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बुधवार, 3 मार्च 2010

दुनिया का डी.एन.ए.टेस्ट ज़रूरी है


  होली की मस्ती अब कम होने को है लेकिन बच्चों की मस्ती अभी कम नहीं हुई है ..हम सभी को अपने बचपन की होली याद आ रही है । चलिये " मस्तिष्क की सत्ता  "लेखमाला के इस लेख क्रमांक -5 की शुरुआत यहीं से करें ..                      
                   आपको आपके बचपन की कबसे याद है ?
जो कुछ हमारी आंखों के सामने घटित हो रहा है उसे देखने के लिये हमारी आँखें पर्याप्त हैं लेकिन उसे महसूस करने के लिये  अपने मस्तिष्क की क्षमता से हमारा परिचय होना आवश्यक है ।चलिये अतीत के बारे में सोचना शुरू करते हैं । अरे.. मै आपको दुनिया का इतिहास पढ़ने के लिये नहीं कह रहा हूँ ,मै तो आपसे अपने बचपन के बारे में सोचने के लिये कह रहा हूँ । आप कहेंगे हमे तो अपने बचपन की सारी बातें याद हैं । सच सच बताइये सारी बातें याद हैं ? जब आपने पहला शब्द बोला था , याद है ? जब आप ने पहला कदम रखा था और ज़मीन पर खड़े हुए थे वह क्षण याद है ? और जब आपने अपने पापा की गोद में....की थी वह याद है ? लेकिन हमें यह सब याद न होते हुए भी मालूम तो है ही इसलिये कि हमे हमारे माता-पिता ने यह बताया है । इसीलिये याद भले न हो हम सब कहते ज़रूर  हैं....” हमने भी अपनी माँ का दूध पिया है । “ और सबसे बड़ी बात तो यह कि हमे जो बताया गया , हमने उसपर विश्वास किया है ।और दूसरे बच्चों को देखकर और उस समय की तस्वीरें देखकर उसकी कल्पना भी की है ।यह मस्तिष्क का ही कमाल है कि जिस तरह हम अपने बचपन के अनदेखे दृश्यों की कल्पना कर लेते हैं उसी तरह आनेवाले कल के दृश्यों की भी कल्पना कर लेते हैं । 
    इस तरह दुनिया के भी न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य और अतीत की कल्पना भी हम इसी मस्तिष्क के द्वारा ही कर सकते हैं । अब आइये उन दृश्यों की कल्पना करते हैं जिन्हे न हमारे माता-पिता  ने देखा ,न उनके माता –पिता ने । कल्पना कीजिये आज से अरबों वर्ष पूर्व जब इस धरती पर इंसान नहीं था । और इंसान तो क्या जब यह पृथ्वी ही नहीं थी , न सूर्य था, ना चान्द-सितारे थे , ना आकाशगंगायें थीं , ना यह बृह्मांड था , तब क्या था ? अर्थात जब “ कुछ नहीं ” था तो “ कुछ नहीं ” से पहले क्या था ?  कुछ लोग इसका उत्तर इस तरह देते हैं कि ‘ कुछ नहीं ‘ से पहले भी ‘ कुछ नहीं ‘ था  और उससे पहले भी ‘ कुछ नहीं ‘ था । उनसे पूछा जा सकता है कि जब ‘ कुछ नहीं ‘ था तो ‘ कुछ नहीं ‘ से यह सब कुछ कैसे आया ?
चलिये गालिब साहब की बात से ही शुरुआत करते है । मैने शुरुआत में ग़ालिब साहब का एक शेर पढ़ा था , डुबोया मुझको होने ने न होता मैं तो क्या होता । इसी शेर का पहला मिसरा है “ न था कुछ तो खुदा था , कुछ न होता तो खुदा होता । “ जब से मनुष्य ने ईश्वर की कल्पना की ( यहाँ अटकिये मत ..इस पर हम आगे चलकर बात करेंगे ) तब से लेकर अब तक तो यही माना गया है कि जब कुछ नहीं था तो यह बृह्मांड मौजूद था लेकिन  वैज्ञानिकों का मानना है कि बृह्मांड की उत्पत्ति से पूर्व यहाँ हाईड्रोजन हीलियम प्लाज़्मा उपस्थित था । प्लाज़्मा अर्थात ठोस,द्रव्य,वायु के अतिरिक्त पदार्थ की चौथी अवस्था या इलेक्ट्रोन रहित न्यूक्लियस की स्थिति । इस प्लाज़्मा के केन्द्र भाग में आकुंचन होना शुरू हुआ, सारे प्लाज़्मा को एक स्थान पर केन्द्रित होने के प्रयास में गुरुत्वाकर्षण में वृद्धि  हुई, तापमान में वृद्धि  हुई फिर एक महाविस्फोट हुआ और फलस्वरूप इस बृह्मांड का निर्माण हुआ । तत्पश्चात आकाशगंगायें बनीं, आकाशगंगाओं में बने सौरमंडल या नक्षत्रमंडल । इन्ही में से एक है हमारा सौरमंडल जिसमें हमारी पृथ्वी ,बुध, बृहस्पति, शुक्र, मंगल, शनि, यूरेनस ,नेप्च्यून,प्लूटो जैसे गृह हैं तथा इनका मुखिया है सूर्य ।
आप कहेंगे इस में नया क्या है ? सही है ,यह सब बातें आप भलिभांति जानते हैं । यह भी जानते हैं कि यह दुनिया एक दिन में नहीं बनी जैसे कि हम एक दिन में बड़े नहीं हो गये ।इंसान के अतीत के बारे में तो उसके पूर्वजों ने उसे बता दिया लेकिन दुनिया के अतीत के बारे में इंसान को  कौन बताता , सो इंसान ने खुद यह जानना चाहा । (भई यह तो इंसान की फितरत है , वह अपने अतीत के बारे में जानना चाहता है , अपने पड़ोसी के अतीत के बारे में जानना चाहता है , फिर दुनिया के अतीत के बारे में क्यों नहीं जानना चाहेगा ? ) फलस्वरूप वैज्ञानिकों ने बहुत खोज की , विभिन्न परीक्षण किये और इस दुनिया का अतीत हमारे सामने रख दिया । आप कहेंगे कि इस वैज्ञानिक परीक्षण की क्या आवश्यकता थी । क्या हमारे पूर्वजों का ज्ञान काफी नहीं था ? मेरा आपसे सवाल है कि जब माँ बच्चे से कहती है कि यह तुम्हारे पिता है और वह बिना किसी सन्देह के उस पर विश्वास भी करता है , दुनिया भी इस बात पर विश्वास करती है फिर कानून को प्रमाण  के लिये डी.एन.ए.टेस्ट की ज़रूरत क्यों पड़ती है ?   
किसी भी दिशा में विज्ञान अभी ठहरा नहीं है । इस दुनिया के बारे में परीक्षण लगातार चल रहे हैं ,अभी पिछले दिनों ऐसे ही एक परीक्षण के दृश्य आपने देखे होंगे और दुनिया के खत्म हो जाने के भय से भयभीत भी हुए होंगे । इसीलिये  हर वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक  जानकारी का तार्किक ढंग से विश्लेषण करने की ज़रूरत है अन्यथा हम इस दुनिया की उत्पत्ति के बारे में नहीं जान पायेंगे और हमेशा इसे किसी की ‘दी हुई दुनिया’ समझते रहेंगे या किसी प्रभुत्वशाली देश को इस दुनिया का मालिक समझते रहेंगे तथा इस दुनिया में रहने का वास्तविक आनन्द कभी नहीं उठा पायेंगे ।- शरद कोकास 

उपसर्ग में कवि केदार नाथ सिंह की यह चर्चित कविता 

उसका हाथ 
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा 
दुनिया को 
हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिये । 
छवि गूगल से साभार