गुरुवार, 27 अगस्त 2009

मेरी स्कूटर भी दूध पीती है




21 सितम्बर 1995 का दिन इस दुनिया में एक ऐसे तथाकथित चमत्कार के लिये याद किया जायेगा जब गणेशोत्सव के दिनों से भी ज़्यादा गणेश जी के मन्दिरों मे भीड़ रही । अचानक एक अफवाह फैली कि गणेश कुल के देवी देवता दूध पी रहे हैं । मन्दिरों में लम्बी लम्बी कतारें लग गईं । भीड़-अफरातफरी शोर का माहौल हो गया । लोग फोन से एक दूसरे को खबर कर रहे थे । थोड़ी देर में पता चला कि विदेशों में भी देवी मूर्तियाँ दूध पी रही हैं । दूध के भाव अचानक बढ़ गये । होटलों में चाय के लिये रखा दूध ऊंचे दाम पर बिक गया । लोग घर का पूरा दूध लेकर मन्दिरों में पहुंच गये ।यह कथा तो अब सभीको मालूम है क्योंकि लगभग सभी सूचना माध्यमों से इसका ज़ोर-शोर से प्रचार किया गया ।
लेकिन उस दिन इस अन्धविश्वास का विरोध करने के लिये और लोगों में वैज्ञानिक दृष्टि से इसका विश्लेषण करने की अपील करती हुई भी कई संस्थाएँ सामने आईं । अफसोस हमारे देश की जनता को मूर्ख समझ कर उनके अन्धविश्वास को बढ़ावा देने वाले माध्यमों के बीच उनकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की तरह साबित हुई । इस अफवाह की वज़ह से उपजी अराजकता से निपटने के लिये और इसका वास्तविक कारण पता लगाने के लिये राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी संचार परिषद के अध्यक्ष डॉ.नरेन्द्र सहगल के नेत्रत्व में तुरंत एक दल का गठन किया गया जिसने राजधानी के विभिन्न मन्दिरो में भ्रमण कर इस घटना को देखा और यह निष्कर्ष दिया कि इस घटना में कोई चमत्कार नहीं है तथा वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुसार सामान्य घटना है ।इस वैज्ञानिक दल ने बताया कि दूध से भरे चम्मच को जब 90 अंश के झुकाव पर मूर्ति से सम्पर्क किया गया तो प्रतिमा ने दूधपान नहीं किया लेकिन इसके विपरीत चम्मच झुकाने से ऐसा प्रतीत हुआ । वैज्ञानिकों ने बताया कि प्रत्येक द्रव का पृष्ठ तनाव होता है जो द्रव के भीतर अणुओं के आपसी आकर्षण बल पर निर्भर होता है । जिस पदार्थ के सम्पर्क में यह आता है उस ओर इसका बल हो जाता है । इस घटना में जैसे ही चम्मच में भरा दूध सीमेंट ,पत्थर या संगमरमर से बनी प्रतिमा के सम्पर्क में आया वह उसकी सतह पर फैल गया तब देखने वालों को लगा कि प्रतिमा ने उस दूध को खींच लिया लेकिन जैसे ही दूध मे रंग या सिन्दूर मिलाकर प्रतिमा से लगाया गया बहती हुई दूध की पतली धार दिखती रही
इस दिन मैं अपने बैंक के निकट स्थित ,मन्दिर की पिछली नाली से बहते हुए दूध को देखता रहा और सोचता रहा यह वही देश है जहाँ लाखों-करोड़ों बच्चों को दूध पीने को क्या देखने तक को नहीं मिलता । शाम तक मैं इतना उद्वेलित हो गया कि स्थानीय प्रेस कॉम्प्लेक्स पहुंच गया और अपने पत्रकार मित्रों को बुलाकर कहा “ देखिये मेरी स्कूटर भी दूध पीती है ।“ फिर मैने यह प्रयोग भरे बाज़ार में करके दिखाया । लोगों ने इसे तमाशे की तरह देखा । साक्षरता भवन में अपने मित्रों के साथ हमने टेबल, कुर्सी, क्लियोपेट्रा की मूर्ती, कम्प्यूटर, काँच कई वस्तुओं पर यह प्रयोग किया । इस बीच दूरदर्शन वालों से भी बात की और रायपुर से मैने व प्रोफेसर डी.एन.शर्मा ने आधे घंटे का एक कार्यक्रम भी तैयार किया । जिसे एक सप्ताह बाद प्रसारित किया गया । हम लोग मन्दिरों में भी गये और लोगों को समझाने की कोशिश की । हाँलाकि 2-4 दिन बाद लोग इस घटना की वास्तविकता समझ गये लेकिन उस दिन तो जैसे लोगों की आँखों पर पट्टी पड़ गई थी । आज भी आपको ऐसे लोग मिल जायेंगे जो कहेंगे “ हाँ, 14 साल पहले गणेश जी ने दूध पिया था । “हम उनसे पूछते हैं कि भाई उसके बाद उनको भूख-प्यास नहीं लगी क्या ? इस बात पर वे हें हें करने लगते हैं ।
(चित्र में वही स्कूटर और पृष्ठभूमि मे मेरा निर्माणाधीन मकान )
क्या आपके शहर में भी ऐसा कोई प्रयास हुआ था ? -आपका शरद कोकास

शनिवार, 15 अगस्त 2009

जिसके नाम से ज्योत हिली वो डायन है





महाराष्ट्र में वरुळ के पास चांदस- वाठोडा गाँव का यह कि
स्सा है । गाँव के लोग उस दिन सुबह से ही नहा धोकर तैयार बैठे थे । आज उनके गाँव मे ज्योत देखने वाला मांत्रिक आने वाला था । गाँव में पता नहीं कौनसी बीमारी फैली थी कि बच्चों को बुखार आने लगा था । गाँव वालों का ऐसा विश्वास था कि उन्ही के गाँव का कोई व्यक्ति बच्चों पर जादू टोना कर रहा है । दोपहर बाद मांत्रिक का आगमन हुआ । उसने गाँव के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर में पहले से लिपे–पुते स्थान पर अपना आसन जमाया । एक कोने मे सबसे पहले पानी छिड़ककर उस स्थान की पूजा की । जिस बच्चे को बुखार था उसके शरीर से अंजुलि भरकर ज्वार उतार कर उस कोने में रख दी और उस से बजरंग बली की आकृति बनाई । मराठी में इसे “जोन्धळ्याचा हनुमान काढ़णे “कहते हैं । फिर एक धागा लेकर उससे एक क्रॉस बनाया और उसके बीच मे एक दिया रखा । दिये मे ज्योत जला कर वह उकड़ूँ बैठ गया और अपने दाँयें हाथ की तर्जनी और अंगूठे के बीच उस धागे का सिरा पकड़ लिया । उस दिये को उसने अनाज के बनाये हनुमान के उपर अधर में रखा और मंत्र बुदबुदाने लगा साथ ही वह गाँव के विभिन्न लोगों के नाम भी लेने लगा । अचानक हिलती हुई ज्योत एक ना के उच्चारण करते ही स्थिर हो गई । वह गाँव की एक स्त्री का नाम था

फिर उस स्त्री को डायन या “कर्नाटकी बताकर उसके साथ क्या हुआ यह बताने की आवश्यकता नहीं उस पर जादू टोने का आरोप लगाया गया । उसे अपमानित किया गया उसके साथ मारपीट भी की गई । अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिती नागपुर के श्री हरीश भाई देशमुख को जब यह पता चला तो वे अपने कार्यकर्ताओं के साथ उस गाँव में गये और अपनी उपस्थिति में पुन: उस मांत्रिक से यह ज्योत हिलाने का कार्यक्रम करवाया । फिर उसकी पोल खोलते हुए उन्होने गाँव वालों को खुद ही यह क्रिया करके बतलाई । उन्होने बताया कि वास्तव मे यह दिया गुरुत्वाकर्षण के नियमानुसार पेंडुलम की तरह हिलता है । दिया अपने आप नहीं हिल सकता और उसे वह मांत्रिक ही अपनी मर्ज़ी के अनुसार हिलाता है और जिस नाम पर रोकना चाहे रोक सकता है । यह सब हाथ की चालाकी है । गाँव वालों ने भी यह क्रिया स्वयं करके देखी ।

हरीश भाई ने यह घटना बहुत पहले बताई थी और यह उनकी पुस्तक “शकुन अपशकुन में प्रकाशित भी हो चुकी है । लेकिन वास्तविकता यह है कि “ ज्योत पाहणे ” या ज्योत देखने का यह अन्धविश्वास अब भी पूरी तरह गाँवों से दूर नहीं हुआ है । यहाँ तक कि समाज के पढ़े-लिखे और प्रतिष्ठित लोग भी इसमें विश्वास करते हैं। कुछ लोग वास्तविकता जानते हैं लेकिन वे किसी को प्रताड़ित करने के लिये जानबूझ कर यह कार्य करवाते हैं । वे नहीं जानते कबीरदास जी ने कहा है..”निर्बल को न सताईये जाकी मोटी आह ..”

आपका- शरद कोकास

(छवि गूगल से साभार)

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

12:34:56 07/08/09




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12:34:56 07/08/09


12 बज कर 34 मिनट 56 सेकंड पर 7 तारीख 8 वें माह और सहस्त्राब्दी के 9 वें वर्ष मे यह श्रंखला होगी .ऐसा हमारे जीवन मे पहली और अंतिम बार होगा ।यह सन्योग है किसी प्रकार के अन्धविश्वास से आप ग्रसित न हो ,आप में वैज्ञानिक दृष्टि का विकास हो तथा इतिहास बोध व चेतना से लैस होकर आप मनुष्य के इस जन्म को सार्थक करें .समय के इस विशेष कालखंड मे मै आप सभी को याद करूंगा और यह दुआयें दूंगा . –

रद कोकास