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शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

विचार आते हैं लिखते समय नहीं - मस्तिष्क की कार्यप्रणाली

                                          मस्तिष्क की कार्यप्रणाली -7  

 प्लानिंग काम्प्लेक्स : मस्तिष्क की कार्य प्रणाली का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है योजना बनाना । विचारों का उन्नयन भी यहीं से होता है । वैचारिक क्षमता यहाँ विद्यमान रहती है । हमें ज्ञात है कि हमारा भोजन करने का समय नौ बजे है फलस्वरूप हम आठ बजे से ही भोजन पकाने की योजना बनाने लगते हैं । यदि हमने कुछ लोगों को खाने पर बुलाया है तो एक दिन पूर्व ही हम उसकी योजना बना लेते हैं । योजना बना कर कार्य करने से सुविधा रहती है और समय पर व्यर्थ की भाग दौड़ से हम बच जाते हैं । जीवन के अनेक महत्वपूर्ण कार्य शादी ब्याह , जन्मोत्सव आदि हम योजना बनाकर ही करते हैं । संतान की उत्पत्ति का कार्य भी आजकल योजना बनाकर ही किया जाता है ।
                 इसी प्रकार तर्क क्षमता भी मस्तिष्क के इसी हिस्से में मौजूद रहती है । जैसे मैं आप से कहूँ कि वहाँ धुआँ है तो तुरंत आपके मस्तिष्क में यह विचार जन्म लेगा कि फिर वहाँ आग भी होगी । यद्यपि विज्ञान के ऐसे अनेक प्रयोग हैं जहाँ धुएँ के लिये आग की ज़रूरत नहीं है । जिस प्रकार यहाँ से तर्क किये जाते हैं उसी प्रकार कुतर्क भी किये जाते हैं । कुतर्क का अर्थ यह होता है जिसका कोई प्रमाण नहीं होता । जैसे कि हम कहें गोरे आदमी की हड्डियाँ बनिस्बत काले के ज़्यादा सफेद होती होंगी ।
             विचार करना यह मस्तिष्क का महत्वपूर्ण कार्य है ।  हम कुछ भी काम  कर रहे हों सोच विचार करते रहते हैं । मस्तिष्क की यह विचार प्रणाली ही है जिसकी वज़ह से सब कुछ सम्भव होता है । मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता है “ विचार आते है लिखते समय नहीं / पीठ पर बोझा ढोते हुए / कपडे पछींटते हुए “ हाँलाकि लिखते समय भी विचार तो आते ही हैं ,कुछ लोगों के साथ ऐसा नहीं होता फलस्वरूप वे बिना विचार के ही लिखते हैं । विचार आपको कहीं भी आ सकते हैं । अगर आप दफ्तर में हैं या किसी फंक्शन में हैं और बैठे बैठे ऊब रहे हैं तो मस्तिष्क की इसी जगह से विचार करते हैं कि घर कब जायेगें । इस तरह वैचारिक क्षमता यहाँ विद्यमान होती है  ।

उपसर्ग में प्रस्तुत है मुक्तिबोध की कविता - विचार आते हैं 

विचार आते हैं - 
लिखते समय नहीं 
बोझ ढोते वक़्त पीठ पर 
सिर पर उठाते समय भार 
परिश्रम करते समय

चांद उगता है व 
पानी में झलमिलाने लगता है 
ह्रदय के पानी में 

विचार आते हैं 
लिखते समय नहीं 
पत्थर ढोते वक़्त 
पीठ पर उठाते वक़्त बोझ 
साँप मारते समय पिछवाड़े 
बच्चों की नेकर फचीटते वक़्त !! 

पत्थर पहाड़ बन जाते हैं 
नक़्शे बनते हैं भौगोलिक 
पीठ कच्छप बन जाते हैं 
समय पृथ्वी बन जाता है ... 

रविवार, 21 नवंबर 2010

पत्नी को आदेश मस्तिष्क का यह भाग देता है

6 आज्ञा केन्द्र (Morter Area ) एक तरह से यह मस्तिष्क का प्रधान मंत्री कार्यालय है । लगभग सारे विभाग इसी कार्यालय के अंतर्गत आते हैं । योजना विभाग भी इसी मंत्रालय के  अधीन है । सभी शारीरिक हरकतों की योजनाएँ यहाँ बनती है । उदाहरणार्थ आप कम्प्यूटर पर काम कर रहे हैं । इतने में एक गुस्ताख मच्छर आपकी बाईं बाँह पर बैठता है और अपनी सूँड चुभोने लगता है । क्षण मात्र में रगों में बहते रक्त के माध्यम से यह सूचना आपके मस्तिष्क के सोमेटोसेंसरी एरिया में पहुँच जाती है और वहाँ से उससे भी कम समय में आज्ञा केन्द्र अर्थात प्रधानमंत्री कार्यालय में । वहाँ इस सूचना पर त्वरित कार्यवाही होती है और आपके शरीर की पुलिस फोर्स अर्थात हाथों के लिये आदेश ज़ारी होता है कि इसे भगाओ  । हाथों की मसल्स तुरंत एक्शन में आ जाती हैं दाया हाथ तुरंत उठता है और बायें हाथ तक पहुँच जाता है  और पटाक से मच्छर का मर्डर हो जाता है । हाँ यदि आपके मस्तिष्क में अहिंसा की प्रोग्रामिंग है और आप मच्छर ही क्या बेक्टेरिया और वाइरस की हत्या के भी खिलाफ हैं तो आप उसे केवल भगाकर ही संतुष्ट हो जाते हैं । इसके बाद आपके हाथ पुन: पूर्व में आदेशित कार्य सम्पन्न करने में लग जाते हैं ।
मच्छर के अलावा अन्य जीवों की हत्या में भी यही प्रक्रिया होती है । मच्छर बेचारे की गलती तो यह थी कि उसने आप को काटा हाँलाकि यह उसने अपनी भूख मिटाने के लिये किया लेकिन हम बिना किसी अपराध के साँप ,मूक पशु और मनुष्यों तक की हत्या कर डालते हैं ।
तात्पर्य यह कि मस्तिष्क़ के इस विभाग से सारे आदेश प्रसारित होते हैं जैसे आपको प्यास लगी हो और गला सूख रहा हो तो गले से रिक्वीज़ीशन मस्तिष्क तक जाती है , वहाँ पर यह तय किया जाता है कि पिछली बार जब प्यास लगी थी तो क्या किया गया था । बचपन में माँ द्वारा पानी पिलाने से लेकर खुद पानी पीने तक की स्मृतियाँ क्षण मात्र में दोहराई जाती हैं । वहाँ से यह फाइल आदेश विभाग में जाती है , जहाँ से आदेश होता है पानी पियो ,पाँवों को आदेश दिया जाता है फलस्वरूप हम उठते हैं और पानी के टैप तक या मटके या फ्रिज तक  जाते हैं । हाथों को आदेश दिया जाता है , बॉटल निकालो या  गिलास उठाओ और उसमें पानी लेकर मुँह तक ले जाओ , इस तरह हम कुछ क्षणों में ही पानी पी लेते हैं और अपनी प्यास बुझाते हैं  । लेकिन कुछ लोग कुर्सी पर बैठे बैठे पत्नी को ज़ुबानी आदेश देते है “ हमरे लिये पानी लाओ । " पत्नी के शरीर की श्रवण प्रणाली द्वारा यह आदेश उसके मस्तिष्क़ तक पहुँचता है और फिर उसके द्वारा पति को पानी पिलाये जाने की क्रिया हेतु नविन आदेश उसके मस्तिष्क द्वारा जारी होता है ।   इस तरह पत्नी को ऑर्डर देने का यह काम भी इसी मस्तिष्क से होता है यानि पहला ऑर्डर यथावत रहते हुए ज़ुबान के लिये दूसरा ऑर्डर जारी हो जाता है ।
इसी तरह बहुत देर बैठे रहने पर पैर अकड़ जाता है तो मस्तिष्क के इसी विभाग से पैर की मसल्स के लिये आदेश ज़ारी होता है “ कुछ हिलो डुलो भई “। हमारे समस्त बाह्य अंगों को मस्तिष्क के इसी केन्द्र से आदेश प्राप्त होते हैं । बावज़ूद इसके शरीर के भीतर की अनेक क्रियाएँ होती हैं जो बिना मस्तिष्क के आदेश के सम्पन्न होती हैं जैसे की दिल का धड़कना । ( चित्र गूगल से साभार ) 
उपसर्ग में प्रस्तुत है  
राधिका अर्जुन द्वारा बनाया गया 
शमशेर बहादुर सिंह की कविता पर 
यह यह कविता   पोस्टर ।

इसे पढ़ते हुए मेरे मन में प्रश्न आया कि किसीसे प्रेम करने के लिये भी हमारा मस्तिष्क हमें कोई आदेश देता है क्या, जिसके फलस्वरूप  हम अगले व्यक्ति से  कहते हैं .. मुझे प्रेम करो ..
क्या कहते हैं आप ? 


सोमवार, 15 नवंबर 2010

गर गले नहीं मिल सकता तो हाथ भी न मिला


             मस्तिष्क की कार्यप्रणाली

सोमेटोसेंसरी एरिया : मस्तिष्क का यह इंद्रीय संवेदों का केन्द्र है  । इस केन्द्र की कार्यप्रणाली को स्पष्ट करने के लिए मै आपको याद दिलाना चाहता हूँ एक मशहूर फ़िल्मी गीत की जो पिछले दिनों बहुत लोकप्रिय रहा है । यह एक आईटम सॉंग है .. बंगले के पीछे तेरी बेरी के नीचे  हाय रे काँटा लगा ..। इस मधुर गीत के रीमिक्स के दृश्य को कृपया याद न करें मैं केवल उस चुभन की ओर आपका ध्यान आकर्षित करवाना चाहता हूँ जो काँटा लगने पर होती है । हो सकता है काँटा चुभने का अनुभव आपको न हो लेकिन सुई या कोई नुकीली वस्तु चुभने का तो होगा ही । इस चुभन को हम मस्तिष्क के इसी केन्द्र द्वारा महसूस करते हैं ।
हमारे शरीर की त्वचा अत्यंत संवेदनशील होती है । इस बात का पता इससे भी चलता है कि कुछ लोग बैठे बैठे यहाँ वहाँ खुजाते रहते हैं । मस्तिष्क के इस केन्द्र तक शरीर के उस भाग से सूचना आती है और हाथ मस्तिष्क की आज्ञानुसार अपना काम करने कगता है । इस कार्यप्रणाली के कारण  जैसे ही हम कोई गरम या ठंडी चीज़ पकड़ते हैं या हमें मच्छर या कोई कीट काटता है तो हमे तुरंत पता चल  जाता  है । कोई हमें स्पर्श करता है तो हमें पता चल जाता है । यह बात अलग है कि कुछ स्पर्श सुखद होते हैं और कुछ दुखद । हाथ मिलाते हुए किसका हाथ कड़ा है और किसका हाथ नर्म है यह हमें यहीं से ज्ञात होता है । इसी तरह गले मिलने का सुख भी यहीं से मिलता है यह अलग बात है कि कोई गले मिलने के लिये गले मिलता है तो कोई गला काटने के लिये । अपने प्रिय से गले मिल कर हमें प्रसन्नता महसूस होती है । लेकिन कई लोग दिखावे के लिये भी गले मिलते हैं । ऐसे ही लोगों के लिये शायर जनाब बशीर बद्र ने लिखा है
      “ मोहब्बत  में  दिखावे  की  दोस्ती      मिला
       गर गले नहीं मिल सकता तो हाथ भी न मिला ।“
तो जनाब यह काँटा लगने ,मच्छर काटने, गले मिलने ,दर्द और खुजली आदि की अनुभूति हम मस्तिष्क के इसी इन्द्रीय संवेदों के केन्द्र से महसूस करते हैं । गाल पर ममत्व के दुलार का स्पर्श भी हम यहीं से महसूस करते है और गाल पर चाँटे का दुख भी यहीं से महसूस करते हैं । बचपन में यदि आपको मार पड़ी होगी तो उसे याद कीजिये , उस का दर्द आपने मस्तिष्क की इसी कार्यप्रणाली की वज़ह से महसूस किया था । 
यह भी एक अच्छी बात है कि हर अनुभूति संवेदना के स्तर पर हमारे मस्तिष्क में दर्ज हो जाती है । हम काँटे की चुभन जानते हैं इसलिये कंटक विहीन मार्ग से चलना चाहते हैं और दूसरों के लिए भी कामना करते हैं कि उनके मार्ग में कोई काँटा न आये ।  हम गर्म वस्तु या आग से जलने का कष्ट जानते हैं इसलिये आग से बचना चाहते हैं । उसी तरह हम स्पर्श या दुलार का सुख भी जानते हैं इसलिये बार बार उसे पाना चाहते हैं । 
( चित्र गूगल से साभार ) 

सोमवार, 20 सितंबर 2010

मस्तिष्क की सत्ता - मस्तिष्क की गुलामी से मुक्त होने के लिए पहले मस्तिष्क को जानें

                                           यह मस्तिष्क कैसे काम करता है

      
हमारे शरीर में विभिन्न अंग हैं । हम दिन भर में कितनी बार उन अंगों का उपयोग करते हैं ,लेकिन क्या हम कभी सोचते हैं कि यह अंग किस तरह काम करते हैं ? यह कतई ज़रूरी नहीं है कि हाथ का उपयोग करने से पहले हम सोचे कि हाथ कैसे काम करता है ,या हमारे पाँव हमारे शरीर का भार किस तरह उठाते हैं । न दाँतों के बारे में सोचना ज़रूरी है कि वे अन्न किस तरह चबाते हैं और न आँखों के बारे में कि वे किस तरह देखती हैं । जब बाहरी अंगों के बारे में यह अनावश्यक है तो फिर भीतरी अंगों की कार्यप्रणाली के बारे में तो जानना तो बिलकुल भी आवश्यक नहीं है  । लेकिन यदि हम केवल मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के बारे मे ही जान लें तो समझ लीजिये कि आप आधे से अधिक तो जान ही गए क्योंकि बहुत सारे अंग तो इस मस्तिष्क से ही संचालित होते हैं । फिर मस्तिष्क की इस गुलामी से मुक्त होने के लिये भी हमें सबसे पहले जानना होगा कि मस्तिष्क कैसे काम करता है । विश्वास हो या अंधविश्वास यह हमारे मस्तिष्क में किस तरह घर करते हैं यह जानने के लिए भी हमें मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को जानना होगा । बेहतर होगा किसी बर्तन को खाली करने से पहले ,उसे भरा कैसे गया यह बात हम जान लें । लेकिन इस बात का आप बिलकुल टेंशन ना लें ,मैं आपको मेडिकल साईंस नहीं पढ़ाने जा रहा हूँ । मैं अत्यंत सरल भाषा में यह बताना चाहता हूँ कि हमारे दिन-प्रतिदिन के काम इस मस्तिष्क के द्वारा कैसे सम्पन्न किये जाते हैं । चलिए हम अपनी सुविधा के लिये सबसे पहले मस्तिष्क को कुछ भागों में विभाजित कर देते हैं ।     
           
मस्तिष्क के क्रियाकलाप: हम किस तरह देखते हैं         यह मस्तिष्क का एक रफ डायग्राम है जिसे मैने सरलता पूर्वक समझने के लिये बनाया है । कृपया इस आकृति का चिकित्सकीय मापदंडों के अनुसार विश्लेषण न करें । इसे हम एक चौकोर बॉक्स की तरह भी देख सकते हैं और कई कमरों वाले एक दफ़्तर की तरह भी । सबसे पहले हम पहले भाग पर नज़र डालते हैं यह है हमारा दृष्टि केन्द्र ,यह वह केन्द्र है जिसकी वज़ह से हम देख पाते हैं ।
1 देखना  : एक कक्षा में मैने सवाल किया हमें देखने के लिये क्या ज़रुरी है ? उत्तर मिला आँखें , किसी ने कहा दिमाग , किसीने और बढ़ कर कहा दृष्टि । एक छात्र ने और बढ़ा-चढ़ा कर कहा मन की आँखें । अंत में विज्ञान के एक छात्र ने सही उत्तर दिया देखने के लिये सबसे ज़्यादा ज़रूरी है प्रकाश । यह हम सभी जानते ही हैं कि प्रकाश के अभाव में आँखें होने के बावज़ूद भी हम नहीं देख पाते हैं । आपको यह भी पता होगा कि  यह कैसे होता है अगर आप जानते होंगे टी.वी पर चित्र कैसे आता है । हमारे दृष्टि केन्द्र में छवि निर्माण होने की भी ऐसी ही प्रक्रिया है । हमारी आँख में भी कैमरे की तरह ही एक लेंस होता है । किसी भी वस्तु पर जब रोशनी डाली जाती है वह रोशनी वस्तु से परावर्तित होकर नेत्र पटल पर पड़ती है , वहाँ से जैव रासायनिक  विद्युत संवेग द्वारा मस्तिष्क के इस केन्द्र में आती है और इस तरह हम उसे देख पाते हैं । अभी मैं केवल देखने की बात ही कर रहा हूँ उस वस्तु या दृश्य को हम किस तरह पहचान पाते हैं वह आगे की बात है । देखने और पहचानने के बाद ही समझने की बारी आती है । इसीलिये कहा जाता है कि देखा हुआ हमेशा सच नहीं होता ।



उपसर्ग : उपसर्ग में मैं अब तक  महत्वपूर्ण कवियों की कवितायें देता रहा हूँ । इस विषय पर काम करते हुए मस्तिष्क के क्रियाकलाप पर बारह कविताएँ मैंने लिखीं । उनमे से एक कविता मस्तिष्क के क्रियाकलाप - देखने पर यह कविता । एक नये विषय पर लिखी इस कविता श्रंखला पर आपकी राय जानना चाहूँगा - शरद कोकास 





मस्तिष्क के क्रियाकलाप – एक – दृष्टि 



एक बच्चे सा विस्मय था जब मनुष्य  की आँखों में
रात और दिन के साथ वह खेलता था आँख मिचौली
समय की प्रयोग शाला में सब कुछ अपने आप घट रहा था

देखने के लिये सिर्फ आँख का होना काफी था
और प्रकाश छिपा था अज्ञान के काले पर्दे में
पृथ्वी से अनेक प्रकाश वर्षों की दूरी के बावज़ूद
सूर्य लगातार भेज रहा था अपनी शुभाशंसाएँ

अब जबकि ऐसा घोषित किया जा रहा है
कि ज्ञान पर पड़े सारे पर्दे खींच दिये गये हैं
और चकाचौन्ध से भर गई है सारी दुनिया
समझ के पत्थर पर लिख दी गई हैं इबारतें
आँख प्रकाश और दिमाग़ के महत्व की
जैसे कि धुप्प अन्धेरे में हाथ को हाथ नहीं सूझता
अन्धेरे में बस दिखाई देता है अन्धेरा
कोई फर्क नहीं पड़ता आँखें खुली या बन्द होने से
यह मस्तिष्क ही है जो अन्धेरे से बाहर सोच पाता है

दृश्य और आँखों के बीच प्रकाश के रिश्तों में
अन्धेरे से बाहर झाँकता है विस्मय से भरा संसार
दृश्य के समुद्र में तैरता है वर्तमान

यह दृष्य में रोशनी की भूमिका है
जो अदृष्य है विचारों के दर्शन में
यहाँ रोशनी का आशय भौतिक होने में नहीं है

अन्धेरे में भटकते बेशुमार विचारों की भीड़ में
दृष्टि तलाश लेती है अक्सर कोई चमकता हुआ विचार

मानव मस्तिष्क के विशाल कार्यक्षेत्र में
जहाँ समाप्त होती है ऑप्टिक नर्व्स की भूमिका
वहाँ दृष्टि की भूमिका शुरू होती है
ज्ञान की उष्मा में छँटती जाती है असमंजस की धुन्ध
यहाँ मस्तिष्क प्रारम्भ करता है
दृश्य में दिखाई देते विचार का विश्लेषण

यही से शुरू होती है
मुक्तिबोध की कविता अन्धेरे में ।

                        --  शरद कोकास
 
 


(चित्र गूगल से साभार )



  






  

बुधवार, 14 जुलाई 2010

कहाँ से आया था वो......

अब तक बहुत सारे विषयों पर हम लोग बात चीत कर चुके हैं । यह बृह्मांड कैसे बना , सूर्य चाँद सितरे ,पृथ्वी कैसे बने , पृथ्वी पर जीवन कैसे आया । सजीव और निर्जीव में क्या फर्क़ होता है , सजीवों के क्या लक्षण होते हैं आदि आदि । अब देखते हैं कि इस पृथ्वी पर मानव का आगमन कहाँ से हुआ और कैसे हुआ ? 
                                     पृथ्वी पर मानव कैसे आया ?
          पृथ्वी पर जीवन के आगमन के पश्चात अब मानव के आगमन का समय हो चुका था । यह 3.5 अरब वर्ष पूर्व की बात है जब पृथ्वी का तापमान 840 सेंटीग्रेड था । पृथ्वी के निर्माण के पश्चात  मानव शरीर की बनावट के लिये जो आवश्यक तत्व थे वे पृथ्वी पर  स्थित  जल में बनना  शुरु हुए । ओजोन की परत के अभाव में अल्ट्रावायलेट , इनफ्रारेड किरणे सीधे पानी में गिरना शुरु हुई । । इन घटक पदार्थों के मेलजोल से सजीव अमीबा जैसी कोशिका तैयार हुई । लगभग 3 करोड़ वर्ष पूर्व यहाँ दलदल था । उथले जल में रसायनों से मिलकर पहली सजीव कोशिका बनी इनमें जल कीट थे, घोंघे थे, रेंगनें वाले जीव थे, जिससे आगे चलकर सस्तन प्राणियों की उत्पत्ति हुई और मनुष्य बना । इस तरह हमनें मछलियों से साँस लेना सीखा । हमारे यहाँ यह मान्यता है कि मनुष्य का शरीर पंचतत्वों का बना है । मरने के बाद इसे मिट्टी कहते हैं ।
मुर्गी पहले आई या अंडा  - यह एक सनातन सवाल है जो अक्सर पूछा जाता है और उत्तर देने वाला हमेशा चकरा जाता है । लेकिन इसमें परेशान होने की ज़रूरत नहीं है । इतना पढ़ने के बाद यह तो आप जान ही गये होंगे कि ना मुर्गी पहले आई ना अंडा । जीवन के क्रमिक विकास के तहत ही इनका उद्भव हुआ । सारे सजीव इसी तरह बने हैं । 
              चलिये फिर से इंसान की बात पर आ जाते हैं  । इंसान का जन्म भी इसी तरह जीवों के क्रमिक विकास के अंतर्गत हुआ है ।  आदि मानव के उदविकास के विभिन्न चरणों तथा उनकी निरपेक्ष तिथियों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि 40 लाख वर्ष पूर्व के मानव को आस्ट्रेलोपिथेकस कहा जाता था । यह मनुष्य पत्थरों का उपयोग करता था तत्पश्चात पिथिकेंथोप्रस मानव 20 लाख वर्ष पूर्व हुआ यह मानव दो पैरों पर चलना जानता था । नियेंडरथल मानव 2 लाख वर्ष पूर्व हुआ था तथा हमारे जैसे आधुनिक मानव की उत्पत्ति मात्र 40000 वर्ष पूर्व हुई है । यह समस्त क्रियाएँ विभिन्न चरणों में सम्पन्न हुई हैं इसलिये हम यह कह सकते हैं कि वह पहला मनुष्य आज के मनुष्य जैसा कतई नहीं दिखता था । उसके पास वह सब चीज़ें होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता जो आज हमारे पास हैं ।इसलिये उस मनुष्य से आज के मनुष्य की तुलना भी बेमानी है । हम क्या थे और आज क्या हो गये हैं जैसे ज़ुमले भी बेकार हैं । समय के अनुसार हर जीव में परिवर्तन होता रहता है । कौन कह सकता है कि आज से 10-20 हज़ार साल बाद का मनुष्य ऐसा ही दिखाई देगा ? उसके पास यह सब वस्तुएँ भी नहीं रहेंगी जो आज हमारे पास हैं । 
            चलिये अपना दिमाग़ लगाइये . और क्या क्या हो सकता है इतने हज़ार साल बाद ... इसलिये कि अगला लेख मैं दिमाग़ के बारे में ही लिखने वाला हूँ ।
उपसर्ग में  बाबा नागार्जुन की यह कविता ...इसका सन्दर्भ तो आप समझ ही सकते हैं ..
                              बाकी बच गया अंडा 
पाँच पूत भारत माता के , दुश्मन था खूँखार 
गोली खाकर एक मर गया बाक़ी रह गये चार 
चार पूत भारत माता के , चारों चतुर प्रवीन 
देश-निकाला मिला एक को , बाक़ी रह गये तीन 
तीन पूत भारत माता के , लड़ने लग गये वो
अलग हो गया उधर एक ,अब बाकी बच गये दो
दो बेटे भारत माता के , छोड़ पुरानी टेक 
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक
एक पूत भारत माता का . कन्धे पर है झंडा
पुलिस पकड़ के जेल ले गई, बाक़ी बच गया अंडा । 
  
छवि गूगल से साभार

बुधवार, 16 जून 2010

तरह तरह से आ रही है मृत्यु…


                                           सजीवों के अन्य लक्षण
          सजीवों के शरीर के निर्माण में जीवद्रव्य की भूमिका और सजीवों के एक निश्चित शारीरिक संगठन के बारे में जानने के पश्चात आप सजीवों के अन्य लक्षणों के बारे में भी जानना चाहेंगे । लीजिये प्रस्तुत हैं सजीवों के अन्य लक्षण ।
उपापचय : अपनी जैविक क्रियाओं के लिये सजीवों को उर्जा की आवश्यकता होती है । यह उर्जा कोशिकाओं में उपस्थित ग्लूकोज ,वसा अथवा प्रोटीन के आक्सीकरण से मिलती है । सजीवों की कोशिकाओं में होने वाली रासायनिक क्रिया उपापचय कहलाती है ।
पोषण : शरीर की वृध्दि , सुधार व उर्जा के लिये सजीवों को पोषण की आवश्यकता होती है । पोषक पदार्थ अवशोषित होकर कोशिकाओं में पहुंचते है । पोषण का विरुद्धार्थी शब्द होता है कुपोषण जिसका अर्थ आप भलिभाँति समझते हैं । पोषण आहार के नाम पर ग़रीब बच्चों को शाला में भोजन भी दिया जाता है इसलिये कि अधिकांश लोगों के बस में नहीं होता कि उन्हे आवश्यक मात्रा में पोषक आहार मिल सके । 
श्वसन : सजीव ऑक्सीजन लेते है तथा कार्बन डाय आक्साइड निकालते हैं ।हम मुँह से साँस लें या नाक से या और कहीं से भी , श्वसन क्रिया कोशिकाओं में ही सम्पन्न होती है ।
उत्सर्जन : कोशिकाओ में उपापचय के कारण जो अनुपयोगी व हानिकारक पदार्थ शेष रहते है या बनते हैं उन्हे बाहर निकालना उत्सर्जन  कहलाता है । अब उत्सर्जन हम कहाँ कहाँ से करते हैं यह आप बखूबी जानते हैं जैसे त्वचा से पसीना निकलना भी एक प्रकार का उत्सर्जन है।
वृध्दि : सभी सजीवों में वृध्दि होती है । उपापचय से जीव द्रव्य में वृध्दि होती है जीव द्रव्य से कोशिकाओं में वृध्दि होती है । एक सीमा के बाद यह कोशिकाएँ विभाजित हो जाती है तथा उसी अनुपात में ऊतक अंग व शरीर बढ़ता जाता हैं । परंतु सजीवों में यह वृध्दि आजीवन नहीं होती । जैसे कि शिशु एक सीमा तक बढ़ता है और सम्पूर्ण विकास के बाद उसका बढ़ना रुक जाता है । यह आपने  नहीं सुना होगा कि किसी बच्चे का बढ़ना रुक ही नहीं रहा ।

एक महानगर में दो मित्र बहुत दिनों बाद मिले । एक ने दूसरे से पूछा बच्चा कितना बड़ा हो गया है ? पहले ने दोनो हाथ ज़मीन के समानांतर फैलाये और कहा इतना बड़ा । दूसरे मित्र ने कहा “ यार सब लोग ज़मीन से ऊपर हाथ उठाकर बच्चे की लम्बाई बताते हैं तुम हाथ फैलाकर बता रहे हो ...। पहले मित्र ने कहा “ क्या बताऊँ जब मैं काम पर जाता हूँ वह सोता रहता है और जब लौटकर आता हूँ तब भी सोता रहता है ..सो उसकी लम्बाई मैं ऐसे ही बताऊँगा ना ?
 
गति व चलना : सभी सजीवों की गति होती है । कुछ में यह गति अंगों के व शरीर के हिलने डुलने तक सीमित रहती है जैसे पेड़ पौधों  में । मनुष्यों व पशु पक्षियों में यह गति चलने ,उड़ने में परिवर्तित हो जाती है ।मनुष्य के पास यदि पंख होते तो वह भी उड़ता लेकिन तब यह गीत नहीं बनता ..पंख होते तो उड़ आती रे.। हाँलाकि मनुष्य ने इसी इच्छा के चलते अपने मस्तिष्क का उपयोग करके एरोप्लेन का आविष्कार किया और उड़ने लगा ।  
प्रजनन : सजीव में अपने समान संतान उत्पन्न करने की क्षमता होती है । मानव की संतान मानव ही होती है । यद्यपि कुछ मानव अपनी संतान को गधा कहकर सम्बोधित करते हैं लेकिन यह उनका नीजि मामला है। निर्जीवों में प्रजनन क्षमता नही होती ,यह आपने नहीं सुना होगा कि एक मेज़ के पास दूसरी मेज़ रख दो तो कुछ दिन बाद एक बच्चा मेज़ पैदा हो जाती है ।
मृत्यु  : प्रत्येक सजीव की एक निश्चित जीवन की अवधि होती है । जो सजीव मर जाता है उसके शरीर से ‘जीवन ‘ के सभी लक्षण हमेशा के लिये समाप्त हो जाते हैं । गब्बर सिंह का मशहूर डॉयलॉग है..”जो डर गया समझो मर गया ।‘ मगर हमारे यहाँ सभी डरे हुए लोग शरीर से ज़िन्दा रहते हैं ,यह जानते हुए भी कि यह जीना भी कोई जीना है ।
                   इस प्रकार ये तमाम लक्षण सजीवों में ही होते हैं । निर्जीवों में इनमें से कोई लक्षण नहीं होता। जैसे निर्जीव तत्वों में ‘ जीव द्रव्य ‘ नहीं होता  । उनमें कोई शारीरिक संगठन नहीं होता । निर्जीवों को किसी पोषण की ज़रुरत नहीं होती । निर्जीवों में वृध्दि नहीं होती , वे प्रजनन नहीं करते । तथा निर्जीव कभी मृत नहीं होते क्योंकि उनमें ‘ जीवन ‘ नहीं होता  ।
उपसर्ग में प्रस्तुत है अग्निशेखर की यह कविता उनके संग्रह ‘ जवाहर टनल ‘ से
                                       स्मृतिलोप
तरह तरह से आ रही है मृत्यु
खत्म हो रही थीं चीज़ें
गायब हो रही थीं स्मृतियाँ
पेड़ों से झर रहे थे पत्ते
और हम धो रहे थे हाथ
मरते जा रहे थे हमारे पूर्वज
दूषित हो रही थीं भाषाएँ
हमारे संवाद
प्रतिरोध
उतर चुके थे जैसे दिमाग़ से

हम डूब रहे थे
तुच्छताओं की चमक में
उठ रहे थे विश्वास
जो ले आये थे हमें यहाँ तक

बची रही थी जिज्ञासा
निर्वासित थी संवेदनायें
नए शब्द हो रहे थे ईज़ाद
अर्थ नहीं थे उनमें
ध्वनियाँ नहीं थीं
रस,गन्ध,रूप नहीं था
स्पर्श नहीं था
उन्ही से गढ़ना था हमें
नया संसार

एक तरफ घोषित किये जा रहे थे
कई कई अंत
दूसरी तरफ
हम थे कुछ बचे हुए
ज़िद्दी और भावुक लोग
कुछ और भी थे हमारे जैसे
यहाँ वहाँ इस भूगोल पर
करते अवहेलनायें
लगातार                                                                         
 
छवि गूगल से साभार