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सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

क्या हम सभी दोगले हैं ?


                                 
दीपावली के समय की बात है । ( आप कहेंगे यह होली के समय मैं दीवाली की बात क्यों कर रहा हूँ ?, चलिये छोड़िये .. किस्सा सुनिये ) मैं घर से दूर किसी अन्य शहर में अपने मित्र के यहाँ था । पूजन के पश्चात मैने अपने मित्र से कहा चलो शहर की रोशनी देखकर आते हैं ।हम लोग जब निकलने लगे तो मैने उनसे कहा " दरवाज़ा तो बन्द कर दो । " उन्होने कहा " आज के दिन लक्ष्मी कभी भी आ सकती है , इसलिये दरवाज़ा बन्द नही किया जाता । " मैने कहा  " और चोर आ गये तो ? " और सचमुच ऐसा ही हुआ । जब हम लोग लौटे तो चोर लक्ष्मीजी के पास रखी नकदी पर हाथ साफ कर चुके थे । मैने कहा .." देख लो ,  यह क्यों भूल गये कि जिस दरवाज़े से लक्ष्मी आ सकती है उससे जा भी तो सकती है ।"
          ऐसा और भी शहरों में और भी लोगों के साथ हुआ होगा ।लेकिन इस किस्से का तात्पर्य यह कि इस तरह ठगे जाने से बचने के लिये हमे सायास विश्वास और अन्धविश्वास के इस दुष्चक्र से निकलना बहुत ज़रूरी है । अन्यथा हम जीवन भर उन्हीं मान्यताओं और जर्जर हो चुकी परम्पराओं को ढोते रहेंगे और इसका नुकसान उठाते रहेंगे  । हाँलाकि इससे कोई विशेष नुकसान नहीं है , क्योंकि इतनी बुद्धि तो हम में है कि जैसे ही हमें नुकसान की सम्भावना दिखाई देती है हम सतर्क हो जाते हैं । लेकिन कुछ चालाक लोग, सामान्य लोगों की इस मनोवृति से हमेशा फायदा उठाते हैं और अक्सर  सीधे-सादे लोग अन्धविश्वासों का शिकार बन जाते  हैं । हम लाख सतर्कता बरतें लेकिन कहीं ना कहीं तो ठगे जाते ही हैं । अगर हम चाहते हैं कि हमारा जीवन सहज हो, सरल हो और इस प्रकार की दुर्घटनाओं से रहित हो तो इसके लिये हम वास्तविकता जानने का प्रयास करना होगा । हमें अपने आप को प्रशिक्षित करने की शुरुआत करनी होगी ।इसके लिये सबसे अधिक आवश्यकता है अपने आपको वैज्ञानिक दृष्टि  से लैस करने की , अपने आप में इतिहास बोध जागृत करने की तथा  ऐतिहासिक तथा वैज्ञानिक अध्ययन की ।
आप कहेंगे व्यस्तता के इस युग में अपनी रोजी-रोटी के लिये ज़द्दोज़हद करते हुए इतनी फुर्सत कहाँ है जो इसके लिये किताबें-विताबें पढ़ें । सही है , इसके लिये किताबें पढ़ने की ज़रूरत भी नहीं है । आप तो सिर्फ उसे याद करें जो बचपन से लेकर अब तक आपने अपनी शालेय व महाविद्यालयीन शिक्षा में पढ़ा है । बिना किताबें पढ़े भी हम अपनी सहज बुद्धि से आज जो कुछ हमारे सामने घटित हो रहा है उसका वैज्ञानिक विष्लेषण तो कर ही सकते हैं  ।तर्क के आधार पर अन्धविश्वास कहकर बहुत सारी मिथ्या बातों को  खारिज भी कर सकते हैं ।
 हम अपने दैनन्दिन जीवन में ऐसा करते भी हैं । लेकिन कई बार स्थायी रूप से इसका प्रभाव नही पड़ता । कुछ समय बाद  हम इसे भूल जाते है और दोबारा फिर उसी तरह की किसी घटना का शिकार हो जाते हैं ।शायद इसी लिये आये दिन हम अखबारों में ठगी की वही वही खबरें पढ़ते है.. “ नकली सोना देकर ठगा गया “ नकली बाबा बनकर जेवरात ले गया “ “झाड़फूँक से बच्चे की मौत “आदि आदि । हम पढ़े-लिखे लोग ऐसे लोगों की मूर्खता पर हँसते हैं और  सोचते हैं कि काश इस तरह ठगे जाने से बेहतर लोग इसके बारे में पहले से जान लेते ।
लेकिन हम पढ़े-लिखे लोग और भी उन्नत तरीके से ठगे जाते हैं और इसका हमें पता भी नहीं चलता । उदाहरण के तौर पर मेरी जानकारी में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसने सौ ग्राम की टुथपेस्ट की ट्यूब से पेस्ट निकालकर जाँचा हो कि वह सौ ग्राम है या नहीं । न हम पेट्रोल की जाँच करते है न गैस की न गंगा जल लिखी बोतल की ,कि उसमे गंगा का जल है या नहीं । हम बहुत सारे विश्वासों की जाँच करना चाहते हैं लेकिन हमें विश्वास दिला दिया जाता है ..” आल इस वेल “ । कई बार विश्वास करने के लिये धर्म और ईश्वर के नाम पर भी हमें बाध्य किया जाता है । हम ठगे जाने से कैसे बचें रहें और कोई अन्धविश्वास भी हमारा कोई नुकसान न कर सके इसके लिये सबसे ज़्यादा ज़रूरी है हमारे जीवन में और हमारे आसपास घटित होने वाली हर घटना के पीछे का कारण जानना । इसके लिये हमारे पास पर्याप्त वैज्ञानिक व  ऐतिहासिक ज्ञान व चेतना का होना भी आवश्यक है ।
इस ज्ञान के अंतर्गत  कुछ प्रश्नों के उत्तर जानना अत्यंत  आवश्यक है जैसे कि यह दुनिया कैसे बनी ? बृह्मांड का निर्माण कैसे हुआ ? सूर्य चांद सितारे कहाँ से आये ? पृथ्वी पर जीवन कैसे आया ?,मनुष्य का जन्म कैसे हुआ ? मनुष्य के विकास में उसके मस्तिष्क की क्या भूमिका रही ?,मस्तिष्क कैसे काम करता है ? हम इतर प्राणियों से अलग क्यों हैं ? हम मस्तिष्क में भूत-प्रेत सम्बन्धी सूचनाओं को कैसे दर्ज करते हैं ? हमे भय क्यों लगता है ? भय से मुक्ति कैसे सम्भव है ? हमारे व्यक्तित्व का निर्माण कैसे होता है ? ज्ञान क्या है ? विज्ञान क्या है ?  मन क्या है ? आदि आदि ।
आप कहेंगे इन बातों का विश्वास –अन्धविश्वास से क्या सम्बन्ध है ? और यह सब तो हम जानते हैं ।सही है ,निरक्षरों की बात छोड़ भी दें लेकिन पढ़ा-लिखा हर व्यक्ति स्कूल कॉलेज में ,पाठ्य पुस्तकों में इन बातों को पढ़ चुका होता है, फिर भी वह अन्धविश्वासों से क्यों घिरा होता है ? क्यों वह अपने जीवन मे कई बार धोखा खाता है ? इस बात पर भी सोचने की आवश्यकता है । इन्हे इन प्रश्नों के परिप्रेक्ष्य में समझने की भी आवश्यकता है । इसका मूल कारण मनुष्य के मस्तिष्क में लागू वह दोहरी प्रणाली है जिसकी  वज़ह से वह विश्वास और अन्धविश्वास के बीच झूलता रहता है और सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाता ।
यह कैसे घटित होता है यह जानने से पूर्व बृह्मान्ड की उत्पत्ति से लेकर मनुष्य की उत्पत्ति तक की कथा का संक्षेप में पुनर्पाठ ज़रूरी है  । तो अगली पोस्ट से प्रारम्भ करते है उस समय की बात से जब इस दुनिया में कुछ नही था । - शरद कोकास
छवि गूगल से साभार

रविवार, 26 जुलाई 2009

शंकर जी ने मारा अग्निबाण और खुद गर्भ में आ गये


आज से लगभग बारह वर्ष पूर्व की यह घटना है. उन दिनो दुर्ग ज़िले में ज़िला साक्षरता समिति के अंतर्गत हम लोगों ने एक अन्द्धश्रद्धा निर्मूलन जत्था बनाया था । बाबाओं के भंडाफोड़ का नया नया शौक लगा था । एक दिन हमे खबर मिली कि पास ही डोंडीलोहारा विकासखन्ड के एक गाँव सुरेगाँव में एक स्त्री पर शंकर जी आये हुए हैं और वहाँ श्रद्धालुओं का मेला लगा हुआ है ,हज़ारों रुपये चढ़ावे में आ रहे हैं अखबार में भी खबरें छप रही थीं कि सुरेगाँव की इस महिला को शंकर जी ने अग्निबाण मारा है और उसके शरीर पर नाग, त्रिशूल जैसे चिन्ह उभर गये हैं साथ ही उस स्त्री के गर्भ में शंकर जी ने प्रवेश कर लिया है और शीघ्र ही अवतार लेने वाले हैं हम लोग समझ गये कि हो न हो वह स्त्री किसी षयंत्र का शिकार हुई है दुर्ग से समिति के प्रमुख निदेशक डी.एन. शर्मा जी के नेतृत्व में बुजुर्ग कार्यकर्ता बी.एल.परगनिहा , कलाकार डोमार सिंह , महिला कार्यकर्ता सुश्री उषा सिंह तथा सुषमा भंडारी के साथ हम लोग सुरेगाँव के लिये रवाना हो गये रास्ते में हम लोगों ने ग्रामीण वेशभूषा धारण कर ली ताकि अजनबी से ना लगें वहाँ जाकर हमें क्या करना है इसकी भी हमने तैयारी कर ली रास्ते में ही बेशरम के पौधे से निकलने वाले दूध से हमने अपने हाथों पर नाग त्रिशूल जैसी आकृतियाँ बना लीं हमने तय किया कि फिलहाल सिर्फ देखा जाये और यदि कुछ सकारात्मक हो सकता है तो विरोध किया जाये इसके लिये हमने समिति के अध्यक्ष व जिलाधीश के सहयोग से स्थानीय पुलिस को भी साथ रख लिया था

जीप हमने गाँव के बाहर खड़ी कर दी और आम श्रद्धालुओं की तरह उस पंडाल में पहुंचे जहाँ वह स्त्री बैठी हुई थी । अद्भुत दृश्य हमने देखा ,एक स्त्री बाल खोले हुए झूम रही है ,उसके दोनो हाथ सामने हैं जिन प उसे जलाये जाने के निशान मौजूद हैं , एक कुंड में अगर्बत्तियाँ जल रही हैं पास ही नारियल का ढेर लगा है, लोग साक्षात दंडवत कर रहे हैं , और रुपये चढा रहे हैं । हमने भी शंकर भगवान की जय कहकर लोगों से बात शुरू कर दी. अचानक हमारे एक कार्यकर्ता से रहा नहीं गया और उसने ज़ोरों से कहना शुरू कर दिया “यह सब बकवास है ,इसे कोई शंकर जी ने बाण-वाण नहीं मारा है, यह ढोंग कर रही है. ‘आदि आदि । हमारा प्लान यहीं गड़बड़ा गया । लोग हमारे विरोध मेंड़े हो गये । हाँलाकि हमने समझाने की कोशिश की । अपने हाथ पर बनाये अदृश्य निशानों पर राख रगड़कर बताया कि निशान ऐसे बनते हैं ,यहाँ तक कि शर्मा जी ने जलती अगरबत्ती लेकर अपने हाथों पर वैसे ही निशान बनाकर बता दिये । लेकिन अन्द्धश्रद्धालू जनता ने हमे कुछ कहने नहीं दिया । अंतत: पुलिस संरक्षण में हमें वहाँ से बचकर आना पड़ा ।

अगले दिन अखबारों में भी हमारी असफलता पर बहुत कुछ छपा लेकिन हम निराश नही हुए ।हमने जो कुछ देखा था वह तत्कालीन जिलाधीश श्री बसंत प्रताप सिंह को बताया । उन्होने अगले ही दिन वहाँ पुलिस भिजवाकर यह गोरखधन्धा बन्द करवा दिया । पुलिस की तफ्तीश से पता चला कि विगत पाँच वर्ष पूर्व उस स्त्री के पति ने उसे प्रताड़ित कर त्याग दिया था तथा वह अपने मायके में रह रही थी । वहाँ रहते हुए वह गर्भवती भी हो गई थी तथा इस वज़ह से मानसिक आघात लगने के कारण वह विक्षिप्तों की तरह व्यवहार करने लगी थी । उसे पुन: ससुराल में स्थापित करने और उसे मोहरा बना कर कमाई करने के उद्देश्य से उसके पिता तथा ससुर ने एक बैगा के साथ मिलकर यह षड़यंत्र किया तथा उसे जलती सलाख से दाग कर उसके शरीर पर नाग,त्रिशूल, डमरू जैसे निशान बनाये तथा प्रचारित किया कि उसे शंकर जी ने अग्निबाण मारा है तथा स्वयँ उसके गर्भ में आ गये हैं .अन्द्धश्रद्धालू जनता ने इसमे कहीं कोई तर्क नहीं किया और इस झूठी कहानी को आस्था वश सच मानकर उसकी पूजा करने लगी.पुलिस ने सच उगलवाया और सब दोषियों पर कार्यवाही कर केस दर्ज़ कर लिया.इस तरह यह सब बन्द हुआ ।

लेकिन ज़रा ,रूकिये अभी कथा का उपसंहार नहीं हुआ है .कुछ माह बाद ऐसे ही एक और स्था पर जहाँ लता नामकी एक लड़की को हर सोम वार और गुरूवार को देवी आती थी (य़ह किस्सा अगली बार ) व स्त्री हमे मिली तब तक उसकी मानसिक स्थिति सुधर चुकी थी और वह वहाँ अपनी रिश्तेदारी में आई थी ।उससे हमने पूछा “ क्यों शंकर जी का क्या हुआ ? तो उसने शरमाकर कहा , “लड़की हुई है “। हमने कहा कोई बात नहीं ,शंकर जी नहीं आये तो क्या हुआ पार्वती जी को तो भेज दिया ।चलो....खुश रहो ।

सावन के महीने में, इस किस्से में मज़ा आया हो तो अगली बार और सुनाऊँ ?

आपका शरद कोकास

(सभी चित्र गूगल से साभार )

शुक्रवार, 22 मई 2009

ज़िन्दा जला दिये जाओगे

इस पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म होने से पूर्व ही बहुत कुछ घटित हो चुका था.बृह्मांड,सूर्य,चान्द,सितारे,आकाश,हवायें,बादल सब कुछ उपस्थित था। मनुष्य नित नई परिघटनायें यहाँ घटित होते हुए देखता और अपनी मान्यतायें तय करता जाता |प्रकृती के रहस्यों को लेकर अलग अलग अलग अलग विचार दृढ होते गए|मनुष्य अपने देवी-देवताओं का निर्माण कर चुका था।मिस्त्री लोगों ने आकाश को एक देवी माना जहाँ रात में दिखाई देने वाले चान्द सूरज दिन में गायब हो जाते थे उन्हे लगा आकाश में कोई सागर है जहाँ ग्रह नाव में बैठकर आर-पार जाते हैं|यूनानी लोगों को आकाश एक छत की तरह प्रतीत होता था। इसी तरह पृथ्वी के बारे में भी मान्यतायें बनी जैसे हमारे यहाँ मान्यता है कि सागर में एक वासुकी नाग है जिसकी पीठ पर हाथी है जिस पर एक तश्तरी है जिसमें पृथ्वी रखी है और नाग के हिलने से भूकम्प आते हैं वगैरह..।
लेकिन जहाँ एक ओर लोग अपनी मान्यताओं में परिवर्तन हेतु तत्पर नही थे वहीं उन्हीके बीच के कुछ लोग इन रहस्यों को सुलझाने में लगे थे।सबसे पहले दूसरी सदी में यूनान के क्लाडियस नामक वैज्ञानिक ने बताया कि सूर्य चान्द,तारे भी कोई देवी-देवता नही हैं वे पृथ्वी की तरह पिंड हैं.फिर पन्द्रहवीं सदी में पोलैंड के निकोलस कॉपरनिकस(1473-1543) ने बताया कि सूर्य केन्द्र मे है तथा पृथ्वी सहित अन्य ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं। इस बात का भीषण विरोध हुआ। उनकी पुस्तक ‘On The Revolution” उनके मरने के बाद प्रकाशित हुई।सोलहवीं सदी में इटली के गियारडानो ब्रूनो(1548-1600)ने कहा कि कॉपरनिकस बिलकुल सही थे,इस बात के लिये उन पर मुकदमा चला और 17 फरवरी 1600 को उन्हे ज़िन्दा जलाया गया।इंग्लैंड,जर्मनी,फ्रांस में इसके प्रचार के बाद अनेक वैज्ञानिक इस मान्यता के पक्ष में आये,पहला टेलीस्कोप बनाने वाले गेलेलिओ(1564-1642),ग्रहों का अंडाकार पथ बताने वाले कैपलर(1571-1630)और गुरुत्वाकर्षण के खोजकर्ता न्यूटन(1642-1727).अनेक विरोधों का सामना करने के बाद आज कहीं यह मान्यतायें स्थापित हो पाई हैं।
आज आप प्रायमरी स्कूल के बच्चे से भी कहें कि पृथ्वी स्थिर है और सूर्य रोज़ उसकी परिक्रमा करता है तो वह आपके सामान्य ज्ञान पर हंसेगा।लेकिन जो लोग नित्य सूरज चान्द व ग्रहों की पूजा करते हैं,उनसे डरते हैं उन्हे अपनी कुंडली मे बिठाकर उनकी शांती हेतु जाने क्या क्या करते हैं उन्हे क्या कहेंगे आप? कॉपरनिकस और ब्रूनों के युग के लोग अभी भी जीवित हैं.उनसे उलझकर तो देखिये आप भी ज़िन्दा जला दिये जायेंगे..(कवि की सलाह- आलोक धनवा की कविता “ब्रूनो की बेटियाँ” अवश्य पढें)
शरद कोकास

सोमवार, 11 मई 2009

BRAIN BRAIN BRAIN

कल्पना कीजिये यदि मनुष्य के पास मस्तिष्क नही होता तो क्या होता?सीधा सा जवाब है ..फ़िर आप यह कल्पना ही कैसे करते ?इस ब्लॉग पर आप सभी विज्ञान में जिज्ञासा रखने वालो का स्वागत है इसलिए की आप सभी के पास BRAIN है.आगे और बातें होंगी फिलहाल इतना ही ॥ शरद कोकास