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बुधवार, 2 अगस्त 2017

आपकी जेब में मोबाइल की जगह रिवोल्वर हो तो ?

गूगल से साभार 

आजकल धर्म और संस्कृति के नाम पर यह भ्रम उत्पन्न किया जा रहा है कि जो कुछ प्राचीन है वही अंतिम है । विडम्बना यह है कि यह भ्रम उत्पन्न करने वाले स्वयं नवीनता का उपभोग करते हैं  और अपने अनुयायियों को इसका निषेध करने के लिए  कहते हैं  । ए सी में बैठकर प्रवचन करने वाले और विज्ञान द्वारा प्रदत्त तमाम सुविधाओं का उपभोग करते हुए विज्ञान का ही निषेध करने वाले  तथाकथित बाबाओं को हम इसी श्रेणी में रख सकते हैं । वस्तुतः ज्ञान अपने आप में परिपूर्ण होता है और उसकी बात अंतिम होती है ,इसके विपरीत विज्ञान किसी बात को अंतिम नहीं  मानता है और प्राचीन की नये सन्दर्भों में व्याख्या करता है इसलिए  कि यह प्रयोगों और परिणाम पर आधारित होता है ।

विज्ञान क्या है यह जाने बगैर हम किसी भी बात को विज्ञान से जोड़ देते हैं और उसे ही अंतिम सत्य मान लेते हैं जबकि विज्ञान स्वयं उसे अंतिम सत्य नहीं मानता । हम विज्ञान और छद्म विज्ञान में अंतर नहीं कर पाते इसका कारण यही है कि अभी हमने विज्ञान को ही सही तरीके से नहीं जाना है । यह जानने के लिए  हमें विज्ञान क्या है इस बारे में कुछ बातें जानना जरुरी है । विज्ञान पर हमारी आस्था कम होने के कुछ कारण और भी हैं ।

जैसे कि मोबाइल का आविष्कार हमें इसलिए  अच्छा लगता है कि यह हमारे काम की वस्तु है लेकिन वहीं बम और बंदूकों के आविष्कार से हमें डर लगता है क्योंकि हम जानते हैं कि यह हमारे विनाश के लिए  हैं । आज बहुत सी  साम्राज्यवादी  और पूंजीवादी  ताकतें विज्ञान का अपने हित में उपयोग कर रही हैं वे मनुष्यता के विनाश के लिए  इसका उपयोग कर रही हैं जो मनुष्य को विज्ञान द्वारा मिलने वाली सुविधाओं की तुलना में  उस पर अधिक हावी हैं । विज्ञान वस्तुतः अवलोकन ,अध्ययन ,परीक्षण , तथा प्रयोगों के माध्यम से प्राप्त किसी विषय का क्रमबद्ध ज्ञान है । प्रकृति में प्रारंभ से ही समस्त चीज़ें बिखरी हुई हैं । मनुष्य ने अपनी आवश्यकता के तहत उन वस्तुओं का उपयोग करना प्रारंभ किया । जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में उसने उपलब्ध संसाधनों का दोहन किया फलस्वरूप उसने अनेक वस्तुओं का अविष्कार किया । अपनी परिकल्पना को मूर्त रूप देते हुए उसने ऐसी अनेक विधियों का विकास किया जो उसके जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को हासिल करने में उसे सुविधा प्रदान करती थीं । विज्ञान का जन्म ही उत्पादन, लागत और समय में कमी लाने के लिए  हुआ है ।

इस तरह विज्ञान एक विशिष्ट अध्ययन पद्धति है जो व्यक्ति की प्रश्नाकुलता का समाधान करती है , घटनाओं के मूल में जो कारण  हैं उनकी खोज करती है , उनका क्रमबद्ध , तर्कसंगत बोध प्रस्तुत करती है जिसका प्रयोगों के माध्यम से परीक्षण किया जा सकता है । विज्ञान के सिद्धांत इन्हीं  प्रयोगों पर आधारित होते हैं जिन्हें सुरक्षित रखा जाता है । यह कई असफल प्रयोगों के बाद होता है जिनका ध्यान रखते हुए वैज्ञानिकों की अगली पीढ़ी इन्हीं  सिद्धांतों पर काम करती है । जो प्रयोग सफल हो चुके हैं उन्हें दोहराया नहीं जाता ।  विज्ञान मानता है कि हर बात के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है और उसका एक निश्चित परिणाम होता है । अगर हम कारण और परिणाम में सम्बन्ध नहीं देखते हैं तो वह विज्ञान के अंतर्गत नहीं आएगा । इसी कारण इतिहास के नये अर्थ उद्घाटित होते  हैं और पुराने अनुभव तथा नये ज्ञान की रोशनी में भविष्य का मार्ग प्रशस्त होता है ।

शरद कोकास  



गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

अरे वा ! ..श्रीदेवी की फोटो से भी भभूत निकलती है ..कमाल है !!!


यह लगभग पन्द्रह वर्ष पुरानी घटना है । एक दिन  सड़क पर वर्मा जी मिल गये बहुत उत्साह से बताने लगे “शरद जी पता है कल पाण्डे जी के यहाँ भजन था और एक चमत्कार हो गया ,हम लोगों ने गाना शुरू ही किया था कि अचानक बाबा की फोटो से भभूत झड़ने लगी ,पाण्डे जी ने सबका ध्यान आकर्षित करवाया ,हम लोगों ने वह भभूत माथे पर लगाई । सचमुच बाबा में बहुत शक्ति है वरना कलयुग में ऐसा चमत्कार कहाँ होता है ?
मैने कहा “वर्मा जी ,आप भी कहाँ इन बातों में विश्वास करते है यह सब चमत्कार नहीं विज्ञान के प्रयोग हैं । बस इतना कहा था मैने कि वर्मा जी चिढ़ गये ..” देखिये आपको नहीं मानना है तो नहीं माने लेकिन बाबा पर अविश्वास तो न करें । मैने फिर कहा “ मै बाबा पर अविश्वास नहीं कर रहा हूँ मैं तो पाण्डे जी द्वारा किये चमत्कार की बात कर रहा हूँ जिसके पीछे विज्ञान का एक साधारण सा प्रयोग है ।“
खैर वर्मा जी तो उस दिन मान गये लेकिन यह बात मन में गूंजती रही ।फिर एक दिन नागपुर की अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति के उमेश बाबू चौबे ,गणेश हलकारे व हरीश देशमुख जी ,साक्षरता समिति के तहत एक शिविर मे दुर्ग पहुंचे तो उनसे मैने यह किस्सा बताया । गणेश भाई हँसने लगे ,कहा “ इसमे कौनसी बड़ी बात है..देवी देवताओं के चित्र से तो भभूत हम भी निकालते हैं अभी उस दिन नागपुर में हमने “श्रीदेवी” की फोटो से भभूत निकाली है ।चलिये घोषणा करवा दीजिये कल यहाँ के किसी सार्वज़निक स्थान पर यह प्रयोग करें ।“ मैने कहा “ठीक है .. अखबारों में विज्ञप्ति दे दी गई “ कल शाम पाँच बजे पुराने बस स्टैंड पर एक आम सभा में आइये और देखिये श्रीदेवी की फोटो से भभूत कैसे निकलती है ।“
तुरंत ऑर्डर देकर एल्युमिनियम की फ्रेम में जड़ी श्रीदेवी की एक तस्वीर तैयार करवाई गई, मंच तैयार किया गया और उस पर एक कुर्सी रखी गई जिस की पीठ से टिकाकर  श्रीदेवी को विराजित किया गया ,बाकायदा अगरबत्ती लगाई गई ,फूल चढ़ाये गये और लोगों ने देखा कि कुछ देर में उस फोटो के काँच पर भभूत गिरने लगी है ।
इस बीच हमारे कार्यकर्ता लोगों को अन्य प्रयोग कर के भी दिखा रहे थे ।इस चमत्कार के बारे में कुछ लोगों ने पूछा तो बताया गया यह तो बहुत आसान है । अल्युमिनियम की फ्रेम पर चुपचाप मर्क्युरस क्लोराइड का पाउडर लगा देते हैं जो सफेद होता है और आसानी से दिखाई नहीं देता थोड़ी देर में दोनों की रासायनिक क्रिया शुरू हो जाती है और  उससे जो पदार्थ तैयार होता है वह भभूत जैसा दिखता है ।एक कार्यकर्ता ने बोर्ड पर यह फार्मूला ही लिख दिया ।
              6Hg2Cl2+2Al = 2AlCl3+3Hg2Cl2+6Hg
वर्मा जी को तो वहाँ पहुंचना ही था वे आये और उन्होने श्रद्धा भक्ति के साथ श्रीदेवी की तस्वीर के आगे हाथ जोड़े और कहा “ देखा बाबा का चमत्कार , श्रीदेवी जी की फोटो में भी प्रकट हो गये ।“ हम लोग हँसने लगे । समिति सचिव डी.एन.शर्मा जी ने उनसे कहा “धन्य हो प्रभु , इस देश की जनता हर स्त्री में इसी तरह भगवान का वास ही मानने लगे तो भले ही अपने अन्धविश्वास न दूर करे ,कम से कम उनके आगे हाथ जोड़ कर उनका सम्मान तो  करने लगे  ।“
घोषणा : यह किस्सा सौ प्रतिशत सत्य है – आपकी राय ?- शरद कोकास

छवि गूगल से साभार