बुधवार, 13 मई 2026

सूरज से आती है ओम की आवाज़

आपको याद होगा कुछ साल पहले एक अफवाह फैलाई गई थी कि "नासा-के-वैज्ञानिकों" ने माना है कि सूरज से " ॐ " की आवाज निकलती है?

बहुत सारे लोगों ने धूप मे खड़े होकर सूर्य से निकलने वाली इस आवाज़ को सुनने की कोशिश की लेकिन उन्हे कुछ सुनाई नहीं आया । 

दरअसल नासा (NASA) के वैज्ञानिकों ने कभी यह नहीं कहा कि सूरज से "ॐ" (Om) की आवाज आती है। यह दावा पूरी तरह से गलत और भ्रामक है।

यह अफवाह क्यों उड़ी और इसकी असलियत क्या है, इसे आप नीचे दिए गए बिंदुओं से समझ सकते हैं:

नासा का असली डेटा: 2018 में, नासा ने सूर्य की आंतरिक गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले कंपनों (vibrations) का एक ऑडियो जारी किया था। वैज्ञानिकों ने बताया कि यह एक धीमी, धड़कन जैसी हूम (Humming) की आवाज है, जो सूर्य के भीतर सामग्री के प्रवाह और लहरों के कारण पैदा होती है।

आवाज का रूपांतरण (Sonification): चूंकि अंतरिक्ष एक निर्वात (vacuum) है, वहां ध्वनि यात्रा नहीं कर सकती। नासा ने सूर्य के डेटा और चुंबकीय लहरों के कंपनों को सोनिफिकेशन (Sonification) तकनीक के जरिए इंसानी कानों के सुनने योग्य आवाज में बदला था।
अफवाह की शुरुआत: सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इस "हूम" की आवाज को हिंदू धर्म के पवित्र मंत्र "ॐ" से जोड़ दिया। जब पुडुचेरी की पूर्व उपराज्यपाल किरण बेदी और कुछ अन्य हस्तियों ने इस दावे वाला वीडियो साझा किया, तो यह अफवाह जंगल की आग की तरह फैल गई। बहुत सारे लोगों ने इसे सिद्ध कारण के लिए एडिट करके वीडियो मे ओम की ध्वनि भी जोड़ दी  । बाद में कई लोगों ने इस गलती के लिए माफी भी मांगी।

वैज्ञानिक स्पष्टीकरण: नासा ने स्पष्ट किया है कि उनके द्वारा रिकॉर्ड किए गए विभिन्न नमूनों में से कोई भी आधिकारिक रूप से "ॐ" नहीं है। यह केवल सुनने वाले की अपनी व्याख्या (interpretation) हो सकती है, वैज्ञानिक तथ्य नहीं।

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कुछ वैज्ञानिक तर्क इस तरह भी दिए जाते हैं   

1.किसी वस्तु के गिरने, टूटने, टकराने, वायु के प्रवाह आदि से निकली लम्बी आवाज से भी ‘स्वरों’ के रूप में ध्वनि  पैदा हो सकती है | कभी-कभी सुनसान जगह पर भी हमें एक विशेष प्रकार की ‘लयबद्ध’ ध्वनि सुनायी देती है, प्रायः वहां भी ध्वनि का ‘उच्चारण’ “स्वर” के रूप में होता है न की “व्यंजन” | इसे पल्सेटाइल टिनिटस (Pulsatile Tinnitus) कहते हैं या मस्तिष्क का स्वतः ध्वनि बनाना (Phantom Sound)कहते हैं । 
2. प्रायः वह ध्वनि हमारे लिए कानों द्वारा सुनने पर, हमारी सोच और मानसिकता पर निर्भर करती हैं | जैसे गला दबाने पर गों गों की आवाज़ निकलती है , यह आपको ओम ओम भी सुनाई दे सकता है । 

3. वैसे ‘सूर्य’ आग का गोला है | हम भी जब ‘आग’ जलाते हैं तब आग की ‘लपटों’ से ध्वनि भी सुनायी देती है | जैसे लकड़ी जलने की आवाज़ तिड तिड आती है या सूं सूं की आवाज़ आती है ।  यह ध्वनि भी हमारे कानों द्वारा सुनने और हमारी मानसिकता और साथ में ‘वायु’ के प्रवाहानुसार अलग-अलग परिभाषित हो सकती है | 

वैसे ध्वनि कानों से सुनने के लिए एक माध्यम की जरुरत भी होती है जैसे मनुष्यों के स्वर के लिए उनका स्वर यन्त्र ज़िम्मेदार होता है वैसे ही जानवरों के भी । जैसे किसी ‘कुत्ते’ के भोंकने पर यदि किसी बालक से पूछे की कुत्ता कैसे भोंक रहा था ? तब वह कह सकता है की ‘कुत्ता’ “भों-भों…” की आवाज निकाल रहा है | वही किसी अन्य बालक से पूछने पर “वऊ-वऊ”, “भू-भू”, “हु-हु” जैसे शब्द सुनने को मिल सकते है जिन्होंने कुत्ते की ध्वनि का विश्लेषण किया हो !ठीक इसी प्रकार वस्तुओं के गिरने, टूटने, टकराने से निकली आवाज को भी हम विभिन्न ‘स्वरों’ और ‘व्यंजनों’ के रूप में जोड़कर आभाषित कर सकते हैं । 
इनमे कौनसी बात सही है कौनसी गलत है यह देखते हैं

मानसिकता और व्याख्या (Perception): यह बात बिल्कुल सही है कि हमारा मस्तिष्क किसी भी अपरिचित ध्वनि को हमारे द्वारा पहले से सुने गए शब्दों या अर्थों में ढालने की कोशिश करता है। इसे मनोविज्ञान में 'Pareidolia' (पैरिडोलिया) कहते हैं। जैसे बादलों में चेहरा दिखना, वैसे ही शोर में कोई शब्द सुनाई देना।

पैरिडोलिया (Pareidolia) क्या है?

यह हमारे मस्तिष्क की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है जिसमें वह अस्पष्ट या बेतरतीब (random) आवाजों या दृश्यों में एक जाना-पहचाना पैटर्न खोजने की कोशिश करता है।
उदाहरण: बादलों में किसी जानवर की आकृति दिखना, बिजली के स्विच बोर्ड में मुस्कुराता हुआ चेहरा नजर आना, या पंखे की आवाज़ में किसी का नाम सुनाई देना।
इस पेड़ मे स्त्री नज़र आती होगी 
सूरज के मामले में: जब लोगों ने सूरज की 'हूमिंग' (गुनगुनाहट) सुनी, तो उनके मस्तिष्क ने उसे उनके सबसे परिचित धार्मिक शब्द 'ॐ' के सांचे में ढाल दिया। यह सुनने वाले की मानसिक धारणा का परिणाम था।

स्वर (Vowels) बनाम व्यंजन (Consonants): यह बात वैज्ञानिक रूप से सही है कि प्राकृतिक आपदाओं, हवा या आग से निकलने वाली ध्वनियाँ अक्सर 'निरंतर' (Continuous) होती हैं, जो 'स्वरों' (Vowels जैसे- अ, ओ, ऊ) जैसी लगती हैं। 'व्यंजन' (Consonants जैसे- क, ख, प) बोलने के लिए जीभ, होंठ या दांतों के घर्षण की ज़रूरत होती है, जो निर्जीव वस्तुओं में नहीं होता।

अनुकरण (Onomatopoeia): कुत्ते के भोंकने वाला उदाहरण एकदम सही है। अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों में एक ही जानवर की आवाज़ को अलग-अलग शब्दों में लिखा जाता है। उदाहरण के लिए, बिल्ली को हम "म्याऊं" कहते हैं, जबकि अंग्रेज़ी में "Meow" और जापानी में "Nya" कहा जाता है। यह सुनने वाले के विश्लेषण पर निर्भर करता है।

माध्यम की आवश्यकता: यह भौतिक विज्ञान का अटल सत्य है कि ध्वनि को यात्रा करने के लिए हवा, पानी या ठोस जैसे माध्यम की ज़रूरत होती है।

उपरोक्त तर्कों मे कहीं कहीं थोड़ा तकनीकी अंतर है

शून्य (Vacuum) में ध्वनि: आग की लपटों का उदाहरण दिया, जो धरती पर सही है। लेकिन सूर्य अंतरिक्ष में है जहाँ 'हवा' नहीं है, इसलिए वहाँ से कोई भी आवाज़ सीधे हमारे कानों तक नहीं पहुँच सकती। नासा ने जो आवाज़ सुनाई, वह 'ध्वनि' नहीं बल्कि 'डेटा' (Magnetic Waves) को साउंड में बदला गया रूप था।

नासा ने चुंबकीय तरंगों को आवाज़ में कैसे बदला? (Sonification)
चूंकि अंतरिक्ष में निर्वात (vacuum) है, वहां ध्वनि की तरंगें यात्रा नहीं कर सकतीं। नासा ने इसे 'सोनिफिकेशन' तकनीक से मुमकिन बनाया:

डेटा कैप्चर: नासा के SOHO (Solar and Heliospheric Observatory) जैसे उपग्रह सूरज की सतह पर होने वाले कंपन और चुंबकीय तरंगों (electromagnetic waves) को रिकॉर्ड करते हैं।

रूपांतरण: इन तरंगों की फ्रीक्वेंसी बहुत कम होती है (इंसानी कान इन्हें नहीं सुन सकते)। वैज्ञानिक सॉफ्टवेयर का उपयोग करके इन तरंगों की गति को हजारों गुना बढ़ा देते हैं और उन्हें साउंड वेव में बदल देते हैं।

परिणाम: यह ठीक वैसा ही है जैसे रेडियो स्टेशन सिग्नल को आवाज़ में बदलता है। जो आवाज़ हमें सुनाई देती है, वह असल में "डेटा का ऑडियो वर्जन" है।

गला दबाने या आग की आवाज़: यह सही है कि ये आवाज़ें 'ॐ' जैसी सुनाई दे सकती हैं, लेकिन वे 'ॐ' होती नहीं हैं। यहाँ 'सुनाई देने' (Subjective) और 'होने' (Objective) के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है। यह पूरी तरह सुनने वाले के सांस्कृतिक और धार्मिक बैकग्राउंड पर निर्भर करता है।

निष्कर्ष

अधिकांश बातें सही और तार्किक हैं। ध्वनि का भौतिक रूप (Vibration) एक सच्चाई है, लेकिन उस ध्वनि का 'अर्थ' निकालना (जैसे उसे ॐ, भों-भों या हूमिंग कहना) पूरी तरह से मानव मस्तिष्क और उसकी धारणा पर निर्भर करता है। सूरज के मामले में भी यही हुआ—वैज्ञानिकों के लिए वह "Solar Hum" (सौर गुंजन) था, जबकि कुछ आम लोगों के लिए वह "ॐ" बन गया।

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क्या अन्य ग्रहों की भी आवाज़ रिकॉर्ड की गई है?

हाँ, नासा और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों ने सौरमंडल के लगभग सभी प्रमुख ग्रहों की 'आवाज़ें' (डेटा रूपांतरण के माध्यम से) जारी की हैं:

मंगल (Mars): 'परसेवेरेंस रोवर' ने मंगल पर असली माइक्रोफोन भेजे हैं। पहली बार हमने वहां की हवाओं और रोवर के चलने की असली आवाज़ सुनी है। यह डेटा रूपांतरण नहीं, बल्कि असली साउंड रिकॉर्डिंग है क्योंकि मंगल पर पतला वायुमंडल मौजूद है।

शुक्र (Venus): नासा के 'पार्कर सोलर प्रोब' ने शुक्र के ऊपरी वायुमंडल से गुजरते समय रेडियो सिग्नल रिकॉर्ड किए थे, जो एक डरावनी सीटी जैसी सुनाई देते हैं।

बृहस्पति (Jupiter): इसके चुंबकीय क्षेत्र की आवाज़ बहुत तेज़ और 'जंगली जानवरों के दहाड़ने' जैसी लगती है।

शनि (Saturn): शनि की रिंग्स और रेडियो उत्सर्जन से निकलने वाली आवाज़ें किसी पुरानी साइंस-फिक्शन फिल्म के बैकग्राउंड म्यूज़िक जैसी सुनाई देती हैं।

आपका 

शरद कोकास 

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1 टिप्पणी:

  1. मित्रों यह बात तो पुरानी हो गई है लेकिन इस बात के बहाने विज्ञान की कुछ नई बातें आपको पता चलेंगी

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