गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

अरे वा ! ..श्रीदेवी की फोटो से भी भभूत निकलती है ..कमाल है !!!


यह लगभग पन्द्रह वर्ष पुरानी घटना है । एक दिन  सड़क पर वर्मा जी मिल गये बहुत उत्साह से बताने लगे “शरद जी पता है कल पाण्डे जी के यहाँ भजन था और एक चमत्कार हो गया ,हम लोगों ने गाना शुरू ही किया था कि अचानक बाबा की फोटो से भभूत झड़ने लगी ,पाण्डे जी ने सबका ध्यान आकर्षित करवाया ,हम लोगों ने वह भभूत माथे पर लगाई । सचमुच बाबा में बहुत शक्ति है वरना कलयुग में ऐसा चमत्कार कहाँ होता है ?
मैने कहा “वर्मा जी ,आप भी कहाँ इन बातों में विश्वास करते है यह सब चमत्कार नहीं विज्ञान के प्रयोग हैं । बस इतना कहा था मैने कि वर्मा जी चिढ़ गये ..” देखिये आपको नहीं मानना है तो नहीं माने लेकिन बाबा पर अविश्वास तो न करें । मैने फिर कहा “ मै बाबा पर अविश्वास नहीं कर रहा हूँ मैं तो पाण्डे जी द्वारा किये चमत्कार की बात कर रहा हूँ जिसके पीछे विज्ञान का एक साधारण सा प्रयोग है ।“
खैर वर्मा जी तो उस दिन मान गये लेकिन यह बात मन में गूंजती रही ।फिर एक दिन नागपुर की अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति के उमेश बाबू चौबे ,गणेश हलकारे व हरीश देशमुख जी ,साक्षरता समिति के तहत एक शिविर मे दुर्ग पहुंचे तो उनसे मैने यह किस्सा बताया । गणेश भाई हँसने लगे ,कहा “ इसमे कौनसी बड़ी बात है..देवी देवताओं के चित्र से तो भभूत हम भी निकालते हैं अभी उस दिन नागपुर में हमने “श्रीदेवी” की फोटो से भभूत निकाली है ।चलिये घोषणा करवा दीजिये कल यहाँ के किसी सार्वज़निक स्थान पर यह प्रयोग करें ।“ मैने कहा “ठीक है .. अखबारों में विज्ञप्ति दे दी गई “ कल शाम पाँच बजे पुराने बस स्टैंड पर एक आम सभा में आइये और देखिये श्रीदेवी की फोटो से भभूत कैसे निकलती है ।“
तुरंत ऑर्डर देकर एल्युमिनियम की फ्रेम में जड़ी श्रीदेवी की एक तस्वीर तैयार करवाई गई, मंच तैयार किया गया और उस पर एक कुर्सी रखी गई जिस की पीठ से टिकाकर  श्रीदेवी को विराजित किया गया ,बाकायदा अगरबत्ती लगाई गई ,फूल चढ़ाये गये और लोगों ने देखा कि कुछ देर में उस फोटो के काँच पर भभूत गिरने लगी है ।
इस बीच हमारे कार्यकर्ता लोगों को अन्य प्रयोग कर के भी दिखा रहे थे ।इस चमत्कार के बारे में कुछ लोगों ने पूछा तो बताया गया यह तो बहुत आसान है । अल्युमिनियम की फ्रेम पर चुपचाप मर्क्युरस क्लोराइड का पाउडर लगा देते हैं जो सफेद होता है और आसानी से दिखाई नहीं देता थोड़ी देर में दोनों की रासायनिक क्रिया शुरू हो जाती है और  उससे जो पदार्थ तैयार होता है वह भभूत जैसा दिखता है ।एक कार्यकर्ता ने बोर्ड पर यह फार्मूला ही लिख दिया ।
              6Hg2Cl2+2Al = 2AlCl3+3Hg2Cl2+6Hg
वर्मा जी को तो वहाँ पहुंचना ही था वे आये और उन्होने श्रद्धा भक्ति के साथ श्रीदेवी की तस्वीर के आगे हाथ जोड़े और कहा “ देखा बाबा का चमत्कार , श्रीदेवी जी की फोटो में भी प्रकट हो गये ।“ हम लोग हँसने लगे । समिति सचिव डी.एन.शर्मा जी ने उनसे कहा “धन्य हो प्रभु , इस देश की जनता हर स्त्री में इसी तरह भगवान का वास ही मानने लगे तो भले ही अपने अन्धविश्वास न दूर करे ,कम से कम उनके आगे हाथ जोड़ कर उनका सम्मान तो  करने लगे  ।“
घोषणा : यह किस्सा सौ प्रतिशत सत्य है – आपकी राय ?- शरद कोकास

छवि गूगल से साभार

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

"मुझे कर्णपिशाचिनी की सिद्धी प्राप्त है । "

"मैं बिना देखे कानों से सब कुछ पढ़ सकता हूँ ।" अगर आप भी पढ़ना चाहते हैं तो इसे ध्यान से पढ़ें ।                                                                                                                                
                उस विवाह समारोह मे एक कोने में मजमा जमाये बाबा यही तो कह रहे थे । भीड़ के बीच उन्होने ऐलान किया कि वे इस बात का प्रदर्शन भी कर सकते हैं । उन्होने लोगों से कहा कि वे उनके मन की बात कानों से पढ़कर जान सकते हैं । बस इसके लिये लोगों को एक चिट पर एक पंक्ति में अपने मन की बात लिख कर देना होगा । उनके सहयोगी ने लगभग 10-12 लोगों को कागज़ का एक –एक टुकड़ा दिया लोगों ने उस पर अपने मन की कोई एक बात लिखी और उसे तीन चार परतों में मोड़कर एक कटोरे में रख दिया ।
               मैं यह सब तमाशा देख रहा था । मुझे पता था बाबा क्या ट्रिक करने जा रहे हैं । सो मैने भी एक कागज़ पर कुछ लिखा और कटोरे में डाल दिया ।
               बाबा ने एक चिट उठाई उसे कानों के पास ले जा कर कुछ सुनने का प्रयास किया और ऐसे सर हिलाया जैसे वे जान रहे हों उस चिट में क्या लिखा है । फिर उन्होने ज़ोर से कहा “ यह किसने लिखा है ,”कर्ण पिशाचिनी देवी की जय ? “ भीड़ में से एक व्यक्ति ने हाथ उठाया और कहा “ महाराज मैने लिखा है ।“ बाबा ने कहा “ शाबास “ और उसे पास बुलाकर स्वयं चिट खोलकर देखी और उसे दिखाकर कहा “ लो देख लो ,सत्य है या नहीं ।“
               फिर न्होने दूसरी चिट उठाई उसे कान के पास ले जाकर कुछ सुनने का प्रयास किया और कहा “ यह किसने लिखा है .. “देश के सारे पढ़े-लिखे मूर्ख हैं “ एक क्षण के लिये सभीने इधर-उधर देखा ,भीड़ में से एक व्यक्ति ने कहा “ मैने लिखा है ।“ सभी लोग बाबा के कानों से पढ़ने के इस चमत्कार को ध्यान से देख रहे थे । फिर बाबा ने तीसरी पर्ची उठाई उसे कान के पास ले जाकर सुना और पूछा “ किसने लिखा है इस साल देश में बारिश नहीं हुई ? “
               भीड में से एक व्यक्ति ने हाथ उठाया । फिर चौथी पर्ची सुनकर उन्होने कहा “ और यह किसने लिखा है कि सारे बाबा लोगों को ठगते हैं ।“ इतना कहकर वे मन्द-मन्द मुस्काये । फिर भीड में से एक व्यक्ति ने हाथ उठाया । पांचवी पर्ची वे कान के पास ले गये और पूछा “ यह किसने लिखा है मुझे चॉकलेट मीठी लगती है ? “इस सवाल पर एक बच्चे ने हाथ उठाया ।
                मै बहुत ध्यान से देख रहा था कान से पर्ची पढ़ने के बाद वे एक नज़र उस पर डाल लेते थे और उसे अलग रख देते थे । यह चोकलेट वाली पर्ची पढ़ते समय उनकी भवें किंचित तन गई । अगली पर्ची वे फिर कानों के पास ले गये और यह क्या वे अचानक क्रोधित हो गये “ यह कौन मूर्ख है जो देवी को क्रोध दिला रहा है , जाने किस विदेशी भाषा मे लिखा है यह सब नहीं चलेगा ,देवी श्राप दे देगी । माहौल बिगड़ चुका था ,
                लेकिन मैने आगे बढ़कर कहा “यह कैसी देवी है जो यह भी नहीं पढ़ सकती । लाइये मैं पढ कर बताता हूँ अपने कान से कि इसमें क्या लिखा है ।“
                पता नहीं बाबा को क्या हुआ मुझे जवाब देने की बजाय वे पैर पटकते हुए वहाँ से निकल गये । लोग आपस में बात करने लगे..”बड़े पहुंचे हुए महात्मा हैं जाने किस बेवकूफ ने इन्हे नाराज़ कर दिया ।“ लोगों की बात सुनकर मैं आगे बढ़ा और मैने कहा “ रुकिये, मै बताता हूँ इस पर्ची में क्या लिखा है । “लोग वहीं ठहर गये ।   
                बाबा जिस पर्ची को फेंककर चले गये थे वह पर्ची वहीं पड़ी थी मैने उसे उठाया और कान के पास ले जाकर कहा “ इसमे लिखा है ज़्द्रास्तुयते एतो सबाक दस्वीदानिया ।“ लोग इधर उधर देखने लगे । मैने कहा यहाँ वहाँ मत देखिये ,यह मैने ही लिखा है । फिर मैने अगली पर्ची उठाई और उसे कान के पास ले जाकर कानों से उसे पढ़ने का अभिनय करते हुए कहा “इसमें लिखा है “इस साल बहुत तेज़ गर्मी पड़ेगी ।“ भीड़ में से एक व्यक्ति ने हाथ उठाकर कहा “ सर यह मैने लिखा है ।“ इस तरह मैने सारी पर्चियाँ कान से पढ़कर सुना दी । लोगों ने कहा “ हमे नहीं पता था सर आप को भी कर्नपिशाचिनी सिद्ध है ।
                मैने कहा नहीं भाइयों ऐसा कुछ नहीं है । यह एक ट्रिक है । आपने देखा होगा बाबा ने जब पहली पर्ची उठाई और कहा ‘कर्णपिशाचिनी की जय’ किसने लिखा है तो जिस व्यक्ति ने हाथ उठाया था वह बाबा का सहयोगी था और उसे पहले से यह इंस्ट्रक्शन थे कि वह इस बात पर हाथ उठाये । इसके बाद बाबा ने वह पर्ची खोलकर खुद पढ़ी और उसे भी दिखाई ,दरअसल उस पर्ची में लिखा था “देश के सारे पढ़े-लिखे मूर्ख हैं ।‘ इसके बाद बाबा ने अगली पर्ची उठाई ,उसे कान से पढा और कहा, इसमे लिखा है ‘देश के सारे पढ़े-लिखे मूर्ख हैं ।‘ और उसे खोलकर मन मे पढ़ा । दरअसल उस पर्ची में लिखा था “इस साल देश में बारिश नहीं हुई ‘ इस मैटर को इसके बाद आनेवाले के लिये उन्हे कहना था ।
               इस तरह वे पर्ची खोलकर पहले ही पढ लेते थे और उस बात को ध्यान में रखकर ,अगले से जोड़कर कह देते थे । लोग इस बात के भ्रम मे रहते थे कि वे कान से पढ रहे हैं । बस इस खेल मे पहला व्यक्ति अपना होना चाहिये जो आपकी बात पर हाँ कहे ,जैसे इस खेल में ‘कर्णपिशाचिनी की जय’ लिखी हुई कोई पर्ची ही नहीं थी । “अच्छा यह बात है “ लोगों को यह ट्रिक समझ में आ गई थी ।“ तो सर इसे तो हम भी कर सकते हैं ? “
                मैने कहा “बिलकुल कीजिये लेकिन कर्णपिशाचिनी या किसी भी देवी का नाम लेकर मत कीजिये ऐसी कोई सिद्धी या चमत्कारिक शक्ति नही होती ।“
                “लेकिन सर आपने अपनी पर्ची में क्या लिखा था ?” एक व्यक्ति ने आखिर पूछ ही लिया “ मैने कहा उसमें रशियन लिपि में लिखा था “एतो सबाक दस्वीदानिया,ज़्द्रास्तुयते “ । यानि यह श्वान है ..मै चलता हूँ ,नमस्ते । लोग हँसने लगे ,,अच्छा हुआ बाबा को रशियन नहीं आती थी वरना ... ।
                    चलिये आप लोगों को भी यह ट्रिक समझ में आ गई हो तो आप लोग भी शादी-ब्याह ,पार्टी-शार्टी, पिकनिक –विकनिक में इस ट्रिक को कीजिये और लोगों का मनोरंजन कीजिये ।                     हाँ  इतना ज़रूर लोगों से कहें कि पर्ची में सिर्फ और सिर्फ हिन्दी में लिखें । और कान के बारे में यही कि  अफवाहों पर कान न दें , ज़्यादा कानाफूसी न करें  कर्णप्रिय बातें करें साथ ही कान में नुकीली वस्तु न डालें । - आपके कान ताउम्र सलामत रहें इस कामना के साथ ..............आपका  शरद कोकास    
छवि गूगल से साभार

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

नवरात्रि में साबूदाने की खिचड़ी खाने से पहले सोचें..

नवरात्रि का पर्व प्रारम्भ होने जा रहा है और बहुत से श्रद्धालु इस तैयारी में हैं कि इस बार पूरे नौ दिन का उपवास कर ही लिया जाये । उस दिन एक मित्र से पूछा “ क्यों भई इस बार भी पूरे नौ दिन ? “ उन्होने कहा “ बिलकुल “ मैं जानता था उन्हे पर्व के बारे में कुछ विशेष श्रद्धा नहीं है और खाने का मोह तो वे त्याग ही नहीं सकते ।
मैने कहा “ क्यों भई जब उपवास में विश्वास ही नहीं है तो व्यर्थ में क्यों शरीर को कष्ट देते हो ? “ तो उन्होने कहा “ कष्ट ? कैसा कष्ट ? भई उपवास में भी एक समय तो मैं जमकर खाता ही हूँ । “ मैने कहा “ खाना ही है तो फिर  उपवास का सहारा क्यों वैसे ही खा सकते हो ? “ तो उन्होने कहा “ भई उपवास के दौरान रोज़ के भोजन से भिन्न, फलों से लेकर विभिन्न पकवानों तक कई कई वेरायटियाँ ( हिन्दी का अद्भुत प्रयोग) खाने को मिलती हैं और सिंघाड़े का हलवा और साबूदाने की खिचड़ी तो मेरा प्रिय व्यंजन है ।“
मैने कहा “ हाँ साबूदाना तो मेरा भी प्रिय खाद्य है,और न केवल खिचड़ी बल्कि बर्फी भी मुझे बेहद प्रिय है । मित्र के मुँह में पानी आना शुरू हो चुका था ।“
फिर अचानक उन्होने पूछा “ यार कई लोगों से पूछा लेकिन कोई नहीं बता पाया कि ये साबूदाने का पेड़ कहाँ होता है ? “ मेरा भी दिमाग चकरा गया ,
 फिर अचानक याद आया कि बरसों पहले विज्ञान पत्रिका सन्दर्भ में यह पढ़ा था
 सो अपनी लायब्रेरी से वह अंक निकाला और उन्हे बताया ।
चलिये यही जानकारी आपके साथ भी बाँटी जाये ।
दर असल साबूदाना किसी पेड़ पर नहीं ऊगता । यह कासावा या टैपियोका नामक कन्द से बनाया जाता है । कासावा वैसे तो दक्षिण अमेरिकी पौधा है लेकिन अब भारत में यह तमिलनाडु,केरल, आन्ध्रप्रदेश और कर्नाटक में भी उगाया जाता है । केरल में इस पौधे को “कप्पा” कहा जाता है । इस कन्द में भरपूर स्टार्च होता है । साबूदाना बनाने के लिये कासावा के कन्दों को पानी की टंकियों में डालकर गलाया जाता है और फिर उनमें से प्राप्त स्टार्च को धूप में सुखाया जाता है । जब यह पदार्थ लेईनुमा हो जाता है तो मशीनों की सहायता से इसे छन्नियों पर डालकर गोलियाँ बनाई जाती हैं ,ठीक उसी तरह जैसे की बून्दी छानी जाती है ।
 इन गोलियों को फिर नारियल का तेल लगी कढ़ाही में भूना जाता है और अंत में गर्म हवा से सुखाया जाता है ।
बस साबूदाना तैयार । फिर इन्हे आकार ,चमक, सफेदी के आधार पर अलग अलग छाँट लिया जाता है और बाज़ार में पहुंचा दिया जाता है ।
तो चलिये उपवास के दिनों में ( उपवास करें न करें यह अलग बात हैं ) साबूदाने की स्वादिष्ट खिचड़ी ,या खीर या बर्फी खाते हुए साबूदाने की निर्माण प्रक्रिया को याद कीजिये और मित्रों से
शेयर कीजिये ।
आपका -शरद कोकास 

(छवि गूगल से साभार)

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

किस धोखे में हैं आप डॉक्टर के पास जाईये

आज एक मित्र के साथ कहीं जाने के लिये उनके घर से बाहर निकला ही था कि उन्हे छींक गई । तुरंत उनकी पत्नी ने कहा थोड़ा रुक जाईये जी यह अपशकुन है “ मैने सोचा ,चलो भाभी हैं , थोड़ा हँसी-मज़ाक कर ही लिया जाये सो मैने पूछा “ क्या हो जायेगा भाभी जी अगर घर से निकलते समय छींक आ गई तो ? “ उन्होने कहा “ अरे आपको मालूम नहीं इससे दुर्घटना की सम्भावना बढ़ जाती है । “ मैने अपने तरकश से तर्क का तीर निकाला और कहा “ मतलब दुनिया में जितनी दुर्घटनाएँ होती हैं सब लोग अपने घर से निकलते समय छींकते ज़रूर होंगे ?” वो बोलीं “ क्या भाई साहब आप भी मज़ाक करते हो ,ऐसा कहीं होता है । “ मैने कहा “ ऐसा नहीं होता तो फिर ठिठकने की क्या ज़रूरत ? उन्होने दूसरा कारण दिया “नहीं भाई साहब ऐसा नहीं ,इससे बना-बनाया काम बिगड़ जाता है “ मैने फिर उसी तीर को प्रत्यंचा पर चढ़ाया और कहा “ मतलब जितने लोगों के काम बिगड़ते हैं सब घर से छींकते हुए निकलते हैं ? “ उन्होने एक वाक्य में मुझे रिजेक्ट करते हुए कहा “ आपसे तो बहस करना बेकार है भाई साहब । “ फिर भी मैने कहा “भाभीजी, ऐसा नहीं है । छींक शरीर की एक रक्षात्मक प्रणाली है ,जो नाक में जबरन घुस आये धूल मिट्टी के कण को बाहर निकालने के लिये है । किसी गन्ध या धुयें या कीटाणु की वज़ह से भी छींक आ सकती है । नाक का यह भीतरी हिस्सा इतना सम्वेदनशील होता है कि ज़रा भी ज़बरदस्ती बरदाश्त नही कर सकता । कई बार जुकाम में इतनी छींक आती है कि रोके नही रुकती । हमारे एक मित्र थे जो बीच–बाज़ार में रहते थे और जुकाम के कारण दिन भर आते जाते छींकते रहते थे और न कोई दुर्घटना होती थी न काम बिगड़ता था ।लेकिन जब भी वो ससुराल जाते थे उनका जुकाम गायब हो जाता था इसलिये कि उनकी ससुराल पहाड़ी प्रदेश में थी ,जहाँ कोई प्रदूषण नहीं था । इसलिये छींक आने का सम्बन्ध शुभ होने से है अशुभ होने से

वैसे यह अच्छी बात है कि सभी छींको को अशुभ नहीं माना जाता । कुछ लोग छींक आते ही कहते हैं “ शायद कोई याद कर रहा है ।“ फिर उस की याद आते ही उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है । कुछ लोग बातचीत के बीच में छींक आते ही कह उठते है “ देखा, सही बात । “ मानो छींक हो आई एस आई की मुहर हो वैसे छींक और याद का थोड़ा बहुत सम्बन्ध तो मै भी मानता हूँ, इसलिये चलते चलते आपको एक मुफ्त नुस्खा दे ही डालता हूँ । मान लीजिये आपको छींक आ ही जाये तो समझिये आपको कोई याद कर रहा है । दूसरी छींक आ जाये तो समझिये कि बहुत ज़्यादा याद कर रहा है । फिर तीसरी छींक आ जाये तो समझिये कि वह आपको अपने पास चाहता है । चौथी छींक आ जाये तो समझिये कि वह बगैर आपसे मिले रह ही नहीं सकता है और फिर पाँचवी छींक आ जाये तो.. किस धोखे में हैं आप ..? डॉक्टर के पास जाईये , आपको जुकाम हो चुका है

वैसे आप क्या सोच रहे हैं ॥भाभीजी मेरी बकवास सुनने के लिये अब तक रुकी होंगी ? हर पढ़े-लिखे का यही हाल है भैया । ठीक ,अगली बार बिल्ली के रास्ता काटने पर बात करेंगे । बेशक कुछ नया ही बताउंगा मै ।

आपका -शरद कोकास

(छवि गूगल से साभार)

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

मेरी स्कूटर भी दूध पीती है




21 सितम्बर 1995 का दिन इस दुनिया में एक ऐसे तथाकथित चमत्कार के लिये याद किया जायेगा जब गणेशोत्सव के दिनों से भी ज़्यादा गणेश जी के मन्दिरों मे भीड़ रही । अचानक एक अफवाह फैली कि गणेश कुल के देवी देवता दूध पी रहे हैं । मन्दिरों में लम्बी लम्बी कतारें लग गईं । भीड़-अफरातफरी शोर का माहौल हो गया । लोग फोन से एक दूसरे को खबर कर रहे थे । थोड़ी देर में पता चला कि विदेशों में भी देवी मूर्तियाँ दूध पी रही हैं । दूध के भाव अचानक बढ़ गये । होटलों में चाय के लिये रखा दूध ऊंचे दाम पर बिक गया । लोग घर का पूरा दूध लेकर मन्दिरों में पहुंच गये ।यह कथा तो अब सभीको मालूम है क्योंकि लगभग सभी सूचना माध्यमों से इसका ज़ोर-शोर से प्रचार किया गया ।
लेकिन उस दिन इस अन्धविश्वास का विरोध करने के लिये और लोगों में वैज्ञानिक दृष्टि से इसका विश्लेषण करने की अपील करती हुई भी कई संस्थाएँ सामने आईं । अफसोस हमारे देश की जनता को मूर्ख समझ कर उनके अन्धविश्वास को बढ़ावा देने वाले माध्यमों के बीच उनकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की तरह साबित हुई । इस अफवाह की वज़ह से उपजी अराजकता से निपटने के लिये और इसका वास्तविक कारण पता लगाने के लिये राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी संचार परिषद के अध्यक्ष डॉ.नरेन्द्र सहगल के नेत्रत्व में तुरंत एक दल का गठन किया गया जिसने राजधानी के विभिन्न मन्दिरो में भ्रमण कर इस घटना को देखा और यह निष्कर्ष दिया कि इस घटना में कोई चमत्कार नहीं है तथा वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुसार सामान्य घटना है ।इस वैज्ञानिक दल ने बताया कि दूध से भरे चम्मच को जब 90 अंश के झुकाव पर मूर्ति से सम्पर्क किया गया तो प्रतिमा ने दूधपान नहीं किया लेकिन इसके विपरीत चम्मच झुकाने से ऐसा प्रतीत हुआ । वैज्ञानिकों ने बताया कि प्रत्येक द्रव का पृष्ठ तनाव होता है जो द्रव के भीतर अणुओं के आपसी आकर्षण बल पर निर्भर होता है । जिस पदार्थ के सम्पर्क में यह आता है उस ओर इसका बल हो जाता है । इस घटना में जैसे ही चम्मच में भरा दूध सीमेंट ,पत्थर या संगमरमर से बनी प्रतिमा के सम्पर्क में आया वह उसकी सतह पर फैल गया तब देखने वालों को लगा कि प्रतिमा ने उस दूध को खींच लिया लेकिन जैसे ही दूध मे रंग या सिन्दूर मिलाकर प्रतिमा से लगाया गया बहती हुई दूध की पतली धार दिखती रही
इस दिन मैं अपने बैंक के निकट स्थित ,मन्दिर की पिछली नाली से बहते हुए दूध को देखता रहा और सोचता रहा यह वही देश है जहाँ लाखों-करोड़ों बच्चों को दूध पीने को क्या देखने तक को नहीं मिलता । शाम तक मैं इतना उद्वेलित हो गया कि स्थानीय प्रेस कॉम्प्लेक्स पहुंच गया और अपने पत्रकार मित्रों को बुलाकर कहा “ देखिये मेरी स्कूटर भी दूध पीती है ।“ फिर मैने यह प्रयोग भरे बाज़ार में करके दिखाया । लोगों ने इसे तमाशे की तरह देखा । साक्षरता भवन में अपने मित्रों के साथ हमने टेबल, कुर्सी, क्लियोपेट्रा की मूर्ती, कम्प्यूटर, काँच कई वस्तुओं पर यह प्रयोग किया । इस बीच दूरदर्शन वालों से भी बात की और रायपुर से मैने व प्रोफेसर डी.एन.शर्मा ने आधे घंटे का एक कार्यक्रम भी तैयार किया । जिसे एक सप्ताह बाद प्रसारित किया गया । हम लोग मन्दिरों में भी गये और लोगों को समझाने की कोशिश की । हाँलाकि 2-4 दिन बाद लोग इस घटना की वास्तविकता समझ गये लेकिन उस दिन तो जैसे लोगों की आँखों पर पट्टी पड़ गई थी । आज भी आपको ऐसे लोग मिल जायेंगे जो कहेंगे “ हाँ, 14 साल पहले गणेश जी ने दूध पिया था । “हम उनसे पूछते हैं कि भाई उसके बाद उनको भूख-प्यास नहीं लगी क्या ? इस बात पर वे हें हें करने लगते हैं ।
(चित्र में वही स्कूटर और पृष्ठभूमि मे मेरा निर्माणाधीन मकान )
क्या आपके शहर में भी ऐसा कोई प्रयास हुआ था ? -आपका शरद कोकास

शनिवार, 15 अगस्त 2009

जिसके नाम से ज्योत हिली वो डायन है





महाराष्ट्र में वरुळ के पास चांदस- वाठोडा गाँव का यह कि
स्सा है । गाँव के लोग उस दिन सुबह से ही नहा धोकर तैयार बैठे थे । आज उनके गाँव मे ज्योत देखने वाला मांत्रिक आने वाला था । गाँव में पता नहीं कौनसी बीमारी फैली थी कि बच्चों को बुखार आने लगा था । गाँव वालों का ऐसा विश्वास था कि उन्ही के गाँव का कोई व्यक्ति बच्चों पर जादू टोना कर रहा है । दोपहर बाद मांत्रिक का आगमन हुआ । उसने गाँव के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर में पहले से लिपे–पुते स्थान पर अपना आसन जमाया । एक कोने मे सबसे पहले पानी छिड़ककर उस स्थान की पूजा की । जिस बच्चे को बुखार था उसके शरीर से अंजुलि भरकर ज्वार उतार कर उस कोने में रख दी और उस से बजरंग बली की आकृति बनाई । मराठी में इसे “जोन्धळ्याचा हनुमान काढ़णे “कहते हैं । फिर एक धागा लेकर उससे एक क्रॉस बनाया और उसके बीच मे एक दिया रखा । दिये मे ज्योत जला कर वह उकड़ूँ बैठ गया और अपने दाँयें हाथ की तर्जनी और अंगूठे के बीच उस धागे का सिरा पकड़ लिया । उस दिये को उसने अनाज के बनाये हनुमान के उपर अधर में रखा और मंत्र बुदबुदाने लगा साथ ही वह गाँव के विभिन्न लोगों के नाम भी लेने लगा । अचानक हिलती हुई ज्योत एक ना के उच्चारण करते ही स्थिर हो गई । वह गाँव की एक स्त्री का नाम था

फिर उस स्त्री को डायन या “कर्नाटकी बताकर उसके साथ क्या हुआ यह बताने की आवश्यकता नहीं उस पर जादू टोने का आरोप लगाया गया । उसे अपमानित किया गया उसके साथ मारपीट भी की गई । अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिती नागपुर के श्री हरीश भाई देशमुख को जब यह पता चला तो वे अपने कार्यकर्ताओं के साथ उस गाँव में गये और अपनी उपस्थिति में पुन: उस मांत्रिक से यह ज्योत हिलाने का कार्यक्रम करवाया । फिर उसकी पोल खोलते हुए उन्होने गाँव वालों को खुद ही यह क्रिया करके बतलाई । उन्होने बताया कि वास्तव मे यह दिया गुरुत्वाकर्षण के नियमानुसार पेंडुलम की तरह हिलता है । दिया अपने आप नहीं हिल सकता और उसे वह मांत्रिक ही अपनी मर्ज़ी के अनुसार हिलाता है और जिस नाम पर रोकना चाहे रोक सकता है । यह सब हाथ की चालाकी है । गाँव वालों ने भी यह क्रिया स्वयं करके देखी ।

हरीश भाई ने यह घटना बहुत पहले बताई थी और यह उनकी पुस्तक “शकुन अपशकुन में प्रकाशित भी हो चुकी है । लेकिन वास्तविकता यह है कि “ ज्योत पाहणे ” या ज्योत देखने का यह अन्धविश्वास अब भी पूरी तरह गाँवों से दूर नहीं हुआ है । यहाँ तक कि समाज के पढ़े-लिखे और प्रतिष्ठित लोग भी इसमें विश्वास करते हैं। कुछ लोग वास्तविकता जानते हैं लेकिन वे किसी को प्रताड़ित करने के लिये जानबूझ कर यह कार्य करवाते हैं । वे नहीं जानते कबीरदास जी ने कहा है..”निर्बल को न सताईये जाकी मोटी आह ..”

आपका- शरद कोकास

(छवि गूगल से साभार)