सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

सोच रहा हूँ अब फिर से कुछ लिखा  जाए । आलस्य त्यागना ही होगा ।

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

कामिनी से लेकर कमीने तक


                                      
मनुष्य के मस्तिष्क ने अपने ऐतिहासिक विकासक्रम में  भाषा की  क्षमता अर्जित की है । आदिम मनुष्य ने अपने दैनिक क्रियाकलाप में शामिल व्यवहार में संकेतों को धीरे धीरे शब्द दिये । कालांतर में यही शब्द  कार्य व्यवहार में लाये गये  । स्मृति में शब्दों का समावेश तथा शब्दों द्वारा वाक्य संरचना की  इस क्षमता का विकास हमारे मस्तिष्क में हमारे बचपन में ही हो जाता है और हम अक्षर जोड़ जोड़ कर शब्द बनाने लगते हैं । हमारे माता- पिता और समाज के लोग इस क्षमता के विकास में हमारे सहायक होते हैं  । शाला में यह कार्य भलिभाँति सिखाया जाता है और मस्तिष्क अपनी यह विशेष क्षमता प्राप्त कर लेता है । जिन बच्चों मे यह क्षमता देरी से विकसित होती है वे पूरे शब्द बोलने में देर लगाते हैं या शब्दों का  ग़लत उच्चारण करते हैं ।
पाल ब्रोका 
सर्वप्रथम शरीरक्रिया विज्ञानी फ्लोरेंस ने कबूतरों पर प्रयोग कर मस्तिष्क के विभिन्न क्रियाकलापों पर अध्ययन किया । उन्होंने यह निष्कर्ष दिया कि मस्तिष्क के विभिन्न भागों की अलग अलग विशेषतायें होती हैं तथा इनके गुण भी अलग अलग होते हैं । अलग अलग स्थानों के अलग अलग कार्यों के बावज़ूद स्नायुमंडल समग्र रूप से कार्य करता है । फ्लोरेंस के कार्यों को पाल ब्रोका ने आगे बढ़ाया और उन्होंने सन 1861 में मस्तिष्क के भाषा क्षेत्र की खोज की । उन्होंने बताया कि बायें मस्तिष्कीय गोलार्ध के बगल में भाषा का केन्द्र अवस्थित होता है । मनोवैज्ञानिक ब्रोका के इस योगदान के फलस्वरूप मस्तिष्क के इस केन्द्र को मनोविज्ञान के क्षेत्र में ' ब्रोकाज़ एरिया ' के रूप में जाना जाता है । ब्रोका के इस कार्य को अन्य शरीर क्रिया विज्ञानियों फ्रिट्श तथा हिटज़िग ने आगे बढ़ाया ।
मस्तिष्क के इस क्षेत्र में अक्षरों से शब्द बनाने का काम होता है । मान लीजिये मैं आपको चार अक्षर देता हूँ ल ब ग और र और कहता हूँ कि इनसे कोई शब्द बनाईये तो आप तुरंत कहेंगे “ब्लॉगर “ । उसी तरह मैं आपको तीन शब्द दूँ ' म ' ' क ' और ' न ' तो आप  मकान, नमक , कान ,नाक, कमान, काका, नाना, मामा, कमान, नमक, और कामिनी से लेकर कमीने तक सारे सम्भाव्य शब्दों की रचना कर डालेंगे । उसी तरह ' म ' ' न ' और ' र ' अक्षरों से आप  मन , नर , मर ,राम ,मार , मरन , रमन ,नरम ,मीनार आदि शब्द बना सकते हैं ।
 अक्षरों से शब्दों के निर्माण में उनका उच्चारण विशेष महत्व रखता है । एक बच्चे ने अपने अध्यापक से कहा “ सर  ‘ नटूरे ‘ यानि क्या होता है ? “ अध्यापक ने कभी इस तरह का शब्द नहीं सुना था अत: उसने कहा " ऐसा कोई शब्द नहीं होता । अगर इस तरह के फालतू सवाल करोगे तो स्कूल से निकाल दिये जाओगे ।“ तब उस छात्र ने निराश होकर कहा “ सर इससे तो मेरा ‘ फुटूरे ‘ खराब हो जाएगा । “ बहुत देर बाद अध्यापक की समझ में आया कि वह ' नेचर ' ( NATURE ) और  ' फ़्यूचर  '  (FUTURE ) की बात कर रहा है ।
         इसी तरह शब्दों से वाक्य बनाने का काम भी मस्तिष्क के इसी क्षेत्र में सम्पन्न होता है । यदि मैं आपको तीन शब्द दूँ  प्रदत्त , जल और  प्रकृति “ तो आप तुरंत कह उठेंगे “ जल प्रकृति प्रदत्त है “ । सामान्य मनुष्य के अलावा एक कवि ,लेखक या वक्ता के लिये यह जानना बहुत ज़रूरी है कि यह कार्य मस्तिष्क किस प्रकार करता है । साधारण मनुष्य और लेखक दोनो के पास शब्द-भंडार लगभग समान होता है लेकिन लेखक कविता ,कहानी ,निबंध , ब्लॉग इत्यादि  लिखता है और सामान्य व्यक्ति यह सब नहीं लिख पाता । इसका सरल सा कारण है कि लेखक अपने मस्तिष्क की इसी क्षमता का उपयोग कर व्यवस्थित रूप से शब्दों का उपयोग कर वाक्य संरचना करता है । एक लेखक के लिये वाक्य संरचना के अलावा ज्ञान, कल्पना , बिम्ब निर्माण तथा विषय की जानकारी आदि अन्य गुणों का होना भी आवश्यक है ।  
लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सामान्य व्यक्ति  मस्तिष्क की इस क्षमता का उपयोग नहीं करता । यदि वह इस क्षमता का उपयोग नहीं करेगा तो अपने विचारों को वाक्यों के द्वारा अभिव्यक्त नहीं कर पायेगा । मस्तिष्क की इस कार्यप्रणाली का हम अपने जीवन में सबसे अधिक प्रयोग बोलने में ही करते हैं । इसी क्षमता के कारण हम अपने शब्द भंडार , व्याकरण व भाषा के ज्ञान का सार्थक उपयोग करते हैं । - शरद कोकास

( चित्र गूगल छवि से साभार )  

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

आप बहुत खुश हो जाते हैं या रोने लगते हैं ?


मस्तिष्क के क्रियाकलाप - 8 व्यवहार नियत्रंण : आप अपने दिन भर के क्रियाकलापों को याद करें । आप सुबह जागते हैं नित्यक्रम से निवृत होते हैं ,भोजन करते है ,दफ्तर जाते हैं या अपने काम पर जाते हैं, सहकर्मियों से या परिजनों से सहज वार्तालाप करते हैं । हर जगह आप संयत होकर काम करते हैं । ऐसा नहीं होता कि आप दफ्तर में काम करते हुए अचानक नाचने लगें या परिजनों से बात करते हुए अचानक उखड़ जायें और किसीको तमाचा जड़ दें । अगर आप सभीसे अच्छी तरह बात करते हैं , सब का सम्मान करते हैं तो आपके बारे में कहा जाता है कि आपका व्यवहार अच्छा है । मस्तिष्क में व्यवहार नियंत्रण की यह क्षमता धीरे धीरे विकसित होती है । हमारे सामाजिक क्रियाकलापों और हमारे संस्कारों का इससे सीधा संबंध होता है ।
यही है मस्तिष्क के इस विभाग का कार्य जो आपके व्यवहार को नियंत्रित करता है । यह सिस्टम अगर फेल हो जाये तो आप अचानक उठकर नाचने लगेंगे या विक्षिप्तों जैसी हरकतें करने लगेंगे । या ऐसी बातें करने लगेंगे जिनका कोई सिर पैर ही नहीं  है । यद्यपि हमारी दिनचर्या में कई बार ऐसा अवसर आता है कि मस्तिष्क का यह भाग ठीक से अपना कार्य नहीं करता , हम कई बार आपा खो बैठते हैं ,या हम अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं कर पाते हैं । इसी तरह अनेक बार हम अपनी भावनाओं पर भी नियंत्रण नहीं कर पाते हैं या तो बहुत खुश हो जाते हैं या रोने लगते हैं ,लेकिन सामान्य स्थितियों में जब यह भाग सुचारु रूप से अपना कार्य करता है , हम अपना आचरण मर्यादा में ही रखते हैं और हमारे क्रियाकलाप सामान्य रूप से घटित होते हैं ।
 हमारे पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बारे में एक चुटकुला मशहूर है कि वे एक बार आगरा के पागलखाने विज़िट के लिये गये एक पागल ने उनसे पूछा “ आप कौन हैं  ? “ तो उन्होने जवाब दिया “ मै जवाहरलाल नेहरू हूँ ।“ इस पर उस पागल ने तुरंत मुँह पर उंगली रखी और कहा “ धीरे बोलो तीन महिने पहले मैं भी यही कहता था , तो इन लोगों ने मुझे पकड़कर यहाँ बन्द कर दिया । “ 
उम्मीद है आप लोग मस्तिष्क के इस हिस्से को इतना मज़बूत बना कर रखेंगे कि आपका व्यवहार सदा नियंत्रण में रहे । 
उपसर्ग में प्रस्तुत है कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की प्रसिद्ध कविता " कुआनो नदी के पार " से यह एक अंश.. 
 
यह पागल था 
पुलिस की हिरासत में 
निजाम उलटने के गीत गा रहा था 
यह एक किराये के जुलूस का 
 तमाशा देखते देखते 
अपनी ज़रूरतों पर सोचने लगा था 
गोली चलने पर भागना भूल गया 

यह हरिजन था इसे ज़िन्दा जला दिया गया 
यह अनपढ़ गरीब था 
इसे देवी की बली चढ़ा दिया गया 
यह 
आस्थावान धर्मगुरुओं की कोठरी में 
मरा 
यह 
अनजानी ऊँचाइयाँ छूना चाहता था 
छत की कड़ी से झूल गया 

मैं देखता हूँ और भागता हूँ 
मैं भागता हूँ और देखता हूँ 
मैं यह मानना नहीं चाहता 
कि नदी के पार कुछ नहीं है 
सिवा लाशों के ।

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

विचार आते हैं लिखते समय नहीं - मस्तिष्क की कार्यप्रणाली

                                          मस्तिष्क की कार्यप्रणाली -7  

 प्लानिंग काम्प्लेक्स : मस्तिष्क की कार्य प्रणाली का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है योजना बनाना । विचारों का उन्नयन भी यहीं से होता है । वैचारिक क्षमता यहाँ विद्यमान रहती है । हमें ज्ञात है कि हमारा भोजन करने का समय नौ बजे है फलस्वरूप हम आठ बजे से ही भोजन पकाने की योजना बनाने लगते हैं । यदि हमने कुछ लोगों को खाने पर बुलाया है तो एक दिन पूर्व ही हम उसकी योजना बना लेते हैं । योजना बना कर कार्य करने से सुविधा रहती है और समय पर व्यर्थ की भाग दौड़ से हम बच जाते हैं । जीवन के अनेक महत्वपूर्ण कार्य शादी ब्याह , जन्मोत्सव आदि हम योजना बनाकर ही करते हैं । संतान की उत्पत्ति का कार्य भी आजकल योजना बनाकर ही किया जाता है ।
                 इसी प्रकार तर्क क्षमता भी मस्तिष्क के इसी हिस्से में मौजूद रहती है । जैसे मैं आप से कहूँ कि वहाँ धुआँ है तो तुरंत आपके मस्तिष्क में यह विचार जन्म लेगा कि फिर वहाँ आग भी होगी । यद्यपि विज्ञान के ऐसे अनेक प्रयोग हैं जहाँ धुएँ के लिये आग की ज़रूरत नहीं है । जिस प्रकार यहाँ से तर्क किये जाते हैं उसी प्रकार कुतर्क भी किये जाते हैं । कुतर्क का अर्थ यह होता है जिसका कोई प्रमाण नहीं होता । जैसे कि हम कहें गोरे आदमी की हड्डियाँ बनिस्बत काले के ज़्यादा सफेद होती होंगी ।
             विचार करना यह मस्तिष्क का महत्वपूर्ण कार्य है ।  हम कुछ भी काम  कर रहे हों सोच विचार करते रहते हैं । मस्तिष्क की यह विचार प्रणाली ही है जिसकी वज़ह से सब कुछ सम्भव होता है । मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता है “ विचार आते है लिखते समय नहीं / पीठ पर बोझा ढोते हुए / कपडे पछींटते हुए “ हाँलाकि लिखते समय भी विचार तो आते ही हैं ,कुछ लोगों के साथ ऐसा नहीं होता फलस्वरूप वे बिना विचार के ही लिखते हैं । विचार आपको कहीं भी आ सकते हैं । अगर आप दफ्तर में हैं या किसी फंक्शन में हैं और बैठे बैठे ऊब रहे हैं तो मस्तिष्क की इसी जगह से विचार करते हैं कि घर कब जायेगें । इस तरह वैचारिक क्षमता यहाँ विद्यमान होती है  ।

उपसर्ग में प्रस्तुत है मुक्तिबोध की कविता - विचार आते हैं 

विचार आते हैं - 
लिखते समय नहीं 
बोझ ढोते वक़्त पीठ पर 
सिर पर उठाते समय भार 
परिश्रम करते समय

चांद उगता है व 
पानी में झलमिलाने लगता है 
ह्रदय के पानी में 

विचार आते हैं 
लिखते समय नहीं 
पत्थर ढोते वक़्त 
पीठ पर उठाते वक़्त बोझ 
साँप मारते समय पिछवाड़े 
बच्चों की नेकर फचीटते वक़्त !! 

पत्थर पहाड़ बन जाते हैं 
नक़्शे बनते हैं भौगोलिक 
पीठ कच्छप बन जाते हैं 
समय पृथ्वी बन जाता है ... 

रविवार, 21 नवंबर 2010

पत्नी को आदेश मस्तिष्क का यह भाग देता है

6 आज्ञा केन्द्र (Morter Area ) एक तरह से यह मस्तिष्क का प्रधान मंत्री कार्यालय है । लगभग सारे विभाग इसी कार्यालय के अंतर्गत आते हैं । योजना विभाग भी इसी मंत्रालय के  अधीन है । सभी शारीरिक हरकतों की योजनाएँ यहाँ बनती है । उदाहरणार्थ आप कम्प्यूटर पर काम कर रहे हैं । इतने में एक गुस्ताख मच्छर आपकी बाईं बाँह पर बैठता है और अपनी सूँड चुभोने लगता है । क्षण मात्र में रगों में बहते रक्त के माध्यम से यह सूचना आपके मस्तिष्क के सोमेटोसेंसरी एरिया में पहुँच जाती है और वहाँ से उससे भी कम समय में आज्ञा केन्द्र अर्थात प्रधानमंत्री कार्यालय में । वहाँ इस सूचना पर त्वरित कार्यवाही होती है और आपके शरीर की पुलिस फोर्स अर्थात हाथों के लिये आदेश ज़ारी होता है कि इसे भगाओ  । हाथों की मसल्स तुरंत एक्शन में आ जाती हैं दाया हाथ तुरंत उठता है और बायें हाथ तक पहुँच जाता है  और पटाक से मच्छर का मर्डर हो जाता है । हाँ यदि आपके मस्तिष्क में अहिंसा की प्रोग्रामिंग है और आप मच्छर ही क्या बेक्टेरिया और वाइरस की हत्या के भी खिलाफ हैं तो आप उसे केवल भगाकर ही संतुष्ट हो जाते हैं । इसके बाद आपके हाथ पुन: पूर्व में आदेशित कार्य सम्पन्न करने में लग जाते हैं ।
मच्छर के अलावा अन्य जीवों की हत्या में भी यही प्रक्रिया होती है । मच्छर बेचारे की गलती तो यह थी कि उसने आप को काटा हाँलाकि यह उसने अपनी भूख मिटाने के लिये किया लेकिन हम बिना किसी अपराध के साँप ,मूक पशु और मनुष्यों तक की हत्या कर डालते हैं ।
तात्पर्य यह कि मस्तिष्क़ के इस विभाग से सारे आदेश प्रसारित होते हैं जैसे आपको प्यास लगी हो और गला सूख रहा हो तो गले से रिक्वीज़ीशन मस्तिष्क तक जाती है , वहाँ पर यह तय किया जाता है कि पिछली बार जब प्यास लगी थी तो क्या किया गया था । बचपन में माँ द्वारा पानी पिलाने से लेकर खुद पानी पीने तक की स्मृतियाँ क्षण मात्र में दोहराई जाती हैं । वहाँ से यह फाइल आदेश विभाग में जाती है , जहाँ से आदेश होता है पानी पियो ,पाँवों को आदेश दिया जाता है फलस्वरूप हम उठते हैं और पानी के टैप तक या मटके या फ्रिज तक  जाते हैं । हाथों को आदेश दिया जाता है , बॉटल निकालो या  गिलास उठाओ और उसमें पानी लेकर मुँह तक ले जाओ , इस तरह हम कुछ क्षणों में ही पानी पी लेते हैं और अपनी प्यास बुझाते हैं  । लेकिन कुछ लोग कुर्सी पर बैठे बैठे पत्नी को ज़ुबानी आदेश देते है “ हमरे लिये पानी लाओ । " पत्नी के शरीर की श्रवण प्रणाली द्वारा यह आदेश उसके मस्तिष्क़ तक पहुँचता है और फिर उसके द्वारा पति को पानी पिलाये जाने की क्रिया हेतु नविन आदेश उसके मस्तिष्क द्वारा जारी होता है ।   इस तरह पत्नी को ऑर्डर देने का यह काम भी इसी मस्तिष्क से होता है यानि पहला ऑर्डर यथावत रहते हुए ज़ुबान के लिये दूसरा ऑर्डर जारी हो जाता है ।
इसी तरह बहुत देर बैठे रहने पर पैर अकड़ जाता है तो मस्तिष्क के इसी विभाग से पैर की मसल्स के लिये आदेश ज़ारी होता है “ कुछ हिलो डुलो भई “। हमारे समस्त बाह्य अंगों को मस्तिष्क के इसी केन्द्र से आदेश प्राप्त होते हैं । बावज़ूद इसके शरीर के भीतर की अनेक क्रियाएँ होती हैं जो बिना मस्तिष्क के आदेश के सम्पन्न होती हैं जैसे की दिल का धड़कना । ( चित्र गूगल से साभार ) 
उपसर्ग में प्रस्तुत है  
राधिका अर्जुन द्वारा बनाया गया 
शमशेर बहादुर सिंह की कविता पर 
यह यह कविता   पोस्टर ।

इसे पढ़ते हुए मेरे मन में प्रश्न आया कि किसीसे प्रेम करने के लिये भी हमारा मस्तिष्क हमें कोई आदेश देता है क्या, जिसके फलस्वरूप  हम अगले व्यक्ति से  कहते हैं .. मुझे प्रेम करो ..
क्या कहते हैं आप ? 


सोमवार, 15 नवंबर 2010

गर गले नहीं मिल सकता तो हाथ भी न मिला


             मस्तिष्क की कार्यप्रणाली

सोमेटोसेंसरी एरिया : मस्तिष्क का यह इंद्रीय संवेदों का केन्द्र है  । इस केन्द्र की कार्यप्रणाली को स्पष्ट करने के लिए मै आपको याद दिलाना चाहता हूँ एक मशहूर फ़िल्मी गीत की जो पिछले दिनों बहुत लोकप्रिय रहा है । यह एक आईटम सॉंग है .. बंगले के पीछे तेरी बेरी के नीचे  हाय रे काँटा लगा ..। इस मधुर गीत के रीमिक्स के दृश्य को कृपया याद न करें मैं केवल उस चुभन की ओर आपका ध्यान आकर्षित करवाना चाहता हूँ जो काँटा लगने पर होती है । हो सकता है काँटा चुभने का अनुभव आपको न हो लेकिन सुई या कोई नुकीली वस्तु चुभने का तो होगा ही । इस चुभन को हम मस्तिष्क के इसी केन्द्र द्वारा महसूस करते हैं ।
हमारे शरीर की त्वचा अत्यंत संवेदनशील होती है । इस बात का पता इससे भी चलता है कि कुछ लोग बैठे बैठे यहाँ वहाँ खुजाते रहते हैं । मस्तिष्क के इस केन्द्र तक शरीर के उस भाग से सूचना आती है और हाथ मस्तिष्क की आज्ञानुसार अपना काम करने कगता है । इस कार्यप्रणाली के कारण  जैसे ही हम कोई गरम या ठंडी चीज़ पकड़ते हैं या हमें मच्छर या कोई कीट काटता है तो हमे तुरंत पता चल  जाता  है । कोई हमें स्पर्श करता है तो हमें पता चल जाता है । यह बात अलग है कि कुछ स्पर्श सुखद होते हैं और कुछ दुखद । हाथ मिलाते हुए किसका हाथ कड़ा है और किसका हाथ नर्म है यह हमें यहीं से ज्ञात होता है । इसी तरह गले मिलने का सुख भी यहीं से मिलता है यह अलग बात है कि कोई गले मिलने के लिये गले मिलता है तो कोई गला काटने के लिये । अपने प्रिय से गले मिल कर हमें प्रसन्नता महसूस होती है । लेकिन कई लोग दिखावे के लिये भी गले मिलते हैं । ऐसे ही लोगों के लिये शायर जनाब बशीर बद्र ने लिखा है
      “ मोहब्बत  में  दिखावे  की  दोस्ती      मिला
       गर गले नहीं मिल सकता तो हाथ भी न मिला ।“
तो जनाब यह काँटा लगने ,मच्छर काटने, गले मिलने ,दर्द और खुजली आदि की अनुभूति हम मस्तिष्क के इसी इन्द्रीय संवेदों के केन्द्र से महसूस करते हैं । गाल पर ममत्व के दुलार का स्पर्श भी हम यहीं से महसूस करते है और गाल पर चाँटे का दुख भी यहीं से महसूस करते हैं । बचपन में यदि आपको मार पड़ी होगी तो उसे याद कीजिये , उस का दर्द आपने मस्तिष्क की इसी कार्यप्रणाली की वज़ह से महसूस किया था । 
यह भी एक अच्छी बात है कि हर अनुभूति संवेदना के स्तर पर हमारे मस्तिष्क में दर्ज हो जाती है । हम काँटे की चुभन जानते हैं इसलिये कंटक विहीन मार्ग से चलना चाहते हैं और दूसरों के लिए भी कामना करते हैं कि उनके मार्ग में कोई काँटा न आये ।  हम गर्म वस्तु या आग से जलने का कष्ट जानते हैं इसलिये आग से बचना चाहते हैं । उसी तरह हम स्पर्श या दुलार का सुख भी जानते हैं इसलिये बार बार उसे पाना चाहते हैं । 
( चित्र गूगल से साभार )