सोमवार, 17 मई 2010

मटर पनीर की सब्ज़ी की तरह बनता है हमारा शरीर

     लेखमाला : मस्तिष्क की सत्ता - हमारा और अन्य सजीवों का शरीर कैसे बनता है -

आपसे यदि पूछा जाये कि सजीवों के कुछ प्रमुख लक्षण बताइये तो आप क्या कहेंगे ? सजीव वही है जो जीवित है या जिसके पास एक जीवित देह है ।फिर पूछा जाये कि जीवित देह में क्या होता है तो आप कहेंगे ,, एक सिर दो हाथ ,दो पाँव, दो आँखें ,दो कान ,एक दिल, एक पेट वगैरह वगैरह । और बेशक एक दिमाग़ भी ..। मेरे जैसे कुछ कविनुमा लोग कुछ और कहेंगे ..मसलन कटीली आँखें , पत्थर जैसा दिल ,कुँये जैसा पेट आदि आदि । लेकिन माफ कीजिये , मैं सिर्फ मनुष्यों के बारे में थोड़े ही पूछ रहा हूँ । मेरा आशय तो हर उस शरीर से है जिसे हम सजीव कहते हैं । बिलकुल सही फरमाया आपने लेकिन यह शरीर जिसके हम मालिक हैं इसकी यह बेहद उबाऊ ही सही लेकिन वैज्ञानिक परिभाषा जानना भी तो ज़रूरी है ।
आइये कुछ विस्तार से देखें सजीवों का यह शरीर कैसे बनता है और इसके प्रमुख लक्षण क्या क्या होते हैं । इनमे सबसे पहला है जीव द्रव्य : सजीवों का शरीर जीव द्रव्य से बनता है । इस जीव द्रव्य में मुख्यत: कार्बनिक व अकार्बनिक ठोस पदार्थ ,प्रोटीन वसा, कार्बोहाइड्रेटस नयूक्लीइक एसिड ,लवण तथा जल होता है । ये सभी यौगिक निर्जीव तत्वों से बनते हैं । यह पारदर्शी ,चिपचिपा ,रवेदार ,जेलीनुमा ,अर्धतरल पदार्थ होता है । यह कोशिका की कोशिका झिल्ली के भीतर अवस्थित होता है । निर्जीव तत्वों से बने इन यौगिकों के एक विशेष तरह के अणु संग्रह में जीवन होता है ।
सजीवों का दूसरा लक्षणहै एक निश्चित शारीरिक संगठन : शरीर का निर्माण करने वाला जीव द्रव्य छोटे छोटे टुकडों में कोशिका कला से घिरकर शरीर की वह इकाई बनाता है जिसे कोशिका कहते हैं । कुछ जीवों का शरीर एक कोशिका से बना होता हैं । ये ‘ एक कोशिकीय जीव ‘ कहलाते है जिसे अमीबा,वालवॉक्स आदि । मनुष्य,अन्य जंतु व पौधे जो अनेक कोशिकाओं से बनते हैं ‘ बहुकोशिकीय जीव ‘ कहलाते हैं । इनके शरीर में असंख्य कोशिकाओं से मिलकर बनते हैं ‘ ऊतक ‘। विभिन्न ऊतकों से अंग बनते हैं। कई अंगो को मिलाकर तंत्र बनता है तथा तंत्रों के संगठन से शरीर का निर्माण होता है। इस तरह बने हुए शरीर की एक निश्चित पहचान होती है जैसे मनुष्य का शरीर,भैंस, हाथी , कुत्ता ,गाय .मख्खी और गधे आदि का शरीर । ऐसे ही पौधे की भी एक निश्चित आकृति होती है जिससे हम पहचानते हैं यह पीपल का पेड़ है या आम का ।
आइये इसे एक उदाहरण से समझते हैं । मटर पनीर की सब्ज़ी बनाने के लिये पहले कढाई में तेल डालते हैं । फिर उसमें जीरा , प्याज़,लहसुन ,अदरक,मिर्च,धनिया,हल्दी डाल देने से बनता है मसाला , इसमे पानी डाल दें तो बन जाती है तरी,उसमें मटर डाल दें तो कहलाती है मटर की सब्जी । अगर इसमें पनीर भी डाल दें तो कहलाती है मटर-पनीर की सब्जी । इसकी अपनी पहचान इसी नाम से होती है और अन्य तत्वों के नाम लुप्त हो जाते हैं ।
मैने अपने एक व्याख्यान के दौरान जब यह उदाहरण दिया तो एक महिला ने कहा “ सर ,आपने इतना भाषण दे दिया लेकिन इस क्रम में आपकी सब्ज़ी (मतलब मटर-पनीर की सब्ज़ी ) बन ही नहीं सकती । मैने पूछा "कैसे ?"तो उसने कहा " आपने गैस तो जलाई ही नही। मैने कहा बिलकुल ठीक । मैं यह बताना भूल ही गया । सब्जी पकाने से पहले गैस जलाना ज़रूरी है ।अंत में यही एक बात कि जैसे पकाने के लिये उर्जा ज़रूरी है वैसे ही जीवन के निर्माण और सजीव को जैविक क्रियाओं के लिये भी उर्जा ज़रूरी है ।
अगली किश्त में देखेंगे सजीवों के अन्य लक्षण ।
आज उपसर्ग में प्रस्तुत है शरीर के लिये और जीवन के लिये ज़रूरी इस उर्जा या इस आग पर कवि निरंजन श्रोत्रिय की यह एक कविता ,उनके संग्रह "जुगलबंदी " से साभार ।


आग


हमारा बहुत सारा जीवन
उसकी तलाश में निकल जाता है
जबकि वह मौजूद होती है
हमारे बहुत करीब


जब हम रगड़ते हैं दियासलाई
वह सिमटी होती है छ: हज़ार डिग्री सैल्सियस
धधकते सूरज से उतरी धूप के भीतर
जब हम ढूँढते हैं ठंडी राख के भीतर कोई अंगारा
वह दुबकी होती है टेसू के सिंदूरी –पीले रंग में


रात को ठंडी पड़ी भट्टी की ईटों और
गुस्से में उबलती कलम की नोंक में
छुपा होता है उसका संगीत


वह भरी हुई है मरी खाल के फ़ेफ़ड़े के भीतर
पिघलाने को बहुत सा लोहा
वह प्रतीक्षा कर रही है हथेलियोँ की रगड़ की


हम अपना सारा जीवन उसे इधर-उधर खोजने में लगा देंगे
और वह प्रकट हो जायेगी यूँ ही एक हल्की चोट में
वहाँ जहाँ चकमक पत्थरों से खेल रहे हैं बच्चे |

निरंजन श्रोत्रिय

बुधवार, 5 मई 2010

मुझे नही पता ,आप ही बताइये यह जीवन क्या हैं ?


                                  
आप कहेंगे यह भी कोई सवाल है । सही है आप में से ऐसा कोई नहीं होगा जिसने कभी इस प्रश्न के बारे में न सोचा हो । अभी इस सवाल के उत्तर में आप धड़ाधड़ लिखना शुरू कर देंगे । कोई कहेगा ज़िन्दगी एक पहेली है कोई कहेगा जीवन पानी का बुलबुला है ,जीवन एक उड़ती हुई पतंग है,जीवन एक साँप है , जीवन एक सज़ा है , एक उड़ता हुआ पंछी है ,वगैरह वगैरह ।जीवन के बारे में हर कवि ने दो चार पंक्तियाँ तो लिख ही डाली हैं मसलन ..”जीवन क्या है,चलता फिरता एक खिलौना है / दो आँखों में एक से हंसना एक से रोना है ।" मुझे भी जीवन के बारे में कविताएँ बहुत अच्छी लगती हैं और जीवन को परिभाषित करने वाली एक कविता तो मुझे बेहद पसन्द है ..” ज़िन्दगी क्या है जान जाओगे / रेत पे लाके मछलियाँ रख दो “
चलिए कवियों को अपना काम करने दीजिये, हम जीवन की वैज्ञानिक परिभाषा देखते हैं । पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ हो चुका था लेकिन मानव जीवन के आगमन में अभी समय था । पेड़-पौधे ,कीड़े-मकोड़े, रेंगने वाले जीव तैरने वाले जीव और उड़ने वाले जीवों का आगमन हो रहा था । यह सब सजीव थे और इनमें जीवन के सभी लक्षण मौजूद थे । हमें तो मनुष्य के जीवन से मतलब है इसलिये मनुष्य के जन्म का समाचार जानने से पहले हम जान लें ,आखिर यह सजीव होना क्या है ?
जीव का अर्थ आत्मा नहीं होता - जीवन के बारे में अगर आप जानते हैं तो आपको यह भी पता ही होगा कि हम मनुष्य,अन्य प्राणि,कीट-पतंगे और पेड़-पौधे सभी सजीवों की श्रेणि में आते हैं । सजीवों के कुछ विशेष लक्षण होते हैं जैसे जन्म लेना,बढ़ना, सांस लेना, गति, उत्तेजना तथा संतानोपत्ति और अंतत: मृत्यु आदि। ये सजीव अपने आसपास से अपने जीवन के लिये आवश्यक वस्तुयें ग्रहण करते हैं । सजीवों के सभी लक्षण जीवन के फलस्वरुप ही होते हैं । सजीवों के शरीर में जीवन के लिये आवश्यक क्रियाशीलता बनी रहती है । यह क्रियाशीलता उनके पदार्थ जीव द्रव्य विभिन्न तत्वों तथा यौगिकों का विशिष्ट संगठन हैं। इस प्रकार जीव संगठित द्रव्य है तथा जीवन उसकी क्रियाशीलता । जीवन के होने के लिये एक शरीर आवश्यक है। शरीर से बाहर जीवन नहीं हो सकता । शरीर और जीवन का तालमेल ही एक सजीव को होने का अर्थ प्रदान करता है । जीवन को बेहतर तरीके से जानने के लिये जरूरी है शरीर को जानना ।
सजीवों के इन प्रमुख लक्षणों को तो हम अगली पोस्ट में देखेंगे , इस बार तो आप यह बताइये कि आप से अगर पूछा जाये कि जीवन क्या है ? तो आप एक दो पंक्ति में इसका क्या उत्तर देंगे ? जीवन की आपकी अपनी परिभाषा जानने की प्रतीक्षा में - आपका - शरद कोकास

अरे हाँ उपसर्ग की कविता तो लिखना भूल ही गया , इस बार लीजिये पढ़िये कवि कुमार अम्बुज की यह कविता जिसमें आपको जीवन की प्रचलित परिभाषाओं से अलग जीवन का एक नया ही अर्थ दिखाई देगा ।श्री कुमार अम्बुज हिन्दी के बहुत प्रसिद्ध कवि हैं और भोपाल में रहते हैं । उनका एक ब्लॉग भी है , " कुमार अम्बुज "... इसे भी देखियेगा ।



इस नश्वर संसार में


लाखों करोड़ों सालों से
इतना ही जीवित चला आ रहा है
यह नश्वर संसार


नश्वरता की घोषणा करने वाले
नष्ट हो गये
नश्वर संसार नष्ट नहीं हो रहा है


तमाम नश्वरता के बावज़ूद
भंगी अपनी झाड़ू बचा लेता है
धोबी अपने घाट का पत्थर
एक मिस्त्री बचा लेता है अपने औज़ार
और किसान गेहूँ की बाली
लोहार अपना घन
समय की छाती पर पटक देता है


तोते अपनी चोंच की लाली बचा लेते हैं
कोयल अपनी कूक
स्त्री अपनी मादकता बचा लेती है
पुरुष अपना ताप
काल के विकराल मुँह से छीन लेता है एक बच्चा
अपनी अमर हँसी


इस नश्वर संसार में
जीवन अमर हो रहा है लगातार
नश्वरवादियों के शवों पर
अट्टहास करता हुआ ।


- कुमार अम्बुज


चित्र गूगल से और कुमार अम्बुज की कविता उनके संग्रह " किवाड़ " से साभार ।तस्वीर मेरे मोबाइल कैमरे से ..-शरद कोकास

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

कुत्ते जैसी हरकतें करने वाले इंसानों से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है ...

लेखमाला मस्तिष्क की सत्ता -- जीवन में प्रोटीन और डी.एन.ए. का अर्थ


पुरानी फिल्मों के दृश्यों को याद कीजिये ..कटघरे में एक स्त्री खड़ी है और वह चीख चीख कर कह रही है ..इस बच्चे का पिता यही है मी लॉर्ड” । दूसरे कटघरे में एक विलेन टाइप का पुरुष कुटिल मुस्कान के साथ खड़ा है । उसका वकील कह रहा है “ लेकिन इसका तुम्हारे पास क्या सबूत है ?” अब फिल्मों में ऐसा दृश्य नहीं होता इसलिये कि अब समय बदल गया है और विज्ञान ने साबित कर दिया है कि बच्चे के डी.एन.ए. से पिता का डी.एन.ए. मिलाकर यह जाना जा सकता है कि उसका वास्तविक पिता कौन है । अब तो टी.वी.धारावाहिक देखने वाले बच्चे भी इस बात को बखूबी जानते हैं कि बच्चे के पिता का पता लगाने के लिये दोनों के डी.एन.ए. का मिलान आवश्यक है ।
मनुष्य के व कुत्ते के तीन-चौथाई डी.एन.ए. एक जैसे हैं - इस तरह हम देखते हैं कि जीवन के लिये दो रासायनिक व्यवस्थाएँ आवश्यक हैं प्रोटीन तथा डी.एन.ए ( डीआक्सीराइबो नयूक्लीइक एसिड )। हर व्यक्ति का डी.एन.ए. अलग होता है । आजकल के मानव शरीर के डी.एन.ए. अन्य प्राणियों के डी.एन.ए. से भी मिलते हैं जैसे चिम्पांजी और मनुष्य के डी.एन.ए. 99.8 % मिलते हैं तथा कुत्ते व मनुष्य के 75% । (कुत्ते जैसी हरकतें करने वाले इंसानों से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है ) विभिन्न एमीनो एसिड्स के मेल से प्रोटीन बनता हैं तथा न्यूक्लीइक अम्ल न्यूक्लिओटाईड्स से बनता है । इनमें कार्बन नाइट्रोजन के यौगिक शर्करा एवं फास्फेट से जुडे होते हैं । प्रोटीन जीवन की सुनियोजित संरचना का आधार है तथा डी.एन.ए यह निर्धारित करता है कि शरीर में क्या बनाना है।
इस वैज्ञानिक सिद्धांत के प्रारम्भिक चरण में सन 1953 में मिलर नामक वैज्ञानिक ने एक प्रयोग किया था जिसमें उसने पृथ्वी के प्रांरभिक वायुमंडल में पाई जाने वाली जल वाष्प,मीथेन अमोनिया और हाइड्रोजन जैसी गैसों के मिश्रण में एक सप्ताह तक बिजली की चिनगारी प्रवाहित की जिसके फलस्वरूप एमिनो एसिड्स तैयार हुए । तत्पश्चात अनेक वैज्ञानिकों ने भी ऐसे ही प्रयोग किये जिससे राइबो शर्करा उनके फास्फेट तथा एडनिन जैसे अनेक जैव अणु तैयार हुए। ये अणु न्यूक्लिओटाईड्स के मूल घटक हैं । इनके ही बहुलकीकरण से न्यूक्लीईक एसिड बनता है ।
जल ही जीवन है क्यों कहा जाता है - हमारे सौर परिवार में केवल पृथ्वी पर ही जीवन सभंव हो सका इसका कारण यह है कि प्रोटीन की एंजाइमी किया के लिये मुक्तजल की उपस्थिति अनिवार्य थी । सूर्य से न अधिक दूर न अधिक पास होने की वजह से यहाँ वाष्पीकरण के पश्चात भी काफी जल शेष रहता है । अब आप समझे वैज्ञानिक चन्द्रमा और मंगल पर जीवन की सम्भावनाओं से पहले पानी की तलाश क्यों कर रहे हैं ।जब तक मनुष्य चन्द्रमा पर नहीं गया था वह चन्द्रमा पर दिखाई देने वाले धब्बों को पानी से भरी झीलें ही समझता था । पानी जीवन के लिये इतना ज़रूरी क्यों है यह अब आप जान गये होंगे।
उपसर्ग में आज प्रस्तुत है कवि चन्द्रकांत देवताले की यह कविता " शब्दों की पवित्रता के बारे में "


शब्दों की पवित्रता के बारे में


रोटी सेंकती पत्नी से हँसकर कहा मैने
अगला फुलका बिल्कुल चन्द्रमा की तरह बेदाग़ हो तो जानूँ


उसने याद दिलाया बेदाग़ नहीं होता चन्द्रमा


तो शब्दों की पवित्रता के बारे में सोचने लगा मै
क्या शब्द रह सकते हैं प्रसन्न या उदास केवल अपने से


वह बोली चकोटी पर पड़ी कच्ची रोटी को दिखाते
यह है चन्द्रमा - जैसी दे दूँ इसे क्या बिना ही आँच दिखाये


अवकाश में रहते हैं शब्द शब्दकोष में टंगे नंगे अस्थिपंजर
शायद यही है पवित्रता शब्दों की


अपने अनुभव से हम नष्ट करते हैं कौमार्य शब्दों का
तब वे दहकते हैं और साबित होते हैं प्यार और आक्रमण करने लायक


मैंने कहा सेंक दो रोटी तुम बढ़िया कड़क चुन्दड़ीवाली
नहीं चाहिये मुझको चन्द्रमा जैसी ।


( कविता चन्द्रकांत देवताले के संग्रह " उसके सपने " से व चित्र गूगल से साभार )

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

पृथ्वी पर जीवन कैसे आया - एक लेख और एक नज़्म



जब हम कोई नाटक देखते हैं तो सबसे पहले रंगमंच पर एक या दो पात्रों का प्रवेश होता है ,फिर धीरे धीरे अन्य पात्रों का प्रवेश होता है और इस तरह नाटक चलता रहता है । यह बृह्माण्ड का रंगमंच भी कुछ इसी तरह का है । इस रंगमंच पर आकाशगंगायें आईं , सौरमण्डल आये , ग्रह आये , उपग्रह आये यह सब तो आप देख चुके हैं । अब देखते हैं इस पृथ्वी पर घटित होने वाली एक महत्वपूर्ण घटना अर्थात पृथ्वी पर जीवन का प्रादुर्भाव । ना ना ... अभी हम मनुष्य के आगमन की बात नहीं कर रहे हैं ,मनुष्य के आने से पहले ही यहाँ बहुत कुछ हो चुका था ,पहले एक नज़र उसे तो देख लें ।
इस तरह साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी तो बन गई ,समुद्र नदी,नाले, तालाब ,पहाड़ सब बन गये ,लेकिन यहाँ जीवन की शुरुआत होनी अभी शेष थी । भू वैज्ञानिकों द्वारा आस्ट्रेलिया ,अफ्रीका व ग्रीनलैंड में किये गये अध्ययनों के आधार पर यह सिध्द हो चुका है कि आज से साढ़े तीन अरब वर्ष पूर्व बैक्टीरिया के समान एक कोशीय जीव ,समुद्रतलों के छिछले पानी में शैलभितियाँ बना रहे थे । इनके पूर्वजों अर्थात सरल अविकसित जीवाणु की उपस्थिति भी लगभग 4 अरब वर्ष पूर्व रही होगी ।इस प्रकार यह प्रतीत होता हैं कि पृथ्वी के विकास के साथ साथ कहीं न कहीं जीवन का विकास भी हो रहा था ।
जीवन की उत्पति कैसे हुई इसके विषय में प्राचीन मनुष्य की अपनी धारणाएँ हैं परंतु विज्ञान के आधार पर शोधकर्ताओं ने इस रहस्य को सुलझा लिया हैं । सन 1920 में एक रुसी वैज्ञानिक जे.बी एस . हाल्डेन ने ‘पृथ्वी पर निर्जीव रसायनों की पारस्पारिक प्रतिक्रिया से जीवन के उदभव’ का सिध्दांत प्रतिपादित किया । हाल्डेन ने कहा कि उस काल में कास्मिक किरणों , बिजली ( तड़ित ) व ज्वालामुखी के कारण हो रही तीक्ष्ण रासायनिक प्रक्रिया के फलस्वरुप कार्बन मूल के जैव अणुओं की उत्पत्ति हुई । ये अणु नदियों के साथ बहकर समुद्र में मिले , जिनसे समुद्र को उष्णता व गाढापन मिला ।
ओपेरिन ने कहा कि आम कोशिकायें जेली ( श्लष ) जैसी छोटी छोटी बूंदें रही होगीं । समुद्रों के साथ रसायनों के आदान प्रदान के दौरान इन जेल सृदृश्य छोटी बूंदों ने ऐसे अणुओं का निर्माण किया होगा जिन्होने बाद में अपनी प्रतिकृतियाँ बनाई होंगी ।
सन 1958 से इन धारणाओं को परखने की शुरुआत हुई । शिकागो विश्वविधालय के वैज्ञानिकों ने उन तमाम गैसों को एक फ्लास्क में लिया जो पृथ्वी के प्रांरभिक वायुमंडल मे विद्यमान थीं । उनमें विद्युत स्फुलिंगों को प्रवाहित कर बिजली पैदा की । इस तरह उन्हे एक सप्ताह पकाया गया । देखा गया कि एक सप्ताह बाद इन गैस भरे फ्लास्कों पर एमीनो एसिडस की परतें चढ़ गई हैं । इन्ही एमीनो एसिडस के आपस में जुडने से प्रोटीन बनता हैं । इसी प्रयोग में जीवन के अन्य मौलिक रासायनिक घटकों का निर्माण होता देखा गया ।
पृथ्वी पर जीवन के अविर्भाव के सम्बन्ध में कुछ वैज्ञानिकों की यह भी मान्यता है कि हो सकता है पृथ्वी पर जीवन अंतरिक्ष से आया हो । इसके लिये भी प्रयोग चल रहे हैं । यह तो विज्ञान है ,अभी तक इसने जीवन की उत्पत्ति के बारे में जो कुछ बताया है उसे हम मान लेते हैं ,आगे और कुछ नया बतायेगा तो उसे भी मान लेंगे ?
उपसर्ग में प्रस्तुत है इस बार प्रसिद्ध शायर जनाब निदा फाज़ली की यह मशहूर नज़्म .............
ये ज़िन्दगी
ये ज़िन्दगी
आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी बड़ी नसों में
मचल रही है
तुम्हारे पैरों से चल रही है
तुम्हारी आवाज़ में गले से
निकल रही है
तुम्हारे लफ्ज़ों में
ढल रही है.....

ये ज़िन्दगी.....
जाने कितनी सदियों से
यूँ ही शक्लें
बदल रही है


बदलती शक्लों
बदलते जिस्मों में
चलता-फिरता ये इक शरारा
जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा !
इसी से सारी चहल -पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा


सितारे तोड़ो
या घर बसाओ
अलम उठाओ
या सर झुकाओ


तुम्हारी आँखों की रोशनी तक है
खेल सारा
ये खेल होगा नहीं दोबारा ।


अलम=जंग का निशान
मित्रों पृथ्वी पर जीवन का यह खेल सचमुच दोबारा नहीं होना है इसलिये क्यों न हम इस खेल को एक बार में ही समझ लें और जान लें अपने होने का अर्थ । अगली कड़ी में पढ़ेंगे जिन्दगी माने प्रोटीन और डी.एन.ए. -
शरद कोकास
(नज़्म , वाणी प्रकाशन से प्रकाशित निदा फाज़ली के संग्रह "खोया हुआ सा कुछ " से साभार । छवि गूगल से साभार)

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

चन्दामामा के नाना सूरज तो हमारे कौन ?


पिछली पोस्ट से इतना ज़रूर याद रखें -

आइये ,इस सिद्धांत के आधार पर देखें कि हमारी पृथ्वी कैसे बनी । साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व सूर्य के निकट से एक पिन्ड गुजरा ,दोनों पिन्डों में आकर्षण हुआ । सूर्य से जो तंतु निकला कालांतर में उसके ठंडे होने पर तथा द्रव्य के शीतली करण के कारण उसके छोटे छोटे पिंड बने । ये तमाम पिंड उस सूर्य की परिक्रमा करने लगे जो उनका जनक था । यह सभी पिंड ग्रह कहलाये जिनमें हमारी पृथ्वी भी एक ग्रह है और उसके भाई बहन हैं अन्य ग्रह । हमारे सबसे करीब यही ग्रह है जिस पर हम खड़े हैं लेकिन इसका हमारी कुंडली में कहीं कोई स्थान नहीं है । और वह पिन्ड जिसके आकर्षण के फलस्वरूप हमारे सौरमंडल की उत्पत्ति हुई हो सकता है अपनी संतानों के साथ बृह्मांड में कहीं विचरण कर रहा हो । और अब आज की कड़ी - चन्दा का और हमारा रिश्ता मामा-भांजे का है यह बात हमे बचपन में ही बता दी जाती है ।बड़े होकर हम चांद सी महबूबा वगैरह ढूंढने लगते हैं । लड़कियाँ चांद सी सूरत पाने को बेताब रहती हैं वहीं लड़के भरी जवानी में सर पर चांद निकलने से घबरा जाते हैं । जो लोग बहुत महत्वाकांक्षी होते है उनके बारे में कहा जाता है कि वह चांद को छूने की कोशिश कर रहा है ।लेखक सुरेन्द्र वर्मा ने तो एक उपन्यास ही लिख डाला है “ मुझे चांद चाहिये “ ।इसी चांद के कैलेंडर पर हमारे सारे तीज त्योहार आधारित हैं ।“करवा चौथ " के चांद से तो आप भलिभाँति परिचित हैं हमारी फिल्मों और धारावाहिकों ने इस पर्व का महत्व स्थापित कर दिया है । पति कैसा भी हो उसके लिये पत्नी व्रत ज़रूर रखती है । पत्नी के लिये पति द्वारा रखे जाने वाले व्रत का अभी तक अविष्कार नहीं हुआ है । यह भी आप जानते होंगे कि हिन्दू धर्म के अलावा इस्लाम में भी सारे त्योहार चांद के घटने - बढ़ने पर ही आधारित होते हैं ।चांद का कैलेंडर ही मनुष्य का पहला कैलेंडर था ।
चलिये देखते हैं कि जिस चांद का हमारे जीवन में इतना महत्व है उसका जन्म कैसे हुआ । सूर्य की बेटी पृथ्वी का जन्म हो चुका था फिर उसका अन्नप्राशन हुआ,नामकरण हुआ और वह धीरे धीरे बड़ी होने लगी । फिर उसकी भी संतान होने का समय आया । पृथ्वी और अन्य ग्रह अपनी उत्पत्ति के समय से ही अपने जनक सूर्य के चारों ओर एक कक्षा में परिक्रमा करने लगे थे । प्रारम्भ में यह कक्षा पूरी तरह वृताकार या दीर्घ वृताकार नहीं थी, इसका कारण पिंडों का परस्पर आकर्षण व अन्य शक्तियों का होना था ।
यह कैसे हुआ होगा जानने के लिये चलिये एक धागे में कोई अंगूठी या भारी वस्तु लटकाईये और उसे गोल गोल घुमाईये,,हाथ सधने में कितनी देर लगती है देखिये । हाँ तो धीरे धीरे कक्षाएँ पूर्ण होती गईं । यह सम्भव है कि जब ग्रह सूर्य के चारों ओर अपूर्ण व अव्यवस्थित कक्षाओं में परिक्रमा लगा रहे थे , कोई ग्रह सूर्य के बहुत निकट पहुंच गया हो तथा गुरुत्वाकर्षण के कारण उसमें से कोई तंतु निकल पड़ा हो । कालांतर में यह तंतु ठंडा हुआ, उसके द्रव्य का शीतलीकरण हुआ तथा उसके छोटे छोटे पिंड बन गये । यही पिंड उपग्रह कहलाये जिस प्रकार ग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहे थे उसी तरह यह उपग्रह भी अपने ग्रह की परिक्रमा करने लगे । जैसे पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह चन्द्रमा जो पृथ्वी से चार लाख किलोमीटर दूर है अपनी जननी की परिक्रमा कर रहा है । शनि के उपग्रह उसकी परिक्रमा कर रहे हैं । पृथ्वी अपने जनक सूर्य की परिक्रमा कर रही है साथ ही अपने अक्ष पर भी परिक्रमा कर रही है । सभी ग्रह एक ही दिशा में सूर्य की परिक्रमा करते हैं तथा इनकी कक्षाएँ एक ही समतल में हैं ।
यह सब चक्कर हमारे जीवन में भी चलते है किसी काम को पूरा करवाने के लिये हम सरकारी दफ्तर में बाबू के चक्कर लगाते हैं, बाबू साहब के चक्कर लगाता है, साहब मंत्री के चक्कर लगाता है और मंत्री प्रधान मंत्री के चक्कर लगाता है । काम होता है या नहीं होता यह अलग विषय है ।
और हाँ.. आप आकाश में प्रतिदिन चांद की स्थिति देखना चाहते हैं तो ज़रा साइड बार में देखिये आपके आसमान पर आज चांद कैसा दिख रहा है दिख जायेगा ।




उपसर्ग में प्रस्तुत है एक गुमनाम से शायर शब्बीर अहमद ख़ान “ करार “ की यह कविता । करार साहब उन दिनों कामठी (महाराष्ट्र) में रहते थे और भोपाल के क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालय में एक वर्षीय बी.एड .के छात्र थे । उन दिनों कॉलेज की पत्रिका “प्रज्ञा” में यह कविता प्रकाशित हुई थी । इस पत्रिका के सम्पादक थे आज के प्रसिद्ध कवि श्री लीलाधर मण्डलोई । चांद पर मनुष्य की विजय पर तीखा व्यंग्य करती यह कविता पढ़िये ।


धरती माँ के लाल गये थे

बहुत सभ्य कहलाने को
निज कौशल दर्शाने को
बुद्धि का लौह मनाने को
धरती माँ के लाल गये थे
चांद पे मिट्टी लाने को
धरती का बोझ बढ़ाने को ।


वियतकांग में आग लगाकर
जाने कितने बम बरसाकर
लाखों जीवन दीप बुझाकर
लाशों के अम्बार लगाकर
अपने ऐब छुपाने को
धरती माँ के लाल गये थे
चांद पे मिट्टी लाने को
धरती का बोझ बढ़ाने को ।


मिट्टी का पुतला मिट्टी से
जितनी दूर भी जायेगा
ऊपर-नीचे आगे-पीछे
मिट्टी ही तो पायेगा
मन मिट्टी हो जायेगा
करनी पर पछतायेगा
मिट्टी ही लेकर आयेगा
यह जग को समझाने को ।


धरती माँ के लाल गये थे
चांद पे मिट्टी लाने को
धरती का बोझ बढ़ाने को ॥


"मस्तिष्क की सत्ता "लेखमाला की यह कड़ी आपको कैसी लगी अवश्य बताइयेगा । - शरद कोकास छवि गूगल से साभार

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

पृथ्वी पर रहने का किराया दो

इस बार कुछ देर हो गई । नवरात्रि पर अपने ब्लोग शरद कोकास पर विदेशी कवयित्रियों की कविता लगाने में व्यस्त रहा । इसके लिये क्षमा चाहता हूँ । खैर ..देर से ही सही प्रस्तुत है " मस्तिष्क की सत्ता " लेखमाला में इस बार की यह कड़ी हमारी पृथ्वी पर ।

पिछली पोस्ट से इतना ज़रूर याद रखें - मान लीजिये हमारी पृथ्वी की आबादी लगभग छह सौ करोड़ है ,इस तरह हम हमारी पृथ्वी के 600 करोड़वें हिस्से हैं । हमारा सौर परिवार हमारी आकाशगंगा का 64 करोड़वाँ हिस्सा है तथा हमारी पृथ्वी हमारी आकाशगंगा का 25 हज़ार करोड़वाँ हिस्सा है । अब बताइये इस आकाशगंगा में हम कहाँ हुए ? फिर ऐसी करोड़ों आकाशगंगाएं बृह्मांड में हैं तो हम बृह्मांड में कहाँ हुए ? गणना छोड़िये , यह सोचिये कि जब हम बृह्मांड में इतने नगण्य हैं तो मामूली कुत्ते,बिल्ली,चीटीं और मच्छरकी क्या स्थिति होगी ? उनसे भी छोटे हैं कीटाणु जो आकार में मिलीमीटर के हज़ारवें भाग तक होते हैं जो केवल माईक्रोस्कोप से देखे जा सकते हैं और जिन्हे माईक्रोमीटर में नापते हैं। इनसे भी छोटे होते हैं अणु । अणु के विभिन्न हिस्से हैं परमाणु जो पदार्थ का सूक्ष्मतम भाग है। समस्त बृह्मांड इन्ही अणुओं से बना है। परमाणु को इलेक्ट्रोन ,प्रोटान व न्यूट्रान में विभाजित कर सकते हैं । ये मूलभूत कण हैं , इलेक्ट्रोन इनमें सबसे छोटा कण है ।
पृथ्वी पर रहने का किराया दो

मकान खरीदने से पहले हम हमेशा जानना चाहते हैं यह किसने बनाया है या ज़मीन खरीदने से पहले यह कि वह ज़मीन किसकी है । हम इस बात के प्रति आश्वस्त हो जाना चाहते हैं कि हम कहीं ठगे तो नहीं जा रहे । सही बात है , आखिर ज़मीन या मकान का पैसा दे रहे हैं भाई । ज़मीन या मकान ही नहीं छोटी से छोटी वस्तु भी हम यदि खरीदते हैं या किराये पर लेते हैं तो उसकी बारे में जानना चाहते हैं ।ऐसा है तो फिर हम यह क्यों नहीं जानना चाहते कि जिस पृथ्वी पर अपने पुरखों के ज़माने से हम रह रहे हैं वह कहाँ से आई ? आप कहेंगे पृथ्वी हम खरीद थोड़े ही रहे हैं या इस पर रहने का किराया थोड़े ही दे रहे हैं । सही है ,जो चीज़ मुफ्त में मिल रही हो या जिसके लिये किराया ना देना पड़ रहा हो उसके बारे में क्या पूछना । कहीं से भी आई हो पृथ्वी हमने तो इसे माल-ए-मुफ्त समझकर इसके टुकड़े टुकड़े कर बाँट लिया है । जो दिमाग से जितना चालाक उसका हिस्सा उतना बड़ा । जो बड़ा ज़मीन्दार उसके पास सैकड़ों एकड़ ज़मीन और जो सीधा-सादा गरीब उसके पास कुछ नहीं ।
चलिये सामाजिक विषमताओं की बात छोड़िये पृथ्वी कहाँ से आई यह देखते हैं । हर धर्म में पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धी ढेरों पौराणिक और प्राचीन मान्यताएँ हैं लेकिन फिलहाल इन्हे एक ओर रखकर इसका वैज्ञानिक उत्तर ढूंढते हैं । भौतिक विज्ञान के महत्वपूर्ण नियम गुरुत्वाकर्षण (जय हो बाबा न्यूटन) के नियमानुसार द्रव्य के दो पिंडों के बीच आकर्षण होता है । एक पिंड दूसरे पिन्ड को अपनी ओर खींचता है तथा उसके करीब पहुंचते पहुंचते यह आकर्षण बढ़ता जाता है व खिंचने की गति भी बढ़ जाती है । इस प्रकार जब दो पिंड एक दूसरे के बहुत निकट आ जाते हैं तो गुरुत्वाकर्षण के फलस्वरूप दोनों पिंडों से एक लम्बा तंतु निकलता है ।(ऐसा कीजिये आज रसोई में आटा गून्धिये । अपने दोनो हाथ मे अलग अलग आटे के गोले लीजिये फिर दोनो को मिलाइये और खींचकर देखिये तंतु ऐसे ही निकला होगा ) कालांतर में यह तंतु ठंडा होता है द्रव्य का शीतलीकरण होता है व छोटे छोटे पिंड बन जाते हैं इस प्रकार उत्पन्न पिंड अपने उत्पादक पिंड के चारों ओर चक्कर लगाते हैं । यह सिद्धांत सन 1916 में प्रसिद्ध ब्रिटिश वैज्ञानिक जेम्स जिंस ने स्थापित किया ।
आइये ,इस सिद्धांत के आधार पर देखें कि हमारी पृथ्वी कैसे बनी । साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व सूर्य के निकट से एक पिन्ड गुजरा ,दोनों पिन्डों में आकर्षण हुआ । सूर्य से जो तंतु निकला कालांतर में उसके ठंडे होने पर तथा द्रव्य के शीतली करण के कारण उसके छोटे छोटे पिंड बने । ये तमाम पिंड उस सूर्य की परिक्रमा करने लगे जो उनका जनक था । यह सभी पिंड ग्रह कहलाये जिनमें हमारी पृथ्वी भी एक ग्रह है और उसके भाई बहन हैं अन्य ग्रह । हमारे सबसे करीब यही ग्रह है जिस पर हम खड़े हैं लेकिन इसका हमारी कुंडली में कहीं कोई स्थान नहीं है । और वह पिन्ड जिसके आकर्षण के फलस्वरूप हमारे सौरमंडल की उत्पत्ति हुई हो सकता है अपनी संतानों के साथ बृह्मांड में कहीं विचरण कर रहा हो ।
इस प्रकार यह पृथ्वी जन्म लेने के पश्चात प्रारम्भ में विभिन्न प्रकार की गैस से मिलकर बना एक विशालकाय पिंड थी जो अपने अक्ष पर घूमती हुई सूर्य की परिक्रमा कर रही थी । ताप के विकीरण के फलस्वरूप यह पिंड ठंडा हुआ ,द्रव्य व गैसों का शीतलीकरण हुआ तथा तरलीय व अर्धसान्द्रीय अवस्थाओं से होता हुआ वर्तमान अवस्था तक पहुंचा। बाहरी तल से घनीकरण प्रारम्भ हुआ,उपरी सतह पर पपड़ी जमी जो भीतर की ओर मोटी होती गई। गर्भ भाग में आकुंचन हुआ, पपड़ी में झुर्रियाँ व दरारें पड़ीं फलस्वरूप हिमालय जैसे पर्वत और नदियाँ बनीं । यह सब घटित होने में कई करोड़ साल लगे ।
दिमाग पर ज़्यादा ज़ोर मत लगाइये चलिए अपने घर में ठंडे होते हुए दूध पर मलाई जमते हुए देखिए और इस पर विचार कीजिए । और किराये की बात भी भूल जाईये यह तो एक बहुत बड़ा बाड़ा है जो जितना पुराना किरायेदार उसका उतना हक़ । वही किरायेदार वही मकान मालिक, जैसे अफ्रिका जैसे बड़े देश और हमारे जैसे छोटे ,फिर देश में भी बड़े बड़े धन्ना सेठ और हमारे जैसे फूटपाथिये । इस धरती पर रहने की कीमत न वो देते है न हम । कीमत तो छोड़िये पृथ्वी पर रहकर हम पृथ्वी का ही नुकसान करते हैं,प्रदूषण फैलाते हैं ,जंगल काटते हैं, ज़मीन से पानी चूस लेते हैं और भी बहुत सा नुकसान करते हैं इस पृथ्वी का । मुम्बई की चालें देखी हैं ना जब तक धराशायी नहीं होती लोग खाली ही नहीं करते ,फिर कई लोग दब कर मर भी जाते हैं । हम भी धीरे धीरे अपनी पृथ्वी को वहीं ले जा रहे हैं जहाँ न ये पृथ्वी रहेगी न हम ।आप कहेंगे हमे क्या ? हमारी आनेवाली पीढ़ीयाँ जानें । हम तो चैन से रह ही लेंगे अपने जीते जी ।


उपसर्ग में इस बार प्रस्तुत है शरद कोकास की लम्बी कविता " पुरातत्ववेत्ता " से यह नौ पंक्तियाँ



दुख के दिनो सी कठोर है बीते समय की पीठ
जिस पर खुदे हैं सहनशीलता के दस्तावेज़
जिसमें उन्माद है राह बदलती नदियों का
बेचैनी में करवट बदलती धरती का अभिशाप
सत्तालोलुपों के आक्रमण सिंहासन की अभिलाषा में
मवेशियों के रेवड़ हासिल करने के लिये
घास के मैदान पर पशुपालकों की जीत
और इन्ही के बीच कहीं अस्पष्ट सी लिखावट में अपने अस्तित्व का अर्थ ढूँढते मनुष्य का संघर्ष ....

पृथ्वी पर मनुष्य के इतिहास का बयान करती यह पंक्तियाँ आपको कैसी लगीं ज़रूर बताइयेगा - शरद कोकास

सोमवार, 15 मार्च 2010

कौन थे जो मर गये पिछली सर्दियों में

पिछली पोस्ट से इतना ज़रूर याद रखें - सूर्य से निकला हुआ प्रकाश 8 मिनट में हम तक पहुंचता है । यह ऐसे होता है कि प्रकाश एक सेकंड में 3 लाख कि.मी. दूरी तय करता है, एक मिनट में (300000x60)कि.मी.,एक घंटे में (300000x60x60)कि.मी.,एक दिन में (300000x60x60x24)कि.मी.,तथा एक वर्ष में (300000x60x60x24x365) कि.मी. अर्थात 10लाख करोड़ कि.मी. यह दूरी एक प्रकाशवर्ष कहलाती है । इस तरह सूर्य हमसे 8 प्रकाश मिनट अर्थात(300000x60x8)=14.4 या लगभग 15 करोड़ कि.मी. दूर हुआ । और अब आगे...मस्तिष्क की सत्ता - सात

बृह्मांड में हमारी औकात क्या है


रोजमर्रा की ज़िंदगी में हमारे धैर्य की रोज़ परीक्षा होती है । जब हमे पता चलता है कि किसी ने हमारी किसी बात को लेकर विपरीत टिप्पणी की है तो हम अपना आपा खो बैठते हैं और गुस्से में कहते हैं “ आखिर उसकी औकात ही क्या है बड़ा आया हमे ज्ञान देने वाला “ ( मुझे पता है कुछ लोग मेरे बारे में भी यही सोच रहे होंगे ) लेकिन सच्चाई यह है कि इस दुनिया में हम अपनी ही औकात नहीं जानते ।जानते भी हैं तो सिर्फ अपने घर में या ज़्यादा से ज़्यादा पड़ोस में ।यह कहावत यूँही नहीं बनी है कि “अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है । “
खैर हम कुत्ते हों या शेर रहेंगे तो जानवर के जानवर ही ना । बेहतर है हम मनुष्य की तरह इस बारे में सोचें कि इस ब्रह्मांड में हमारी क्या औकात हो सकती है । आप कहेंगे ,यह तो हमने कभी सोचा ही नहीं । चलिये पहले देखें कि यह बृह्मांड क्या बला है । यह तो आप जानते ही हैं कि हमारी पृथ्वी,अन्य ग्रहों व सूर्य को मिलाकर एक सौरमंडल बनता है । ऐसे अनेक सौरमंडलों से बनती है आकाशगंगा और ऐसी अनेक आकाशगंगाओं से मिलकर बनता है बृह्मांड । इतने विशाल बृह्मांड के बारे में जानने के लिये एक जीवन बहुत छोटा है । लेकिन हमें यह एक जीवन ही मिला है और अगला जन्म होना नहीं है ,इसलिये थोड़ा बहुत तो हमें इसी जीवन में इस बारे में जानना ही चाहिये ।
यह तय करने के लिये कि इस बृह्मांड में हम कहाँ हैं चलिये एक छोटा सा गणित और हल करते हैं ।( फिर एक गणित ?? ) मान लीजिये हमारी पृथ्वी की आबादी लगभग छह सौ करोड़ है ,इस तरह हम हमारी पृथ्वी के 600 करोड़वें हिस्से हैं । हमारा सौर परिवार हमारी आकाशगंगा का 64 करोड़वाँ हिस्सा है तथा हमारी पृथ्वी हमारी आकाशगंगा का 25 हज़ार करोड़वाँ हिस्सा है । अब बताइये इस आकाशगंगा में हम कहाँ हुए ? फिर ऐसी करोड़ों आकाशगंगाएं बृह्मांड में हैं तो हम बृह्मांड में कहाँ हुए ? गणना छोड़िये , यह सोचिये कि जब हम बृह्मांड में इतने नगण्य हैं तो मामूली कुत्ते,बिल्ली,चीटीं और मच्छरकी क्या स्थिति होगी ? उनसे भी छोटे हैं कीटाणु जो आकार में मिलीमीटर के हज़ारवें भाग तक होते हैं जो केवल माईक्रोस्कोप से देखे जा सकते हैं और जिन्हे माईक्रोमीटर में नापते हैं। इनसे भी छोटे होते हैं अणु । अणु के विभिन्न हिस्से हैं परमाणु जो पदार्थ का सूक्ष्मतम भाग है। समस्त बृह्मांड इन्ही अणुओं से बना है। परमाणु को इलेक्ट्रोन ,प्रोटान व न्यूट्रान में विभाजित कर सकते हैं । ये मूलभूत कण हैं , इलेक्ट्रोन इनमें सबसे छोटा कण है । यह वैज्ञानिक जानकारी है जिसे आपने किताबों में भी पढ़ा होगा ।
ज़्यादा विस्तार में न जायें ,मूल प्रश्न यह है कि बृह्मांड में जब हमारी स्थिति इतनी नगण्य है तब अपनी स्थिति जानने के पश्चात भी हमारे में मन में अहंकार क्यों आता है ? अपनी क्षुद्रता को जानकर भी हम जाति ,धर्म ,नस्ल ,भाषा, क्षेत्र ,राज्य ,सम्पन्नता के नाम पर क्यों लड़ते हैं ? एक दूसरे के खून के प्यासे क्यों रहते हैं ? क्या यह हमारा अहंकार नहीं है जो हमे नई जानकारी प्राप्त करने,नई बातें सीखने से रोकता है , हम अपने आप को सर्वज्ञ समझने लगते हैं , हम सिर्फ अपनी कहना चाहते हैं और किसीकी कुछ नहीं सुनना चाहते । हम अपने विचार को ही अंतिम मानते हैं । हम अपना लिखा पत्थर की लकीर समझते हैं । हम अपने आगे हर किसी को तुच्छ समझते हैं । सोचकर देखिये यदि हमारे पूर्वज भी ऐसे ही अहंकारी होते तो क्या आज विज्ञान इतनी प्रगति कर पाता ? अगर हम यह मान लेते कि हमें सब कुछ आता है और हम सबसे बड़े ज्ञानी हैं तो आज भी उसी तरह पेड़ की छाल लपेटे घूमते रहते और जानवरों का शिकार करते रहते । न विज्ञान की कोई बात अंतिम है न धर्म की ,इसलिये सबसे पहले अपने मन से इस अहंकार को निकाल फेंकिये कि आपस में लड़- झगड़कर हम कुछ बड़ा काम कर जायेंगे । लड़ना ही है तो आततायियों से लड़िये ..भूख ग़रीबी बेरोजगारी और मनुष्य द्वारा पैदा की गई समस्याओं से लड़िये ।
खैर ..जबसे पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म हुआ है ,यह सब चल ही रहा है ..जाने कितने लोग इस पृथ्वी पर आये और चले गये किसको याद है ,वे कौन थे ? हम से ही कोई पूछे कि हमारे पिता के पिता के पिता के पिता कौन थे , क्या हमे याद है उनका नाम ? हमें भी कौन याद रखेगा ?और कितने साल याद रखेगा ? बृह्माण्ड की कथा यहीं समाप्त की जाये ..अगली बार बातें करेंगें इस पृथ्वी की ।
एक निवेदन - मेरा यह लिखने का उद्देश्य भी किसी की ओर इंगित करना नहीं है । मैं एक तुच्छ् प्राणि किसी को क्या कह सकता हूँ । इसलिये कृपया विषय से सम्बन्धित टिप्पणी ही करें जिसमे किसी व्यक्ति विशेष की ओर संकेत न हो




और अब उपसर्ग में कवि संजय चतुर्वेदी की यह छोटी लेकिन गम्भीर कविता उनके कविता संग्रह "प्रकाशवर्ष " (आधार प्रकाशन पंचकूला से वर्ष 1993 में प्रकाशित ) से साभार -डॉ.संजय चतुर्वेदी किंग जॉर्जेज़ मेडिकल कॉलेज (अब छत्रपति शाहू जी मे.कॉ.)लखनऊ से एम.डी. हैं । जो मर गये पिछली सर्दियों में

लोग भूल जाते हैं
कौन लोग थे
जो उन्हे इतिहास से निकालकर लाये
उन्हे खींचते रहे
उनकी गर्म रज़ाइयों से बाहर
लकड़ियाँ इकठ्ठा करते रहे
कहीं मौसम ज़्यादा खराब न हो जाये
उनके सहमे हुए घरों में आवाज़ बनकर रहे


लोग भूल जाते हैं वसंत आते ही
कौन थे जो मर गये पिछली सर्दियों में ।

सस्नेह आपका - शरद कोकास  
( चित्र गूगल से साभार )                                                                                                                            
 

सोमवार, 8 मार्च 2010

जिनका दिल टूट जाये उन्हे जनरल नॉलेज की क्या ज़रूरत

पिछली पोस्ट से और कुछ याद रखें न रखें इसे ज़रूर याद रखें -

वैज्ञानिकों का मानना है कि बृह्मांड की उत्पत्ति से पूर्व यहाँ हाईड्रोजन हीलियम प्लाज़्मा उपस्थित था । प्लाज़्मा अर्थात ठोस,द्रव्य,वायु के अतिरिक्त पदार्थ की चौथी अवस्था या इलेक्ट्रोन रहित न्यूक्लियस की स्थिति । इस प्लाज़्मा के केन्द्र भाग में आकुंचन होना शुरू हुआ, सारे प्लाज़्मा को एक स्थान पर केन्द्रित होने के प्रयास में गुरुत्वाकर्षण में वृद्धि हुई, तापमान में वृद्धि हुई फिर एक महाविस्फोट हुआ और फलस्वरूप इस बृह्मांड का निर्माण हुआ । तत्पश्चात आकाशगंगायें बनीं, आकाशगंगाओं में बने सौरमंडल या नक्षत्रमंडल । इन्ही में से एक है हमारा सौरमंडल जिसमें हमारी पृथ्वी ,बुध, बृहस्पति, शुक्र, मंगल, शनि, यूरेनस ,नेप्च्यून,प्लूटो जैसे गृह हैं तथा इनका मुखिया है सूर्य ।
और अब पढ़िये इस से आगे - मस्तिष्क की सत्ता - छह

हमारा एच.ओ.डी.सूर्य हमसे कितनी दूर है


एक पुराना चुटकुला है । पोस्टमैन के इंटरव्यू में एक प्रतिभागी से पूछा गया “ पृथ्वी से सूर्य की दूरी कितनी है बताईये ?” प्रतिभागी ने जवाब दिया “ देखिये अगर सूरज तक डाक बाँटने का काम है तो मुझे नहीं करनी ऐसी नौकरी ।“ लेकिन आप चिंता न करें यहाँ यह प्रश्न मै केवल आपका सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिये कर रहा हूँ । आप जानते होंगे हमारे युवा वर्ग में आजकल एक डॉयलॉग बहुत चलता है ‘ और कुछ हो न हो जी.के. सॉलिड होना चाहिये ।‘ हमारे एक युवा मित्र हैं एक दिन कहने लगे “ जिनका दिल टूट जाये उन्हे जनरल नॉलेज की क्या ज़रूरत ? ” मैनें पूछा “ऐसा क्यों “ तो उन्होने कहा “ आपने वो गाना नहीं सुना ..जब दिल ही टूट गया हम जी के क्या करेंगे “ चलिये हम मान लेते हैं कि हमारा दिल अभी नहीं टूटा है या हमारा दिल सॉलिड है इसलिये थोड़ा बहुत जी.के.तो जान ही लेते है ।
हमारे सौरमंडल के विभागाध्यक्ष सूरज के बारे में बात करते हैं जिसे हम रोज सुबह ऊगता हुआ देखते हैं , जिसे हम प्रणाम करते हैं ,जिसे हम अर्ध्य देते हैं ।जिसके लिये वेदों में अनेक ऋचायें रची गईं और दुनिया के तमाम धर्मग्रंथों में जिसकी स्तुति में साहित्य रचा गया । सूर्य भी वस्तुत: एक तारा है जो पृथ्वी के निकटतम है । इसका जन्म पांच हज़ार करोड़ वर्ष पूर्व हुआ । यह गैसों का एक गोला है तथा इसमें उपस्थित हाईड्रोजन गैस से होने वाली नाभीकीय संलयन की क्रिया के फलस्वरूप इससे उर्जा निकलती है । यह सभी दिशाओं में प्रकाशमान होता है । हमें इसकी उर्जा का 0. 000000005 % भाग ही मिल पाता है । सूर्य की सतह का तापमान 6000 सें.ग्रे. है । इसके केन्द्र का तापमान 1.5 करोड़ डिग्री सें.ग्रे. है ।यह पृथ्वी से पन्द्रह करोड़ किलो मीटर दूरी पर स्थित है तथा पृथ्वी से तेरह लाख गुना बड़ा है । सूर्य से निकला हुआ प्रकाश 8 मिनट में हम तक पहुंचता है । यह ऐसे होता है कि प्रकाश एक सेकंड में 3 लाख कि.मी. दूरी तय करता है, एक मिनट में (300000x60)कि.मी.,एक घंटे में (300000x60x60)कि.मी.,एक दिन में (300000x60x60x24)कि.मी.,तथा एक वर्ष में (300000x60x60x24x365) कि.मी. अर्थात 10लाख करोड़ कि.मी. यह दूरी एक प्रकाशवर्ष कहलाती है । इस तरह सूर्य हमसे 8 प्रकाश मिनट अर्थात(300000x60x8)=14.4 या लगभग 15 करोड़ कि.मी. दूर हुआ ।
बाप रे, दिमाग घूम गया । वैसे भी किलोमीटर की गणना समय में करना कठिन होता है । अभी मैं मुम्बई गया था । वहाँ दूरी को समय में बताने की परम्परा है । प्रभादेवी नाके पर मैने पूछा “ सिद्धि विनायक मन्दिर कितनी दूर है ? “ जवाब मिला “ बस पाँच मिनट “ जुहू बीच की दूरी पूछी तो उत्तर मिला “ बस फिफ्टी फाइव मिनट्स “ मैने किलोमीटर मे दूरी पूछी तो वे सज्जन मुझे ऐसे घूरकर देखने लगे जैसे मैं किसी दूसरे ग्रह से आया प्राणि हूँ । अब यह पैदल फिफ्टीफाइव मिनट था ,बस से या रेल से वह भी मुझे ही तय करना था । प्रकाश की गति से तो मैं चलने से रहा । मैं समझ गया ,मुम्बई में या तो सब विज्ञान की भाषा में बात करते हैं या सबके सब सूर्यवंशी हैं ।
चलिये आप भी जब तक यह सवाल हल करिये । वैसे देखा जाये तो यह बहुत कठिन गणित नहीं है । यह आप चाहे तो कागज कलम या केल्कुलेटर ले लें और धीरे धीरे इसे हल करें । अगर मुझसे कहीं ग़लती हो गई हो तो मुझे बतायें वैसे भी छात्र जीवन में गणित में अपना हाल बेहाल रहा है । तो हल कर रहे हैं ना ? भाई इतना गणित तो आपने स्कूल में पढ़ा ही होगा ?


उपसर्ग में प्रस्तुत है बाबा नागार्जुन की यह कविता 1961 में लिखी हुई

मेरी भी आभा है इसमें


नये गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है
यह विशाल भूखण्ड आज जो दमक रहा है
मेरी भी आभा है इसमें
भीनी भीनी खूशबु वाले
रंग-बिरंगे यह जो इतने फूल खिले हैं
कल इनको मेरे प्राणों ने नहलाया था
कल इनको मेरे सपनो ने सहलाया था
पकी सुनहली फसलों से जो
अबकी यह खलिहान भर गया
मेरी रग-रग के शोणित की बूँदे इसमें मुसकाती हैं
नये गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है
यह विशाल भूखण्ड आज जो दमक रहा है

मेरी भी आभा है इसमें

बुधवार, 3 मार्च 2010

दुनिया का डी.एन.ए.टेस्ट ज़रूरी है


  होली की मस्ती अब कम होने को है लेकिन बच्चों की मस्ती अभी कम नहीं हुई है ..हम सभी को अपने बचपन की होली याद आ रही है । चलिये " मस्तिष्क की सत्ता "लेखमाला के इस लेख क्रमांक -5 की शुरुआत यहीं से करें ..
आपको आपके बचपन की कबसे याद है ?
जो कुछ हमारी आंखों के सामने घटित हो रहा है उसे देखने के लिये हमारी आँखें पर्याप्त हैं लेकिन उसे महसूस करने के लिये अपने मस्तिष्क की क्षमता से हमारा परिचय होना आवश्यक है ।चलिये अतीत के बारे में सोचना शुरू करते हैं । अरे.. मै आपको दुनिया का इतिहास पढ़ने के लिये नहीं कह रहा हूँ ,मै तो आपसे अपने बचपन के बारे में सोचने के लिये कह रहा हूँ । आप कहेंगे हमे तो अपने बचपन की सारी बातें याद हैं । सच सच बताइये सारी बातें याद हैं ? जब आपने पहला शब्द बोला था , याद है ? जब आप ने पहला कदम रखा था और ज़मीन पर खड़े हुए थे वह क्षण याद है ? और जब आपने अपने पापा की गोद में....की थी वह याद है ? लेकिन हमें यह सब याद न होते हुए भी मालूम तो है ही इसलिये कि हमे हमारे माता-पिता ने यह बताया है । इसीलिये याद भले न हो हम सब कहते ज़रूर हैं....” हमने भी अपनी माँ का दूध पिया है । “ और सबसे बड़ी बात तो यह कि हमे जो बताया गया , हमने उसपर विश्वास किया है ।और दूसरे बच्चों को देखकर और उस समय की तस्वीरें देखकर उसकी कल्पना भी की है ।यह मस्तिष्क का ही कमाल है कि जिस तरह हम अपने बचपन के अनदेखे दृश्यों की कल्पना कर लेते हैं उसी तरह आनेवाले कल के दृश्यों की भी कल्पना कर लेते हैं ।
इस तरह दुनिया के भी न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य और अतीत की कल्पना भी हम इसी मस्तिष्क के द्वारा ही कर सकते हैं । अब आइये उन दृश्यों की कल्पना करते हैं जिन्हे न हमारे माता-पिता ने देखा ,न उनके माता –पिता ने । कल्पना कीजिये आज से अरबों वर्ष पूर्व जब इस धरती पर इंसान नहीं था । और इंसान तो क्या जब यह पृथ्वी ही नहीं थी , न सूर्य था, ना चान्द-सितारे थे , ना आकाशगंगायें थीं , ना यह बृह्मांड था , तब क्या था ? अर्थात जब “ कुछ नहीं ” था तो “ कुछ नहीं ” से पहले क्या था ? कुछ लोग इसका उत्तर इस तरह देते हैं कि ‘ कुछ नहीं ‘ से पहले भी ‘ कुछ नहीं ‘ था और उससे पहले भी ‘ कुछ नहीं ‘ था । उनसे पूछा जा सकता है कि जब ‘ कुछ नहीं ‘ था तो ‘ कुछ नहीं ‘ से यह सब कुछ कैसे आया ?
चलिये गालिब साहब की बात से ही शुरुआत करते है । मैने शुरुआत में ग़ालिब साहब का एक शेर पढ़ा था , डुबोया मुझको होने ने न होता मैं तो क्या होता । इसी शेर का पहला मिसरा है “ न था कुछ तो खुदा था , कुछ न होता तो खुदा होता । “ जब से मनुष्य ने ईश्वर की कल्पना की ( यहाँ अटकिये मत ..इस पर हम आगे चलकर बात करेंगे ) तब से लेकर अब तक तो यही माना गया है कि जब कुछ नहीं था तो यह बृह्मांड मौजूद था लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि बृह्मांड की उत्पत्ति से पूर्व यहाँ हाईड्रोजन हीलियम प्लाज़्मा उपस्थित था । प्लाज़्मा अर्थात ठोस,द्रव्य,वायु के अतिरिक्त पदार्थ की चौथी अवस्था या इलेक्ट्रोन रहित न्यूक्लियस की स्थिति । इस प्लाज़्मा के केन्द्र भाग में आकुंचन होना शुरू हुआ, सारे प्लाज़्मा को एक स्थान पर केन्द्रित होने के प्रयास में गुरुत्वाकर्षण में वृद्धि हुई, तापमान में वृद्धि हुई फिर एक महाविस्फोट हुआ और फलस्वरूप इस बृह्मांड का निर्माण हुआ । तत्पश्चात आकाशगंगायें बनीं, आकाशगंगाओं में बने सौरमंडल या नक्षत्रमंडल । इन्ही में से एक है हमारा सौरमंडल जिसमें हमारी पृथ्वी ,बुध, बृहस्पति, शुक्र, मंगल, शनि, यूरेनस ,नेप्च्यून,प्लूटो जैसे गृह हैं तथा इनका मुखिया है सूर्य ।
आप कहेंगे इस में नया क्या है ? सही है ,यह सब बातें आप भलिभांति जानते हैं । यह भी जानते हैं कि यह दुनिया एक दिन में नहीं बनी जैसे कि हम एक दिन में बड़े नहीं हो गये ।इंसान के अतीत के बारे में तो उसके पूर्वजों ने उसे बता दिया लेकिन दुनिया के अतीत के बारे में इंसान को कौन बताता , सो इंसान ने खुद यह जानना चाहा । (भई यह तो इंसान की फितरत है , वह अपने अतीत के बारे में जानना चाहता है , अपने पड़ोसी के अतीत के बारे में जानना चाहता है , फिर दुनिया के अतीत के बारे में क्यों नहीं जानना चाहेगा ? ) फलस्वरूप वैज्ञानिकों ने बहुत खोज की , विभिन्न परीक्षण किये और इस दुनिया का अतीत हमारे सामने रख दिया । आप कहेंगे कि इस वैज्ञानिक परीक्षण की क्या आवश्यकता थी । क्या हमारे पूर्वजों का ज्ञान काफी नहीं था ? मेरा आपसे सवाल है कि जब माँ बच्चे से कहती है कि यह तुम्हारे पिता है और वह बिना किसी सन्देह के उस पर विश्वास भी करता है , दुनिया भी इस बात पर विश्वास करती है फिर कानून को प्रमाण के लिये डी.एन.ए.टेस्ट की ज़रूरत क्यों पड़ती है ?
किसी भी दिशा में विज्ञान अभी ठहरा नहीं है । इस दुनिया के बारे में परीक्षण लगातार चल रहे हैं ,अभी पिछले दिनों ऐसे ही एक परीक्षण के दृश्य आपने देखे होंगे और दुनिया के खत्म हो जाने के भय से भयभीत भी हुए होंगे । इसीलिये हर वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक जानकारी का तार्किक ढंग से विश्लेषण करने की ज़रूरत है अन्यथा हम इस दुनिया की उत्पत्ति के बारे में नहीं जान पायेंगे और हमेशा इसे किसी की ‘दी हुई दुनिया’ समझते रहेंगे या किसी प्रभुत्वशाली देश को इस दुनिया का मालिक समझते रहेंगे तथा इस दुनिया में रहने का वास्तविक आनन्द कभी नहीं उठा पायेंगे ।- शरद कोकास


उपसर्ग में कवि केदार नाथ सिंह की यह चर्चित कविता


उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिये ।
छवि गूगल से साभार

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

क्या हम सभी दोगले हैं ?


                                 
दीपावली के समय की बात है । ( आप कहेंगे यह होली के समय मैं दीवाली की बात क्यों कर रहा हूँ ?, चलिये छोड़िये .. किस्सा सुनिये ) मैं घर से दूर किसी अन्य शहर में अपने मित्र के यहाँ था । पूजन के पश्चात मैने अपने मित्र से कहा चलो शहर की रोशनी देखकर आते हैं ।हम लोग जब निकलने लगे तो मैने उनसे कहा " दरवाज़ा तो बन्द कर दो । " उन्होने कहा " आज के दिन लक्ष्मी कभी भी आ सकती है , इसलिये दरवाज़ा बन्द नही किया जाता । " मैने कहा " और चोर आ गये तो ? " और सचमुच ऐसा ही हुआ । जब हम लोग लौटे तो चोर लक्ष्मीजी के पास रखी नकदी पर हाथ साफ कर चुके थे । मैने कहा .." देख लो , यह क्यों भूल गये कि जिस दरवाज़े से लक्ष्मी आ सकती है उससे जा भी तो सकती है ।"
ऐसा और भी शहरों में और भी लोगों के साथ हुआ होगा ।लेकिन इस किस्से का तात्पर्य यह कि इस तरह ठगे जाने से बचने के लिये हमे सायास विश्वास और अन्धविश्वास के इस दुष्चक्र से निकलना बहुत ज़रूरी है । अन्यथा हम जीवन भर उन्हीं मान्यताओं और जर्जर हो चुकी परम्पराओं को ढोते रहेंगे और इसका नुकसान उठाते रहेंगे । हाँलाकि इससे कोई विशेष नुकसान नहीं है , क्योंकि इतनी बुद्धि तो हम में है कि जैसे ही हमें नुकसान की सम्भावना दिखाई देती है हम सतर्क हो जाते हैं । लेकिन कुछ चालाक लोग, सामान्य लोगों की इस मनोवृति से हमेशा फायदा उठाते हैं और अक्सर सीधे-सादे लोग अन्धविश्वासों का शिकार बन जाते हैं । हम लाख सतर्कता बरतें लेकिन कहीं ना कहीं तो ठगे जाते ही हैं । अगर हम चाहते हैं कि हमारा जीवन सहज हो, सरल हो और इस प्रकार की दुर्घटनाओं से रहित हो तो इसके लिये हम वास्तविकता जानने का प्रयास करना होगा । हमें अपने आप को प्रशिक्षित करने की शुरुआत करनी होगी ।इसके लिये सबसे अधिक आवश्यकता है अपने आपको वैज्ञानिक दृष्टि से लैस करने की , अपने आप में इतिहास बोध जागृत करने की तथा ऐतिहासिक तथा वैज्ञानिक अध्ययन की ।
आप कहेंगे व्यस्तता के इस युग में अपनी रोजी-रोटी के लिये ज़द्दोज़हद करते हुए इतनी फुर्सत कहाँ है जो इसके लिये किताबें-विताबें पढ़ें । सही है , इसके लिये किताबें पढ़ने की ज़रूरत भी नहीं है । आप तो सिर्फ उसे याद करें जो बचपन से लेकर अब तक आपने अपनी शालेय व महाविद्यालयीन शिक्षा में पढ़ा है । बिना किताबें पढ़े भी हम अपनी सहज बुद्धि से आज जो कुछ हमारे सामने घटित हो रहा है उसका वैज्ञानिक विष्लेषण तो कर ही सकते हैं ।तर्क के आधार पर अन्धविश्वास कहकर बहुत सारी मिथ्या बातों को खारिज भी कर सकते हैं ।
हम अपने दैनन्दिन जीवन में ऐसा करते भी हैं । लेकिन कई बार स्थायी रूप से इसका प्रभाव नही पड़ता । कुछ समय बाद हम इसे भूल जाते है और दोबारा फिर उसी तरह की किसी घटना का शिकार हो जाते हैं ।शायद इसी लिये आये दिन हम अखबारों में ठगी की वही वही खबरें पढ़ते है.. “ नकली सोना देकर ठगा गया “ नकली बाबा बनकर जेवरात ले गया “ “झाड़फूँक से बच्चे की मौत “आदि आदि । हम पढ़े-लिखे लोग ऐसे लोगों की मूर्खता पर हँसते हैं और सोचते हैं कि काश इस तरह ठगे जाने से बेहतर लोग इसके बारे में पहले से जान लेते ।
लेकिन हम पढ़े-लिखे लोग और भी उन्नत तरीके से ठगे जाते हैं और इसका हमें पता भी नहीं चलता । उदाहरण के तौर पर मेरी जानकारी में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसने सौ ग्राम की टुथपेस्ट की ट्यूब से पेस्ट निकालकर जाँचा हो कि वह सौ ग्राम है या नहीं । न हम पेट्रोल की जाँच करते है न गैस की न गंगा जल लिखी बोतल की ,कि उसमे गंगा का जल है या नहीं । हम बहुत सारे विश्वासों की जाँच करना चाहते हैं लेकिन हमें विश्वास दिला दिया जाता है ..” आल इस वेल “ । कई बार विश्वास करने के लिये धर्म और ईश्वर के नाम पर भी हमें बाध्य किया जाता है । हम ठगे जाने से कैसे बचें रहें और कोई अन्धविश्वास भी हमारा कोई नुकसान न कर सके इसके लिये सबसे ज़्यादा ज़रूरी है हमारे जीवन में और हमारे आसपास घटित होने वाली हर घटना के पीछे का कारण जानना । इसके लिये हमारे पास पर्याप्त वैज्ञानिक व ऐतिहासिक ज्ञान व चेतना का होना भी आवश्यक है ।
इस ज्ञान के अंतर्गत कुछ प्रश्नों के उत्तर जानना अत्यंत आवश्यक है जैसे कि यह दुनिया कैसे बनी ? बृह्मांड का निर्माण कैसे हुआ ? सूर्य चांद सितारे कहाँ से आये ? पृथ्वी पर जीवन कैसे आया ?,मनुष्य का जन्म कैसे हुआ ? मनुष्य के विकास में उसके मस्तिष्क की क्या भूमिका रही ?,मस्तिष्क कैसे काम करता है ? हम इतर प्राणियों से अलग क्यों हैं ? हम मस्तिष्क में भूत-प्रेत सम्बन्धी सूचनाओं को कैसे दर्ज करते हैं ? हमे भय क्यों लगता है ? भय से मुक्ति कैसे सम्भव है ? हमारे व्यक्तित्व का निर्माण कैसे होता है ? ज्ञान क्या है ? विज्ञान क्या है ? मन क्या है ? आदि आदि ।
आप कहेंगे इन बातों का विश्वास –अन्धविश्वास से क्या सम्बन्ध है ? और यह सब तो हम जानते हैं ।सही है ,निरक्षरों की बात छोड़ भी दें लेकिन पढ़ा-लिखा हर व्यक्ति स्कूल कॉलेज में ,पाठ्य पुस्तकों में इन बातों को पढ़ चुका होता है, फिर भी वह अन्धविश्वासों से क्यों घिरा होता है ? क्यों वह अपने जीवन मे कई बार धोखा खाता है ? इस बात पर भी सोचने की आवश्यकता है । इन्हे इन प्रश्नों के परिप्रेक्ष्य में समझने की भी आवश्यकता है । इसका मूल कारण मनुष्य के मस्तिष्क में लागू वह दोहरी प्रणाली है जिसकी वज़ह से वह विश्वास और अन्धविश्वास के बीच झूलता रहता है और सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाता ।
यह कैसे घटित होता है यह जानने से पूर्व बृह्मान्ड की उत्पत्ति से लेकर मनुष्य की उत्पत्ति तक की कथा का संक्षेप में पुनर्पाठ ज़रूरी है । तो अगली पोस्ट से प्रारम्भ करते है उस समय की बात से जब इस दुनिया में कुछ नही था । - शरद कोकास छवि गूगल से साभार

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

क्या आप धारावाहिक और फिल्में देखते हुए रोते हैं ?


              
                         अज्ञात शक्तियों की कल्पना
मनुष्य के मस्तिष्क की विकलांगता का यह सिलसिला बहुत पुराना नहीं है लेकिन इससे सबसे अधिक नुकसान यह हुआ कि हमने विश्वास और अन्ध विश्वास मे अंतर करना छोड़ दिया । फलस्वरूप ऐसी अनेक मान्यताओं ने हमारे जीवन मे अपना स्थान मज़बूत कर लिया जिनका वास्तविकताओं से कोई सम्बन्ध नहीं है। मानव जीवन के प्रारम्भिक दौर में जब मनुष्य जन्म ,मृत्यु और प्रकृति के रहस्यों से नावाकिफ था ,बीमारियाँ और प्राकृतिक विपदायें उसे घेर लेती थीं और वह असमय ही काल के गाल में समा जाता था । कार्य और कारण का सम्बन्ध ना स्थापित कर पाने के कारण उसने अनेक अज्ञात शक्तियों की कल्पना की और अपने विवेकानुसार अपने जीवन को सुरक्षित रूप से संचालित करने के लिये अनेक मान्यतायें गढ़ लीं ।
प्राचीन मनुष्य आकाश में घटित होने वाली परिघटनाओं को एक बच्चे की तरह बहुत उत्सुकता से देखता था । वह देखता था कि सूर्य जब आकाश में होता है तो सब कुछ साफ दिखाई देता है ,उष्णता का अनुभव होता है,जंगली जानवर दूर भाग जाते हैं । वहीं रात में चांद रोज़ आकार बदलता है और एक निश्चित अवधि के बाद फिर पूरा दिखाई देता है । इस अवधि को उसने महीना माना । उसी तरह सितारों की रोज़ बदलती स्थिति और एक वर्ष पश्चात फिर उसी स्थान पर दिखाई देने की गणना के अनुसार वर्ष की व्याख्या की गई । सभ्यताओं के विकास के क्रम में सिन्धु, बेबीलोनिअन, मिस्त्र ,मेसोपोटामिया और चीनी सभ्यतायें, नदियों के किनारे विकसित हुईं। इन लोगों ने बृह्मांड ,सूर्य ,आकाश ,चांद, तारों के बारे में अपनी कल्पनायें कीं । जैसे प्राचीन मिस्त्र के लोग आकाश को सितारों से जड़ी देह लिये एक देवी मानते हैं । यूनानियों के अनुसार आकाश एक छत है जहाँ दैत्य विशालकाय मशीनें चलाते हैं , वहीं हमारे यहाँ मान्यता है कि वासुकि नाग की गोद में विष्णु कछुए के रूप में बैठे हैं और अभी भी पुराने लोग यह मानते हैं कि वासुकि नाग के क्रोध में फन हिलाने की वज़ह से भूकम्प आते हैं ।
बृह्मांड के रहस्य को आज भी पूरी तरह नहीं जाना जा सका है लेकिन जितना हम जानते हैं उसे जानने में भी मनुष्य को लगभग 2000 वर्षों का समय तो लगा ही है । कल्पनाओं से वास्तविकता में आने के लिये यह अवधि कम नहीं है । दूसरी सदी के यूनानी वैज्ञानिक क्लॉडियस टॉलेमी से लेकर ,आर्यभट्ट .हिस्टॉर्कस, पन्द्रहवीं सदी के टाईकोब्राहे, निकोलस कॉपरनिकस , गियार्डानो ब्रूनो , गेलेलिओ ,केपलर और न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों के योगदान को इस बात के लिये कम करके नहीं आंका जा सकता।
अफसोस यही है कि एक ओर इन वैज्ञानिक मान्यताओं पर विश्वास करते हुए भी हम सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण का कारण राहु-केतु द्वारा उन्हें निगला जाना मानते हैं ? भूकम्प का कारण नाग का हिलना मानते हैं ? करवा चौथ पर चांद की पूजा कर ,प्रताड़ित करने वाले पति के लिये भी लम्बी उम्र की दुआयें मांगते हैं ,( ग्लीसरीन के आँसू के सहारे बनाये जाने वाले धारावाहिकों और फिल्मों को देख कर ज़ार ज़ार रोते हैं ) , डीहायड्रेशन होने पर बच्चे की नज़र उतारते हैं ,बिल्ली के रास्ता काट देने पर या किसी के छींक देने पर ठिठक जाते हैं । हम भूत-प्रेत,पुनर्जन्म, लोक-परलोक, आत्मा,मोक्ष आदि में आँख मून्दकर विश्वास करते हैं । ऐसे ना जाने कितने अन्धविश्वास हैं जिन्हे हमने अपने मस्तिष्क में स्थान दे रखा है । इन्हे हम दूर करना भी चाहते है लेकिन तथ्यों पर विश्वास करने में भय महसूस करते हैं । हम स्वयं को आधुनिक और पढ़े-लिखे कहलाना तो पसन्द करते हैं लेकिन जो परम्पराएं चली आ रही हैं उनकी हम पड़ताल नहीं करते । आस्था हमारा मार्ग अवरुद्ध करती है और आधा सच और आधा झूठ स्वीकार करते हुए उसी तरह जीवन भर दोहरे मानदंडों के साथ जीते हुए पारलौकिक सुख और मोक्ष की कामना करते हुए अंतत: मनुष्य जीवन से मुक्त हो जाते हैं ।छवि गूगल से साभार

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

हवा से भी बच्चा पैदा हो सकता है ?

लेखमाला " मस्तिष्क की सत्ता "की पहली किश्त में हम लोगों ने इस बात पर विचार किया कि हम अगर पैदा ही नहीं होते तो क्या होता ? लेकिन जबकि हम मनुष्य के रूप में जन्म ले चुके हैं , तो इस बात पर विचार करना ज़रूरी है कि हम मनुष्य क्यों हैं । वैज्ञानिक दृष्टि से इस बात पर विचार करने से पूर्व यह भी जान लें कि क्या हमारे पूर्वजों की वैज्ञानिक दृष्टि थी ? या यह कि वे विज्ञान किसे कहते थे ? जिस काम को सीखने में मनुष्य को हज़ारों साल लगे उसे आज एक बच्चा कैसे भलिभाँति सम्पन्न कर लेता है ? हम मनुष्य अपने आप में कुछ मौलिक हैं या वही पुराने मनुष्य के रीमिक्स संस्करण हैं ? चलिये इन प्रश्नों पर विचार करें । आप लोगों से पुन: निवेदन है कि इस लेख को गम्भीरता से पढ़ें और बातचीत में हिस्सा लें । - शरद कोकास


दुनिया का प्रथम वैज्ञानिक कौन था ?


लाखों वर्ष पूर्व जिस मनुष्य ने पत्थर उछाल कर देखा था और कहा था.. ‘ अरे यह तो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकता है ‘ वह उस युग का वैज्ञानिक था । पहली बार जिस ने अग्नि का प्रयोग किया ,पहली बार जिस ने पत्थरों से औज़ार बनाये, पहली बार जिसने छाल को वस्त्र की तरह इस्तेमाल किया,पहली बार जिसने खाने योग्य और न खाने योग्य वस्तुओं की पहचान की,पहली बार जिसने पंछियों की तरह उड़ने की कोशिश की और इस कोशिश में पहाड़ से कूद कर मर गया,या जो मछली की तरह तैरने की कोशिश में पानी में डूब गया ,ऐसे सभी मनुष्य इस मनुष्य जाति के प्रथम वैज्ञानिक थे । आज जो मनुष्य रॉकेट को अंतरिक्ष में भेज कर नये नये ग्रहों पर पहुंच रहा है और वहाँ बस्ती बसाने के स्वप्न देख रहा है वह आज का वैज्ञानिक है । इसी तरह खानपान व अन्य आदतों के बारे में भी कहा जा सकता है । वह मनुष्य जिसने पहला ज़हरीला फल खाया और मरकर दुनिया को यह बता गया कि इसके खाने से मौत हो जाती है क्या दुनिया का पहला वैज्ञानिक डायटीशियन नहीं था ?
मानव जीवन की यह सारी क्रांति पीढ़ी दर पीढ़ी उसके मस्तिष्क में दर्ज़ होती रही है । अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिये वह इसकी क्षमता का उपयोग कर नित नये आविष्कार करता रहा । आज दस-बारह साल का एक बच्चा मनुष्य द्वारा किये जाने वाले अधिकांश काम कर लेता है जिन्हे सीखने में हमारे पूर्वजों को हज़ारों साल लगे । वह निरंतर प्रयोग करता गया और पिछले अनुभव के आधार पर पुराने को छोड़ नये को अपनाता गया । लेकिन धीरे धीरे यह मनुष्य दो भागों में बँट गया कुछ लोग तो अपने पुरखों की तरह नवीनता की तलाश में जुट गये और कुछ ने पहले की उपलाब्धियों को अंतिम मान संतोष कर लिया ।
आज का मनुष्य इन्ही दोनों का घालमेल बनकर रह गया है ।अफसोस यह है कि आज वह जहाँ नये को स्वीकार कर रहा है वहीं बगैर उनकी प्रासंगिकता परखे पुराने विश्वासों को भी साथ लिये चल रहा है । एक ओर वह टेस्ट ट्यूब बेबी के जन्म के चिकित्सकीय विज्ञान से परिचित है वहीं दूसरी ओर इस बात पर भी यकीन करता है कि स्त्री, सूर्य की रोशनी से या हवा मात्र के संसर्ग से संतान को जन्म दे सकती है । ऐसे अनेक उदाहरण आप खुद सोच सकते हैं । मानव मस्तिष्क में कार्यरत इस दोहरी प्रणाली में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है इसलिये कि ज्ञान और विज्ञान दोनों ही उसने अपने पूर्वजों से जस का तस पाया है । जिन मनुष्यों ने विरासत में प्राप्त इस ज्ञान की विवेचना कर नये प्रयोगों के माध्यम से उसे खारिज किया है अथवा आगे बढ़ाया है और जो वास्तव मे मनुष्य जाति के भविष्य के लिये चिंतित एवं प्रयासरत है वे मनुष्य ही मानव जाति का सच्चा प्रतिनिधित्व करते हैं ।
लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि शेष मनुष्य, मनुष्य कहलाने के हक़दार नहीं हैं । उन मनुष्यों का दोष इसलिये नहीं है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व ही उनके मस्तिष्क को विचार के स्तर पर पंगु बना दिया गया है ,उनसे सोचने समझने की शक्ति छीन ली गई है तथा धर्म एवं संस्कृति के नाम पर उनके भीतर यह भ्रम प्रस्थापित कर दिया गया है कि जो कुछ प्राचीन है वही अंतिम है । इसके विपरीत विज्ञान किसी बात को अंतिम नहीं मानता है और प्राचीन की नये सन्दर्भों में व्याख्या करता है । इसी कारण इतिहास के नये अर्थ उद्घाटित होते हैं और पुराने अनुभव तथा नये ज्ञान की रोशनी में भविष्य का मार्ग प्रशस्त होता है ।
उपसर्ग - उपसर्ग में प्रस्तुत है कवि संजय चतुर्वेदी की यह छोटी सी कविता उनके संग्रह "प्रकाशवर्ष " से साभार
सात हज़ार साल बाद
कोई सात हज़ार साल बाद उसने खोला दरवाज़ा
बदल गई थी भाषा
लेकिन बदले नहीं थे आदमियों के आपसी सम्बन्ध
और वही आदमी था आज भी राजा
जिसके डर से वह बन्द हुआ था ..
सात हज़ार साल पहले ।
- संजय चतुर्वेदी
यह पोस्ट आपको कैसी लगी इस बात की प्रतीक्षा रहेगी । - शरद कोकास


छवि गूगल से साभार

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

मैं भी मरना नहीं चाहता भाई...

                                                                 मस्तिष्क की सत्ता - एक

“ ना होता मै तो क्या होता “
गालिब के मशहूर शेर का मिसरा है “ डुबोया मुझको होने ने ,ना होता मैं तो क्या होता । ” ज़रा इस बात पर गम्भीरता से सोचिये कि हम हैं इसलिए हमारे लिये यह दुनिया है ,हम हैं इसलिये इस दुनिया के सारे प्रपंच हैं, सुख –दुख हैं , रिश्ते- नाते हैं , दोस्त-यार हैं , घर - परिवार है , यानि सब कुछ हैं । यदि हमारा अस्तित्व ही नहीं होता मतलब हम पैदा ही नहीं होते तो हमारे लिये कुछ नहीं होता । सारा कुछ उनके लिये होता जो इस धरती पर जन्म ले चुके हैं । यह बात उन पर लागू नहीं होती जो यहाँ जन्म लेने के पश्चात यहाँ से प्रस्थान कर चुके हैं क्योंकि उनके जाने के बाद भी उनसे जुड़ी हुई चीजें और उनकी स्मृतियाँ तो होती हैं ।
दर असल गालिब ने यह शेर अपने बहाने उस मनुष्य जाति के बारे में लिखा है जिसने इस धरती पर लाखों वर्ष पूर्व जन्म लिया है और इस जाति का प्रतिनिधि हर एक मनुष्य है जो अब तक इस बात पर विचार कर रहा है कि आखिर उसने जन्म क्यों लिया है ? जैसे ही मुसीबत आती है हम सीधे उपर वाले से सम्वाद करते हैं “हे भगवान ! तूने मुझे पैदा ही क्यों किया ? न केवल जन्म के बारे में बल्कि यह मनुष्य मृत्यु के बारे में भी विचार कर रहा है । सुख की स्थितियों में यह जीवन उसे इतना प्रिय लगता है कि वह मरकर भी मरना नहीं चाहता । हाँलाकि हम में से बहुत से लोग तकलीफ बढ़ जाने पर यह कहते ज़रूर हैं , “ हे ऊपर वाले..मुझे उठा ले “ लेकिन सचमुच कोई उठाने आ जाये तो कहेंगे..” तुम सच में आ गये यार ..मैं तो मज़ाक कर रहा था ।“
यद्यपि स्वयं का जन्म और मृत्यु दोनो ही उसके बस में नहीं है लेकिन जन्म लेने के पश्चात यह जीवन और यह शरीर उसे इतना प्रिय लगने लगता है कि लाख कष्टों के बावज़ूद वह इसे जीवित रखने की भरसक कोशिश करता है । वह बार बार जन्म लेना चाहता है और उन समस्त सुखों का उपभोग करना चाहता है जो उसके पूर्वजों ने अनवरत परिश्रम और प्रयोग कर उसके लिये जुटाये हैं ।न केवल उपभोग बल्कि हम ज़्यादा से ज़्यादा सुविधायें जुटाना चाहते हैं और उसके लिये नित नये आविष्क़ार कर मनुष्य जीवन की बेहतरी के लिये कुछ करना चाहते हैं । ऐसा कौन है जो पूर्वजों द्वारा अर्जित ज्ञान में बढ़ोत्तरी कर इस दुनिया को आगे बढ़ाने में अपना योगदान नहीं देना चाहता ? इससे बढ़कर यह कि हम में से ऐसा कौन है जो सारी सुख –सुविधाओं के साथ जीते हुए अमर होने की आकान्क्षा नहीं रखता । यह सच है और इसमें कोई दो राय नहीं कि हम सभी लगातार सोच विचार करते हुए इस दिशा में प्रयत्नशील हैं और मनुष्य होने के कर्तव्य का निर्वाह कर रहे हैं ।
सोचने विचारने ,चिंतन करने और आविष्कार करने का यह समस्त कार्य मनुष्य नामक यह प्राणि दिमाग नामक अद्भुत अंग से करता है जो उसकी देह की उपरी मंज़िल पर स्थित खोपड़ी मे अवस्थित है । डेढ़ किलो औसत वज़न का, धूसर रंग का और मख्खन जैसा नर्म यह अंग जिसमें लाखों तंत्रिकाओं का जाल है , जिसकी गति किसी तेज़ कम्प्यूटर से भी अधिक तेज़ है मनुष्य के जन्म के साथ ही अस्तित्व में आया है । भ्रूणावस्था में यह हृदय से 15 सेकंड पहले काम करना शुरू कर देता है । इस दुनिया का और मानव जाति का अब तक का सम्पूर्ण विकास यहाँ दर्ज़ है । मनुष्य के सारे अंग काम करना बन्द कर दें लेकिन जब तक मस्तिष्क काम करना बन्द नहीं करता उसे जीवित ही माना जाता है । डॉक्टर द्वारा क्लीनिकल डेथ घोषित करने का अर्थ भी यही है । यह मनुष्य के मस्तिष्क का ही कमाल है कि जिस मनुष्य को अंग ढाँकना तक नही आता था,सीधे खड़े होना नहीं आता था,उंगलियों का उपयोग करना नहीं आता था, वह इसी दिमाग की ताकत से आज चांद तक जा पहुंचा है । यह उसके मस्तिष्क की ही क्षमता है कि आज जो वह सोचता है कल उसे पूरा कर दिखाता है ।
उपसर्ग - उपसर्ग में प्रस्तुत है बर्तोल ब्रेख़्त की यह कविता
जनरल तुम्हारा टैंक एक शक्तिशाली वाहन है
वह जंगलों को रौन्द देता है
और सैकड़ों लोगों को चपेट में ले लेता है
लेकिन उसमें एक दोष है
उसे एक चालक चाहिये

जनरल , तुम्हारा बमवर्षक जहाज शक्तिशाली है
तूफान से तेज़ उड़ता है वह और
एक हाथी से ज़्यादा भारी वज़न उठाता है
लेकिन उसमें एक दोष है
उसे एक कारीगर चाहिये

जनरल आदमी बहुत उपयोगी होता है
वह उड़ सकता है और
हत्या भी कर सकता है
लेकिन उसमें एक दोष है
वह सोच सकता है ।
( बर्तोल ब्रेख़्त की इस कविता का अनुवाद कवि श्री नरेन्द्र जैन द्वारा किया गया है ।सम्पादक बृजनारायण शर्मा व हरि भटनागर की पत्रिका " रचना समय " से साभार )
यह पोस्ट आपको कैसी लगी . अवश्य बताइयेगा - शरद कोकास
छवि गूगल से साभार

शनिवार, 30 जनवरी 2010

ऐसा हमारे घर में शुरू से चला आ रहा है ।


“ हम जानते हैं कि जो कुछ हमारे पास मूल्यवान है वह सब हमें विज्ञान ने प्रदान किया है । विज्ञान ही एक मात्र सभ्य बनाने वाला है । इसने गुलामों को मुक्त कराया , नंगों को कपड़े पहनाये , भूखों को भोजन दिया , आयु में वृद्धि की , हमें घर परिवार चूल्हा दिया , चित्र तथा किताबें दीं ,जलयान ,रेलें , टेलीग्राफ, तथा तार तथा इंजन जो असंख्य पहियों को बिना थके घुमाते हैं और इसने भूत पिशाचों , शैतानों ,पंखों वाले दैत्यों जो असभ्य जंगली लोगों के दिमाग पर छये रहते थे ,का नामोनिशान मिटा दिया । “
- राबर्ट ग्रीन इंगरसोल (1833-1899)


प्रसिद्ध तर्कशास्त्री राबर्ट ग्रीन इंगरसोल के इस कथन को 100 से भी ज़्यादा वर्ष बीत चुके हैं । हम सभ्यता के नये युग में प्रवेश कर चुके हैं । आज के दौर में अन्धविश्वास को लेकर बात करना बेमानी हो गया है । हम जैसे जैसे सभ्य होते जा रहे हैं सड़ी-गली मान्यतायें और रूढ़ियाँ अपने आप दूर होती जा रही हैं । हम विज्ञान के नये नये अविष्कारों का उपभोग कर रहे हैं । पहले परिवर्तन 100 वर्षों में रेखांकित किया जाता था ,फिर यह अवधि दस वर्ष हुई और अब तो प्रति वर्ष होने वाला परिवर्तन महसूस किया जा सकता है ।
यदि ऐसा है तो फिर हमें यह सब लिखने की क्या आवश्यकता है । शायद इसलिये कि अभी भी हमारे मन के किसी कोने में असभ्यता का अन्धकार है जिसे हम महसूस नहीं कर पा रहे हैं । बिल्ली के रास्ता काट देने पर अभी भी हम ठिठक जाते हैं , घर से निकलते हुए किसी के छींक देने पर पल भर के लिये ही सही ठहर जाते हैं , गृहिणी के हाथ से बर्तन गिरने पर कहते हैं कि कोई आ रहा है ,शनिवार के दिन हजामत नहीं बनाते या गुरुवार के दिन नये कपड़े नही पहनते और ऐसे ही ढेर सारे विश्वास । ठीक है हम में से अधिकांश लोग इन्हे नहीं मानते और केवल परम्परा के पालन के रूप में इनका निर्वाह करते हैं । नई पीढ़ी के युवाओं से पूछा जाये कि वे यह सब क्यों मानते हैं तो उनका जवाब होता है ..ऐसा हमारे घर में शुरू से चला आ रहा है ।
यह केवल इन छोटे-मोटे अन्द्धविश्वासों को मानने की बात तक सीमित नहीं है । दर असल हम इन विश्वासों की वज़ह से निरंतर पिछड़ते जा रहे हैं और उन चालाक लोगों के गुलाम होते जा रहे हैं जो सायास हमें मस्तिष्क के स्तर पर गुलाम रखना चाहते हैं । वे हमें भावनात्मक स्तर पर ब्लैकमेल कर रहे हैं और हम उनकी चाल समझ नहीं पा रहे हैं ।हम सभी लकीर के फकीर हैं जो चल रहा है उसमें कोई परिवर्तन नहीं चाहते , कभी कोई तर्क करना नहीं चाहते और एक यथास्थितिवादी की तरह जो विरासत में मिला है उसे जस का तस स्वीकार कर लेते हैं । देखा जाये तो इसमें कोई बुराई भी नहीं है । परम्पराओं का सम्मान करने की प्रवृत्ति हमें विरासत में मिली है । लेकिन वहीं हम नया ज्ञान प्राप्त करते समय तर्क करते हैं , स्कूल-कॉलेज में पढ़ते हुए प्रश्न करते हैं और जब तक हमारा समाधान नहीं हो जाता उस प्रश्न से जूझते हैं ।इसका अर्थ यही हुआ ना कि हम में समझने की क्षमता है लेकिन हम जानबूझ कर समझना ही नहीं चाहते ?
मनुष्य के स्वभाव की यह विशेषता है कि वह जो कुछ नूतन है उसे तो आत्मसात कर लेता है लेकिन जो पुरातन ताज्य है उसे छोड़ नहीं पाता । यह ज़रूरी भी नहीं है क्योंकि यदि हम सब कुछ जो पुरातन है उसे त्याग देंगे तो न हमारे पास इतिहास रह पायेगा न,परम्परा न संस्कृति ,न संस्कृति का गौरव । लेकिन क्या यह ज़रूरी नहीं कि हम अपने अतीत से जो कुछ ग्रहण करने योग्य है उसे ग्रहण करें और उस आधार पर नूतन की विवेचना करें । यह बिलकुल आवश्यक नहीं है कि प्राचीन मान्यताओं को आधार बनाकर हम विसंगतियों को जीवित रखने के लिए अनावश्यक कारणों की तलाश करें । अतीत की किसी विसंगति को सिर्फ इसलिए जायज़ नही ठहराया जा सकता कि हमारे पूर्वज ऐसा किया करते थे । ध्यान इस बात पर दिया जाना चाहिये कि उनकी इस सोच और कार्य के पीछे क्या कारण थे और देश- कालानुसार क्या परिस्थितियाँ थीं । आज जब हम पुरातन समय में चमत्कारिक समझी जाने वाली घटनाओं के विश्लेषण में समर्थ है इस बात की कोई आवश्यकता नही रह जाती की सामाजिक विसंगतियों को चमत्कारों के जरिये दूर होने की आशा करें या किसी अवतार की प्रतीक्षा करें ।


यही सब सोचकर मैने लगभग बीस लेखों की इस लेखमाला का विचार किया है और इसे अपने ब्लॉग “ना जादू ना टोना “ पर प्रस्तुत करना चाहता हूँ ।मेरा उद्देश्य जादू-टोने या अन्द्धविश्वासों पर बहस करना नहीं है न ही सायास कोई बात मैं आप लोगों से मनवाना चाहता हूँ । मैं चाहता हूँ के हम सब मिलकर इस समाज की सोच में कुछ परिवर्तन कर सकें । आप सभी से निवेदन है कि इस सम्वाद में हिस्सा लें और अपने विचारों से मुझे अवगत करायें ।यह लेखमाला मैं सोमवार 1 फरवरी 2010 से प्रारम्भ करने जा रहा हूँ और प्रत्येक सोमवार को इसका प्रकाशन होगा । हो सकता है इसमें सम्मिलित विषय सामग्री आपकी पढ़ी हुई हो लेकिन उसे नये नज़रिये से देखने का यह अवसर है । इसकी भाषा भी शास्त्रीय नहीं है और रोचक उद्धरणों से मैने अपनी बात समझाने की कोशिश की है । इस बहाने हम आपस में ,और उससे अधिक अपने आप से संवाद तो कर सकेंगे ।
   भवदीय

शरद कोकास