत बाद में हुई है , हिन्दू धर्म से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है । हिन्दुओ में ही नहीं बल्कि विश्व के सभी लोगों में इतना रक्त सम्मिश्रण हो चुका है कि अब रक्त सम्बन्धियों में विवाह होने के बावजूद इस तरह की जेनेटिक बीमारी होने की कोई संभावना बहुत कम है । विश्व के बहुत से समुदायों में रक्त सम्बन्धियों में विवाह होते हैं लेकिन इन बीमारियों का प्रमाण उतना ही है जितना रक्त सम्बन्धियों में विवाह न होने का । जींस का सेपरेशन लगातार होता है , मधुमेह जैसी बीमारी भी सगे भाई बहनों में सभी को नहीं होती , इसके अन्यान्य कारण हैं । ऐसा कोइ भी धर्म नहीं है जो विज्ञान पर आधारित हो । धर्म की रुढियों और मान्यताओं को विज्ञान नकारता है । 

चलिए इसे धर्म के आधार पर देखते हैं - 

हिन्दू धर्म और विशेष रूप से उत्तर भारतीय समाजों में 'समान गोत्र' (सगोत्र) में विवाह न करने की परंपरा के पीछे पौराणिक मान्यताएं और आधुनिक आनुवंशिक (Genetic) तर्क, दोनों ही दिए जाते हैं।

इसे समझने के लिए हम इसे तीन मुख्य हिस्सों में देख सकते हैं:

1. धार्मिक एवं पौराणिक आधार


धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 'गोत्र' का अर्थ उस मूल ऋषि से है जिससे किसी कुल का वंश आरंभ हुआ।

  • सहोदर भाव: एक ही गोत्र के होने का अर्थ है कि वे व्यक्ति एक ही पूर्वज की संतानें हैं। इस नाते वे आपस में भाई-बहन माने जाते हैं।

  • ऋषि परंपरा: माना जाता है कि सभी हिन्दू सप्तऋषियों की ही संतानें हैं। इसलिए एक ही गोत्र में विवाह को 'अगम्य गमन' (Incest) की श्रेणी में रखा गया है।

चलिए अब इसे वैज्ञानिक आधार पर देखते हैं 

2. वैज्ञानिक आधार (Genetics)


विज्ञान के दृष्टिकोण से इसे 'Inbreeding Depression' के जोखिम से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि 'गोत्र' पूरी तरह से वैज्ञानिक शब्द नहीं है, लेकिन इसके पीछे का तर्क आनुवंशिक है:

  • समान जींस का प्रभाव: एक ही कुल या वंश में विवाह करने से परिवार के 'रिसेसिव जींस' (Recessive Genes) के आपस में मिलने की संभावना बढ़ जाती है। यदि कुल में कोई आनुवंशिक बीमारी है, तो वह अगली पीढ़ी में उभरने का खतरा ज्यादा होता है।

  • विविधता (Diversity): विज्ञान मानता है कि दो अलग-अलग वंशों (Gene Pools) के बीच विवाह होने से संतान अधिक स्वस्थ और मानसिक रूप से सुदृढ़ होती है क्योंकि उसे जींस की विविधता मिलती है।

  • क्रोमोसोम का तर्क: गोत्र मुख्य रूप से पिता से पुत्र में जाने वाले Y-Chromosome पर आधारित माना जाता है। एक ही गोत्र में विवाह करने से Y-Chromosome का नवीनीकरण नहीं हो पाता।


चलिए अब इसे अन्य धर्मों और संस्कृति के आधार पर देखते है 


3. अन्य धर्मों में रक्त संबंधियों में विवाह और उसके प्रभाव


हाँ, कई संस्कृतियों और धर्मों (जैसे इस्लाम, या दक्षिण भारत के कुछ समुदायों) में चचेरे-ममेरे भाई-बहनों के बीच विवाह (Consanguineous Marriage) मान्य है। इसके प्रभावों पर शोध बताते हैं:

पक्षप्रभाव
आनुवंशिक विकाररक्त संबंधियों में विवाह से बच्चों में जन्मजात दोष (Congenital disabilities), अंधापन, या चयापचय (Metabolism) संबंधी बीमारियों का खतरा उन लोगों की तुलना में अधिक होता है जो पूरी तरह अलग वंश में विवाह करते हैं।
प्रतिरोधक क्षमताजींस में विविधता कम होने के कारण ऐसी संतानों की बीमारियों से लड़ने की क्षमता (Immunity) तुलनात्मक रूप से कम हो सकती है।
सामाजिक तर्कइन समुदायों में संपत्ति के बंटवारे को रोकने और पारिवारिक एकता को बनाए रखने के लिए इसे प्राथमिकता दी जाती है।

हालांकि, आधुनिक समय में हजारों वर्षों के बाद एक ही गोत्र के लोगों के बीच जींस का सीधा संबंध बहुत कम रह गया है, फिर भी जैविक स्वास्थ्य की दृष्टि से अलग-अलग वंशों में विवाह करना हमेशा श्रेष्ठ क्यों माना जाता है?


वास्तव मे हजारों वर्षों के मानव प्रवास और अंतर्जातीय विवाहों के कारण 'शुद्ध वंश' जैसा कुछ बचा नहीं है, फिर भी आनुवंशिकी (Genetics) के कुछ नियम आज भी प्रभावी हैं।

इसे हम दो मुख्य बिंदुओं से समझ सकते हैं:

1. रक्त सम्मिश्रण और 'रिसेसिव जींस' (Recessive Genes) का खेल क्या है ?

भले ही सदियों से रक्त का सम्मिश्रण हुआ हो, लेकिन Recessive Genes का खतरा अभी भी खत्म नहीं हुआ है।

छिपे हुए गुण:
हमारे शरीर में हर जीन के दो सेट होते हैं। कुछ बीमारियाँ (जैसे थैलेसीमिया या सिस्टिक फाइब्रोसिस) तभी होती हैं जब माता और पिता दोनों से खराब जीन मिले।


संभावना का तर्क: यदि आप अपने गोत्र से बाहर विवाह करते हैं, तो इस बात की संभावना बहुत कम हो जाती है कि आपके साथी के पास भी वही 'छिपा हुआ खराब जीन' होगा जो आपके पास है। लेकिन एक ही कुल में, वह खराब जीन पीढ़ी दर पीढ़ी सुप्त (Dormant) अवस्था में चलता रह सकता है और समान जीन मिलते ही बीमारी के रूप में प्रकट हो सकता है।

2. भाई-बहनों में बीमारी अलग अलग क्यों होती है?

हालांकि ऐसा न मानने का एक कारण यह भी है कि ऐसी संभावना बहुत कम होती है जैसे कि सगे भाई बहनों में से भी मधुमेह या इसी तरह की बीमारी सभी को क्यों नहीं होती ? यह एक बहुत ही तार्किक और गहरा सवाल है।

यह तर्क बिल्कुल सही है कि सगे भाई-बहनों को भी एक जैसी बीमारियाँ नहीं होतीं। इसका कारण 'Genetic Recombination' है:

रैंडम मिक्सिंग:
जब बच्चा पैदा होता है, तो उसे माता-पिता से 50-50% जींस मिलते हैं, लेकिन यह कौन से 50% होंगे, यह पूरी तरह रैंडम (यादृच्छिक) होता है।

उदाहरण: मान लीजिए माता-पिता के पास मधुमेह (Diabetes) का जीन है। मुमकिन है कि एक बच्चे को वह हिस्सा मिले जिसमें मधुमेह के जीन सक्रिय हों, और दूसरे को वह हिस्सा मिले जो स्वस्थ हो।

जोखिम बनाम निश्चितता:
विज्ञान 'निश्चितता' की बात नहीं करता, बल्कि 'जोखिम' (Probability) की बात करता है। सगे भाई-बहनों या एक ही गोत्र में विवाह करने से बीमारी होने की संभावना (Risk Factor) बढ़ जाती है, यह जरूरी नहीं कि बीमारी होगी ही।

अब अंतिम बात यह कि क्या आज के समय में गोत्र मायने रखता है?

आज के वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में, 'गोत्र' से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण 'निकटता' मायने रखती है।


दूरी का लाभ: सगे भाई-बहन सबसे निकट हैं (अधिक जोखिम), चचेरे-ममेरे भाई बहन थोड़े दूर (कम जोखिम), और एक ही गोत्र के अनजान लोग बहुत दूर (नगण्य जोखिम)।

आधुनिक स्थिति: क्योंकि अब जनसंख्या बहुत बढ़ चुकी है और लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर बस चुके हैं, इसलिए एक ही गोत्र के दो अनजान लोगों के बीच जींस का मिलन होना अब उतना खतरनाक नहीं रहा जितना शायद हजारों साल पहले रहा होगा जब कबीले छोटे थे।

यही कारण है कि आज के जेनेटिक एक्सपर्ट गोत्र के बजाय 'Family Medical History' और 'Genetic Screening' पर ज्यादा जोर देते हैं।

क्या आपको लगता है कि सामाजिक परंपराओं को अब वैज्ञानिक परीक्षणों (जैसे ब्लड टेस्ट) के आधार पर बदल जाना चाहिए?

आज के समय में 'एक ही गोत्र' में विवाह करने से किसी बड़ी बीमारी का खतरा उतना नहीं है जितना कि 'निकट रक्त संबंध' (जैसे सगे या चचेरे रिश्तेदारों) में विवाह से है। गोत्र की परंपरा अब वैज्ञानिक से ज्यादा एक सांस्कृतिक पहचान बनकर रह गई है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अब गोत्र देखने के बजाय 'Genetic Screening' (कुंडली के बजाय जींस का मिलान) की सलाह देता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि माता-पिता के जींस में कोई ऐसी समानता तो नहीं जो बच्चे के लिए घातक हो। 

शरद कोकास

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

मनुष्य ने अपने देवताओं का निर्माण किस तरह किया

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा


इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जायेगा
(बशीर बद्र)


मुसीबतें पहले भी कम नहीं थीं इंसान की ज़िन्दगी में । यह मानव जीवन का प्रारंभिक दौर था जब वह आदिम मनुष्य जन्म ,मृत्यु और प्रकृति के रहस्यों से नावाकिफ था , कार्य और कारण का सम्बन्ध स्थापित कर पाने की क्षमता उसमें नहीं थी । मतलब, वह नहीं जानता था कि धूप कैसे निकलती है , पानी कैसे बरसता है , बाढ़ या भूकंप कैसे आते हैं , सूरज चाँद कैसे उगते हैं , इन्सान कैसे जन्म लेता है और कैसे अचानक मर जाता है । जीवन उसके लिए सबसे बड़ा रहस्य था । उसे पता ही नहीं चलता था , कब बीमारियाँ और प्राकृतिक विपदायें उसे घेर लेती थीं और वह असमय ही काल के गाल में समा जाता था ।


जब उसे पता ही नहीं था कि यह सब कैसे घटित होता है तो कारण के अभाव में उसने मन ही मन यह मान लिया कि ऐसा होने के पीछे ज़रूर कोई न कोई है । फलस्वरूप अपने जीवन में जन्म से लेकर भूख ,बीमारी और शिकार प्राप्त करने की स्थितियों और अंततः मृत्यु तक में वह किसी अज्ञात शक्ति की कल्पना करने लगा । ऐसा होने के फलस्वरूप ऐसी अनेक मान्यताओं ने उसके जीवन में अपना स्थान मज़बूत कर लिया जिनका वास्तविकताओं से कोई सम्बन्ध नहीं था । उसने अपने विवेकानुसार जीवन को सुरक्षित रूप से संचालित करने के लिए अनेक मान्यताएँ गढ़ लीं । मानने का अर्थ ही मान्यता है ।



*यह प्रारंभिक मानव हर घटना को अत्यंत आश्चर्य भाव से देखता था तथा हर आश्चर्य के पीछे उसे किसी अज्ञात शक्ति का भास होता था । आसमान से पानी बरसता देखता तो उसे लगता वहाँ ऊपर कोई है जो पानी फेंक रहा है या बिजली चमका रहा है , भूकंप आता तो उसे लगता ज़मीन के नीचे कोई है जो उथल पुथल मचा रहा है , समुद्र से आने वाली सुनामी की ओर देखता तो उसे लगता कोई भीतर बैठा लहरों को उछल रहा है ,जंगल में लगी आग देखता तो लगता कोई है जो यह भीषण अग्निकांड कर रहा है । इस तरह उसके मन में इन अज्ञात शक्तियों के प्रति सर्वप्रथम भय पैदा हुआ और जब उन्होंने बहुत दिनों तक उसका कुछ नहीं बिगाड़ा बल्कि कुछ अच्छा ही किया तो फिर धीरे धीरे उनके प्रति श्रद्धा भी उत्पन्न हुई । आज भले ही हम इन सब बातों के वैज्ञानिक कारण जानते हों लेकिन आज भी हम जब ईश्वर के बारे में सोचते हैं तो उसी आदिम मान्यता के अनुसार सोचते हैं कि वह एक ऐसी शक्ति है जो या तो हमारा अच्छा करता है या फिर हमारा बुरा करता है ।*


इन आसमानी शक्तियों को देवता मान लेने के बाद फिर उसकी निगाह छोटी छोटी चीज़ों की ओर गई । जैसे वह जिस प्राणी का शिकार करता या जिस पेड़ से फल या कंदमूल प्राप्त करता उसे भी अपना आराध्य मानने लगा आखिर उसकी भूख उससे शांत होती थी और प्रारंभिक मानव के पास सिवाय भूख मिटाने के और क्या काम था । बस खाना पीना और सोना । ( आज भी बहुत से लोग सिर्फ यही करते हैं ।) भय,निद्रा,मैथुन और आहार यह जैविक प्रवृत्तियाँ उसके भीतर थीं लेकिन न उसे भूख लगने का कारण पता था न जन्म लेने का । जब उसे अपने पैदा होने का कारण नहीं पता चला तो उसने मान लिया कि यह पशु- पक्षी,पेड़ ,पर्वत या नदी ही उसके पूर्वज हैं और इन्हीं से उसके वंश की उत्पत्ति हुई है । पहाड़ों की गुफाओं में वह रहता था पहाड़ उसे आसरा देता था , नदी जल देती थी , पेड़ फल और छाँव देते थे ,प्राणी अपना मांस देते थे , सो यह सब उसके देवता होते गए ।


कालांतर में जब सम्पूर्ण मानवशास्त्र का अध्ययन हुआ तो उसके इन आराध्य देवताओं को टोटम कहा गया । आज भी आदिम समाज में ऐसे टोटेम का बहुत महत्त्व है जैसे बंगाल के संथाली कबीले के लोग अपना टोटेम जंगली हंस या बतख को मानते हैं और अपने पूर्वजों को हंस के अंडे से उत्पन्न मानते हैं । जिस पेड़ से उन्हें फल मिलते थे या जिस जानवर का वे मांस खाते थे वे भी उनके टोटेम थे । किसी का टोटेम पीपल है किसी का नीम , किसी का भालू, किसी का हिरण किसी का खरगोश ।


इस दौरान एक अजीब बात और हुई । जैसे कहीं कहीं पर टोटेम जीवों का मांस खाना या टोटेम पेड़ों के फल खाना सही माना जाता था इसलिए कि वे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे इसके विपरीत जहाँ इनकी संख्या नगण्य थी वहां इनका सेवन निषिद्ध था । कहीं किसी प्राणी का सिर खाना निषिद्ध था कहीं किसी का पैर । आज भी कई घरों में कुछ चीजें ,वनस्पति या जीव खाने की मनाही होती है उसका कारण यही मान्यता है जो सहस्त्राब्दियों से चली आ रही है । कई जातियों में ऐसे ही कई प्राणियों या पेड़ों को कुलदेवता माना जाता है । सांप, बिच्छू ,बन्दर, भालू , कच्छप भी कुछ कबीलों के टोटेम थे इसलिए कि या तो वे उनके लिए संहारक थे अथवा उनकी रक्षा करते थे । यह टोटेम वाद आदिम अर्थव्यवस्था में धर्म का ही एक रूप था । कालांतर में पूरी की पूरी जातियाँ ,वंश या कबीले भी इनके नाम से बने ।


*आज हम न सिर्फ प्रजनन शास्त्र के बारे में जानते हैं ,मानवशास्त्र के बारे में जानते हैं , बल्कि इनकी बहुत सारी शाखाओं का अध्ययन भी कर रहे हैं , सो यह सब कुछ कहानी की तरह ही लगता है बावज़ूद इसके हम अब भी इन मान्यताओं में ख़ुद को जकड़े हुए हैं ।*


*बशीर बद्र साहब के शेर का अर्थ समझ गए होंगे? इंसान ने इसी तरह पत्थर को इतना चाहा कि उसे देवता मान लिया और फिर प्रकृति रूपी उस देवता का इतना शोषण किया कि वह उससे रूठ गया , आज भी हम प्रकृति के साथ यही कर रहे हैं ना ? चाहत का दूसरा नाम दोहन भी है । कर लीजिये जितना चाहें .. कल को न ये नदियाँ रहेंगी न पहाड़ ,न पेड़ पौधे ना ऑक्सीजन , न पेट्रोल ..सब बेवफ़ा हो जायेंगे।*



*(शरद कोकास की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक "मस्तिष्क की सत्ता" से)*

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

आज के बच्चों का आई क्यू अधिक क्यों है

अलबर्ट आइन्स्टीन 
फिर आज का वैज्ञानिक कौन है ? वही जिसने नई नई मशीनें बनाईं , मोबाईल बनाया ,कंप्यूटर बनाया ,जो मनुष्य रॉकेट को अंतरिक्ष में भेज कर नये नये ग्रहों पर पहुंच रहा है और वहाँ बस्ती बसाने के स्वप्न देख रहा है वह आज का वैज्ञानिक है । भले ही आज हम पेड़ लुढ़का कर चक्के का आविष्कार करने वाले उस मनुष्य को उस काल का वैज्ञानिक न माने लेकिन उसके योगदान की उपेक्षा तो नहीं की जा सकती । हम उन सभी वैज्ञानिकों के ऋणी हैं जिन्होंने मानव जाति के उत्थान में अपना योगदान दिया । । मानव जीवन में विकास सम्बन्धी समस्त क्रांति पीढ़ी दर पीढ़ी उसके मस्तिष्क में दर्ज़ होती रही है । अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए वह मस्तिष्क की क्षमता का उपयोग कर नित नये आविष्कार करता रहा है ।


आज दस-बारह साल का एक बच्चा मनुष्य द्वारा किये जाने वाले वह तमाम कार्य कर लेता है जिन्हें सीखने में हमारे पूर्वजों को लाखों साल लगे । आप कहते हैं ना बच्चों का आई क्यू बढ़ गया है , वह इसी वज़ह से है कि हर पीढ़ी ने अपनी पिछली पीढ़ी से उसके द्वारा संचित यह ज्ञान ग्रहण किया है जो उसे उसकी पिछली पीढ़ियों से मिला इस तरह उसमे गुणात्मक वृद्धि हुई .


पृथ्वी पर जन्म लेने के बाद मनुष्य निरंतर प्रयोग करता गया और पिछले अनुभव के आधार पर पुराने को छोड़ नये को अपनाता गया । लेकिन सभ्यता के विकासक्रम में धीरे धीरे यह मनुष्य दो भागों में बँट गया कुछ लोग तो अपने पुरखों की तरह नवीनता की तलाश में जुट गए और कुछ ने अपने पूर्वजों द्वारा प्रदत्त ज्ञान को अंतिम मान कर संतोष कर लिया । इसका कारण यह नहीं था कि वे अपने जीवन के प्रति पूर्णतया संतुष्ट थे या उन्हें नवीनता की आवश्यकता ही नहीं थी लेकिन संभवतः वे यथास्थितिवादी थे । वे नवीनता और पुरातनता दोनों को एकसाथ स्वीकार करते रहे । आज उनका वंशज आधुनिक मनुष्य भी इन्ही दोनों का घालमेल बनकर रह गया है । विडम्बना यह है कि आज वह जहाँ नये को स्वीकार कर रहा है वहीं बगैर उनकी प्रासंगिकता परखे पुराने विश्वासों को भी साथ लिए चल रहा है ।


ऐसे लोग आज भी हैं जो एक ओर टेस्ट ट्यूब बेबी के जन्म के चिकित्सकीय विज्ञान से परिचित है वहीं दूसरी ओर प्राचीन ग्रंथों और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर इस बात में भी विश्वास करते हैं कि स्त्री, सूर्य की रोशनी से या हवा मात्र के संसर्ग से संतान को जन्म दे सकती है । एक ओर वह विज्ञान को भी मानते हैं और दूसरी ओर चमत्कारों में भी विश्वास रखते हैं ।


ऐसा क्यों है ? दरअसल मानव मस्तिष्क में कार्यरत इस दोहरी प्रणाली में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है इसलिए कि ज्ञान और विज्ञान दोनों ही उसने अपने पूर्वजों से जस का तस पाया है । जिन मनुष्यों ने विरासत में प्राप्त इस ज्ञान की विवेचना कर नये प्रयोगों के माध्यम से उसे खारिज किया है अथवा आगे बढ़ाया है और जो वास्तव में मनुष्य जाति के भविष्य के लिए चिंतित एवं प्रयासरत है वे मनुष्य ही मानव जाति का सच्चा प्रतिनिधित्व करते हैं । हम सच्चे वैज्ञानिक उन्हें ही कह सकते हैं ।


लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि शेष मनुष्य, मनुष्य कहलाने के हक़दार नहीं हैं । उन मनुष्यों का इसमें कोई दोष नहीं है । सैकड़ों वर्ष पूर्व ही उनके मस्तिष्क को विचार के स्तर पर पंगु बना दिया गया है ,उनसे सोचने समझने की शक्ति छीन ली गई है तथा धर्म एवं संस्कृति के नाम पर उनके भीतर यह भ्रम प्रस्थापित कर दिया गया है कि जो कुछ प्राचीन है वही अंतिम है ,वे आज भी यह अभिशाप जी रहे हैं ।


शरद कोकास
1 अगस्त 2017


रविवार, 30 जुलाई 2017

बीमार होने पर डॉक्टर के पास जाते हैं ना ?

सेलेरी बढ़ाने के लिए हम हड़ताल करते हैं ना 

यदि हम बीती सदियों के पन्ने पलटकर देखें तो हमें ज्ञात होगा कि इस बात पर दार्शनिकों में सदा विवाद होता रहा है कि चेतना प्रमुख है या पदार्थ । इस आधार पर दार्शनिक दो खेमों में बंट गए , विश्व को चेतना की उपज मानने वाले प्रत्ययवादी और चेतना को भौतिक विश्व या प्रकृति की उपज मानने वाले भौतिक वादी । जब तक समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास नहीं हुआ और भौतिकवाद की महत्ता स्थापित नहीं हुई यह विवाद चलता रहा । हम आज भी दार्शनिक बहसों में नहीं उलझना चाहते । ऐसा हम दर्शन की ठीक- ठाक समझ न होने के कारण करते हैं । दर्शन को सामान्यतः अध्यात्म से जोड़ कर देखा जाता है । बिना सिर पैर की बातें करने वाले के लिए भी हम कहते हैं देखो वह फिलोसफ़र टाइप की बातें करता है ।वास्तव में दर्शन का अर्थ होता है जीवन और स्थितियों के प्रति आपकी समझ और विश्व को जानने के प्रति आपका दृष्टिकोण । दर्शन आपसे सवाल करता है , आप अपनी परिस्थितियों को समाज की उपज मानते हैं या भाग्य की उपज ? आप अपनी समस्याओं का समाधान इसी जगत में ढूँढते हैं या पारलौकिक जगत में ? यह प्रश्न आपके दर्शन से सम्बन्ध रखता है ।

दर्शन की अवधारणा को लेकर यह समाज आध्यात्मिक या भाववादी दर्शन तथा भौतिक वादी दर्शन में बंट गया । भौतिकवादी दर्शन के अनुसार यह प्रकृति ही सब कुछ है लेकिन भाववादियों ने आत्मा की महत्ता प्रकृति से ऊपर स्थापित की और हर समस्या का समाधान पारलौकिकता में ढूँढा । मनुष्य की नियति को लेकर उनके प्रिय वाक्य रहे .. 'यह तो सब पहले से ही लिखा है' ,'यह तो होना ही था' आदि ,जबकि भौतिकवादी जानता है कि उसकी समस्या का समाधान इसी जगत में है । अब आपकी आमदनी नहीं बढ़ रही तो आप उसके लिए प्रयास करते हैं या उसे किस्मत के भरोसे छोड़ देते हैं ? बीमार होने पर डॉक्टर के पास जाते हैं या भगवान भरोसे छोड़ देते हैं ? किसी अपराधी को दण्ड दिलाने के लिए प्रयास करते हैं या सोचते हैं कि उसके भाग्य में जो लिखा है वही होगा ? इस तरह हम इन लौकिक सवालों के जवाब इसी लोक में ढूँढते हैं , यही भौतिकवाद है ।


शरद कोकास

शनिवार, 29 जुलाई 2017

चेतना और पदार्थ की परिभाषा

हमारी त्वचा 

          चेतना का अर्थ आप जानते होंगे ,चेतना अर्थात हमें उद्वेलित करने वाली गर्व ,लज्जा,क्रोध,हर्ष, प्रेम, घृणा आदि भावनाएं ,हमारे नेत्र,नाक,कान, जिव्हा,स्पर्श आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त अनुभूतियाँ ,और अंततः हमारे मस्तिष्क को सदा व्यस्त रखने वाले विचार यह सब चेतना है । चेतना से बाहर जो कुछ भी है वह सब पदार्थ है । पदार्थ मतलब हमारे चारों ओर उपस्थित वस्तुएं या पिंड जिनमें भौतिकीय ,यांत्रिकीय रासायनिक तथा शरीर क्रियात्मक प्रक्रियाएं घटती रहती है उन्हें ही भौतिकीय परिघटनाएं अथवा पदार्थ या भूतद्रव्य कहा जाता है । हमारी चेतना के निर्माण में इन ज्ञानेन्द्रियों की प्रमुख भूमिका है बिना इनकी सहायता के हम अनुभूतियों को अपने मस्तिष्क में दर्ज नहीं कर सकते .
जैसे जैसे मनुष्य के शरीर का विकास होता है वह अन्य मनुष्यों के संपर्क में आकर विभिन्न कार्य सीखता है , रंग, ध्वनि व गंध में भेद करने लगता है इस तरह उसकी भावनाएं परिष्कृत होती हैं । जब उसका शरीर दुर्बल पड़ने लगता है ,अनुभूतियों और विचार करने की क्षमता पर भी उसका प्रभाव पड़ता है । इस तरह हम देखते हैं कि मनुष्य की चेतना का आलंबन उसका यह भौतिक शरीर ही है . अन्य प्राणियों से इतर मनुष्य के भीतर यह क्षमता है कि वह कुछ करने से पहले उसके बारे में सोच सकता है । मनुष्य की मुक्ति की आकांक्षा और समाज में व्याप्त शोषण और अन्याय के खिलाफ विचार करने की क्षमता और फलस्वरूप उपजे क्षोभ ने ही उसे शोषकों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया । इतिहास गवाह है कि मेहनत कश इंसान और प्रभुत्व संपन्न वर्ग के बीच हमेशा से संघर्ष रहा है, उसकी भौतिक स्थितियों ने ही हमेशा उसे संघर्ष के लिए प्रेरित किया है । इस संघर्ष में उसकी चेतना की प्रमुख भूमिका है ।
ज्ञानेन्द्रियों के विषय में और अधिक जानने के लिए यहाँ ज्ञानेन्द्रियों पर क्लिक करें (चित्र भारतकोश से साभार)

शरद कोकास 

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

क्या आप भी अमर होना चाहते हैं

यद्यपि स्वयं का जन्म मनुष्य के वश में नहीं है न ही वह इसके लिए उत्तरदायी है लेकिन जन्म लेने के पश्चात यह जीवन और यह शरीर उसे इतना प्रिय लगने लगता है कि लाख कष्टों के बावज़ूद वह इसे जीवित रखने का भरसक प्रयास करता है । यह स्वाभाविक भी है । वह उन समस्त सुख-सुविधाओं का उपभोग करना चाहता है जो उसके पूर्वजों द्वारा अनवरत परिश्रम से जुटाई गई हैं । वह स्वयं भी इस मनुष्य जाति के विकास हेतु कटिबद्ध है , आनेवाली पीढ़ी के लिए वह अधिक से अधिक सुविधाएँ जुटाने की इच्छा रखता है और उसके लिए नित नये आविष्क़ार कर भविष्य के मनुष्य की बेहतरी के लिए कुछ करना चाहता है । मनुष्य के भीतर सारी सुख - सुविधाओं के साथ जीते हुए अमर होने की एक सुप्त इच्छा भी होती है , । हालाँकि वह इस बात को बेहतर जानता है कि न कोई अमर हो सकता है न कोई इस जन्म में सुख पाने के विचार को स्थगित कर अगले जन्म में सुख पाने की अभिलाषा कर सकता है । हमें जो चाहिए वह इसी एकमात्र जन्म में चाहिए क्योंकि मनुष्य या किसी भी प्राणी का सिर्फ एक ही जन्म होता है ।


लेकिन यहीं कहीं कुछ चालाक लोग उसकी इस सुप्त इच्छा को भुनाते हुए उसे पाप - पुण्य , मोक्ष , पुनर्जन्म आदि के जाल में फंसाते हैं । वे उन्हें बरगलाते हुए कहते हैं कि भाइयों इस जन्म में आपको सुख मिले न मिले अगले जन्म में जरूर मिलेगा , बस जरा दान - पुण्य करें । यह वे लोग हैं जो आपको कर्म से विमुख करते हैं और भाग्यवादी बनाते हैं । यह लोग ईश्वर और धर्म के नाम पर आपका शोषण करते हैं । इस दिशा में विचार करने की आवश्यकता है कि यह स्थितियाँ किन कारणों की वज़ह से हैं । वैसे भी हम विचारवान मनुष्य हैं ,अपने पूर्वजों की तरह इस दिशा में लगातार प्रयत्नशील हैं और मनुष्य होने के कर्तव्य का निर्वाह कर रहे हैं । एक मनुष्य के रूप में हर व्यक्ति एक चेतना संपन्न व्यक्ति है और एक सुदृढ़ मस्तिष्क का मालिक है ।


शरद कोकास

बुधवार, 26 जुलाई 2017

हम पैदा ही नहीं होते तो क्या होता



मिर्ज़ा असदुल्ला खां 'ग़ालिब' अपने समय के महत्वपूर्ण शायर रहे हैं । ‘ इश्क़ वो आतिश है ग़ालिब ‘ इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया ‘ ग़ालिब छुटी शराब ‘ जैसी उनकी पंक्तियाँ मुहावरों और कहावतों की तरह उपयोग में लाई जाती हैं । ग़ालिब साहब का एक मशहूर शेर है “ न था कुछ तो ख़ुदा था ,कुछ न होता तो ख़ुदा होता, डुबोया मुझको होने ने ,ना होता मैं तो क्या होता । ” इस शेर में एक प्रश्न छुपा हुआ है । यह स्पष्ट है कि हमारा अस्तित्व ही हमारे जीवन के समस्त क्रियाकलापों के लिए उत्तरदायी है । हम हैं इसलिए हमारे लिए यह दुनिया है, इस दुनिया के सारे प्रपंच हैं, सुख - दुख हैं, रिश्ते- नाते हैं, दोस्त-यार हैं, घर - परिवार है, समाज है,बाज़ार है ,फेसबुक है,व्हाट्स एप है यानि सब कुछ हैं । संसार में उपस्थित सब कुछ उन्हीं के लिए है जो इस धरती पर जन्म ले चुके हैं। जो लोग इस दुनिया से विदा ले चुके हैं उनके लिए भी यह दुनिया उसी समय तक थी जब तक उनका अस्तित्व था। हमारे लिए केवल उनसे जुड़ी हुई चीजें, उनके द्वारा किए गए कार्य और उनकी स्मृतियाँ हैं, और वे भी हमारे लिए तभी तक हैं जब तक हम इस दुनिया में हैं ।


वस्तुत: गालिब ने यह शेर लाक्षणिक अर्थ में उस मनुष्य जाति के बारे में कहा है जिसने इस धरती पर लाखों वर्ष पूर्व जन्म लिया है । एक धार्मिक और ईश्वर में विश्वास करने वाला व्यक्ति मुसीबत आने पर न तो स्थितियों को स्वीकार करता है न ही उनका तार्किक समाधान खोजता है अपितु मुसीबतों से घबराकर वह सीधे ईश्वर से प्रश्न करता है “ हे भगवान ! तूने मुझे पैदा ही क्यों किया ? “ या कष्टों से घबराकर वह कहता है ,'ईश्वर मुझे उठा ले' । जन्म और मरण की अवधारणाओं से परिचित होने के पश्चात यह मनुष्य केवल जन्म के बारे में ही नहीं अपितु मृत्यु के बारे में भी निरंतर विचार करता रहा है । सुख की स्थितियों में यह जीवन उसे इतना प्रिय लगता है कि वह सामान्यत: मृत्यु के विषय में विचार नहीं करता। किसी ईश्वरीय सत्ता में विश्वास न करने वाले लोग भी दैनन्दिन व्यवहार में इस तरह के साधारण वाक्यों का प्रयोग करते हैं और जीवन - मरण जैसे शाश्वत प्रश्नों का समाधान अन्य क्रियाकलापों में ढूँढते हैं ।


आपका
शरद कोकास

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

कामिनी से लेकर कमीने तक


                                      
मनुष्य के मस्तिष्क ने अपने ऐतिहासिक विकासक्रम में भाषा की क्षमता अर्जित की है । आदिम मनुष्य ने अपने दैनिक क्रियाकलाप में शामिल व्यवहार में संकेतों को धीरे धीरे शब्द दिये । कालांतर में यही शब्द कार्य व्यवहार में लाये गये । स्मृति में शब्दों का समावेश तथा शब्दों द्वारा वाक्य संरचना की इस क्षमता का विकास हमारे मस्तिष्क में हमारे बचपन में ही हो जाता है और हम अक्षर जोड़ जोड़ कर शब्द बनाने लगते हैं । हमारे माता- पिता और समाज के लोग इस क्षमता के विकास में हमारे सहायक होते हैं । शाला में यह कार्य भलिभाँति सिखाया जाता है और मस्तिष्क अपनी यह विशेष क्षमता प्राप्त कर लेता है । जिन बच्चों मे यह क्षमता देरी से विकसित होती है वे पूरे शब्द बोलने में देर लगाते हैं या शब्दों का ग़लत उच्चारण करते हैं ।

पाल ब्रोका

सर्वप्रथम शरीरक्रिया विज्ञानी फ्लोरेंस ने कबूतरों पर प्रयोग कर मस्तिष्क के विभिन्न क्रियाकलापों पर अध्ययन किया । उन्होंने यह निष्कर्ष दिया कि मस्तिष्क के विभिन्न भागों की अलग अलग विशेषतायें होती हैं तथा इनके गुण भी अलग अलग होते हैं । अलग अलग स्थानों के अलग अलग कार्यों के बावज़ूद स्नायुमंडल समग्र रूप से कार्य करता है । फ्लोरेंस के कार्यों को पाल ब्रोका ने आगे बढ़ाया और उन्होंने सन 1861 में मस्तिष्क के भाषा क्षेत्र की खोज की । उन्होंने बताया कि बायें मस्तिष्कीय गोलार्ध के बगल में भाषा का केन्द्र अवस्थित होता है । मनोवैज्ञानिक ब्रोका के इस योगदान के फलस्वरूप मस्तिष्क के इस केन्द्र को मनोविज्ञान के क्षेत्र में ' ब्रोकाज़ एरिया ' के रूप में जाना जाता है । ब्रोका के इस कार्य को अन्य शरीर क्रिया विज्ञानियों फ्रिट्श तथा हिटज़िग ने आगे बढ़ाया ।
मस्तिष्क के इस क्षेत्र में अक्षरों से शब्द बनाने का काम होता है । मान लीजिये मैं आपको चार अक्षर देता हूँ ल ब ग और र और कहता हूँ कि इनसे कोई शब्द बनाईये तो आप तुरंत कहेंगे “ब्लॉगर “ । उसी तरह मैं आपको तीन शब्द दूँ ' म ' ' क ' और ' न ' तो आप मकान, नमक , कान ,नाक, कमान, काका, नाना, मामा, कमान, नमक, और कामिनी से लेकर कमीने तक सारे सम्भाव्य शब्दों की रचना कर डालेंगे । उसी तरह ' म ' ' न ' और ' र ' अक्षरों से आप मन , नर , मर ,राम ,मार , मरन , रमन ,नरम ,मीनार आदि शब्द बना सकते हैं ।
अक्षरों से शब्दों के निर्माण में उनका उच्चारण विशेष महत्व रखता है । एक बच्चे ने अपने अध्यापक से कहा “ सर ‘ नटूरे ‘ यानि क्या होता है ? “ अध्यापक ने कभी इस तरह का शब्द नहीं सुना था अत: उसने कहा " ऐसा कोई शब्द नहीं होता । अगर इस तरह के फालतू सवाल करोगे तो स्कूल से निकाल दिये जाओगे ।“ तब उस छात्र ने निराश होकर कहा “ सर इससे तो मेरा ‘ फुटूरे ‘ खराब हो जाएगा । “ बहुत देर बाद अध्यापक की समझ में आया कि वह ' नेचर ' ( NATURE ) और ' फ़्यूचर ' (FUTURE ) की बात कर रहा है ।
इसी तरह शब्दों से वाक्य बनाने का काम भी मस्तिष्क के इसी क्षेत्र में सम्पन्न होता है । यदि मैं आपको तीन शब्द दूँ प्रदत्त , जल और प्रकृति “ तो आप तुरंत कह उठेंगे “ जल प्रकृति प्रदत्त है “ । सामान्य मनुष्य के अलावा एक कवि ,लेखक या वक्ता के लिये यह जानना बहुत ज़रूरी है कि यह कार्य मस्तिष्क किस प्रकार करता है । साधारण मनुष्य और लेखक दोनो के पास शब्द-भंडार लगभग समान होता है लेकिन लेखक कविता ,कहानी ,निबंध , ब्लॉग इत्यादि लिखता है और सामान्य व्यक्ति यह सब नहीं लिख पाता । इसका सरल सा कारण है कि लेखक अपने मस्तिष्क की इसी क्षमता का उपयोग कर व्यवस्थित रूप से शब्दों का उपयोग कर वाक्य संरचना करता है । एक लेखक के लिये वाक्य संरचना के अलावा ज्ञान, कल्पना , बिम्ब निर्माण तथा विषय की जानकारी आदि अन्य गुणों का होना भी आवश्यक है । लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सामान्य व्यक्ति मस्तिष्क की इस क्षमता का उपयोग नहीं करता । यदि वह इस क्षमता का उपयोग नहीं करेगा तो अपने विचारों को वाक्यों के द्वारा अभिव्यक्त नहीं कर पायेगा । मस्तिष्क की इस कार्यप्रणाली का हम अपने जीवन में सबसे अधिक प्रयोग बोलने में ही करते हैं । इसी क्षमता के कारण हम अपने शब्द भंडार , व्याकरण व भाषा के ज्ञान का सार्थक उपयोग करते हैं । - शरद कोकास

( चित्र गूगल छवि से साभार )