शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

विचार आते हैं लिखते समय नहीं - मस्तिष्क की कार्यप्रणाली

                                          मस्तिष्क की कार्यप्रणाली -7


प्लानिंग काम्प्लेक्स : मस्तिष्क की कार्य प्रणाली का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है योजना बनाना । विचारों का उन्नयन भी यहीं से होता है । वैचारिक क्षमता यहाँ विद्यमान रहती है । हमें ज्ञात है कि हमारा भोजन करने का समय नौ बजे है फलस्वरूप हम आठ बजे से ही भोजन पकाने की योजना बनाने लगते हैं । यदि हमने कुछ लोगों को खाने पर बुलाया है तो एक दिन पूर्व ही हम उसकी योजना बना लेते हैं । योजना बना कर कार्य करने से सुविधा रहती है और समय पर व्यर्थ की भाग दौड़ से हम बच जाते हैं । जीवन के अनेक महत्वपूर्ण कार्य शादी ब्याह , जन्मोत्सव आदि हम योजना बनाकर ही करते हैं । संतान की उत्पत्ति का कार्य भी आजकल योजना बनाकर ही किया जाता है ।
इसी प्रकार तर्क क्षमता भी मस्तिष्क के इसी हिस्से में मौजूद रहती है । जैसे मैं आप से कहूँ कि वहाँ धुआँ है तो तुरंत आपके मस्तिष्क में यह विचार जन्म लेगा कि फिर वहाँ आग भी होगी । यद्यपि विज्ञान के ऐसे अनेक प्रयोग हैं जहाँ धुएँ के लिये आग की ज़रूरत नहीं है । जिस प्रकार यहाँ से तर्क किये जाते हैं उसी प्रकार कुतर्क भी किये जाते हैं । कुतर्क का अर्थ यह होता है जिसका कोई प्रमाण नहीं होता । जैसे कि हम कहें गोरे आदमी की हड्डियाँ बनिस्बत काले के ज़्यादा सफेद होती होंगी ।
विचार करना यह मस्तिष्क का महत्वपूर्ण कार्य है । हम कुछ भी काम कर रहे हों सोच विचार करते रहते हैं । मस्तिष्क की यह विचार प्रणाली ही है जिसकी वज़ह से सब कुछ सम्भव होता है । मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता है “ विचार आते है लिखते समय नहीं / पीठ पर बोझा ढोते हुए / कपडे पछींटते हुए “ हाँलाकि लिखते समय भी विचार तो आते ही हैं ,कुछ लोगों के साथ ऐसा नहीं होता फलस्वरूप वे बिना विचार के ही लिखते हैं । विचार आपको कहीं भी आ सकते हैं । अगर आप दफ्तर में हैं या किसी फंक्शन में हैं और बैठे बैठे ऊब रहे हैं तो मस्तिष्क की इसी जगह से विचार करते हैं कि घर कब जायेगें । इस तरह वैचारिक क्षमता यहाँ विद्यमान होती है ।


उपसर्ग में प्रस्तुत है मुक्तिबोध की कविता - विचार आते हैं


विचार आते हैं -
लिखते समय नहीं
बोझ ढोते वक़्त पीठ पर
सिर पर उठाते समय भार
परिश्रम करते समय


चांद उगता है व
पानी में झलमिलाने लगता है
ह्रदय के पानी में


विचार आते हैं
लिखते समय नहीं
पत्थर ढोते वक़्त
पीठ पर उठाते वक़्त बोझ
साँप मारते समय पिछवाड़े
बच्चों की नेकर फचीटते वक़्त !!


पत्थर पहाड़ बन जाते हैं
नक़्शे बनते हैं भौगोलिक
पीठ कच्छप बन जाते हैं
समय पृथ्वी बन जाता है ...

रविवार, 21 नवंबर 2010

पत्नी को आदेश मस्तिष्क का यह भाग देता है

6 आज्ञा केन्द्र (Morter Area ) एक तरह से यह मस्तिष्क का प्रधान मंत्री कार्यालय है । लगभग सारे विभाग इसी कार्यालय के अंतर्गत आते हैं । योजना विभाग भी इसी मंत्रालय के अधीन है । सभी शारीरिक हरकतों की योजनाएँ यहाँ बनती है । उदाहरणार्थ आप कम्प्यूटर पर काम कर रहे हैं । इतने में एक गुस्ताख मच्छर आपकी बाईं बाँह पर बैठता है और अपनी सूँड चुभोने लगता है । क्षण मात्र में रगों में बहते रक्त के माध्यम से यह सूचना आपके मस्तिष्क के सोमेटोसेंसरी एरिया में पहुँच जाती है और वहाँ से उससे भी कम समय में आज्ञा केन्द्र अर्थात प्रधानमंत्री कार्यालय में । वहाँ इस सूचना पर त्वरित कार्यवाही होती है और आपके शरीर की पुलिस फोर्स अर्थात हाथों के लिये आदेश ज़ारी होता है कि इसे भगाओ । हाथों की मसल्स तुरंत एक्शन में आ जाती हैं दाया हाथ तुरंत उठता है और बायें हाथ तक पहुँच जाता है और पटाक से मच्छर का मर्डर हो जाता है । हाँ यदि आपके मस्तिष्क में अहिंसा की प्रोग्रामिंग है और आप मच्छर ही क्या बेक्टेरिया और वाइरस की हत्या के भी खिलाफ हैं तो आप उसे केवल भगाकर ही संतुष्ट हो जाते हैं । इसके बाद आपके हाथ पुन: पूर्व में आदेशित कार्य सम्पन्न करने में लग जाते हैं ।
मच्छर के अलावा अन्य जीवों की हत्या में भी यही प्रक्रिया होती है । मच्छर बेचारे की गलती तो यह थी कि उसने आप को काटा हाँलाकि यह उसने अपनी भूख मिटाने के लिये किया लेकिन हम बिना किसी अपराध के साँप ,मूक पशु और मनुष्यों तक की हत्या कर डालते हैं ।
तात्पर्य यह कि मस्तिष्क़ के इस विभाग से सारे आदेश प्रसारित होते हैं जैसे आपको प्यास लगी हो और गला सूख रहा हो तो गले से रिक्वीज़ीशन मस्तिष्क तक जाती है , वहाँ पर यह तय किया जाता है कि पिछली बार जब प्यास लगी थी तो क्या किया गया था । बचपन में माँ द्वारा पानी पिलाने से लेकर खुद पानी पीने तक की स्मृतियाँ क्षण मात्र में दोहराई जाती हैं । वहाँ से यह फाइल आदेश विभाग में जाती है , जहाँ से आदेश होता है पानी पियो ,पाँवों को आदेश दिया जाता है फलस्वरूप हम उठते हैं और पानी के टैप तक या मटके या फ्रिज तक जाते हैं । हाथों को आदेश दिया जाता है , बॉटल निकालो या गिलास उठाओ और उसमें पानी लेकर मुँह तक ले जाओ , इस तरह हम कुछ क्षणों में ही पानी पी लेते हैं और अपनी प्यास बुझाते हैं । लेकिन कुछ लोग कुर्सी पर बैठे बैठे पत्नी को ज़ुबानी आदेश देते है “ हमरे लिये पानी लाओ । " पत्नी के शरीर की श्रवण प्रणाली द्वारा यह आदेश उसके मस्तिष्क़ तक पहुँचता है और फिर उसके द्वारा पति को पानी पिलाये जाने की क्रिया हेतु नविन आदेश उसके मस्तिष्क द्वारा जारी होता है । इस तरह पत्नी को ऑर्डर देने का यह काम भी इसी मस्तिष्क से होता है यानि पहला ऑर्डर यथावत रहते हुए ज़ुबान के लिये दूसरा ऑर्डर जारी हो जाता है ।
इसी तरह बहुत देर बैठे रहने पर पैर अकड़ जाता है तो मस्तिष्क के इसी विभाग से पैर की मसल्स के लिये आदेश ज़ारी होता है “ कुछ हिलो डुलो भई “। हमारे समस्त बाह्य अंगों को मस्तिष्क के इसी केन्द्र से आदेश प्राप्त होते हैं । बावज़ूद इसके शरीर के भीतर की अनेक क्रियाएँ होती हैं जो बिना मस्तिष्क के आदेश के सम्पन्न होती हैं जैसे की दिल का धड़कना । ( चित्र गूगल से साभार )
उपसर्ग में प्रस्तुत है
राधिका अर्जुन द्वारा बनाया गया
शमशेर बहादुर सिंह की कविता पर
यह यह कविता पोस्टर ।


इसे पढ़ते हुए मेरे मन में प्रश्न आया कि किसीसे प्रेम करने के लिये भी हमारा मस्तिष्क हमें कोई आदेश देता है क्या, जिसके फलस्वरूप हम अगले व्यक्ति से कहते हैं .. मुझे प्रेम करो ..
क्या कहते हैं आप ?


सोमवार, 15 नवंबर 2010

गर गले नहीं मिल सकता तो हाथ भी न मिला


             मस्तिष्क की कार्यप्रणाली


सोमेटोसेंसरी एरिया : मस्तिष्क का यह इंद्रीय संवेदों का केन्द्र है । इस केन्द्र की कार्यप्रणाली को स्पष्ट करने के लिए मै आपको याद दिलाना चाहता हूँ एक मशहूर फ़िल्मी गीत की जो पिछले दिनों बहुत लोकप्रिय रहा है । यह एक आईटम सॉंग है .. बंगले के पीछे तेरी बेरी के नीचे हाय रे काँटा लगा ..। इस मधुर गीत के रीमिक्स के दृश्य को कृपया याद न करें मैं केवल उस चुभन की ओर आपका ध्यान आकर्षित करवाना चाहता हूँ जो काँटा लगने पर होती है । हो सकता है काँटा चुभने का अनुभव आपको न हो लेकिन सुई या कोई नुकीली वस्तु चुभने का तो होगा ही । इस चुभन को हम मस्तिष्क के इसी केन्द्र द्वारा महसूस करते हैं ।
हमारे शरीर की त्वचा अत्यंत संवेदनशील होती है । इस बात का पता इससे भी चलता है कि कुछ लोग बैठे बैठे यहाँ वहाँ खुजाते रहते हैं । मस्तिष्क के इस केन्द्र तक शरीर के उस भाग से सूचना आती है और हाथ मस्तिष्क की आज्ञानुसार अपना काम करने कगता है । इस कार्यप्रणाली के कारण जैसे ही हम कोई गरम या ठंडी चीज़ पकड़ते हैं या हमें मच्छर या कोई कीट काटता है तो हमे तुरंत पता चल जाता है । कोई हमें स्पर्श करता है तो हमें पता चल जाता है । यह बात अलग है कि कुछ स्पर्श सुखद होते हैं और कुछ दुखद । हाथ मिलाते हुए किसका हाथ कड़ा है और किसका हाथ नर्म है यह हमें यहीं से ज्ञात होता है । इसी तरह गले मिलने का सुख भी यहीं से मिलता है यह अलग बात है कि कोई गले मिलने के लिये गले मिलता है तो कोई गला काटने के लिये । अपने प्रिय से गले मिल कर हमें प्रसन्नता महसूस होती है । लेकिन कई लोग दिखावे के लिये भी गले मिलते हैं । ऐसे ही लोगों के लिये शायर जनाब बशीर बद्र ने लिखा है
“ मोहब्बत में दिखावे की दोस्ती न मिला
गर गले नहीं मिल सकता तो हाथ भी न मिला ।“
तो जनाब यह काँटा लगने ,मच्छर काटने, गले मिलने ,दर्द और खुजली आदि की अनुभूति हम मस्तिष्क के इसी इन्द्रीय संवेदों के केन्द्र से महसूस करते हैं । गाल पर ममत्व के दुलार का स्पर्श भी हम यहीं से महसूस करते है और गाल पर चाँटे का दुख भी यहीं से महसूस करते हैं । बचपन में यदि आपको मार पड़ी होगी तो उसे याद कीजिये , उस का दर्द आपने मस्तिष्क की इसी कार्यप्रणाली की वज़ह से महसूस किया था ।
यह भी एक अच्छी बात है कि हर अनुभूति संवेदना के स्तर पर हमारे मस्तिष्क में दर्ज हो जाती है । हम काँटे की चुभन जानते हैं इसलिये कंटक विहीन मार्ग से चलना चाहते हैं और दूसरों के लिए भी कामना करते हैं कि उनके मार्ग में कोई काँटा न आये । हम गर्म वस्तु या आग से जलने का कष्ट जानते हैं इसलिये आग से बचना चाहते हैं । उसी तरह हम स्पर्श या दुलार का सुख भी जानते हैं इसलिये बार बार उसे पाना चाहते हैं ।
( चित्र गूगल से साभार )

रविवार, 7 नवंबर 2010

भाईसाहब ज़रा ठीक से खड़े रहिये

 मस्तिष्क की कार्यप्रणाली - चार - वातावरण के साथ शरीर का तालमेल





शीत ऋतु का आगमन हो रहा है । बदलते हुए इस मौसम को हम अपने शरीर द्वारा महसूस कर रहे हैं । लेकिन जिसे हम महसूस करना कहते हैं वह वास्तव में शरीर द्वारा नहीं होता , शीत हो या गर्मी अनुभव करने की यह क्रिया हम अपने मस्तिष्क द्वारा ही सम्पन्न करते हैं ।
मस्तिष्क की इस कार्यप्रणाली द्वारा हम वातावरण के साथ अपना सामंजस्य स्थापित करते हैं । जैसे अपने शरीर को ठंड में सिकोड़ लेना और गर्मी मे फैलाना । वस्तुत: भौतिक रूप से हम ऐसा नहीं करते हैं क्योंकि हमारा शरीर लोहे का नहीं बना है और गर्मी से फैलने और ठंड से सिकुड़ने का नियम इस पर लागू नहीं होता है । लेकिन हम इसकी इच्छा रखते हैं । उदाहरण के रूप में याद कीजिये उन यात्राओं को जो आपने सर्दी , गर्मी , बरसात के अलग अलग मौसम में की होगी । गर्मी के दिनों में यात्रा करते हुए हम चाहते हैं कि हमारा सहयात्री हमसे दूर बैठे और हम थोड़ा फैल कर बैठ सकें । हम ऐसी स्थिति में अपने शरीर को भी थोड़ा फैलाने की कोशिश करते है । अपने कमीज़ के कॉलर को थोड़ा उपर कर लेते हैं और हवा आने दो के अन्दाज़ में यहाँ - वहाँ देखते हैं ।


हालाँकि यह नियम उस स्थिति में लागू नहीं होता जब आप वातानुकूलन में यात्रा कर रहे हों । लेकिन मैंने देखा है कि बहुत से लोग ए सी में कुछ देर बैठने के बाद असुविधा का अनुभव करने लगते हैं और वहाँ से बाहर निकल कर ही उन्हे चैन आता है । वैसे भी हमारे देश में जहाँ असंख्य आबादी खुले आसमान के नीचे रहती है , ए सी की सुविधा चंद लोगों को ही प्राप्त होती है ।
मस्तिष्क की इस कार्यप्रणाली की वज़ह से जैसे गर्मी के मौसम में हम थोड़ा फैलकर बैठना चाहते हैं इसके विपरीत ठंड में यात्रा करते हुए हम अपने आप में सिमट जाना चाहते हैं । बगल वाले यात्री से भी हमें कोई असुविधा नही होती कि वह कितना सटकर बैठा है । हाँ उसके शरीर से बदबू आ रही हो तो और बात है । हाँ कई पुरुष अवश्य ऐसे होते हैं जो ठंड हो या गर्मी स्त्री के समीप बैठने का सुख नहीं छोड़ना चाहते जब तक कि इसके लिये दुत्कारे न जायें । बस वगैरह में एकाध स्त्री यह बोलने का साहस कर ही लेती है “ भाईसाहब ज़रा ठीक से खड़े रहिये । “ लेकिन इसके लिये मस्तिष्क का यह विभाग दोषी नहीं है , इसका दोष मस्तिष्क के एक अन्य विभाग को दिया जा सकता है ,जो हम आगे चलकर देखेंगे ।


मस्तिष्क का यह विभाग इस तरह पूरे समय वातावरण के साथ शरीर का तालमेल बिठाने की कोशिश करता है । यह कार्य इस तरह से होता है कि हमें पता ही नहीं चलता ।
उपसर्ग में प्रस्तुत है मस्तिष्क की इसी कार्यप्रणाली से सम्बन्धित मेरी यह कविता -



मस्तिष्क के क्रियाकलाप – छह – सामंजस्य



लोहा अपने गुणधर्म में
फैल जाना चाहता है उष्मा मिलते ही
अपने अणुओं में सिमट जाना चाहता है शीत पाकर


प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाये रखना
प्रकृति के घटकों का गुणधर्म है


पहाड़ों से आती हैं सर्द हवाएँ
और हम अपने भीतर कैद होने की कोशिश करते हैं
निकल जाना चाहते हैं देह से बाहर गर्म हवाओं में


इस देह का अधिष्ठाता है मस्तिष्क
स्वयं अपना अधिष्ठाता है जो
उसके संस्कारों में शामिल है
वातावरण के मुताबिक स्वयं को ढालना


यह गुलामी में भी जी सकता है
स्वीकार कर सकता है शोषण की स्थितियाँ
फटेहाली में भी खुश रह सकता है


लेकिन यहीं कहीं उपस्थित हैं विरोध के संस्कार
जैसे ठंड का विरोध करते हैं हम आग जलाकर
गर्मी से बचने के इंतज़ामात करते हैं
सूखना चाहते हैं हम बारिश में भीगकर भी


उसी तरह विरोध करना चाहते हैं हम
अपनी बदहाली का ।


- शरद कोकास





छवि गूगल से व शरद के कैमरे से  साभार

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

माँ ही बताती है बचपन में कि यह तुम्हारे पिता है


मस्तिष्क की सत्ता लेखमाला - मस्तिष्क के क्रियाकलाप - हम किसी को कैसे पहचानते हैं -


3 : प्रतिमा का शब्द में रुपांतरण : (Naming an object ) शब्द के छवि में रूपांतरण के ठीक विपरीत है छवि या प्रतिमा का शब्द में रूपांतरण । मस्तिष्क की इस कार्यप्रणाली द्वारा जैसे ही हम किसी वस्तु को या व्यक्ति को देखते हैं हमें तुरंत उसका नाम याद आ जाता है । दरअसल जब पहली बार हमें उस वस्तु या व्यक्ति का नाम बताया जाता है हमारे मस्तिष्क उसे रिकॉर्ड कर लेता है तथा दोबारा देखने पर हम तुरंत उसका नाम बता देते हैं । बचपन में हमें बताया जाता है बेटा यह चिड़िया है ,यह पेड़ है , यह आदमी है , यह औरत है , यह रोटी है , यह पानी है , यह मन्दिर है , यह मस्जिद है । यहाँ तक कि क कमल का,ख खरगोश का वगैरह भी इसी प्रक्रिया के फलस्वरूप हम याद करते हैं । रिश्तों की पहचान भी हमें इसी तरह कराई जाती है । माँ जैसी दिखाई देने वाली एक स्त्री जिसकी गोद में हम बड़े होते है हमारी माँ कहलाती है और फिर यह माँ हमारे पिता से हमारा परिचय करवाती है ।
लेकिन यह प्रक्रिया स्थायी नहीं होती । जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हमें बार बार याद करने पर भी किसी चीज का नाम याद नहीं आता यद्यपि वह नाम हमारी मेमोरी में रहता है । ऐसा ही लोगों के साथ भी होता है । अक्सर ऐसा होता है कि किसी समारोह में ,कहीं बाज़ार में हमारा कोई पुराना परिचित अचानक सामने आकर खड़ा हो जाता है और कहता है ..क्यों पहचाना ? “ हम शर्म के मारे कह तो देते हैं कि , हाँ पहचान लिया लेकिन याद नहीं कर पाते कि वह कौन है ।
ऐसी स्थिति में मस्तिष्क तेज़ी से अपना यह काम शुरु करता है । मस्तिष्क की सर्च प्रणाली प्रारम्भ हो जाती है और यह तेज़ी से अपनी फाइलों में उस छवि का नाम ढूँढता है । और फिर अचानक किसी वस्तु को देखकर या अन्य किसी सन्दर्भ से हमें उसका नाम याद आ जाता है । मान लीजिये आपको नाम याद ही नहीं आया तो आप घर जाकर पत्नी से या किसी मित्र से पूछते है और उसके यह पूछने पर कि वह कैसा दिखता है आप कहते है .. वह कॉलेज वाले शर्मा जी जैसा दिखता है फिर तुरंत आपकी पत्नी या मित्र कहता है अच्छा तो वह पाण्डे जी होंगे .. और आप को उस व्यक्ति का नाम याद आ जाता है । यह बात अलग है कि इसके बाद आप पत्नी से पूछते है “ लेकिन तुम उन्हे कैसे जानती हो ? “ और पत्नी जब तक यह नही कहती कि “ वो मेरे मायके से है और मैं उन्हे भाई मानती हूँ “ , तब तक आपको चैन नही आता ।
ऐसे ही किसी अनदेखी वस्तु के बारे में भी हम कहते है कि वह अनदेखी चीज भी इसके या उसके जैसी दिखती है और आप उससे मिलती जुलती किसी वस्तु के बारे में बताते हैं । मान लीजिये आपने जंगल में भेड़िया पहली बार देखा और आप को उस जानवर का नाम नही पता तो आप कहेंगे कि “ एक जानवर मैने ऐसा देखा है जो कुत्ते जैसा दिखता है । “ इसलिये कि कुत्ता आपका जाना पहचाना जानवर है । इसीलिये हमें शेर ,बाघ , सिंह ,चीता ,तेन्दुआ या लकड़बग्घा एक जैसे दिखाई देते हैं । इसी तरह हमें सारे गोरे विदेशी एक जैसे दिखते हैं । वह अमेरिकी हो या ब्रिटिश हम उसे अंग्रेज़ ही कहते हैं । सारे अश्वेत नागरिकों को नीग्रो कहने का प्रचलन अभी अभी तक था । इसी तरह चीनी और जापानी भी हमें एक जैसे लगते हैं । यहाँ तक कि अपने देश में भी अनेक उत्तर भारतीय हर दक्षिण भारतीय की विविध प्रांतों के आधार पर पहचान न कर पाने के कारण सभी को मद्रासी कहते हैं ।
लेकिन मस्तिष्क की पहचान करने की क्षमता के कारण अभ्यास करने पर हम उनमें भेद कर सकते हैं । मस्तिष्क की यह कार्यप्रणाली जीवन भर बखूबी अपना काम करती है । हम नित नई चीज़ें देखते है और उनके साथ अपनी पहचान स्थापित करते हैं । हम देखी हुई हर वस्तु को एक नाम देते हैं , यह नाम हमारी अपनी भाषा में होता है । इस तरह नये बिम्बों के लिये नये शब्द बनते हैं । इसी प्रकार हम अपनी अन्य इन्द्रियों के माध्यम से भी जो ज्ञान प्राप्त करते हैं उन्हे इस कार्यप्रणाली द्वारा नाम देते हैं ।


उपसर्ग मे प्रस्तुत है मस्तिष्क की इसी कार्यक्षमता को आधार बनाकर लिखी गई मेरी यह कविता ---






मस्तिष्क के क्रियाकलाप –चार – पहचानना


मनुष्य का नाम मनुष्य नहीं था जब
मस्तिष्क का नाम भी मस्तिष्क नहीं था
नदी पेड़ चिड़िया इसी दुनिया में थे और
नदी पेड़ चिड़िया नहीं कहलाते थे
गूंगे के ख्वाब की तरह बखानता था मनुष्य
वह सब कुछ जो दृश्यमान था


अनाम चित्रों से भरी थी मस्तिष्क की कलावीथिका
और मनुष्य उनक लिये शीर्षक तलाश रहा था


हवाओं ने उसे कुछ नाम सुझाये
धूप ने छाया में बोले कुछ शब्द
बारिश की बून्दों ने कुछ गीत गुनगुनाये
इस तरह नामकरण का सिलसिला शुरू हुआ
पहाड़ का नाम उसने पहाड़ रखा
और आसमान का आसमान
दिखाई देने वाली हर चीज़ के साथ
एक नाम जोड़कर उसने पहचान कायम की
और जिसे देख नहीं पाया
उसका नाम उसने ईश्वर रखा


यहीं से शुरू हुई रिश्तों के साथ उसकी पहचान
स्त्री सी दिखने वाली एक स्त्री उसकी माँ कहलाई
और एक पुरुष को पहचाना उसने पिता के रूप में
जानवरों में भेद करते हुए उसने
उन्हे बाँटा हिंसक और अहिंसक की श्रेणियों में
मस्तिष्क की इस कार्यप्रणाली को फिर उसने
मनुष्यों पर भी लागू किया


हर दाढ़ी वाला उसे मुसलमान नज़र आया
चोटी जनेउवाला हिन्दू और पगड़ीधारी सिख
हर अश्वेत की पहचान उसने की अफ्रीकी के रूप में
सूटधारी को इसाई और गोरे को विदेशी जाना


युद्ध दंगों और चुनावों से इतर समय में ही
हमने मनुष्य के रूप में मनुष्य पहचाना ।

शरद कोकास




( एक चित्र मेरे ममेरे भाई ,डॉ.आनंद शर्मा ,उनकी अमेरिकन पत्नी लुईस रोज़ व बिटिया लोरी लाई का , अन्य सभी चित्र गूगल से साभार )

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

राम कहने पर आपको किसका चेहरा याद आता है ?

2 : शब्दों का प्रतिमा में रुपांतरण : मस्तिष्क द्वारा किये जाने वाले अनेक कार्यों के अंतर्गत यह मस्तिष्क का एक और कार्य है । यह किस तरह होता है यह समझाने के लिए मैं आपको कुछ शब्द दे रहा हूँ । जैसे ही आप उस शब्द को पढ़ेंगे आप को उस से जुड़ी प्रतिमा, इमेज या छवि याद आयेगी । जैसे मै कहता हूँ “ एक पेड़ । ” तो आपने जो भी पेड़ देखा होगा या जिस पेड़ की छवि आपकी स्मृति में होगी उस छवि की कल्पना आप करेंगे । हो सकता है बहुत से पेड़ आपने देखे हों लेकिन उनमें से कोई एक पेड़ ही आपको याद आयेगा । लेकिन मैं अगर कहूँ जंगल तो आपको बहुत से पेड़ों के अलावा पहाड़ , झरने या जंगल में जो कुछ भी आपने देखा हो याद आ जायेगा । हो सकता है कई लोगों को अब तक जंगल देखने का अवसर ना प्राप्त हुआ हो लेकिन अगर आपने जंगल को चित्र में देखा हो तो वह याद आयेगा ।उसी तरह मैं कहूंगा “ कम्प्यूटर “ तो आपको डेस्कटॉप या लैप टॉप , कम्प्यूटर का जो भी चित्र आपके मस्तिष्क मे होगा वह याद आ जायेगा ।

इसके विपरीत जिन छवियों की पहचान हमारे मस्तिष्क में शब्द के रूप में दर्ज़ नहीं है वह छवि हमें याद नहीं आयेगी, जैसे मै कहूँ ‘ फ्लोरेंस नाईटिंगेल ‘, अब आप में से जिसने सेवा की इस मूर्ति का चित्र देखा होगा वे ही इसे याद कर सकेंगे । कई बार द्रश्य मध्यमों के द्वारा भी कुछ छवियाँ हमारे मस्तिष्क में आरोपित की जाती हैं जिन्हे हम सच समझने लगते हैं । जैसे कि मैं कहूँ “ राम “ तो आपको रामायण धारावाहिक में राम का अभिनय करने वाले अभिनेता अरुण गोविल का चेहरा नज़र आयेगा । इस धारावाहिक से पूर्व हम इस छवि को किस रूप में याद करते थे यह भी सोचने की बात है । एक और उदाहरण मान लीजिये मैं कहता हूँ “ एतो सबाक “ तो आप कहेंगे पता नहीं क्या कह रहा है और आप इस शब्द से कोई छवि निर्माण नहीं कर सकेंगे लेकिन जैसे ही मैं कहूंगा “ यह कुत्ता । “ आप के मस्तिष्क मे तुरंत कुत्ते की छवि आ जायेगी । भई मैने रशियन मे कहा था ‘ एतो सबाक ‘ यानि ‘ यह कुत्ता ‘ । इस तरह हम अपने सम्पर्क में दृश्य-श्रव्य माध्यम से आनेवाले हर शब्द की एक प्रतिमा निर्माण करते हैं यह कार्य मस्तिष्क के इस केन्द्र द्वारा सम्पन्न होता है ।
उपसर्ग में प्रस्तुत है मस्तिष्क की इस क्षमता पर लिखी मेरी एक और कविता



मस्तिष्क के क्रियाकलाप –तीन –कल्पना


डार्करूम के अन्धेरे में तैरते
अतीत और वर्तमान के तमाम चित्रों के साथ
सैकड़ों चित्र भविष्य के तैरते हैं यहाँ ईथर में
रूप रंग रस गन्ध और स्पर्श की अनुभूतियाँ
यहाँ चित्रों में ढलती हैं
आँखों के कैमरे में पलकों का शटर खुलता है
और कैद हो जाता है सब कुछ स्थायी रूप में


फिर जॉर्ज बुश या ओबामा का नाम सुनते ही
जेहन में उभरता है
तथाकथित विश्वचौधरी का चेहरा
अमिताभ बच्चन का ज़िक्र होते ही
एक एंग्री यंग मैन सम्वाद बोलता नज़र आता है
कल्पना में शामिल होते हैं लोग दृष्य और वस्तुएँ
जो कभी न कभी हमारे देखे सुने होते हैं
अन्धों का हाथी ठीक इसी प्रक्रिया में
खम्भे सूप और रस्सी में बदलता है


जैसे माँ शब्द सुनते या पढ़ते ही
हमें याद आती है अपनी माँ
जिसे हम होश सम्भालने के बाद पहचानते हैं
माँ की कल्पना में वह छवि कहीं नहीं होती
जिसमें हमे वह जन्म दे रही होती है
या स्तनपान करा रही होती है
ऐसी कल्पना तो देवताओं के लिये भी सम्भव नहीं


यहाँ प्रकट होती है मस्तिष्क की सीमाएँ
जिसकी क्षमता से किसी अन्य स्त्री के चित्र में
माँ का चित्र आरोपित कर
हम स्त्री में माँ का रूप देख सकते हैं
यही तो है मस्तिष्क का कमाल
जहाँ पढ़े हुए शब्दों
और देखे सुने दृष्यों के आधार पर
हम कल्पना कर सकते हैं आगत और विगत की
पृथ्वी पर मनुष्य के जन्म की
और मनुष्य के मन में जन्मी
ईश्वर की कल्पना कर सकते हैं हम
इसी मस्तिष्क से ।


-- शरद कोकास


( चित्र : श्रीमती ऐश्वर्या राय , श्रीमती शीला कोकास , श्रीमती फ्लोरेंस नाइटिंगेल , श्री अरुण गोविल , गूगल से साभार )

सोमवार, 20 सितंबर 2010

मस्तिष्क की सत्ता - मस्तिष्क की गुलामी से मुक्त होने के लिए पहले मस्तिष्क को जानें

                                          यह मस्तिष्क कैसे काम करता है


हमारे शरीर में विभिन्न अंग हैं । हम दिन भर में कितनी बार उन अंगों का उपयोग करते हैं ,लेकिन क्या हम कभी सोचते हैं कि यह अंग किस तरह काम करते हैं ? यह कतई ज़रूरी नहीं है कि हाथ का उपयोग करने से पहले हम सोचे कि हाथ कैसे काम करता है ,या हमारे पाँव हमारे शरीर का भार किस तरह उठाते हैं । न दाँतों के बारे में सोचना ज़रूरी है कि वे अन्न किस तरह चबाते हैं और न आँखों के बारे में कि वे किस तरह देखती हैं । जब बाहरी अंगों के बारे में यह अनावश्यक है तो फिर भीतरी अंगों की कार्यप्रणाली के बारे में तो जानना तो बिलकुल भी आवश्यक नहीं है । लेकिन यदि हम केवल मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के बारे मे ही जान लें तो समझ लीजिये कि आप आधे से अधिक तो जान ही गए क्योंकि बहुत सारे अंग तो इस मस्तिष्क से ही संचालित होते हैं । फिर मस्तिष्क की इस गुलामी से मुक्त होने के लिये भी हमें सबसे पहले जानना होगा कि मस्तिष्क कैसे काम करता है । विश्वास हो या अंधविश्वास यह हमारे मस्तिष्क में किस तरह घर करते हैं यह जानने के लिए भी हमें मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को जानना होगा । बेहतर होगा किसी बर्तन को खाली करने से पहले ,उसे भरा कैसे गया यह बात हम जान लें । लेकिन इस बात का आप बिलकुल टेंशन ना लें ,मैं आपको मेडिकल साईंस नहीं पढ़ाने जा रहा हूँ । मैं अत्यंत सरल भाषा में यह बताना चाहता हूँ कि हमारे दिन-प्रतिदिन के काम इस मस्तिष्क के द्वारा कैसे सम्पन्न किये जाते हैं । चलिए हम अपनी सुविधा के लिये सबसे पहले मस्तिष्क को कुछ भागों में विभाजित कर देते हैं ।

मस्तिष्क के क्रियाकलाप: हम किस तरह देखते हैं यह मस्तिष्क का एक रफ डायग्राम है जिसे मैने सरलता पूर्वक समझने के लिये बनाया है । कृपया इस आकृति का चिकित्सकीय मापदंडों के अनुसार विश्लेषण न करें । इसे हम एक चौकोर बॉक्स की तरह भी देख सकते हैं और कई कमरों वाले एक दफ़्तर की तरह भी । सबसे पहले हम पहले भाग पर नज़र डालते हैं यह है हमारा दृष्टि केन्द्र ,यह वह केन्द्र है जिसकी वज़ह से हम देख पाते हैं ।1 देखना : एक कक्षा में मैने सवाल किया हमें देखने के लिये क्या ज़रुरी है ? उत्तर मिला आँखें , किसी ने कहा दिमाग , किसीने और बढ़ कर कहा दृष्टि । एक छात्र ने और बढ़ा-चढ़ा कर कहा मन की आँखें । अंत में विज्ञान के एक छात्र ने सही उत्तर दिया देखने के लिये सबसे ज़्यादा ज़रूरी है प्रकाश । यह हम सभी जानते ही हैं कि प्रकाश के अभाव में आँखें होने के बावज़ूद भी हम नहीं देख पाते हैं । आपको यह भी पता होगा कि यह कैसे होता है अगर आप जानते होंगे टी.वी पर चित्र कैसे आता है । हमारे दृष्टि केन्द्र में छवि निर्माण होने की भी ऐसी ही प्रक्रिया है । हमारी आँख में भी कैमरे की तरह ही एक लेंस होता है । किसी भी वस्तु पर जब रोशनी डाली जाती है वह रोशनी वस्तु से परावर्तित होकर नेत्र पटल पर पड़ती है , वहाँ से जैव रासायनिक विद्युत संवेग द्वारा मस्तिष्क के इस केन्द्र में आती है और इस तरह हम उसे देख पाते हैं । अभी मैं केवल देखने की बात ही कर रहा हूँ उस वस्तु या दृश्य को हम किस तरह पहचान पाते हैं वह आगे की बात है । देखने और पहचानने के बाद ही समझने की बारी आती है । इसीलिये कहा जाता है कि देखा हुआ हमेशा सच नहीं होता ।



उपसर्ग : उपसर्ग में मैं अब तक महत्वपूर्ण कवियों की कवितायें देता रहा हूँ । इस विषय पर काम करते हुए मस्तिष्क के क्रियाकलाप पर बारह कविताएँ मैंने लिखीं । उनमे से एक कविता मस्तिष्क के क्रियाकलाप - देखने पर यह कविता । एक नये विषय पर लिखी इस कविता श्रंखला पर आपकी राय जानना चाहूँगा - शरद कोकास






मस्तिष्क के क्रियाकलाप – एक – दृष्टि





एक बच्चे सा विस्मय था जब मनुष्य की आँखों में
रात और दिन के साथ वह खेलता था आँख मिचौली
समय की प्रयोग शाला में सब कुछ अपने आप घट रहा था


देखने के लिये सिर्फ आँख का होना काफी था
और प्रकाश छिपा था अज्ञान के काले पर्दे में
पृथ्वी से अनेक प्रकाश वर्षों की दूरी के बावज़ूद
सूर्य लगातार भेज रहा था अपनी शुभाशंसाएँ

अब जबकि ऐसा घोषित किया जा रहा है
कि ज्ञान पर पड़े सारे पर्दे खींच दिये गये हैं
और चकाचौन्ध से भर गई है सारी दुनिया
समझ के पत्थर पर लिख दी गई हैं इबारतें
आँख प्रकाश और दिमाग़ के महत्व की
जैसे कि धुप्प अन्धेरे में हाथ को हाथ नहीं सूझता
अन्धेरे में बस दिखाई देता है अन्धेरा
कोई फर्क नहीं पड़ता आँखें खुली या बन्द होने से
यह मस्तिष्क ही है जो अन्धेरे से बाहर सोच पाता है


दृश्य और आँखों के बीच प्रकाश के रिश्तों में
अन्धेरे से बाहर झाँकता है विस्मय से भरा संसार
दृश्य के समुद्र में तैरता है वर्तमान

यह दृष्य में रोशनी की भूमिका है
जो अदृष्य है विचारों के दर्शन में
यहाँ रोशनी का आशय भौतिक होने में नहीं है


अन्धेरे में भटकते बेशुमार विचारों की भीड़ में
दृष्टि तलाश लेती है अक्सर कोई चमकता हुआ विचार


मानव मस्तिष्क के विशाल कार्यक्षेत्र में
जहाँ समाप्त होती है ऑप्टिक नर्व्स की भूमिका
वहाँ दृष्टि की भूमिका शुरू होती है
ज्ञान की उष्मा में छँटती जाती है असमंजस की धुन्ध
यहाँ मस्तिष्क प्रारम्भ करता है
दृश्य में दिखाई देते विचार का विश्लेषण

यही से शुरू होती है
मुक्तिबोध की कविता अन्धेरे में ।



-- शरद कोकास


(चित्र गूगल से साभार )



  






  

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

मानव मस्तिष्क के गुलाम होने की कहानी

                        फिर यह मस्तिष्क गुलाम कैसे हुआ ?
इस तरह मस्तिष्क की क्षमता का उपयोग कर मनुष्य द्वारा न केवल नये नये अविष्कार किये गये बल्कि इस तरह मनुष्यों ने आपसी संबंध भी कायम किये गए और पृथ्वी पर एक मनुष्य समाज की स्थापना हुई । सामाजिक विकास के साथ साथ मानव ने अपने मस्तिष्क की क्षमता पहचान ली थी और इसकी क्षमता का उपयोग वह न केवल अपने लिये सुख-सुविधायें जुटाने में कर रहा था अपितु समस्त प्राणियों के बीच अपना वर्चस्व कायम करने के लिये भी वह इसका उपयोग कर रहा था । यह तब भी होता था कि कुछ लोग जीवन को बेहतर बनाने के लिये मस्तिष्क का उपयोग करते थे और अन्य लोग उस जीवन का उपभोग करते थे । हालाँकि श्रम की महत्ता को नकारा नहीं गया लेकिन श्रम का बौद्धिक और शारीरिक रूप में विभाजन होने लगा था । जिन लोगों ने मस्तिष्क की क्षमता को पहचाना उन्हीके बीच ऐसे लोगों का उद्भव भी हुआ जिन्होने अन्य मनुष्यों पर शासन करने के लिये इसका उपयोग किया ।इस चालाक मनुष्य ने यह देखा कि समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जिन पर आसानी से शासन किया जा सकता है , तब उसने अपने बीच के मनुष्यों को ही अपना गुलाम बनाना शुरु किया । मनुष्यों में सत्ता की हवस , धन लोलुपता , जैसे विकारों ने जन्म लेना शुरु किया और घास के मैदानों और पशुओं के लिये किये जाने वाले युद्ध वर्चस्व की लड़ाई में तब्दील हो गए ।ऐसा दुनिया के हर समाज में हुआ ।
धीरे धीरे मनुष्यों में वर्ग विभाजन हुआ फिर काम के आधार पर जातियाँ बनीं ,हमारे यहाँ वर्ण व्यवस्था प्रारम्भ हुई सीधे-सादे मनुष्य को चालाक मनुष्य द्वारा यह बताया गया कि मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है इसलिये कि वह परमपिता के मुख से पैदा हुआ है । सभी सभ्यताओं में जो अमीर थे उन्होने गरीबों को दास बनाया और उन्हे अमीरों की सेवा करने का काम सौंपा । मनुष्य को अपने अधीन करने के लिये आवश्यक था कि उसके मस्तिष्क को काबू में किया जाये । सभी तानाशाहों ने यही किया । मनुष्य के मस्तिष्क को धर्म , पाप पुण्य ,लोक-परलोक ,पुनर्जन्म,मोक्ष कर्मफल जैसी अवधारणाओं के आधार पर गुलाम बनाने की कोशिश की गई । उसे यथास्थिति में जीने का उपदेश दिया गया । इस मस्तिष्क में अज्ञात शक्तियों के प्रति भय को हवा दी गई तथा अंधविश्वास ठूंसे गये । मनुष्य के सोचने समझने व तर्क करने की शक्ति कमजोर कर दी गई । ऐसा नहीं कि मनुष्य ने इस शोषण के खिलाफ कभी सर नहीं उठाया । विश्व के अनेक भागों मे क्रांतियाँ हुईं ,रूस में ज़ारशाही के खिलाफ क्रांति हुई,ब्रिटेन में फ्यूडल सिस्टम के खिलाफ क्रांति हुई, अमेरिका में , फ्रांस में क्रांति हुई,ग्रीस में स्पार्ट्कस की क्रांति हुई आदि आदि। कहीं यह सफल हुई कहीं असफल हुई यह अलग बात है । लेकिन हमारे देश में ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ । हमारे देश सहित विश्व के अनेक भू-भागों का मनुष्य आज पिछड़ा हुआ है या , दकियानुसी मान्यताओं से घिरा हुआ हैं तो उसके पीछे यही कारण है कि आज से हजारों वर्ष पूर्व मनुष्य के मस्तिष्क को गुलाम कर दिया गया है । भाग्यवाद के नाम पर् उसे अकर्मण्य बना दिया गया है जाति व्यवस्था , वर्ण व्यवस्था व अर्थव्यवस्था के आधार पर उसे टुकडों टुकडों में बाँट दिया गया है । हम सभी जो अपने देश के सच्चे नागरिक हैं आज भी संगठित होकर अन्याय के खिलाफ नहीं लड़ते
यदि हमें अंधविश्वासों व अव्यवस्थाओं के खिलाफ अपनी लडाई लडनी है तो सबसे पहले मस्तिष्क की गुलामी से मुक्त होना पडेगा। अपनी चेतना , तर्क शक्ति व सोच को पुन: धारदार बनाना पडेगा । अब्राहम लिंकन ने कहा है कि “गुलाम को उसकी गुलामी का अहसास दिला दो तो वह बागी हो जाता है ।“ कहते हैं जब मनुष्य सोचना शुरू कर देता है तो वह तानाशाह के लिये खतरनाक हो जाता है । न सोचने वाला मनुष्य मृत व्यक्ति के समान होता है । कवि उदय प्रकाश की प्रसिद्ध कविता है
मरने के बाद आदमी कुछ नही बोलता
मरने के बाद आदमी कुछ नही सोचता
कुछ नहीं बोलने कुछ नहीं सोचने पर
आदमी मर जाता है
यदि यह बात हम समझ लें तो स्वतंत्र भारत का हर नागरिक मानसिक तौर पर स्वतंत्र हो जाये क्योंकि जिस तरह मानव विकास की हर प्रक्रिया का जन्म सबसे पहले मानव मस्तिष्क मे हुआ उसी तरह क्रांति या परिवर्तन भी सबसे पहले मानव मस्तिष्क में ही जन्म लेता है तत्पश्चात हम समाज में उसे प्रतिफलित होते देखते हैं ।जागृति के लिये हमें स्वयं शिक्षित होना होगा और लोगों को शिक्षित करना होगा । इसके लिये सबसे पहले ज़रूरी है मस्तिष्क की गुलामी से मुक्त होना ।
( छवि गूगल से साभार )

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

मस्तिष्क की सत्ता - मनुष्य जाति का शैशव काल

विकास की पूरी फिल्म का ट्रेलर है छोटा बच्चा -
मनुष्य की प्रारम्भिक अवस्था में भाषा के विकास को हम शिशु के भाषा ज्ञान के विकास के साथ जोड़कर देख सकते हैं । अपनी आयु के पहले वर्ष में शिशु सही सही शब्दों का उच्चारण नहीं कर पाता । दूसरे तीसरे वर्ष में वह शब्दों के साथ छोटे सरल वाक्य बोलना सीखता है तथा पाँच छह वर्ष की आयु तक पूरी तरह वाक्य रचना सीख जाता है ।बच्चा भाषा के पहले से बने मानकों को ग्रहण करता हैं ।वह उसे उस रुप में सीखता है जिस रुप में उसे उसका परिवेश प्रदान करता है ।उसी तरह प्रांरभिक वर्ष में शिशु पत्थर या कोई वस्तु ठीक से पकड़ नहीं सकता धीरे धीरे वह सीखता है । प्राचीन मानव का यह शैशव काल हजारों वर्षों तक चला । धीरे धीरे सब कुछ उसके मस्तिष्क में दर्ज होता गया ।
उस प्रकार हाथ, जिव्हा व गले के प्रयोग के साथ साथ मनुष्य के मस्तिष्क की क्षमता भी बढ़ती गई ।उसने आग की खोज की, आग जलाकर तापना ,माँस भूनना ,खाल व पत्तियों से तन ढंकना उसने सीख लिया । हजारों वर्षों तक वह उसी अवस्था में रहा । फिर उसने पत्थर के औजार व हथियार बनाये । हडडी की चीजें ,बरछी भाले ,सूजे, सूजियाँ बनाई । गुफाओं में चित्र बनाये । तत्पश्चात वह पशुपालन व खेती की अवस्था तक आया ।
तात्पर्य यह कि विकास के हर चरण के साथ साथ , पर्यावरण के साथ खुद को ढालते हुए वह अपने मस्तिष्क का विकास करता गया । आज हम मानव जीवन में मस्तिष्क की अहम भूमिका को स्वीकार करते हैं ।आज हमारी प्रत्येक क्रिया प्रतिक्रिया पर मस्तिष्क का सीधा नियंत्रण है । जिस मानव को पत्थर पकड़ना तक नहीं आता था वह यान में सवार होकर अनंत ब्रम्हांड के रहस्य खोजने निकला है ।वह बिजली जिसे आकाश में देखकर वह डर जाया करता था , उसका प्रयोग वह अपनी सुख सुविधाओं के लिये कर रहा है ।मनुष्य जाति की संपूर्ण प्रगति , समस्त परिवर्तन इसी मस्तिष्क की देन है । हर परिवर्तन के पीछे हमारे हाथ हैं जिन्हे हमारा मस्तिष्क संचालित करता है । टेलीविजन ,कम्प्यूटर या एरोप्लेन का अविष्कार ध्यानावस्था में नहीं हुआ, लगातार चलने वाले प्रयोगों और मस्तिष्क की क्षमता की वज़ह से यह अविष्कार सम्भव हुए । हमारी इंद्रियों से प्राप्त सभी अनुभूतियाँ इस मस्तिष्क में दर्ज हुई जिससे कला साहित्य संस्कृति का विकास हुआ। सारी अच्छाईयाँ और बुराइयाँ भी इसी मस्तिष्क की उपज हैं । यदि मस्तिष्क नहीं होता तो हम सचमुच जानवर के जानवर रहते ।

सोमवार, 16 अगस्त 2010

मनुष्य के जीवन में संकेत की आवश्यकता


                                        इशारों इशारों में
इसी तरह प्रारंभिक काल में जब मनुष्य के पास कोई भाषा नहीं थी वह संप्रषेण के लिये संकेतों का प्रयोग करता था । वह सोच नहीं पाता था, क्योंकि सोचने के लिये भाषा अनिवार्य थी ।महाअरण्य में जब उसने हिंसक पशुओं को देखा तो उनसे स्वयं की तथा अपने समूह की रक्षा के लिये उसने हाव भाव व संकेतों का उपयोग किया । उसी तरह शिकार के समय जानवरों का चुपचाप पीछा करने तथा उन्हे पकड़ने के लिये समझ में आने वाले संकेतों की आवश्यकता होती थी । इनकी मदद से वह साथियों को सतर्क कर सकता था तथा खामोश रख सकता था । परंतु वह अंधेरे में विवश हो जाता था , संकेतों का प्रयोग कर वह मात्र दिन में ही शिकार कर सकता था । अंधेरे में हिंसक पशुओं यथा शेर ,बाघ तथा जहरीले सापों से स्वंय की व समूह जनों की रक्षा कर पाना उसके लिये कठिन था ।उस समय तक अग्नि की खोज भी नहीं हुई थी ।
इस आस्ट्रेलोपिथेकस मनुष्य की संकेत भाषा को जानने के लिये हम अपने संसर्ग में आने वाले पशुओं का निरीक्षण कर सकते है साथ ही ऐसे ही मनुष्यों का भी निरीक्षण कर सकते हैं जो एक दूसरे की भाषा नहीं जानते तथा केवल संकेतों व भांगिमाओं से भाव व्यक्त कर सकते हैं । अंधेरे में संकेतों की निष्फलता के फलस्वरुप आदिम मनुष्य ने संकेतों के लिये गले का प्रयोग करना शुरु किया ।कुछ स्वरों व चीखों के माध्यम से उसने संकेतों का आदान प्रदान किया ।वह दिन के प्रकाश में हाथों व चेहरे के संकेत का प्रयोग करता था तथा रात्रि में कुछ विशिष्ट स्वर संकेत निकालता था ।खतरे का स्वर निकालते ही वह देखता सारे लोग सावधान हो जाते हैं ।अभी भी आप देख सकते हैं कि जब शेर जंगल में निकलता है तो पशु पक्षी कुछ विशिष्ट आवाजों से खतरे के संकेत देने लगते हैं ।
धीरे धीरे मनुष्य की यह क्षमता बढ़ी । उसने पिथिकेंथ्रोपस की अवस्था तक आते आते कुछ शब्दों का उपयोग करना सीख लिया। फिर नियंडरथल मानव की अवस्था तक वह सरल वाक्य बनाने लगा और आधुनिक मानव की अवस्था तक भाषा का बखूबी उपयोग करने लगा ।भाषा का यह संपूर्ण विकास उसके मस्तिष्क में दर्ज होता गया ।यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि आस्ट्रेलोपिथेकस से पिथिकेंथ्रोपस मानव के मस्तिष्क के आयतन में डेढ़ गुनी तथा नियंडरथल मानव के मस्तिष्क तक मस्तिष्क के आयतन में ढाई गुनी वृध्दि हुई ।
उपसर्ग में प्रस्तुत है कवि केदारनाथ अग्रवाल की यह कविता ..यह केदार जी का जन्मशताब्दी वर्ष है

सुबह से सूरह उजाला उगाये
आँखें खोले शोभित शासन करता है

ज़मीन और आसमान का भूगोल
ऊग आये उजाले का आलिंगन करता है

द्वन्द्व का नर्तक, काल
नित्य और अनित्य का नर्तन करता है

नाश और निर्माण का भागीदार आदमी
शताब्दी के रंग रूप का परिवर्तन करता है ।छवि गूगल से साभार