2 : शब्दों का प्रतिमा में रुपांतरण : मस्तिष्क द्वारा किये जाने वाले अनेक कार्यों के अंतर्गत यह मस्तिष्क का एक और कार्य है । यह किस तरह होता है यह समझाने के लिए मैं आपको कुछ शब्द दे रहा हूँ । जैसे ही आप उस शब्द को पढ़ेंगे आप को उस से जुड़ी प्रतिमा, इमेज या छवि याद आयेगी । जैसे मै कहता हूँ “ एक पेड़ । ” तो आपने जो भी पेड़ देखा होगा या जिस पेड़ की छवि आपकी स्मृति में होगी उस छवि की कल्पना आप करेंगे । हो सकता है बहुत से पेड़ आपने देखे हों लेकिन उनमें से कोई एक पेड़ ही आपको याद आयेगा । लेकिन मैं अगर कहूँ जंगल तो आपको बहुत से पेड़ों के अलावा पहाड़ , झरने या जंगल में जो कुछ भी आपने देखा हो याद आ जायेगा । हो सकता है कई लोगों को अब तक जंगल देखने का अवसर ना प्राप्त हुआ हो लेकिन अगर आपने जंगल को चित्र में देखा हो तो वह याद आयेगा ।उसी तरह मैं कहूंगा “ कम्प्यूटर “ तो आपको डेस्कटॉप या लैप टॉप , कम्प्यूटर का जो भी चित्र आपके मस्तिष्क मे होगा वह याद आ जायेगा ।

उपसर्ग में प्रस्तुत है मस्तिष्क की इस क्षमता पर लिखी मेरी एक और कविता
मस्तिष्क के क्रियाकलाप –तीन –कल्पना
डार्करूम के अन्धेरे में तैरते
अतीत और वर्तमान के तमाम चित्रों के साथ
सैकड़ों चित्र भविष्य के तैरते हैं यहाँ ईथर में
रूप रंग रस गन्ध और स्पर्श की अनुभूतियाँ
यहाँ चित्रों में ढलती हैं
आँखों के कैमरे में पलकों का शटर खुलता है
और कैद हो जाता है सब कुछ स्थायी रूप में
फिर जॉर्ज बुश या ओबामा का नाम सुनते ही
जेहन में उभरता है
तथाकथित विश्वचौधरी का चेहरा
अमिताभ बच्चन का ज़िक्र होते ही
एक एंग्री यंग मैन सम्वाद बोलता नज़र आता है
कल्पना में शामिल होते हैं लोग दृष्य और वस्तुएँ
जो कभी न कभी हमारे देखे सुने होते हैं
अन्धों का हाथी ठीक इसी प्रक्रिया में
खम्भे सूप और रस्सी में बदलता है
जैसे माँ शब्द सुनते या पढ़ते ही
हमें याद आती है अपनी माँ
जिसे हम होश सम्भालने के बाद पहचानते हैं
माँ की कल्पना में वह छवि कहीं नहीं होती
जिसमें हमे वह जन्म दे रही होती है
या स्तनपान करा रही होती है
ऐसी कल्पना तो देवताओं के लिये भी सम्भव नहीं
यहाँ प्रकट होती है मस्तिष्क की सीमाएँ
जिसकी क्षमता से किसी अन्य स्त्री के चित्र में
माँ का चित्र आरोपित कर
हम स्त्री में माँ का रूप देख सकते हैं
यही तो है मस्तिष्क का कमाल
जहाँ पढ़े हुए शब्दों
और देखे सुने दृष्यों के आधार पर
हम कल्पना कर सकते हैं आगत और विगत की
पृथ्वी पर मनुष्य के जन्म की
और मनुष्य के मन में जन्मी
ईश्वर की कल्पना कर सकते हैं हम
इसी मस्तिष्क से ।
-- शरद कोकास
( चित्र : श्रीमती ऐश्वर्या राय , श्रीमती शीला कोकास , श्रीमती फ्लोरेंस नाइटिंगेल , श्री अरुण गोविल , गूगल से साभार )