बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

माँ ही बताती है बचपन में कि यह तुम्हारे पिता है


मस्तिष्क की सत्ता लेखमाला - मस्तिष्क के क्रियाकलाप - हम किसी को कैसे पहचानते हैं -


3 : प्रतिमा का शब्द में रुपांतरण : (Naming an object ) शब्द के छवि में रूपांतरण के ठीक विपरीत है छवि या प्रतिमा का शब्द में रूपांतरण । मस्तिष्क की इस कार्यप्रणाली द्वारा जैसे ही हम किसी वस्तु को या व्यक्ति को देखते हैं हमें तुरंत उसका नाम याद आ जाता है । दरअसल जब पहली बार हमें उस वस्तु या व्यक्ति का नाम बताया जाता है हमारे मस्तिष्क उसे रिकॉर्ड कर लेता है तथा दोबारा देखने पर हम तुरंत उसका नाम बता देते हैं । बचपन में हमें बताया जाता है बेटा यह चिड़िया है ,यह पेड़ है , यह आदमी है , यह औरत है , यह रोटी है , यह पानी है , यह मन्दिर है , यह मस्जिद है । यहाँ तक कि क कमल का,ख खरगोश का वगैरह भी इसी प्रक्रिया के फलस्वरूप हम याद करते हैं । रिश्तों की पहचान भी हमें इसी तरह कराई जाती है । माँ जैसी दिखाई देने वाली एक स्त्री जिसकी गोद में हम बड़े होते है हमारी माँ कहलाती है और फिर यह माँ हमारे पिता से हमारा परिचय करवाती है ।
लेकिन यह प्रक्रिया स्थायी नहीं होती । जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हमें बार बार याद करने पर भी किसी चीज का नाम याद नहीं आता यद्यपि वह नाम हमारी मेमोरी में रहता है । ऐसा ही लोगों के साथ भी होता है । अक्सर ऐसा होता है कि किसी समारोह में ,कहीं बाज़ार में हमारा कोई पुराना परिचित अचानक सामने आकर खड़ा हो जाता है और कहता है ..क्यों पहचाना ? “ हम शर्म के मारे कह तो देते हैं कि , हाँ पहचान लिया लेकिन याद नहीं कर पाते कि वह कौन है ।
ऐसी स्थिति में मस्तिष्क तेज़ी से अपना यह काम शुरु करता है । मस्तिष्क की सर्च प्रणाली प्रारम्भ हो जाती है और यह तेज़ी से अपनी फाइलों में उस छवि का नाम ढूँढता है । और फिर अचानक किसी वस्तु को देखकर या अन्य किसी सन्दर्भ से हमें उसका नाम याद आ जाता है । मान लीजिये आपको नाम याद ही नहीं आया तो आप घर जाकर पत्नी से या किसी मित्र से पूछते है और उसके यह पूछने पर कि वह कैसा दिखता है आप कहते है .. वह कॉलेज वाले शर्मा जी जैसा दिखता है फिर तुरंत आपकी पत्नी या मित्र कहता है अच्छा तो वह पाण्डे जी होंगे .. और आप को उस व्यक्ति का नाम याद आ जाता है । यह बात अलग है कि इसके बाद आप पत्नी से पूछते है “ लेकिन तुम उन्हे कैसे जानती हो ? “ और पत्नी जब तक यह नही कहती कि “ वो मेरे मायके से है और मैं उन्हे भाई मानती हूँ “ , तब तक आपको चैन नही आता ।
ऐसे ही किसी अनदेखी वस्तु के बारे में भी हम कहते है कि वह अनदेखी चीज भी इसके या उसके जैसी दिखती है और आप उससे मिलती जुलती किसी वस्तु के बारे में बताते हैं । मान लीजिये आपने जंगल में भेड़िया पहली बार देखा और आप को उस जानवर का नाम नही पता तो आप कहेंगे कि “ एक जानवर मैने ऐसा देखा है जो कुत्ते जैसा दिखता है । “ इसलिये कि कुत्ता आपका जाना पहचाना जानवर है । इसीलिये हमें शेर ,बाघ , सिंह ,चीता ,तेन्दुआ या लकड़बग्घा एक जैसे दिखाई देते हैं । इसी तरह हमें सारे गोरे विदेशी एक जैसे दिखते हैं । वह अमेरिकी हो या ब्रिटिश हम उसे अंग्रेज़ ही कहते हैं । सारे अश्वेत नागरिकों को नीग्रो कहने का प्रचलन अभी अभी तक था । इसी तरह चीनी और जापानी भी हमें एक जैसे लगते हैं । यहाँ तक कि अपने देश में भी अनेक उत्तर भारतीय हर दक्षिण भारतीय की विविध प्रांतों के आधार पर पहचान न कर पाने के कारण सभी को मद्रासी कहते हैं ।
लेकिन मस्तिष्क की पहचान करने की क्षमता के कारण अभ्यास करने पर हम उनमें भेद कर सकते हैं । मस्तिष्क की यह कार्यप्रणाली जीवन भर बखूबी अपना काम करती है । हम नित नई चीज़ें देखते है और उनके साथ अपनी पहचान स्थापित करते हैं । हम देखी हुई हर वस्तु को एक नाम देते हैं , यह नाम हमारी अपनी भाषा में होता है । इस तरह नये बिम्बों के लिये नये शब्द बनते हैं । इसी प्रकार हम अपनी अन्य इन्द्रियों के माध्यम से भी जो ज्ञान प्राप्त करते हैं उन्हे इस कार्यप्रणाली द्वारा नाम देते हैं ।


उपसर्ग मे प्रस्तुत है मस्तिष्क की इसी कार्यक्षमता को आधार बनाकर लिखी गई मेरी यह कविता ---






मस्तिष्क के क्रियाकलाप –चार – पहचानना


मनुष्य का नाम मनुष्य नहीं था जब
मस्तिष्क का नाम भी मस्तिष्क नहीं था
नदी पेड़ चिड़िया इसी दुनिया में थे और
नदी पेड़ चिड़िया नहीं कहलाते थे
गूंगे के ख्वाब की तरह बखानता था मनुष्य
वह सब कुछ जो दृश्यमान था


अनाम चित्रों से भरी थी मस्तिष्क की कलावीथिका
और मनुष्य उनक लिये शीर्षक तलाश रहा था


हवाओं ने उसे कुछ नाम सुझाये
धूप ने छाया में बोले कुछ शब्द
बारिश की बून्दों ने कुछ गीत गुनगुनाये
इस तरह नामकरण का सिलसिला शुरू हुआ
पहाड़ का नाम उसने पहाड़ रखा
और आसमान का आसमान
दिखाई देने वाली हर चीज़ के साथ
एक नाम जोड़कर उसने पहचान कायम की
और जिसे देख नहीं पाया
उसका नाम उसने ईश्वर रखा


यहीं से शुरू हुई रिश्तों के साथ उसकी पहचान
स्त्री सी दिखने वाली एक स्त्री उसकी माँ कहलाई
और एक पुरुष को पहचाना उसने पिता के रूप में
जानवरों में भेद करते हुए उसने
उन्हे बाँटा हिंसक और अहिंसक की श्रेणियों में
मस्तिष्क की इस कार्यप्रणाली को फिर उसने
मनुष्यों पर भी लागू किया


हर दाढ़ी वाला उसे मुसलमान नज़र आया
चोटी जनेउवाला हिन्दू और पगड़ीधारी सिख
हर अश्वेत की पहचान उसने की अफ्रीकी के रूप में
सूटधारी को इसाई और गोरे को विदेशी जाना


युद्ध दंगों और चुनावों से इतर समय में ही
हमने मनुष्य के रूप में मनुष्य पहचाना ।

शरद कोकास




( एक चित्र मेरे ममेरे भाई ,डॉ.आनंद शर्मा ,उनकी अमेरिकन पत्नी लुईस रोज़ व बिटिया लोरी लाई का , अन्य सभी चित्र गूगल से साभार )

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

राम कहने पर आपको किसका चेहरा याद आता है ?

2 : शब्दों का प्रतिमा में रुपांतरण : मस्तिष्क द्वारा किये जाने वाले अनेक कार्यों के अंतर्गत यह मस्तिष्क का एक और कार्य है । यह किस तरह होता है यह समझाने के लिए मैं आपको कुछ शब्द दे रहा हूँ । जैसे ही आप उस शब्द को पढ़ेंगे आप को उस से जुड़ी प्रतिमा, इमेज या छवि याद आयेगी । जैसे मै कहता हूँ “ एक पेड़ । ” तो आपने जो भी पेड़ देखा होगा या जिस पेड़ की छवि आपकी स्मृति में होगी उस छवि की कल्पना आप करेंगे । हो सकता है बहुत से पेड़ आपने देखे हों लेकिन उनमें से कोई एक पेड़ ही आपको याद आयेगा । लेकिन मैं अगर कहूँ जंगल तो आपको बहुत से पेड़ों के अलावा पहाड़ , झरने या जंगल में जो कुछ भी आपने देखा हो याद आ जायेगा । हो सकता है कई लोगों को अब तक जंगल देखने का अवसर ना प्राप्त हुआ हो लेकिन अगर आपने जंगल को चित्र में देखा हो तो वह याद आयेगा ।उसी तरह मैं कहूंगा “ कम्प्यूटर “ तो आपको डेस्कटॉप या लैप टॉप , कम्प्यूटर का जो भी चित्र आपके मस्तिष्क मे होगा वह याद आ जायेगा ।

इसके विपरीत जिन छवियों की पहचान हमारे मस्तिष्क में शब्द के रूप में दर्ज़ नहीं है वह छवि हमें याद नहीं आयेगी, जैसे मै कहूँ ‘ फ्लोरेंस नाईटिंगेल ‘, अब आप में से जिसने सेवा की इस मूर्ति का चित्र देखा होगा वे ही इसे याद कर सकेंगे । कई बार द्रश्य मध्यमों के द्वारा भी कुछ छवियाँ हमारे मस्तिष्क में आरोपित की जाती हैं जिन्हे हम सच समझने लगते हैं । जैसे कि मैं कहूँ “ राम “ तो आपको रामायण धारावाहिक में राम का अभिनय करने वाले अभिनेता अरुण गोविल का चेहरा नज़र आयेगा । इस धारावाहिक से पूर्व हम इस छवि को किस रूप में याद करते थे यह भी सोचने की बात है । एक और उदाहरण मान लीजिये मैं कहता हूँ “ एतो सबाक “ तो आप कहेंगे पता नहीं क्या कह रहा है और आप इस शब्द से कोई छवि निर्माण नहीं कर सकेंगे लेकिन जैसे ही मैं कहूंगा “ यह कुत्ता । “ आप के मस्तिष्क मे तुरंत कुत्ते की छवि आ जायेगी । भई मैने रशियन मे कहा था ‘ एतो सबाक ‘ यानि ‘ यह कुत्ता ‘ । इस तरह हम अपने सम्पर्क में दृश्य-श्रव्य माध्यम से आनेवाले हर शब्द की एक प्रतिमा निर्माण करते हैं यह कार्य मस्तिष्क के इस केन्द्र द्वारा सम्पन्न होता है ।
उपसर्ग में प्रस्तुत है मस्तिष्क की इस क्षमता पर लिखी मेरी एक और कविता



मस्तिष्क के क्रियाकलाप –तीन –कल्पना


डार्करूम के अन्धेरे में तैरते
अतीत और वर्तमान के तमाम चित्रों के साथ
सैकड़ों चित्र भविष्य के तैरते हैं यहाँ ईथर में
रूप रंग रस गन्ध और स्पर्श की अनुभूतियाँ
यहाँ चित्रों में ढलती हैं
आँखों के कैमरे में पलकों का शटर खुलता है
और कैद हो जाता है सब कुछ स्थायी रूप में


फिर जॉर्ज बुश या ओबामा का नाम सुनते ही
जेहन में उभरता है
तथाकथित विश्वचौधरी का चेहरा
अमिताभ बच्चन का ज़िक्र होते ही
एक एंग्री यंग मैन सम्वाद बोलता नज़र आता है
कल्पना में शामिल होते हैं लोग दृष्य और वस्तुएँ
जो कभी न कभी हमारे देखे सुने होते हैं
अन्धों का हाथी ठीक इसी प्रक्रिया में
खम्भे सूप और रस्सी में बदलता है


जैसे माँ शब्द सुनते या पढ़ते ही
हमें याद आती है अपनी माँ
जिसे हम होश सम्भालने के बाद पहचानते हैं
माँ की कल्पना में वह छवि कहीं नहीं होती
जिसमें हमे वह जन्म दे रही होती है
या स्तनपान करा रही होती है
ऐसी कल्पना तो देवताओं के लिये भी सम्भव नहीं


यहाँ प्रकट होती है मस्तिष्क की सीमाएँ
जिसकी क्षमता से किसी अन्य स्त्री के चित्र में
माँ का चित्र आरोपित कर
हम स्त्री में माँ का रूप देख सकते हैं
यही तो है मस्तिष्क का कमाल
जहाँ पढ़े हुए शब्दों
और देखे सुने दृष्यों के आधार पर
हम कल्पना कर सकते हैं आगत और विगत की
पृथ्वी पर मनुष्य के जन्म की
और मनुष्य के मन में जन्मी
ईश्वर की कल्पना कर सकते हैं हम
इसी मस्तिष्क से ।


-- शरद कोकास


( चित्र : श्रीमती ऐश्वर्या राय , श्रीमती शीला कोकास , श्रीमती फ्लोरेंस नाइटिंगेल , श्री अरुण गोविल , गूगल से साभार )