*किसी
बच्चे से पूछकर देखिये , पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है या सूर्य पृथ्वी के चक्कर
लगाता है ?*
पता
है वह आप को क्या जवाब देगा .. किस ज़माने में जी रहे हैं अंकल..हमें सब पता है
,सूर्य कैसे निकलता है चाँद कैसे निकलता है ,पानी कैसे बरसता है,पृथ्वी कैसे घूमती
है ,भूकंप कैसे आता है , सुनामी कैसे आती है , ग्रहण कैसे लगता है , हम कैसे पैदा
होते हैं और कैसे मरते हैं आदि आदि ।
फिर
भी आप बच्चे को बताएँगे कि आसमान में एक इंद्र भगवान है जो पानी बरसाते हैं ,
ज्यूस नाम के देवता के पास बिजली का अस्त्र है जिसका नाम थंडर बोल्ट है । ( इस
जनरेशन का बच्चा हो सकता है कहे . ..किसको बना रहे हो बीडू.. यह तो बीअर का नाम है
) फिर आप उससे कहेंगे कि मृत्यु के समय एक यमराज नाम का देवता आता है वह आपके
प्राण ले जाता है तब वह ज़ोर से हँसेगा । अगर आप उससे कहेंगे कि शनि नामका देवता है
जो नाराज़ हो जाए तो आपको परीक्षा में फेल कर देगा , बच्चा तुरंत अपने मोबाइल पर
शनि ग्रह की तस्वीर बता देगा और कहेगा यह कोई देवता-वेवता नहीं है एक मामूली सा
ग्रह है और फेल या पास कराने वाला शनि महाराज नहीं है , जो पढ़ेगा वही पास होगा ।
ज़माना बहुत आगे बढ़ चुका है भैया ..। अब के बच्चे न सान्ताक्लाज़ की कहानी पर यकीन
करते हैं न राहू -केतु की ,न परी और राक्षसों की ।
आधुनिकता
के दौर में दिखाई देने वाला यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ है । प्रकृति से सम्बंधित रहस्यों
की खोज बहुत धीरे धीरे संपन्न हुई और मनुष्य समाज वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न होता
गया । उदाहरण के लिए आज से महज चार सौ साल पहले तक लोग इस बात में सब
विश्वास रखते थे कि पृथ्वी स्थिर है और सूर्य उसके इर्द-गिर्द परिक्रमा करता है । उस
समय तक का सारा धार्मिक साहित्य भी इसी अवधारणा पर आधारित है । लोग तत्संबंधी
मान्यताओं को अंतिम मानकर चुपचाप बैठे रहे
लेकिन विज्ञान ने यहाँ भी पैठ लगाई और इस
सत्य की खोज की कि सूर्य अपने स्थान पर स्थिर है और पृथ्वी उसकी परिक्रमा करती है ।
*यदि
आज आप उस पुरानी मान्यता पर विश्वास करने
के लिए किसी बच्चे से भी ऐसा कहेंगे तो वह
आपकी मूर्खता पर हंसेगा । लेकिन क्या आप जानते हैं , सिर्फ इसी एक बात को कहने के
आरोप में तत्कालीन धर्माचार्यों द्वारा वैज्ञानिक गैलेलियो को कारावास में डाल
दिया गया , ब्रूनो और कोपरनिकस को जान से मार डाला गया और जाने कितने लोगों को
प्रताड़ित किया गया । लेकिन विज्ञान ने हार नहीं मानी और इसके बाद तो अंतरिक्ष
विज्ञान में कितनी खोज हुई , कितने ही ग्रह ढूंढें गए , उनके परिक्रमा पथ ढूंढें
गए , कितने ही सितारे खोजे गए , और आज तक यह सिलसिला जारी है ।*
मुश्ताक़
नक़वी साहब ने मनुष्य के इसी आत्मविश्वास पर कहा है
*ज़िन्दगी
का निशाँ हैं हम लोग*
*ऐ
ज़मीं आसमान हैं हम लोग*
*(शरद
कोकास की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक "मस्तिष्क की सत्ता" से)*
आइये ,इस सिद्धांत के आधार पर देखें कि हमारी पृथ्वी कैसे बनी । साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व सूर्य के निकट से एक पिन्ड गुजरा ,दोनों पिन्डों में आकर्षण हुआ । सूर्य से जो तंतु निकला कालांतर में उसके ठंडे होने पर तथा द्रव्य के शीतली करण के कारण उसके छोटे छोटे पिंड बने । ये तमाम पिंड उस सूर्य की परिक्रमा करने लगे जो उनका जनक था । यह सभी पिंड ग्रह कहलाये जिनमें हमारी पृथ्वी भी एक ग्रह है और उसके भाई बहन हैं अन्य ग्रह । हमारे सबसे करीब यही ग्रह है जिस पर हम खड़े हैं लेकिन इसका हमारी कुंडली में कहीं कोई स्थान नहीं है । और वह पिन्ड जिसके आकर्षण के फलस्वरूप हमारे सौरमंडल की उत्पत्ति हुई हो सकता है अपनी संतानों के साथ बृह्मांड में कहीं विचरण कर रहा हो ।
और अब आज की कड़ी - चन्दा का और हमारा रिश्ता मामा-भांजे का है यह बात हमे बचपन में ही बता दी जाती है ।बड़े होकर हम चांद सी महबूबा वगैरह ढूंढने लगते हैं । लड़कियाँ चांद सी सूरत पाने को बेताब रहती हैं वहीं लड़के भरी जवानी में सर पर चांद निकलने से घबरा जाते हैं । जो लोग बहुत महत्वाकांक्षी होते है उनके बारे में कहा जाता है कि वह चांद को छूने की कोशिश कर रहा है ।लेखक सुरेन्द्र वर्मा ने तो एक उपन्यास ही लिख डाला है “ मुझे चांद चाहिये “ ।इसी चांद के कैलेंडर पर हमारे सारे तीज त्योहार आधारित हैं ।“करवा चौथ " के चांद से तो आप भलिभाँति परिचित हैं हमारी फिल्मों और धारावाहिकों ने इस पर्व का महत्व स्थापित कर दिया है । पति कैसा भी हो उसके लिये पत्नी व्रत ज़रूर रखती है । पत्नी के लिये पति द्वारा रखे जाने वाले व्रत का अभी तक अविष्कार नहीं हुआ है । यह भी आप जानते होंगे कि हिन्दू धर्म के अलावा इस्लाम में भी सारे त्योहार चांद के घटने - बढ़ने पर ही आधारित होते हैं ।चांद का कैलेंडर ही मनुष्य का पहला कैलेंडर था ।
चलिये देखते हैं कि जिस चांद का हमारे जीवन में इतना महत्व है उसका जन्म कैसे हुआ । सूर्य की बेटी पृथ्वी का जन्म हो चुका था फिर उसका अन्नप्राशन हुआ,नामकरण हुआ और वह धीरे धीरे बड़ी होने लगी । फिर उसकी भी संतान होने का समय आया । पृथ्वी और अन्य ग्रह अपनी उत्पत्ति के समय से ही अपने जनक सूर्य के चारों ओर एक कक्षा में परिक्रमा करने लगे थे । प्रारम्भ में यह कक्षा पूरी तरह वृताकार या दीर्घ वृताकार नहीं थी, इसका कारण पिंडों का परस्पर आकर्षण व अन्य शक्तियों का होना था ।
यह कैसे हुआ होगा जानने के लिये चलिये एक धागे में कोई अंगूठी या भारी वस्तु लटकाईये और उसे गोल गोल घुमाईये,,हाथ सधने में कितनी देर लगती है देखिये । हाँ तो धीरे धीरे कक्षाएँ पूर्ण होती गईं । यह सम्भव है कि जब ग्रह सूर्य के चारों ओर अपूर्ण व अव्यवस्थित कक्षाओं में परिक्रमा लगा रहे थे , कोई ग्रह सूर्य के बहुत निकट पहुंच गया हो तथा गुरुत्वाकर्षण के कारण उसमें से कोई तंतु निकल पड़ा हो । कालांतर में यह तंतु ठंडा हुआ, उसके द्रव्य का शीतलीकरण हुआ तथा उसके छोटे छोटे पिंड बन गये । यही पिंड उपग्रह कहलाये जिस प्रकार ग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहे थे उसी तरह यह उपग्रह भी अपने ग्रह की परिक्रमा करने लगे । जैसे पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह चन्द्रमा जो पृथ्वी से चार लाख किलोमीटर दूर है अपनी जननी की परिक्रमा कर रहा है । शनि के उपग्रह उसकी परिक्रमा कर रहे हैं । पृथ्वी अपने जनक सूर्य की परिक्रमा कर रही है साथ ही अपने अक्ष पर भी परिक्रमा कर रही है । सभी ग्रह एक ही दिशा में सूर्य की परिक्रमा करते हैं तथा इनकी कक्षाएँ एक ही समतल में हैं ।
यह सब चक्कर हमारे जीवन में भी चलते है किसी काम को पूरा करवाने के लिये हम सरकारी दफ्तर में बाबू के चक्कर लगाते हैं, बाबू साहब के चक्कर लगाता है, साहब मंत्री के चक्कर लगाता है और मंत्री प्रधान मंत्री के चक्कर लगाता है । काम होता है या नहीं होता यह अलग विषय है ।
और हाँ.. आप आकाश में प्रतिदिन चांद की स्थिति देखना चाहते हैं तो ज़रा साइड बार में देखिये आपके आसमान पर आज चांद कैसा दिख रहा है दिख जायेगा ।
उपसर्ग में प्रस्तुत है एक गुमनाम से शायर शब्बीर अहमद ख़ान “ करार “ की यह कविता । करार साहब उन दिनों कामठी (महाराष्ट्र) में रहते थे और भोपाल के क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालय में एक वर्षीय बी.एड .के छात्र थे । उन दिनों कॉलेज की पत्रिका “प्रज्ञा” में यह कविता प्रकाशित हुई थी । इस पत्रिका के सम्पादक थे आज के प्रसिद्ध कवि श्री लीलाधर मण्डलोई । चांद पर मनुष्य की विजय पर तीखा व्यंग्य करती यह कविता पढ़िये ।
धरती माँ के लाल गये थे
बहुत सभ्य कहलाने को
निज कौशल दर्शाने को
बुद्धि का लौह मनाने को
धरती माँ के लाल गये थे
चांद पे मिट्टी लाने को
धरती का बोझ बढ़ाने को ।
वियतकांग में आग लगाकर
जाने कितने बम बरसाकर
लाखों जीवन दीप बुझाकर
लाशों के अम्बार लगाकर
अपने ऐब छुपाने को
धरती माँ के लाल गये थे
चांद पे मिट्टी लाने को
धरती का बोझ बढ़ाने को ।
मिट्टी का पुतला मिट्टी से
जितनी दूर भी जायेगा
ऊपर-नीचे आगे-पीछे
मिट्टी ही तो पायेगा
मन मिट्टी हो जायेगा
करनी पर पछतायेगा
मिट्टी ही लेकर आयेगा
यह जग को समझाने को ।
धरती माँ के लाल गये थे
चांद पे मिट्टी लाने को
धरती का बोझ बढ़ाने को ॥
"मस्तिष्क की सत्ता "लेखमाला की यह कड़ी आपको कैसी लगी अवश्य बताइयेगा । - शरद कोकास
इस बार कुछ देर हो गई । नवरात्रि पर अपने ब्लोग शरद कोकास पर विदेशी कवयित्रियों की कविता लगाने में व्यस्त रहा । इसके लिये क्षमा चाहता हूँ । खैर ..देर से ही सही प्रस्तुत है " मस्तिष्क की सत्ता " लेखमाला में इस बार की यह कड़ी हमारी पृथ्वी पर ।
पिछली पोस्ट से इतना ज़रूर याद रखें - मान लीजिये हमारी पृथ्वी की आबादी लगभग छह सौ करोड़ है ,इस तरह हम हमारी पृथ्वी के 600 करोड़वें हिस्से हैं । हमारा सौर परिवार हमारी आकाशगंगा का 64 करोड़वाँ हिस्सा है तथा हमारी पृथ्वी हमारी आकाशगंगा का 25 हज़ार करोड़वाँ हिस्सा है । अब बताइये इस आकाशगंगा में हम कहाँ हुए ? फिर ऐसी करोड़ों आकाशगंगाएं बृह्मांड में हैं तो हम बृह्मांड में कहाँ हुए ? गणना छोड़िये , यह सोचिये कि जब हम बृह्मांड में इतने नगण्य हैं तो मामूली कुत्ते,बिल्ली,चीटीं और मच्छरकी क्या स्थिति होगी ? उनसे भी छोटे हैं कीटाणु जो आकार में मिलीमीटर के हज़ारवें भाग तक होते हैं जो केवल माईक्रोस्कोप से देखे जा सकते हैं और जिन्हे माईक्रोमीटर में नापते हैं। इनसे भी छोटे होते हैं अणु । अणु के विभिन्न हिस्से हैं परमाणु जो पदार्थ का सूक्ष्मतम भाग है। समस्त बृह्मांड इन्ही अणुओं से बना है। परमाणु को इलेक्ट्रोन ,प्रोटान व न्यूट्रान में विभाजित कर सकते हैं । ये मूलभूत कण हैं , इलेक्ट्रोन इनमें सबसे छोटा कण है । पृथ्वी पर रहने का किराया दो
मकान खरीदने से पहले हम हमेशा जानना चाहते हैं यह किसने बनाया है या ज़मीन खरीदने से पहले यह कि वह ज़मीन किसकी है । हम इस बात के प्रति आश्वस्त हो जाना चाहते हैं कि हम कहीं ठगे तो नहीं जा रहे । सही बात है , आखिर ज़मीन या मकान का पैसा दे रहे हैं भाई । ज़मीन या मकान ही नहीं छोटी से छोटी वस्तु भी हम यदि खरीदते हैं या किराये पर लेते हैं तो उसकी बारे में जानना चाहते हैं ।ऐसा है तो फिर हम यह क्यों नहीं जानना चाहते कि जिस पृथ्वी पर अपने पुरखों के ज़माने से हम रह रहे हैं वह कहाँ से आई ? आप कहेंगे पृथ्वी हम खरीद थोड़े ही रहे हैं या इस पर रहने का किराया थोड़े ही दे रहे हैं । सही है ,जो चीज़ मुफ्त में मिल रही हो या जिसके लिये किराया ना देना पड़ रहा हो उसके बारे में क्या पूछना । कहीं से भी आई हो पृथ्वी हमने तो इसे माल-ए-मुफ्त समझकर इसके टुकड़े टुकड़े कर बाँट लिया है । जो दिमाग से जितना चालाक उसका हिस्सा उतना बड़ा । जो बड़ा ज़मीन्दार उसके पास सैकड़ों एकड़ ज़मीन और जो सीधा-सादा गरीब उसके पास कुछ नहीं ।
चलिये सामाजिक विषमताओं की बात छोड़िये पृथ्वी कहाँ से आई यह देखते हैं । हर धर्म में पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धी ढेरों पौराणिक और प्राचीन मान्यताएँ हैं लेकिन फिलहाल इन्हे एक ओर रखकर इसका वैज्ञानिक उत्तर ढूंढते हैं । भौतिक विज्ञान के महत्वपूर्ण नियम गुरुत्वाकर्षण (जय हो बाबा न्यूटन) के नियमानुसार द्रव्य के दो पिंडों के बीच आकर्षण होता है । एक पिंड दूसरे पिन्ड को अपनी ओर खींचता है तथा उसके करीब पहुंचते पहुंचते यह आकर्षण बढ़ता जाता है व खिंचने की गति भी बढ़ जाती है । इस प्रकार जब दो पिंड एक दूसरे के बहुत निकट आ जाते हैं तो गुरुत्वाकर्षण के फलस्वरूप दोनों पिंडों से एक लम्बा तंतु निकलता है ।(ऐसा कीजिये आज रसोई में आटा गून्धिये । अपने दोनो हाथ मे अलग अलग आटे के गोले लीजिये फिर दोनो को मिलाइये और खींचकर देखिये तंतु ऐसे ही निकला होगा ) कालांतर में यह तंतु ठंडा होता है द्रव्य का शीतलीकरण होता है व छोटे छोटे पिंड बन जाते हैं इस प्रकार उत्पन्न पिंड अपने उत्पादक पिंड के चारों ओर चक्कर लगाते हैं । यह सिद्धांत सन 1916 में प्रसिद्ध ब्रिटिश वैज्ञानिक जेम्स जिंस ने स्थापित किया ।
आइये ,इस सिद्धांत के आधार पर देखें कि हमारी पृथ्वी कैसे बनी । साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व सूर्य के निकट से एक पिन्ड गुजरा ,दोनों पिन्डों में आकर्षण हुआ । सूर्य से जो तंतु निकला कालांतर में उसके ठंडे होने पर तथा द्रव्य के शीतली करण के कारण उसके छोटे छोटे पिंड बने । ये तमाम पिंड उस सूर्य की परिक्रमा करने लगे जो उनका जनक था । यह सभी पिंड ग्रह कहलाये जिनमें हमारी पृथ्वी भी एक ग्रह है और उसके भाई बहन हैं अन्य ग्रह । हमारे सबसे करीब यही ग्रह है जिस पर हम खड़े हैं लेकिन इसका हमारी कुंडली में कहीं कोई स्थान नहीं है । और वह पिन्ड जिसके आकर्षण के फलस्वरूप हमारे सौरमंडल की उत्पत्ति हुई हो सकता है अपनी संतानों के साथ बृह्मांड में कहीं विचरण कर रहा हो ।
इस प्रकार यह पृथ्वी जन्म लेने के पश्चात प्रारम्भ में विभिन्न प्रकार की गैस से मिलकर बना एक विशालकाय पिंड थी जो अपने अक्ष पर घूमती हुई सूर्य की परिक्रमा कर रही थी । ताप के विकीरण के फलस्वरूप यह पिंड ठंडा हुआ ,द्रव्य व गैसों का शीतलीकरण हुआ तथा तरलीय व अर्धसान्द्रीय अवस्थाओं से होता हुआ वर्तमान अवस्था तक पहुंचा। बाहरी तल से घनीकरण प्रारम्भ हुआ,उपरी सतह पर पपड़ी जमी जो भीतर की ओर मोटी होती गई। गर्भ भाग में आकुंचन हुआ, पपड़ी में झुर्रियाँ व दरारें पड़ीं फलस्वरूप हिमालय जैसे पर्वत और नदियाँ बनीं । यह सब घटित होने में कई करोड़ साल लगे ।
दिमाग पर ज़्यादा ज़ोर मत लगाइये चलिए अपने घर में ठंडे होते हुए दूध पर मलाई जमते हुए देखिए और इस पर विचार कीजिए । और किराये की बात भी भूल जाईये यह तो एक बहुत बड़ा बाड़ा है जो जितना पुराना किरायेदार उसका उतना हक़ । वही किरायेदार वही मकान मालिक, जैसे अफ्रिका जैसे बड़े देश और हमारे जैसे छोटे ,फिर देश में भी बड़े बड़े धन्ना सेठ और हमारे जैसे फूटपाथिये । इस धरती पर रहने की कीमत न वो देते है न हम । कीमत तो छोड़िये पृथ्वी पर रहकर हम पृथ्वी का ही नुकसान करते हैं,प्रदूषण फैलाते हैं ,जंगल काटते हैं, ज़मीन से पानी चूस लेते हैं और भी बहुत सा नुकसान करते हैं इस पृथ्वी का । मुम्बई की चालें देखी हैं ना जब तक धराशायी नहीं होती लोग खाली ही नहीं करते ,फिर कई लोग दब कर मर भी जाते हैं । हम भी धीरे धीरे अपनी पृथ्वी को वहीं ले जा रहे हैं जहाँ न ये पृथ्वी रहेगी न हम ।आप कहेंगे हमे क्या ? हमारी आनेवाली पीढ़ीयाँ जानें । हम तो चैन से रह ही लेंगे अपने जीते जी ।
उपसर्ग में इस बार प्रस्तुत है शरद कोकास की लम्बी कविता " पुरातत्ववेत्ता " से यह नौ पंक्तियाँ
दुख के दिनो सी कठोर है बीते समय की पीठ
जिस पर खुदे हैं सहनशीलता के दस्तावेज़
जिसमें उन्माद है राह बदलती नदियों का
बेचैनी में करवट बदलती धरती का अभिशाप
सत्तालोलुपों के आक्रमण सिंहासन की अभिलाषा में
मवेशियों के रेवड़ हासिल करने के लिये
घास के मैदान पर पशुपालकों की जीत
और इन्ही के बीच कहीं अस्पष्ट सी लिखावट में
अपने अस्तित्व का अर्थ ढूँढते मनुष्य का संघर्ष ....
पृथ्वी पर मनुष्य के इतिहास का बयान करती यह पंक्तियाँ आपको कैसी लगीं ज़रूर बताइयेगा - शरद कोकास