हमारे यहाँ एक अंधविश्वास है अगर कोई घर से बाहर जा रहा है और अचानक कोई छींक दें तो कहते हैं कि अब जरूर कुछ अनहोनी होगी या कुछ दुर्घटना होगी । इसके अलावा एक अंधविश्वास और भी है कि यदि कोई काम कर रहा है और छींक आ जाए तो कहते हैं कि अब यह काम पूरा नहीं होगा । उसी तरह से छींक को लेकर यह भी कहा जाता है कि किसी को छींक आ जाए तो समझो कोई याद कर रहा है दरअसल यह सब अंधविश्वास है छींकना क्या होता है हम इस पोस्ट में देखते हैं।
वास्तव मे छींकना एक नैसर्गिक क्रिया है, छींकने से कुछ अनहोनी नहीं होती ना ही किसी काम में बाधा आती है - छींकने से शरीर की सुप्त पेशियां सक्रिय हो जाती है।
छींक आना शरीर की एक स्वाभाविक और सुरक्षात्मक प्रक्रिया है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसके मुख्य कारणों को नीचे समझा जा सकता है:
1. नाक की सफाई (सेंसर की तरह काम करना)
हमारी नाक के अंदर एक महीन झिल्ली होती है जिसे म्यूकस मेंब्रेन कहते हैं। जब इस झिल्ली में कोई बाहरी कण जैसे धूल, मिट्टी, धुआं, परागकण (pollen) या तेज गंध वाली चीज घुस जाती है, तो वहां मौजूद नसें (Trigeminal nerve) मस्तिष्क को एक संकेत भेजती हैं।
2. मस्तिष्क की प्रतिक्रिया
जैसे ही मस्तिष्क को यह संकेत मिलता है कि नाक में कुछ "अनचाहा" है, वह शरीर की मांसपेशियों को उसे बाहर निकालने का आदेश देता है। इसमें आपके फेफड़े, छाती की मांसपेशियां, पेट, डायाफ्राम और गले की मांसपेशियां एक साथ काम करती हैं।
3. हवा का तेज दबाव
छींकते समय हम अनजाने में एक गहरी सांस लेते हैं और फिर उसे बहुत तेजी से बाहर छोड़ते हैं। यह हवा लगभग 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बाहर निकलती है, जो नाक के रास्ते में फंसी किसी भी बाहरी चीज को बाहर धकेल देती है।
4. छींक कब कब आती है ?
शरीर के आभामण्डल में आकस्मिक परिवर्तन से भी छींक आती है,जैसे कुछ लोगो को नहाने के तुरंत बाद, या सोकर उठने के तुरंत बाद छींक आती है । किसी को सुबह किसी को शाम को छींक आती है, किसी को अगरबत्ती की गंध से किसी को परफ्यूम की गंध से ,किसी को बारिश या मिट्टी की गंध से भी छींक आती है
छींक से जुड़ी कुछ रोचक बातें:
आंखें बंद होना: छींकते समय हमारी आंखें अपने आप बंद हो जाती हैं। यह एक रिफ्लेक्स (प्रतिवर्त क्रिया) है जिसे हम चाहकर भी रोक नहीं सकते।
सूरज की रोशनी: कुछ लोगों को तेज धूप या रोशनी देखने पर भी छींक आती है। इसे 'फोटिक स्नीज रिफ्लेक्स' (Photic Sneeze Reflex) कहा जाता है।
बीमारियां: सर्दी-जुकाम या एलर्जी होने पर नाक की झिल्ली में सूजन आ जाती है, जिससे वह बहुत संवेदनशील हो जाती है और बार-बार छींक आती है।
सावधानी: छींक को कभी भी रोकना नहीं चाहिए, क्योंकि इसका दबाव कान के पर्दों या आंखों की नसों पर बुरा असर डाल सकता है। हमेशा छींकते समय रुमाल का उपयोग करें ताकि कीटाणु दूसरों तक न फैलें।
कई बार जोर से छींकने पर आंखों के सामने तैरते हुए सफेद डॉट्स या 'फ्लोटर्स' (Floaters) दिखाई देना एक सामान्य अनुभव है। विज्ञान की भाषा में इसे 'फॉसफेंस' (Phosphenes) कहा जाता है। इसके पीछे मुख्य रूप से दो वैज्ञानिक कारण होते हैं:
1. यांत्रिक दबाव (Mechanical Pressure)
जब आप बहुत जोर से छींकते हैं, तो आपके चेहरे और सिर की नसों में अचानक बहुत अधिक दबाव (Intraocular pressure) बढ़ जाता है।
छींकते समय आपकी आंखें अपने आप कसकर बंद होती हैं।
यह बाहरी दबाव आपकी आंखों के पीछे मौजूद रेटिना (Retina) को उत्तेजित कर देता है।
चूंकि रेटिना का काम प्रकाश के संकेतों को समझना है, इसलिए जब उस पर भौतिक दबाव पड़ता है, तो वह मस्तिष्क को गलत संकेत भेजता है जिसे हमारा दिमाग 'प्रकाश की चिंगारी' या 'तैरते हुए कणों' के रूप में देखता है।
2. रक्त के प्रवाह में बदलाव
छींकते समय आप अचानक बहुत ऊर्जा लगाते हैं, जिससे आपके रक्तचाप (Blood Pressure) में पल भर के लिए तेजी से बदलाव आता है।
इससे आंखों की सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं में ऑक्सीजन और खून की आपूर्ति एक सेकंड के लिए प्रभावित होती है।
इस स्थिति को 'ब्लू फील्ड एंटोप्टिक फेनोमेनन' (Blue Field Entoptic Phenomenon) भी कहा जा सकता है, जिसमें हमें अपनी ही सफेद रक्त कोशिकाओं (White Blood Cells) की परछाईं तैरती हुई दिखाई देने लगती है।
क्या यह चिंता का विषय है?
सामान्यतः, छींकने के तुरंत बाद दिखने वाले ये फ्लोटर्स या रोशनी की चमक कुछ ही सेकंड में गायब हो जाती है और यह बिल्कुल सामान्य है।
तात्पर्य यह कि छींक आने का सम्बन्ध विषैले पदार्थ को बाहर फेंकना नही होता या कोई अंधविश्वास नहीं होता बल्कि यह संवेदनशील तंतुओं की वजह से होता है, नाक में तिनका डालेंगे तब भी छींक आयेगी । इसका सम्बन्ध एलर्जी से है न किसी का छींक की वज़ह से काम बिगड़ जाने की वज़ह से ।
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