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सोमवार, 15 मार्च 2010

कौन थे जो मर गये पिछली सर्दियों में

पिछली पोस्ट से इतना ज़रूर याद रखें - सूर्य से निकला हुआ प्रकाश 8 मिनट में हम तक पहुंचता है । यह ऐसे होता है कि प्रकाश एक सेकंड में 3 लाख कि.मी. दूरी तय करता है, एक मिनट में (300000x60)कि.मी.,एक घंटे में (300000x60x60)कि.मी.,एक दिन में (300000x60x60x24)कि.मी.,तथा एक वर्ष में (300000x60x60x24x365) कि.मी. अर्थात 10लाख करोड़ कि.मी. यह दूरी एक प्रकाशवर्ष कहलाती है । इस तरह सूर्य हमसे 8 प्रकाश मिनट अर्थात(300000x60x8)=14.4 या लगभग 15 करोड़ कि.मी. दूर हुआ । और अब आगे...मस्तिष्क की सत्ता - सात 

                                  बृह्मांड में हमारी औकात क्या है

          रोजमर्रा की ज़िंदगी में हमारे धैर्य की रोज़ परीक्षा होती है । जब हमे पता चलता है कि किसी ने हमारी किसी बात को लेकर विपरीत टिप्पणी की है तो हम अपना आपा खो बैठते  हैं और गुस्से में कहते हैं “ आखिर उसकी औकात ही क्या है बड़ा आया हमे ज्ञान देने वाला “ ( मुझे पता है कुछ लोग मेरे बारे में भी यही सोच रहे होंगे ) लेकिन सच्चाई यह है कि इस दुनिया में हम अपनी ही औकात नहीं जानते ।जानते भी हैं तो सिर्फ अपने घर में या ज़्यादा से ज़्यादा पड़ोस में ।यह कहावत यूँही नहीं बनी है कि “अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है । “
खैर हम कुत्ते हों या शेर रहेंगे तो जानवर के जानवर ही ना । बेहतर है हम मनुष्य की तरह इस बारे में सोचें कि इस ब्रह्मांड में हमारी क्या औकात हो सकती है । आप कहेंगे ,यह तो हमने कभी सोचा ही नहीं । चलिये पहले देखें कि यह बृह्मांड क्या बला है । यह तो आप जानते ही हैं कि हमारी पृथ्वी,अन्य ग्रहों व सूर्य को मिलाकर एक सौरमंडल बनता है । ऐसे अनेक सौरमंडलों से बनती है आकाशगंगा और ऐसी अनेक आकाशगंगाओं से मिलकर बनता है बृह्मांड । इतने विशाल बृह्मांड के बारे में जानने के लिये एक जीवन बहुत छोटा है । लेकिन हमें यह एक जीवन ही मिला है और अगला जन्म होना नहीं है ,इसलिये थोड़ा बहुत तो हमें इसी जीवन में इस बारे में जानना ही चाहिये ।
यह तय करने के लिये कि इस बृह्मांड में हम कहाँ हैं चलिये एक छोटा सा गणित और हल करते हैं ।( फिर एक गणित ?? ) मान लीजिये हमारी पृथ्वी की आबादी लगभग छह सौ करोड़  है ,इस तरह   हम हमारी पृथ्वी के 600 करोड़वें हिस्से हैं । हमारा सौर परिवार हमारी आकाशगंगा का 64 करोड़वाँ हिस्सा है तथा हमारी पृथ्वी हमारी आकाशगंगा का 25 हज़ार करोड़वाँ हिस्सा है । अब बताइये इस आकाशगंगा में हम कहाँ हुए ? फिर ऐसी करोड़ों आकाशगंगाएं बृह्मांड में हैं तो हम बृह्मांड में कहाँ हुए ? गणना छोड़िये , यह सोचिये कि जब हम बृह्मांड में इतने नगण्य हैं तो मामूली कुत्ते,बिल्ली,चीटीं और मच्छरकी क्या स्थिति होगी ? उनसे भी छोटे हैं कीटाणु जो आकार में मिलीमीटर के हज़ारवें भाग तक होते हैं जो केवल माईक्रोस्कोप से देखे जा सकते हैं और जिन्हे माईक्रोमीटर में नापते हैं। इनसे भी छोटे होते हैं अणु । अणु के विभिन्न हिस्से हैं परमाणु जो पदार्थ का सूक्ष्मतम भाग है। समस्त बृह्मांड इन्ही अणुओं से बना है। परमाणु को इलेक्ट्रोन ,प्रोटान व न्यूट्रान में विभाजित कर सकते हैं । ये मूलभूत कण हैं , इलेक्ट्रोन इनमें सबसे छोटा कण है । यह वैज्ञानिक जानकारी है जिसे आपने किताबों में भी पढ़ा होगा ।
ज़्यादा विस्तार में न जायें ,मूल प्रश्न यह है कि बृह्मांड में जब हमारी स्थिति इतनी नगण्य है तब अपनी स्थिति जानने के पश्चात भी हमारे में मन में अहंकार क्यों आता है ? अपनी क्षुद्रता को जानकर भी हम जाति ,धर्म ,नस्ल ,भाषा, क्षेत्र ,राज्य ,सम्पन्नता के नाम पर क्यों लड़ते हैं ? एक दूसरे के खून के प्यासे क्यों रहते हैं ? क्या यह हमारा अहंकार नहीं है जो हमे नई जानकारी प्राप्त करने,नई बातें सीखने से रोकता है , हम अपने आप को सर्वज्ञ समझने लगते हैं , हम सिर्फ अपनी कहना चाहते हैं और किसीकी कुछ नहीं सुनना चाहते । हम अपने विचार को ही अंतिम मानते हैं । हम अपना लिखा पत्थर की लकीर समझते हैं । हम अपने आगे हर किसी को तुच्छ समझते हैं । सोचकर देखिये यदि हमारे पूर्वज भी ऐसे ही अहंकारी होते तो क्या आज विज्ञान इतनी प्रगति कर पाता ? अगर हम यह मान लेते  कि हमें सब कुछ आता है और हम सबसे बड़े ज्ञानी हैं तो आज भी उसी तरह पेड़ की छाल लपेटे घूमते रहते और जानवरों का शिकार करते रहते । न विज्ञान की कोई बात अंतिम है न धर्म की ,इसलिये सबसे पहले अपने मन से इस अहंकार को निकाल फेंकिये कि आपस में  लड़- झगड़कर हम कुछ बड़ा काम कर जायेंगे । लड़ना ही है तो आततायियों से लड़िये ..भूख ग़रीबी बेरोजगारी और मनुष्य द्वारा पैदा की गई समस्याओं से लड़िये ।
खैर ..जबसे पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म हुआ है ,यह सब चल ही रहा है ..जाने कितने लोग इस पृथ्वी पर आये और चले गये किसको याद है ,वे कौन थे ? हम से ही कोई पूछे कि हमारे पिता के पिता के पिता के पिता कौन थे , क्या हमे याद है उनका नाम ? हमें भी कौन याद रखेगा ?और कितने साल याद रखेगा ? बृह्माण्ड की कथा यहीं समाप्त की जाये ..अगली बार बातें करेंगें इस पृथ्वी की ।
एक निवेदन - मेरा यह लिखने का उद्देश्य भी किसी की ओर इंगित करना नहीं है । मैं एक तुच्छ् प्राणि किसी को क्या कह सकता हूँ । इसलिये कृपया विषय से सम्बन्धित टिप्पणी ही करें जिसमे किसी व्यक्ति विशेष की ओर संकेत न हो


और अब उपसर्ग में कवि संजय चतुर्वेदी की यह छोटी लेकिन गम्भीर कविता उनके कविता संग्रह "प्रकाशवर्ष " (आधार प्रकाशन पंचकूला से वर्ष 1993 में प्रकाशित ) से साभार -डॉ.संजय चतुर्वेदी किंग जॉर्जेज़ मेडिकल कॉलेज (अब छत्रपति शाहू जी मे.कॉ.)लखनऊ से एम.डी. हैं ।
             जो मर गये पिछली सर्दियों में
लोग भूल जाते हैं 
कौन लोग थे 
जो उन्हे इतिहास से निकालकर लाये 
उन्हे खींचते रहे 
उनकी गर्म रज़ाइयों से बाहर 
लकड़ियाँ इकठ्ठा करते रहे 
कहीं मौसम ज़्यादा खराब न हो जाये 
उनके सहमे हुए घरों में आवाज़ बनकर रहे 

लोग भूल जाते हैं वसंत आते ही 
कौन थे जो मर गये पिछली सर्दियों में ।

सस्नेह आपका - शरद कोकास  
( चित्र गूगल से साभार )                                                                                                                            
 

बुधवार, 3 मार्च 2010

दुनिया का डी.एन.ए.टेस्ट ज़रूरी है


  होली की मस्ती अब कम होने को है लेकिन बच्चों की मस्ती अभी कम नहीं हुई है ..हम सभी को अपने बचपन की होली याद आ रही है । चलिये " मस्तिष्क की सत्ता  "लेखमाला के इस लेख क्रमांक -5 की शुरुआत यहीं से करें ..                      
                   आपको आपके बचपन की कबसे याद है ?
जो कुछ हमारी आंखों के सामने घटित हो रहा है उसे देखने के लिये हमारी आँखें पर्याप्त हैं लेकिन उसे महसूस करने के लिये  अपने मस्तिष्क की क्षमता से हमारा परिचय होना आवश्यक है ।चलिये अतीत के बारे में सोचना शुरू करते हैं । अरे.. मै आपको दुनिया का इतिहास पढ़ने के लिये नहीं कह रहा हूँ ,मै तो आपसे अपने बचपन के बारे में सोचने के लिये कह रहा हूँ । आप कहेंगे हमे तो अपने बचपन की सारी बातें याद हैं । सच सच बताइये सारी बातें याद हैं ? जब आपने पहला शब्द बोला था , याद है ? जब आप ने पहला कदम रखा था और ज़मीन पर खड़े हुए थे वह क्षण याद है ? और जब आपने अपने पापा की गोद में....की थी वह याद है ? लेकिन हमें यह सब याद न होते हुए भी मालूम तो है ही इसलिये कि हमे हमारे माता-पिता ने यह बताया है । इसीलिये याद भले न हो हम सब कहते ज़रूर  हैं....” हमने भी अपनी माँ का दूध पिया है । “ और सबसे बड़ी बात तो यह कि हमे जो बताया गया , हमने उसपर विश्वास किया है ।और दूसरे बच्चों को देखकर और उस समय की तस्वीरें देखकर उसकी कल्पना भी की है ।यह मस्तिष्क का ही कमाल है कि जिस तरह हम अपने बचपन के अनदेखे दृश्यों की कल्पना कर लेते हैं उसी तरह आनेवाले कल के दृश्यों की भी कल्पना कर लेते हैं । 
    इस तरह दुनिया के भी न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य और अतीत की कल्पना भी हम इसी मस्तिष्क के द्वारा ही कर सकते हैं । अब आइये उन दृश्यों की कल्पना करते हैं जिन्हे न हमारे माता-पिता  ने देखा ,न उनके माता –पिता ने । कल्पना कीजिये आज से अरबों वर्ष पूर्व जब इस धरती पर इंसान नहीं था । और इंसान तो क्या जब यह पृथ्वी ही नहीं थी , न सूर्य था, ना चान्द-सितारे थे , ना आकाशगंगायें थीं , ना यह बृह्मांड था , तब क्या था ? अर्थात जब “ कुछ नहीं ” था तो “ कुछ नहीं ” से पहले क्या था ?  कुछ लोग इसका उत्तर इस तरह देते हैं कि ‘ कुछ नहीं ‘ से पहले भी ‘ कुछ नहीं ‘ था  और उससे पहले भी ‘ कुछ नहीं ‘ था । उनसे पूछा जा सकता है कि जब ‘ कुछ नहीं ‘ था तो ‘ कुछ नहीं ‘ से यह सब कुछ कैसे आया ?
चलिये गालिब साहब की बात से ही शुरुआत करते है । मैने शुरुआत में ग़ालिब साहब का एक शेर पढ़ा था , डुबोया मुझको होने ने न होता मैं तो क्या होता । इसी शेर का पहला मिसरा है “ न था कुछ तो खुदा था , कुछ न होता तो खुदा होता । “ जब से मनुष्य ने ईश्वर की कल्पना की ( यहाँ अटकिये मत ..इस पर हम आगे चलकर बात करेंगे ) तब से लेकर अब तक तो यही माना गया है कि जब कुछ नहीं था तो यह बृह्मांड मौजूद था लेकिन  वैज्ञानिकों का मानना है कि बृह्मांड की उत्पत्ति से पूर्व यहाँ हाईड्रोजन हीलियम प्लाज़्मा उपस्थित था । प्लाज़्मा अर्थात ठोस,द्रव्य,वायु के अतिरिक्त पदार्थ की चौथी अवस्था या इलेक्ट्रोन रहित न्यूक्लियस की स्थिति । इस प्लाज़्मा के केन्द्र भाग में आकुंचन होना शुरू हुआ, सारे प्लाज़्मा को एक स्थान पर केन्द्रित होने के प्रयास में गुरुत्वाकर्षण में वृद्धि  हुई, तापमान में वृद्धि  हुई फिर एक महाविस्फोट हुआ और फलस्वरूप इस बृह्मांड का निर्माण हुआ । तत्पश्चात आकाशगंगायें बनीं, आकाशगंगाओं में बने सौरमंडल या नक्षत्रमंडल । इन्ही में से एक है हमारा सौरमंडल जिसमें हमारी पृथ्वी ,बुध, बृहस्पति, शुक्र, मंगल, शनि, यूरेनस ,नेप्च्यून,प्लूटो जैसे गृह हैं तथा इनका मुखिया है सूर्य ।
आप कहेंगे इस में नया क्या है ? सही है ,यह सब बातें आप भलिभांति जानते हैं । यह भी जानते हैं कि यह दुनिया एक दिन में नहीं बनी जैसे कि हम एक दिन में बड़े नहीं हो गये ।इंसान के अतीत के बारे में तो उसके पूर्वजों ने उसे बता दिया लेकिन दुनिया के अतीत के बारे में इंसान को  कौन बताता , सो इंसान ने खुद यह जानना चाहा । (भई यह तो इंसान की फितरत है , वह अपने अतीत के बारे में जानना चाहता है , अपने पड़ोसी के अतीत के बारे में जानना चाहता है , फिर दुनिया के अतीत के बारे में क्यों नहीं जानना चाहेगा ? ) फलस्वरूप वैज्ञानिकों ने बहुत खोज की , विभिन्न परीक्षण किये और इस दुनिया का अतीत हमारे सामने रख दिया । आप कहेंगे कि इस वैज्ञानिक परीक्षण की क्या आवश्यकता थी । क्या हमारे पूर्वजों का ज्ञान काफी नहीं था ? मेरा आपसे सवाल है कि जब माँ बच्चे से कहती है कि यह तुम्हारे पिता है और वह बिना किसी सन्देह के उस पर विश्वास भी करता है , दुनिया भी इस बात पर विश्वास करती है फिर कानून को प्रमाण  के लिये डी.एन.ए.टेस्ट की ज़रूरत क्यों पड़ती है ?   
किसी भी दिशा में विज्ञान अभी ठहरा नहीं है । इस दुनिया के बारे में परीक्षण लगातार चल रहे हैं ,अभी पिछले दिनों ऐसे ही एक परीक्षण के दृश्य आपने देखे होंगे और दुनिया के खत्म हो जाने के भय से भयभीत भी हुए होंगे । इसीलिये  हर वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक  जानकारी का तार्किक ढंग से विश्लेषण करने की ज़रूरत है अन्यथा हम इस दुनिया की उत्पत्ति के बारे में नहीं जान पायेंगे और हमेशा इसे किसी की ‘दी हुई दुनिया’ समझते रहेंगे या किसी प्रभुत्वशाली देश को इस दुनिया का मालिक समझते रहेंगे तथा इस दुनिया में रहने का वास्तविक आनन्द कभी नहीं उठा पायेंगे ।- शरद कोकास 

उपसर्ग में कवि केदार नाथ सिंह की यह चर्चित कविता 

उसका हाथ 
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा 
दुनिया को 
हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिये । 
छवि गूगल से साभार

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

क्या हम सभी दोगले हैं ?


                                 
दीपावली के समय की बात है । ( आप कहेंगे यह होली के समय मैं दीवाली की बात क्यों कर रहा हूँ ?, चलिये छोड़िये .. किस्सा सुनिये ) मैं घर से दूर किसी अन्य शहर में अपने मित्र के यहाँ था । पूजन के पश्चात मैने अपने मित्र से कहा चलो शहर की रोशनी देखकर आते हैं ।हम लोग जब निकलने लगे तो मैने उनसे कहा " दरवाज़ा तो बन्द कर दो । " उन्होने कहा " आज के दिन लक्ष्मी कभी भी आ सकती है , इसलिये दरवाज़ा बन्द नही किया जाता । " मैने कहा  " और चोर आ गये तो ? " और सचमुच ऐसा ही हुआ । जब हम लोग लौटे तो चोर लक्ष्मीजी के पास रखी नकदी पर हाथ साफ कर चुके थे । मैने कहा .." देख लो ,  यह क्यों भूल गये कि जिस दरवाज़े से लक्ष्मी आ सकती है उससे जा भी तो सकती है ।"
          ऐसा और भी शहरों में और भी लोगों के साथ हुआ होगा ।लेकिन इस किस्से का तात्पर्य यह कि इस तरह ठगे जाने से बचने के लिये हमे सायास विश्वास और अन्धविश्वास के इस दुष्चक्र से निकलना बहुत ज़रूरी है । अन्यथा हम जीवन भर उन्हीं मान्यताओं और जर्जर हो चुकी परम्पराओं को ढोते रहेंगे और इसका नुकसान उठाते रहेंगे  । हाँलाकि इससे कोई विशेष नुकसान नहीं है , क्योंकि इतनी बुद्धि तो हम में है कि जैसे ही हमें नुकसान की सम्भावना दिखाई देती है हम सतर्क हो जाते हैं । लेकिन कुछ चालाक लोग, सामान्य लोगों की इस मनोवृति से हमेशा फायदा उठाते हैं और अक्सर  सीधे-सादे लोग अन्धविश्वासों का शिकार बन जाते  हैं । हम लाख सतर्कता बरतें लेकिन कहीं ना कहीं तो ठगे जाते ही हैं । अगर हम चाहते हैं कि हमारा जीवन सहज हो, सरल हो और इस प्रकार की दुर्घटनाओं से रहित हो तो इसके लिये हम वास्तविकता जानने का प्रयास करना होगा । हमें अपने आप को प्रशिक्षित करने की शुरुआत करनी होगी ।इसके लिये सबसे अधिक आवश्यकता है अपने आपको वैज्ञानिक दृष्टि  से लैस करने की , अपने आप में इतिहास बोध जागृत करने की तथा  ऐतिहासिक तथा वैज्ञानिक अध्ययन की ।
आप कहेंगे व्यस्तता के इस युग में अपनी रोजी-रोटी के लिये ज़द्दोज़हद करते हुए इतनी फुर्सत कहाँ है जो इसके लिये किताबें-विताबें पढ़ें । सही है , इसके लिये किताबें पढ़ने की ज़रूरत भी नहीं है । आप तो सिर्फ उसे याद करें जो बचपन से लेकर अब तक आपने अपनी शालेय व महाविद्यालयीन शिक्षा में पढ़ा है । बिना किताबें पढ़े भी हम अपनी सहज बुद्धि से आज जो कुछ हमारे सामने घटित हो रहा है उसका वैज्ञानिक विष्लेषण तो कर ही सकते हैं  ।तर्क के आधार पर अन्धविश्वास कहकर बहुत सारी मिथ्या बातों को  खारिज भी कर सकते हैं ।
 हम अपने दैनन्दिन जीवन में ऐसा करते भी हैं । लेकिन कई बार स्थायी रूप से इसका प्रभाव नही पड़ता । कुछ समय बाद  हम इसे भूल जाते है और दोबारा फिर उसी तरह की किसी घटना का शिकार हो जाते हैं ।शायद इसी लिये आये दिन हम अखबारों में ठगी की वही वही खबरें पढ़ते है.. “ नकली सोना देकर ठगा गया “ नकली बाबा बनकर जेवरात ले गया “ “झाड़फूँक से बच्चे की मौत “आदि आदि । हम पढ़े-लिखे लोग ऐसे लोगों की मूर्खता पर हँसते हैं और  सोचते हैं कि काश इस तरह ठगे जाने से बेहतर लोग इसके बारे में पहले से जान लेते ।
लेकिन हम पढ़े-लिखे लोग और भी उन्नत तरीके से ठगे जाते हैं और इसका हमें पता भी नहीं चलता । उदाहरण के तौर पर मेरी जानकारी में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसने सौ ग्राम की टुथपेस्ट की ट्यूब से पेस्ट निकालकर जाँचा हो कि वह सौ ग्राम है या नहीं । न हम पेट्रोल की जाँच करते है न गैस की न गंगा जल लिखी बोतल की ,कि उसमे गंगा का जल है या नहीं । हम बहुत सारे विश्वासों की जाँच करना चाहते हैं लेकिन हमें विश्वास दिला दिया जाता है ..” आल इस वेल “ । कई बार विश्वास करने के लिये धर्म और ईश्वर के नाम पर भी हमें बाध्य किया जाता है । हम ठगे जाने से कैसे बचें रहें और कोई अन्धविश्वास भी हमारा कोई नुकसान न कर सके इसके लिये सबसे ज़्यादा ज़रूरी है हमारे जीवन में और हमारे आसपास घटित होने वाली हर घटना के पीछे का कारण जानना । इसके लिये हमारे पास पर्याप्त वैज्ञानिक व  ऐतिहासिक ज्ञान व चेतना का होना भी आवश्यक है ।
इस ज्ञान के अंतर्गत  कुछ प्रश्नों के उत्तर जानना अत्यंत  आवश्यक है जैसे कि यह दुनिया कैसे बनी ? बृह्मांड का निर्माण कैसे हुआ ? सूर्य चांद सितारे कहाँ से आये ? पृथ्वी पर जीवन कैसे आया ?,मनुष्य का जन्म कैसे हुआ ? मनुष्य के विकास में उसके मस्तिष्क की क्या भूमिका रही ?,मस्तिष्क कैसे काम करता है ? हम इतर प्राणियों से अलग क्यों हैं ? हम मस्तिष्क में भूत-प्रेत सम्बन्धी सूचनाओं को कैसे दर्ज करते हैं ? हमे भय क्यों लगता है ? भय से मुक्ति कैसे सम्भव है ? हमारे व्यक्तित्व का निर्माण कैसे होता है ? ज्ञान क्या है ? विज्ञान क्या है ?  मन क्या है ? आदि आदि ।
आप कहेंगे इन बातों का विश्वास –अन्धविश्वास से क्या सम्बन्ध है ? और यह सब तो हम जानते हैं ।सही है ,निरक्षरों की बात छोड़ भी दें लेकिन पढ़ा-लिखा हर व्यक्ति स्कूल कॉलेज में ,पाठ्य पुस्तकों में इन बातों को पढ़ चुका होता है, फिर भी वह अन्धविश्वासों से क्यों घिरा होता है ? क्यों वह अपने जीवन मे कई बार धोखा खाता है ? इस बात पर भी सोचने की आवश्यकता है । इन्हे इन प्रश्नों के परिप्रेक्ष्य में समझने की भी आवश्यकता है । इसका मूल कारण मनुष्य के मस्तिष्क में लागू वह दोहरी प्रणाली है जिसकी  वज़ह से वह विश्वास और अन्धविश्वास के बीच झूलता रहता है और सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाता ।
यह कैसे घटित होता है यह जानने से पूर्व बृह्मान्ड की उत्पत्ति से लेकर मनुष्य की उत्पत्ति तक की कथा का संक्षेप में पुनर्पाठ ज़रूरी है  । तो अगली पोस्ट से प्रारम्भ करते है उस समय की बात से जब इस दुनिया में कुछ नही था । - शरद कोकास
छवि गूगल से साभार

मंगलवार, 23 जून 2009

वैज्ञानिक चेतना के ब्लॉगर्स सलाह दें

ब्लॉगिंग की दुनिया में घोषित रूप से वैज्ञानिक दृष्टि में विश्वास रखने वाले ब्लॉग्स बहुत है जिनमें ब्लॉग कुदरतनामा के ज़रिये श्री बाल्सुब्रमणियम भुजंग के ज़रिये सुश्री लवली कुमारी और श्री अरविन्द मिश्रा तथा साईंस ब्लोगर असोसिएशन एवं तस्लीम के माध्यम से श्री ज़ाकिर अली रजनीश , डॉ.अरविन्द मिश्रा,श्री ज़ीशान हैदर ज़ैदी सुश्री अर्शिया अली और् कवि कुमार अम्बुज जैसे लोग यह काम बखूबी कर रहे हैं.वर्तमान समय में इ बात की आवश्यकता है कि सामान्य जन के भीतर न केवल वैज्ञानिक दृष्टि अपितु इतिहास बोध भी जागृत किया जावे.वस्तुत: वर्तमान दौर में पूंजीवाद ने बाज़ार के साथ-साथ धर्म पर भी आधिपत्य कर लिया है. यह इतनी चालाकी के साथ हुआ है कि पूरी न पीढी इसकी चपेट में आ गई है.धार्मिक जुलूस पहले भी निकाले जाते थे लेकिन अब उनमें उन्माद का प्रदर्शन होने लगा है.एक धर्म की प्रतिद्वन्दिता में दूसरा धर्म इस उन्माद का प्रदर्शन और अधिक ज़ोर शोर से करता है.धर्म और ईश्वर पर अवलम्बिता बढती ही जा रही है अत: धार्मिक स्थलों पर भीड भी बढने लगी है.ईश्वर को चढाये जाने वाले प्रसाद ने अब घूस का रूप धारण कर लिया है और मनुष्य तथाकथित पाप से मुक्त होकर तमाम अनैतिक कार्यों में लिप्त रहने लगा है.मनुष्य की धर्मभीरुता और अन्धविश्वास के प्रति सकारात्मक सोच के फलस्वरूप न केवल धर्म की शक्तियाँ बल्कि बाज़ार की शक्तियाँ तथा राजनैतिक शक्तियाँ भी इसका लाभ उठाने में लगी हैं.इसलिये अन्धश्रद्धा का शिकार होने या तांत्रिकों द्वारा ठगे जाने को अब केव किसीकी व्यक्तिगत हानि मानक नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता.अन्द्धश्रद्धा निर्मूलन समिति,तर्कशील सोसायटी और अन्य संस्थाओं द्वारा दिये गये चमत्कार साबित करने विषयक चेलेंज को स्वीकार करने हेतु कोई पाखंडी बाबा या ज्योतिषी सामने नहीं आता इसलिये कि वे जानते हैं अन्धश्रद्धालू जनता जब तक उनके साथ है वे धनार्जन करते रहेंगे.सत्ताधीशों और पूंजीपतियों का प्रश्रय भी उन्हे प्राप्त है.ड्रुग एण्ड मेजिकल रेमेडी एक्ट 1954 में लागू हुआ था लेकिन इसके तहत अब तक कितने लोगों पर कारवाई हुई है? हमारे शहर मे कोई बाबा आता है किसी लॉज में ठहरता है,स्थानीय अखबार में विज्ञापन देता है और पुत्र उत्पन्न होने की भभूत बेचकर पैसा लूटकर चला जाता है. कितने लोग है जो इस बात की शिकायत करते है.कितने लोगों को पता है कि इस एक्ट के अंतर्गत न केवल बाबा पर बल्कि अखबार के मालिक पर भी मुकदमा दायर किया जा सकता है.दर असल यह स आम जन के बीच वैज्ञानिक चेतना ना होने की वज़ह से है .और इस चेतना के प्रसार के लिये जनता के उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता है.लेकिन प्रश्न यह है कि यह सब कौन करेगा.क्या हमारे जैसे चन्द ब्लॉगर मिलकर इस काम को कर सकेंगे? वर्षों से अनेक संस्थायें इस दिशा में कार्य रत हैं लेकिन यह समस्या कम होने की बजाय बढती ही जा रही है. फिर भी यह निराश होने का समय नही है.मिल जुल कर मनुष्य को इस मनुष्य निर्मित आपदा से बचाया जा सकता है.

मै अपने स्तर पर यह कार्य कर रहा हूँ.तथा स्कूलों,कॉलेजों मे छात्रों के बीच जाकर अपने व्याख्यान "मस्तिष्क की सत्ता' के माध्यम से वैज्ञानिक दृष्टि का प्रसार करता हूँ.इस व्याख्यान को रोल प्ले तथा सहायक सामग्री फ्लिप चार्ट आदि की सहायता से मैं प्रस्तुत करता हूँ.इसके अंतर्गत बृह्मांड की उत्पत्ति से लेकर सूर्य,गृहों व पृथ्वी के जन्म ,मनुष्य के जन्म तथा उसके आज तक के विकास में अथवा उसके अन्धविश्वास में उसके मस्तिष्क की भूमिका,व्यक्तित्व का विकास,संस्कारों की भूमिका ,आत्मा का अस्तित्व,मनोविज्ञान के laws of suggetions भूत-प्रेत व ढोंगी बाबाओं के किस्से आदि को मै अत्यंत रोचक एवं मनोरंजक ढंग से समझाता हूँ.कवितायें, चुटकुले,मीमीक्री आदि तत्वों से युक्त मेरा प्रस्तुतिकरण इतना रोचक होता है कि लगभग ढाई-तीन घंटे कोई अपने स्थान से हिलता नही हैं.इतनी देर मे सारे अन्धविश्वास दिमाग से निकल जाते है. ब्लॉग के माध्यम से इस आवश्यक एवं महत्वपूर्ण कार्य को करने वाले अपने अनेक साथियों को देखकर मुझमें आशा का संचार हुआ है और यह विचार मन में आया है कि इस व्याख्यान को स्क्रिप्ट का स्वरूप देकर और इसकी रोचकता को यथावत रखकर इसे ब्लॉग पर प्रस्तुत करूँ.आप सभी शुभचिंतकों,ब्लॉगर्स एवं पाठकों की राय इस बारे में आमंत्रित है. इसे यह नया स्वरूप देने में मुझे कुछ समय लग सकता है.तब तक बाबाओं के किस्से,पोल खोल के किस्से और चमत्कारों का भंडाफोड आदि चलते रहेंगे. कृपया इस बारे मे सुधी साथी मुझे सुझाव दें
.
आपका:शरद कोकास