आदरणीय
दिनेश राय द्विवेदी जी, अजित वडनेरकर जी,सर्वश्री अरविन्द मिश्रा,बालसुब्रमणियम जी, अनुनाद सिंह,अलबेला खत्री जी,स्वप्नदर्शी ,महामंत्री तस्लीम,राज भाटिया जी, मुरारी पारीक,महफूज़ भाई,मथुरा कलौनी,सुश्री लवली कुमारी,शोभना चौरे,सुमन जी,संगीता पुरी,अल्पना वर्मा जी,वन्दना जी,पाबला जी,भाई संजीव तिवारी और मेरे अन्य बहुत सारे मित्र । मेरे निवेदन “
वैज्ञानिक चेतना के ब्लॉगर्स कृपया सलाह दें “ पर आप सभी की हार्दिक शुभेच्छाओं का मै स्वागत करता हूँ । आप लोगों के उत्साहवर्धन के फलस्वरूप मैने अपने अन्धश्रद्धा निर्मूलन सम्बन्धी क्रियाकलापों तथा व्याख्यानों को शब्द रूप देना प्रारम्भ कर दिया है ।और अभी तक लगभग तीस पृष्ठ मैं लिख चुका हूँ ।भारी भरकम वैज्ञानिक शब्दावली और सैद्धांतिक बातों से अलग हटकर इसे रोचक रूप में प्रस्तुत करने का मेरा प्रयास है । इस बात के लिये भी सतर्क हूँ कि सरलीकरण ऐसा भी ना हो कि यह बाल साहित्य लगने लगे । हमारे इधर लेखकों में यह उक्ति काफी प्रसिद्ध है कि कठिन लिखना तो सरल काम है लेकिन सरल भाषा में लिखना अत्यंत कठिन है । इस बात का अनुभव मुझे अब हो रहा है ।बहरहाल आप लोगों की प्रेरणा से मै इस महत्वपूर्ण काम में लगा हूँ और समाधानकारक स्थिति में पहुंचते ही इस लेखन को ब्लॉग पर देना प्रारम्भ करूंगा । इस बीच आप लोग इस ब्लॉग को विस्मृत न कर दें इसलिये अपने अनुभवों के भंडार से कुछ कथायें यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ । तो लीजिये प्रस्तुत है यह किस्सा
ज़मीन से डेढ़ फूट उपर चलने वाले भूत का किस्सामहाराष्ट्र के ही एक गाँव का यह किस्सा है । बिलकुल गाँव जैसा ही गाँव था वह । ज़्यादातर किसान और मज़दूर ,कुछ छोटे-मोटे दुकानदार और लोहा,लकड़ी,चर्म आदि का काम करने वाले शिल्पी इन्ही की बस्ती थी ।एक प्रायमरी स्कूल और एक मिडिल स्कूल । अपनी रोज़मर्रा की परेशानियों के अलावा कुल मिलाकर ठीक-ठाक ही बीत रहा था सबका जीवन ।

अचानक एक दिन गाँव में खबर फैल गई कि गाँव के ही एक लड़के रामू ने शुक्रवार की शाम नहर के पार एक बड़ा सा भूत देखा है । फिर क्या था अगले ही शुक्रवार नहर के करीब लोगों की भीड़ जुट गई। ठीक आठ बजे लोगों ने देखा कि नहर की मेढ़ के उस पार ज़मीन से लगभग डेढ़-दो फीट उपर एक सफेद रंग का साया चला जा रहा है । सब साँस रोके उसे देखते रहे । धीरे धीरे वह साया आंखों से ओझल हो गया । अब यह होने लगा कि शुक्रवार आते ही सुबह से सारे लोग किसी अज्ञात आशंका से भयभीत हो जाते । बच्चों को उस दिन स्कूल नहीं जाने दिया जाता और लोग सारे काम जल्द ही निपटाकर अन्धेरा होने से पहले ही घर में दुबक जाते ।कुछ साहसी लोग फिर भी नहर के किनारे खड़े रहते और उस साये को निकलता हुआ देखते ।हाँ यह तैयारी उनकी ज़रूर रहती कि यदि वो साया गाँव की तरफ रुख करे तो दौड़कर अपने घरों में घुस जायें।फिर क्या था गाँव में कोई बीमार हो,किसी का जानवर मर जाये ,कोई भी अनहोनी हो उसका कारण वह साया माना जाने लगा ।खबर फैली तो नागपुर से कुछ अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति के कार्यकर्ता वहाँ पहुंचे ।शुक्रवार की शाम से ही उन्होने गाँव भर के लोगों को अपने विश्वास में लेकर वहाँ इकठ्ठा कर लिया ।जैसे ही आठ बजे और वह विचित्र साया नहर के पार दिखाई दिया कार्यकर्ता उस ओर बढ़ने लगे ।बुज़ुर्गों ने मना किया “काहे भैया जान जोखिम में डालते हो” लेकिन पाँच मिनट बाद ही लोगों ने देखा कि वे कार्यकर्ता उस साये को साथ लिये चले आ रहे हैं ।करीब आने पर लोगों ने देखा कि वह एक साँवले रंग का एक जवान आदमी था जो घुटनों तक धोती पहने हुए था और उसके कन्धों पर एक बूढ़ा बैठा हुआ था ।‘लो भई यह रहा आपका भूत” कार्य कर्ताओं ने कहा । पूछने पर पता चला कि वह पास के ही गाँव का एक किसान था जो हर शुक्रवार अपने लकवाग्रस्त कमज़ोर पिता का इलाज़ कराने पड़ोस के गाँव में किसी वैद्य के पास उन्हे ले जाता था । घुटने तक धोती पहने होने की वज़ह से और नहर की मेड़ के कारण काली टांगों वाला उसके नीचे का हिस्सा अन्धेरे में नहीं दिखाई देता था फलस्वरूप वह हवा में चलता हुआ महसूस होता था और कन्धे पर बूढ़े के बैठे होने के कारण उसकी लम्बाई सामान्य मनुष्य से अधिक और अजीब सी दिखाई देती थी । बस यही है इस कथा में रहस्य । और सन्देश यह कि जब भी कोई अजीब सी आकृति दिखे भूत समझ कर उससे डरो नहीं ,हिम्मत करके पास जाओ रहस्य अपने आप समझ में आ जायेगा
आपका-
शरद कोकास