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मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

ज़िंदगी क्या है जान गए ना ?




आप में से ऐसा कोई नहीं होगा जिसने कभी ज़िंदगी के बारे में न सोचा हो । कोई कहेगा ज़िन्दगी एक पहेली है कोई कहेगा जीवन पानी का बुलबुला है ,जीवन एक उड़ती हुई पतंग है वगैरह वगैरह । जीवन के बारे में हर कवि ने दो चार पंक्तियाँ तो लिख ही डाली हैं । निदा फाज़ली साहब का मशहूर शेर है  ..

”जीवन क्या है,चलता फिरता एक खिलौना है 
 दो आँखों में एक से हंसना एक से रोना है । 

मुझे भी जीवन के बारे में कविताएँ बहुत अच्छी लगती हैं और जीवन को परिभाषित करने वाली एक कविता तो मुझे बेहद पसन्द है ..” ज़िन्दगी क्या है जान जाओगे / रेत पे लाके मछलियाँ रख दो “

मैंने भी अपनी लम्बी कविता “ पुरातत्ववेत्ता ‘ में जीवन के बारे में लिखा है .." और जीवन भी कोई गोलगप्पा नहीं / जिसे आप पुदीने की चटनी मिले पानी में डुबायें /और परम संतृप्तता के भाव में गप  से खा जाएँ ।  

जीवन की परिभाषा ढूँढने  वाले कवियों को अपना काम करने दीजिये, हम अपना काम करते हैं ।  जीवन कहाँ से आया यह हम देख चुके हैं , अब हम जीवन की वैज्ञानिक परिभाषा देखते हैं । पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ हो चुका था लेकिन मानव जीवन के आगमन में अभी समय था । पेड़-पौधे ,कीड़े-मकोड़े, रेंगने वाले जीव तैरने वाले जीव और उड़ने वाले जीवों का आगमन हो रहा था । यह सब सजीव थे और इनमें जीवन के सभी लक्षण मौजूद थे । हम मनुष्य हैं इसलिए  हमें तो मनुष्य के जीवन से मतलब है इसलिए मनुष्य के जन्म का समाचार जानने से पहले हम जान लें ,आखिर यह सजीव होना क्या है ?

ध्यान रखिये जीव का अर्थ यहाँ आत्मा नहीं है  - जीवन के बारे में अगर आप जानते हैं तो आपको यह भी पता ही होगा कि हम मनुष्य,अन्य प्राणि,कीट-पतंगे और पेड़-पौधे सभी सजीवों की श्रेणि में आते हैं । सजीवों के कुछ विशेष लक्षण होते हैं जैसे जन्म लेना,बढ़ना, सांस लेना, भोजन , उत्सर्जन , गति, उत्तेजना तथा संतानोपत्ति और अंतत: मृत्यु आदि। ये सजीव अपने आसपास से अपने जीवन के लिए आवश्यक वस्तुयें ग्रहण करते हैं । सजीवों के सभी लक्षण जीवन के फलस्वरुप ही होते हैं । सजीवों के शरीर में जीवन के लिए आवश्यक क्रियाशीलता बनी रहती है । यह क्रियाशीलता उनके पदार्थ जीव द्रव्य विभिन्न तत्वों तथा यौगिकों का विशिष्ट संगठन हैं। इस प्रकार जीव संगठित द्रव्य है तथा जीवन उसकी क्रियाशीलता । जीवन के होने के लिए एक शरीर आवश्यक है। शरीर से बाहर जीवन नहीं हो सकता । शरीर और जीवन का तालमेल ही एक सजीव को होने का अर्थ प्रदान करता है । जीवन को बेहतर तरीके से जानने के लिए जरूरी है शरीर को जानना ।

4. जीवन में प्रोटीन , डी.एन.ए. और जल  की महत्ता  

मैं आपको पुरानी हिन्दी फिल्मों का एक दृश्य याद दिलाना चाहता हूँ । कटघरे में एक स्त्री खड़ी है और वह चीख चीख कर कह रही है "इस बच्चे का पिता यही है मी लॉर्ड ।" दूसरे कटघरे में एक विलेन टाइप का पुरुष चेहरे पर  कुटिल मुस्कान लिए  खड़ा है । उसका वकील कह रहा है  "लेकिन इसका तुम्हारे पास क्या सबूत है ?" अब फिल्मों में ऐसा दृश्य नहीं होता इसलिए कि अब समय बदल गया है और विज्ञान ने साबित कर दिया है कि बच्चे के डी.एन.ए. से पिता का डी.एन.ए. मिलाकर यह जाना जा सकता है कि उसका वास्तविक पिता कौन है । अब तो टी.वी.धारावाहिक देखने वाले बच्चे भी इस बात को बखूबी जानते हैं कि बच्चे के पिता का पता लगाने के लिए दोनों के डी.एन.ए. का मिलान आवश्यक है । अब देखते हैं कि यह डी एन ए क्या बला है ? इससे पूर्व यह जानना ज़रूरी है कि कोशिका क्या है ।

शरद कोकास 


सोमवार, 20 सितंबर 2010

मस्तिष्क की सत्ता - मस्तिष्क की गुलामी से मुक्त होने के लिए पहले मस्तिष्क को जानें

                                           यह मस्तिष्क कैसे काम करता है

      
हमारे शरीर में विभिन्न अंग हैं । हम दिन भर में कितनी बार उन अंगों का उपयोग करते हैं ,लेकिन क्या हम कभी सोचते हैं कि यह अंग किस तरह काम करते हैं ? यह कतई ज़रूरी नहीं है कि हाथ का उपयोग करने से पहले हम सोचे कि हाथ कैसे काम करता है ,या हमारे पाँव हमारे शरीर का भार किस तरह उठाते हैं । न दाँतों के बारे में सोचना ज़रूरी है कि वे अन्न किस तरह चबाते हैं और न आँखों के बारे में कि वे किस तरह देखती हैं । जब बाहरी अंगों के बारे में यह अनावश्यक है तो फिर भीतरी अंगों की कार्यप्रणाली के बारे में तो जानना तो बिलकुल भी आवश्यक नहीं है  । लेकिन यदि हम केवल मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के बारे मे ही जान लें तो समझ लीजिये कि आप आधे से अधिक तो जान ही गए क्योंकि बहुत सारे अंग तो इस मस्तिष्क से ही संचालित होते हैं । फिर मस्तिष्क की इस गुलामी से मुक्त होने के लिये भी हमें सबसे पहले जानना होगा कि मस्तिष्क कैसे काम करता है । विश्वास हो या अंधविश्वास यह हमारे मस्तिष्क में किस तरह घर करते हैं यह जानने के लिए भी हमें मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को जानना होगा । बेहतर होगा किसी बर्तन को खाली करने से पहले ,उसे भरा कैसे गया यह बात हम जान लें । लेकिन इस बात का आप बिलकुल टेंशन ना लें ,मैं आपको मेडिकल साईंस नहीं पढ़ाने जा रहा हूँ । मैं अत्यंत सरल भाषा में यह बताना चाहता हूँ कि हमारे दिन-प्रतिदिन के काम इस मस्तिष्क के द्वारा कैसे सम्पन्न किये जाते हैं । चलिए हम अपनी सुविधा के लिये सबसे पहले मस्तिष्क को कुछ भागों में विभाजित कर देते हैं ।     
           
मस्तिष्क के क्रियाकलाप: हम किस तरह देखते हैं         यह मस्तिष्क का एक रफ डायग्राम है जिसे मैने सरलता पूर्वक समझने के लिये बनाया है । कृपया इस आकृति का चिकित्सकीय मापदंडों के अनुसार विश्लेषण न करें । इसे हम एक चौकोर बॉक्स की तरह भी देख सकते हैं और कई कमरों वाले एक दफ़्तर की तरह भी । सबसे पहले हम पहले भाग पर नज़र डालते हैं यह है हमारा दृष्टि केन्द्र ,यह वह केन्द्र है जिसकी वज़ह से हम देख पाते हैं ।
1 देखना  : एक कक्षा में मैने सवाल किया हमें देखने के लिये क्या ज़रुरी है ? उत्तर मिला आँखें , किसी ने कहा दिमाग , किसीने और बढ़ कर कहा दृष्टि । एक छात्र ने और बढ़ा-चढ़ा कर कहा मन की आँखें । अंत में विज्ञान के एक छात्र ने सही उत्तर दिया देखने के लिये सबसे ज़्यादा ज़रूरी है प्रकाश । यह हम सभी जानते ही हैं कि प्रकाश के अभाव में आँखें होने के बावज़ूद भी हम नहीं देख पाते हैं । आपको यह भी पता होगा कि  यह कैसे होता है अगर आप जानते होंगे टी.वी पर चित्र कैसे आता है । हमारे दृष्टि केन्द्र में छवि निर्माण होने की भी ऐसी ही प्रक्रिया है । हमारी आँख में भी कैमरे की तरह ही एक लेंस होता है । किसी भी वस्तु पर जब रोशनी डाली जाती है वह रोशनी वस्तु से परावर्तित होकर नेत्र पटल पर पड़ती है , वहाँ से जैव रासायनिक  विद्युत संवेग द्वारा मस्तिष्क के इस केन्द्र में आती है और इस तरह हम उसे देख पाते हैं । अभी मैं केवल देखने की बात ही कर रहा हूँ उस वस्तु या दृश्य को हम किस तरह पहचान पाते हैं वह आगे की बात है । देखने और पहचानने के बाद ही समझने की बारी आती है । इसीलिये कहा जाता है कि देखा हुआ हमेशा सच नहीं होता ।



उपसर्ग : उपसर्ग में मैं अब तक  महत्वपूर्ण कवियों की कवितायें देता रहा हूँ । इस विषय पर काम करते हुए मस्तिष्क के क्रियाकलाप पर बारह कविताएँ मैंने लिखीं । उनमे से एक कविता मस्तिष्क के क्रियाकलाप - देखने पर यह कविता । एक नये विषय पर लिखी इस कविता श्रंखला पर आपकी राय जानना चाहूँगा - शरद कोकास 





मस्तिष्क के क्रियाकलाप – एक – दृष्टि 



एक बच्चे सा विस्मय था जब मनुष्य  की आँखों में
रात और दिन के साथ वह खेलता था आँख मिचौली
समय की प्रयोग शाला में सब कुछ अपने आप घट रहा था

देखने के लिये सिर्फ आँख का होना काफी था
और प्रकाश छिपा था अज्ञान के काले पर्दे में
पृथ्वी से अनेक प्रकाश वर्षों की दूरी के बावज़ूद
सूर्य लगातार भेज रहा था अपनी शुभाशंसाएँ

अब जबकि ऐसा घोषित किया जा रहा है
कि ज्ञान पर पड़े सारे पर्दे खींच दिये गये हैं
और चकाचौन्ध से भर गई है सारी दुनिया
समझ के पत्थर पर लिख दी गई हैं इबारतें
आँख प्रकाश और दिमाग़ के महत्व की
जैसे कि धुप्प अन्धेरे में हाथ को हाथ नहीं सूझता
अन्धेरे में बस दिखाई देता है अन्धेरा
कोई फर्क नहीं पड़ता आँखें खुली या बन्द होने से
यह मस्तिष्क ही है जो अन्धेरे से बाहर सोच पाता है

दृश्य और आँखों के बीच प्रकाश के रिश्तों में
अन्धेरे से बाहर झाँकता है विस्मय से भरा संसार
दृश्य के समुद्र में तैरता है वर्तमान

यह दृष्य में रोशनी की भूमिका है
जो अदृष्य है विचारों के दर्शन में
यहाँ रोशनी का आशय भौतिक होने में नहीं है

अन्धेरे में भटकते बेशुमार विचारों की भीड़ में
दृष्टि तलाश लेती है अक्सर कोई चमकता हुआ विचार

मानव मस्तिष्क के विशाल कार्यक्षेत्र में
जहाँ समाप्त होती है ऑप्टिक नर्व्स की भूमिका
वहाँ दृष्टि की भूमिका शुरू होती है
ज्ञान की उष्मा में छँटती जाती है असमंजस की धुन्ध
यहाँ मस्तिष्क प्रारम्भ करता है
दृश्य में दिखाई देते विचार का विश्लेषण

यही से शुरू होती है
मुक्तिबोध की कविता अन्धेरे में ।

                        --  शरद कोकास
 
 


(चित्र गूगल से साभार )



  






  

सोमवार, 15 मार्च 2010

कौन थे जो मर गये पिछली सर्दियों में

पिछली पोस्ट से इतना ज़रूर याद रखें - सूर्य से निकला हुआ प्रकाश 8 मिनट में हम तक पहुंचता है । यह ऐसे होता है कि प्रकाश एक सेकंड में 3 लाख कि.मी. दूरी तय करता है, एक मिनट में (300000x60)कि.मी.,एक घंटे में (300000x60x60)कि.मी.,एक दिन में (300000x60x60x24)कि.मी.,तथा एक वर्ष में (300000x60x60x24x365) कि.मी. अर्थात 10लाख करोड़ कि.मी. यह दूरी एक प्रकाशवर्ष कहलाती है । इस तरह सूर्य हमसे 8 प्रकाश मिनट अर्थात(300000x60x8)=14.4 या लगभग 15 करोड़ कि.मी. दूर हुआ । और अब आगे...मस्तिष्क की सत्ता - सात 

                                  बृह्मांड में हमारी औकात क्या है

          रोजमर्रा की ज़िंदगी में हमारे धैर्य की रोज़ परीक्षा होती है । जब हमे पता चलता है कि किसी ने हमारी किसी बात को लेकर विपरीत टिप्पणी की है तो हम अपना आपा खो बैठते  हैं और गुस्से में कहते हैं “ आखिर उसकी औकात ही क्या है बड़ा आया हमे ज्ञान देने वाला “ ( मुझे पता है कुछ लोग मेरे बारे में भी यही सोच रहे होंगे ) लेकिन सच्चाई यह है कि इस दुनिया में हम अपनी ही औकात नहीं जानते ।जानते भी हैं तो सिर्फ अपने घर में या ज़्यादा से ज़्यादा पड़ोस में ।यह कहावत यूँही नहीं बनी है कि “अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है । “
खैर हम कुत्ते हों या शेर रहेंगे तो जानवर के जानवर ही ना । बेहतर है हम मनुष्य की तरह इस बारे में सोचें कि इस ब्रह्मांड में हमारी क्या औकात हो सकती है । आप कहेंगे ,यह तो हमने कभी सोचा ही नहीं । चलिये पहले देखें कि यह बृह्मांड क्या बला है । यह तो आप जानते ही हैं कि हमारी पृथ्वी,अन्य ग्रहों व सूर्य को मिलाकर एक सौरमंडल बनता है । ऐसे अनेक सौरमंडलों से बनती है आकाशगंगा और ऐसी अनेक आकाशगंगाओं से मिलकर बनता है बृह्मांड । इतने विशाल बृह्मांड के बारे में जानने के लिये एक जीवन बहुत छोटा है । लेकिन हमें यह एक जीवन ही मिला है और अगला जन्म होना नहीं है ,इसलिये थोड़ा बहुत तो हमें इसी जीवन में इस बारे में जानना ही चाहिये ।
यह तय करने के लिये कि इस बृह्मांड में हम कहाँ हैं चलिये एक छोटा सा गणित और हल करते हैं ।( फिर एक गणित ?? ) मान लीजिये हमारी पृथ्वी की आबादी लगभग छह सौ करोड़  है ,इस तरह   हम हमारी पृथ्वी के 600 करोड़वें हिस्से हैं । हमारा सौर परिवार हमारी आकाशगंगा का 64 करोड़वाँ हिस्सा है तथा हमारी पृथ्वी हमारी आकाशगंगा का 25 हज़ार करोड़वाँ हिस्सा है । अब बताइये इस आकाशगंगा में हम कहाँ हुए ? फिर ऐसी करोड़ों आकाशगंगाएं बृह्मांड में हैं तो हम बृह्मांड में कहाँ हुए ? गणना छोड़िये , यह सोचिये कि जब हम बृह्मांड में इतने नगण्य हैं तो मामूली कुत्ते,बिल्ली,चीटीं और मच्छरकी क्या स्थिति होगी ? उनसे भी छोटे हैं कीटाणु जो आकार में मिलीमीटर के हज़ारवें भाग तक होते हैं जो केवल माईक्रोस्कोप से देखे जा सकते हैं और जिन्हे माईक्रोमीटर में नापते हैं। इनसे भी छोटे होते हैं अणु । अणु के विभिन्न हिस्से हैं परमाणु जो पदार्थ का सूक्ष्मतम भाग है। समस्त बृह्मांड इन्ही अणुओं से बना है। परमाणु को इलेक्ट्रोन ,प्रोटान व न्यूट्रान में विभाजित कर सकते हैं । ये मूलभूत कण हैं , इलेक्ट्रोन इनमें सबसे छोटा कण है । यह वैज्ञानिक जानकारी है जिसे आपने किताबों में भी पढ़ा होगा ।
ज़्यादा विस्तार में न जायें ,मूल प्रश्न यह है कि बृह्मांड में जब हमारी स्थिति इतनी नगण्य है तब अपनी स्थिति जानने के पश्चात भी हमारे में मन में अहंकार क्यों आता है ? अपनी क्षुद्रता को जानकर भी हम जाति ,धर्म ,नस्ल ,भाषा, क्षेत्र ,राज्य ,सम्पन्नता के नाम पर क्यों लड़ते हैं ? एक दूसरे के खून के प्यासे क्यों रहते हैं ? क्या यह हमारा अहंकार नहीं है जो हमे नई जानकारी प्राप्त करने,नई बातें सीखने से रोकता है , हम अपने आप को सर्वज्ञ समझने लगते हैं , हम सिर्फ अपनी कहना चाहते हैं और किसीकी कुछ नहीं सुनना चाहते । हम अपने विचार को ही अंतिम मानते हैं । हम अपना लिखा पत्थर की लकीर समझते हैं । हम अपने आगे हर किसी को तुच्छ समझते हैं । सोचकर देखिये यदि हमारे पूर्वज भी ऐसे ही अहंकारी होते तो क्या आज विज्ञान इतनी प्रगति कर पाता ? अगर हम यह मान लेते  कि हमें सब कुछ आता है और हम सबसे बड़े ज्ञानी हैं तो आज भी उसी तरह पेड़ की छाल लपेटे घूमते रहते और जानवरों का शिकार करते रहते । न विज्ञान की कोई बात अंतिम है न धर्म की ,इसलिये सबसे पहले अपने मन से इस अहंकार को निकाल फेंकिये कि आपस में  लड़- झगड़कर हम कुछ बड़ा काम कर जायेंगे । लड़ना ही है तो आततायियों से लड़िये ..भूख ग़रीबी बेरोजगारी और मनुष्य द्वारा पैदा की गई समस्याओं से लड़िये ।
खैर ..जबसे पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म हुआ है ,यह सब चल ही रहा है ..जाने कितने लोग इस पृथ्वी पर आये और चले गये किसको याद है ,वे कौन थे ? हम से ही कोई पूछे कि हमारे पिता के पिता के पिता के पिता कौन थे , क्या हमे याद है उनका नाम ? हमें भी कौन याद रखेगा ?और कितने साल याद रखेगा ? बृह्माण्ड की कथा यहीं समाप्त की जाये ..अगली बार बातें करेंगें इस पृथ्वी की ।
एक निवेदन - मेरा यह लिखने का उद्देश्य भी किसी की ओर इंगित करना नहीं है । मैं एक तुच्छ् प्राणि किसी को क्या कह सकता हूँ । इसलिये कृपया विषय से सम्बन्धित टिप्पणी ही करें जिसमे किसी व्यक्ति विशेष की ओर संकेत न हो


और अब उपसर्ग में कवि संजय चतुर्वेदी की यह छोटी लेकिन गम्भीर कविता उनके कविता संग्रह "प्रकाशवर्ष " (आधार प्रकाशन पंचकूला से वर्ष 1993 में प्रकाशित ) से साभार -डॉ.संजय चतुर्वेदी किंग जॉर्जेज़ मेडिकल कॉलेज (अब छत्रपति शाहू जी मे.कॉ.)लखनऊ से एम.डी. हैं ।
             जो मर गये पिछली सर्दियों में
लोग भूल जाते हैं 
कौन लोग थे 
जो उन्हे इतिहास से निकालकर लाये 
उन्हे खींचते रहे 
उनकी गर्म रज़ाइयों से बाहर 
लकड़ियाँ इकठ्ठा करते रहे 
कहीं मौसम ज़्यादा खराब न हो जाये 
उनके सहमे हुए घरों में आवाज़ बनकर रहे 

लोग भूल जाते हैं वसंत आते ही 
कौन थे जो मर गये पिछली सर्दियों में ।

सस्नेह आपका - शरद कोकास  
( चित्र गूगल से साभार )