मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

क्या आप धारावाहिक और फिल्में देखते हुए रोते हैं ?


              
                          अज्ञात शक्तियों की कल्पना
मनुष्य के मस्तिष्क की विकलांगता का यह सिलसिला बहुत पुराना नहीं है लेकिन इससे सबसे अधिक नुकसान यह हुआ कि हमने विश्वास और अन्ध विश्वास मे अंतर करना छोड़ दिया । फलस्वरूप ऐसी अनेक मान्यताओं ने हमारे जीवन मे अपना स्थान मज़बूत कर लिया जिनका वास्तविकताओं से कोई सम्बन्ध नहीं है। मानव जीवन के प्रारम्भिक दौर में जब मनुष्य जन्म ,मृत्यु और प्रकृति के रहस्यों से नावाकिफ था ,बीमारियाँ और प्राकृतिक विपदायें उसे घेर लेती थीं और वह असमय ही काल के गाल में समा जाता था । कार्य और कारण का सम्बन्ध ना स्थापित कर पाने के कारण उसने अनेक अज्ञात शक्तियों की कल्पना की और अपने विवेकानुसार अपने जीवन को सुरक्षित रूप से संचालित करने के लिये अनेक मान्यतायें गढ़ लीं ।
प्राचीन मनुष्य आकाश में घटित होने वाली परिघटनाओं को एक बच्चे की तरह बहुत उत्सुकता से देखता था । वह देखता था कि सूर्य जब आकाश में होता है तो सब कुछ साफ दिखाई देता है ,उष्णता का अनुभव होता है,जंगली जानवर दूर भाग जाते हैं । वहीं रात में चांद रोज़ आकार बदलता है और एक निश्चित अवधि के बाद फिर पूरा दिखाई देता है । इस अवधि को उसने महीना माना । उसी तरह सितारों की रोज़ बदलती स्थिति और एक वर्ष पश्चात फिर उसी स्थान पर दिखाई देने की गणना के  अनुसार वर्ष की व्याख्या की गई । सभ्यताओं के विकास के क्रम में सिन्धु, बेबीलोनिअन, मिस्त्र ,मेसोपोटामिया और चीनी सभ्यतायें, नदियों के किनारे विकसित हुईं। इन लोगों ने बृह्मांड ,सूर्य ,आकाश ,चांद, तारों के बारे में अपनी कल्पनायें कीं । जैसे प्राचीन मिस्त्र के लोग आकाश को सितारों से जड़ी देह लिये एक देवी मानते हैं । यूनानियों के अनुसार आकाश एक छत है जहाँ दैत्य विशालकाय मशीनें चलाते हैं , वहीं हमारे यहाँ मान्यता है कि वासुकि नाग की गोद में विष्णु कछुए के रूप में बैठे हैं और अभी भी पुराने लोग यह मानते हैं कि वासुकि नाग के क्रोध में फन हिलाने की वज़ह से भूकम्प आते हैं ।
          बृह्मांड के रहस्य को आज भी पूरी तरह नहीं जाना जा सका है लेकिन जितना हम जानते हैं उसे जानने में भी मनुष्य को लगभग 2000 वर्षों का समय तो लगा ही है । कल्पनाओं से वास्तविकता में आने के लिये यह अवधि कम नहीं है । दूसरी सदी के यूनानी वैज्ञानिक क्लॉडियस टॉलेमी से लेकर ,आर्यभट्ट .हिस्टॉर्कस,  पन्द्रहवीं सदी के टाईकोब्राहे,  निकोलस कॉपरनिकस , गियार्डानो ब्रूनो , गेलेलिओ ,केपलर और न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों के योगदान को इस बात के लिये कम करके नहीं आंका जा सकता।
          अफसोस यही है कि एक ओर इन वैज्ञानिक मान्यताओं पर विश्वास करते हुए भी हम सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण का कारण राहु-केतु द्वारा उन्हें निगला जाना मानते हैं ? भूकम्प का कारण नाग का हिलना मानते हैं  ? करवा चौथ पर चांद की पूजा कर ,प्रताड़ित करने वाले पति  के लिये भी  लम्बी उम्र की दुआयें मांगते हैं ,( ग्लीसरीन के आँसू के सहारे बनाये जाने वाले धारावाहिकों और फिल्मों को देख कर ज़ार ज़ार रोते हैं ) , डीहायड्रेशन होने पर बच्चे की नज़र उतारते हैं ,बिल्ली के रास्ता काट देने पर या किसी के छींक देने पर ठिठक जाते हैं । हम भूत-प्रेत,पुनर्जन्म, लोक-परलोक, आत्मा,मोक्ष आदि में आँख मून्दकर विश्वास करते हैं । ऐसे ना जाने कितने अन्धविश्वास हैं जिन्हे हमने अपने मस्तिष्क में स्थान दे रखा है । इन्हे हम दूर करना भी चाहते है लेकिन तथ्यों पर विश्वास करने में भय महसूस करते हैं । हम स्वयं को आधुनिक और पढ़े-लिखे कहलाना तो पसन्द करते हैं लेकिन जो परम्पराएं चली आ रही हैं उनकी हम पड़ताल नहीं करते । आस्था हमारा मार्ग अवरुद्ध करती है और आधा सच और आधा झूठ स्वीकार करते हुए उसी तरह जीवन भर दोहरे मानदंडों के साथ जीते हुए पारलौकिक सुख और मोक्ष की कामना करते हुए अंतत: मनुष्य जीवन से मुक्त हो जाते हैं ।
छवि गूगल से साभार

29 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लागवाणी से भटकते हुए पहली बार आपके ब्लाग पर पहुंचा। आकर अच्छा लगा। अफसोस हुआ कि पहले क्यों नहीं पहुंचा था।
    अंधविश्वास के खिलाफ मुहिम जारी रखें।

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  2. आस्था और अन्धविश्वास मे फर्क कर पना तभी सम्भव है, जब परम्पराओ मन्यताओ से आगे बड कर विग्यान का सहरा लिया जाए ...अच्छा लेख है!
    आभार
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

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  3. क्या आप धारावाहिक और फिल्में देखते हुए रोते हैं ?

    शरद भाई, आप भी न कैसे-कैसे सवाल करते हैं, भला शादीशुदा आदमी को रोने के लिए धारावाहिक और फिल्में देखने की क्या ज़रूरत...

    जय हिंद...

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  4. शायद बचपन से देखते सुनते अवचेतन मन में गहरे पैठ कर जाती हैं यह सब बातें और फिर लाख तर्कों से भी नहीं निकलती.

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  5. पोस्ट बहुत अच्छी लगी शरद जी..

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  6. @समीर भाई, यह सच है कि अवचेतन में बैठी बातों को तर्कों से निकालना मुश्किल होता है ,लेकिन यह काम सेल्फ सजेशन से ही सम्भव है। इसके लिये हमें मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को बेहतर तरीके से जानना ज़रूरी होगा । यह कैसे किया जाता है यही बात मैं आगे चलकर धीरे धीरे बताउंगा । कृपया इसे धैर्यपूर्वक पढ़ते रहें । यहाँ पधारने के लिये धन्यवाद ।

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  7. हम सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण का कारण राहु-केतु द्वारा उन्हें निगला जाना मानते हैं ? भूकम्प का कारण नाग का हिलना मानते हैं ?डीहायड्रेशन होने पर बच्चे की नज़र उतारते हैं ,
    पढे लिखे लोग अब ऐसा नहीं मानते है !!
    करवा चौथ पर चांद की पूजा कर ,प्रताड़ित करने वाले पति के लिये भी लम्बी उम्र की दुआयें मांगते हैं ,( ग्लीसरीन के आँसू के सहारे बनाये जाने वाले धारावाहिकों और फिल्मों को देख कर ज़ार ज़ार रोते हैं )
    इसमें पूरे समाज का दोष है .. क्‍यूंकि थोडे बहुत मतभेद के बावजूद भी पति के साथ में ही महिलाओं को सारा सुख मिलता है .. पति के बिना जीवन और कठिन है हमारे समाज में .. जहां महिलाएं अपने पैरों पर खडी हैं वहां भी आप ऐसी घटनाएं देख सकते हैं .. और फिल्‍म या धारावाहिक में जो भी दिखाया जाता है .. कहीं न कहीं तो वास्‍तविकता से इसका संबंध है .. इसलिए काल्‍पनिक घटनाओं में भी हम रो पडते हैं
    हम भूत-प्रेत,पुनर्जन्म, लोक-परलोक, आत्मा,मोक्ष आदि में आँख मून्दकर विश्वास करते
    क्‍यूंकि विज्ञान ने इसे उपेक्षित ही छोड दिया है .. कभी कभी तो कोई न कोई घटना ऐसी आती ही है .. जिसपर विश्‍वास करना होता है .. जबतक विज्ञान कोई कारण न बताए .. मान्‍यताएं बनी रहेंगी .. और इस अंधविश्‍वास का दुरूपयोग होता रहेगा .. पिछले वर्ष बिहार के मुख्‍यमंत्री के दरबार में लायी गयी 4 वर्ष की एक लडकी को संस्‍कृत के कई ग्रंथ कंठस्‍थ थे .. उसे टीवी पर देखने के बाद मेरा वैज्ञानिक मस्तिष्‍क इसका कोई कारण नहीं ढूंढ सका .. वैज्ञानिक इस प्रकार की घटनाओं को गंभीरता से लें .. तो समाज में अच्‍छा परिणाम देखने को मिलेगा .. अन्‍यथा पढे लिखे लोग भी कभी कभी वास्‍तविक रहस्‍य को न समझते हुए अंधविश्‍वास पर विश्‍वास करते हैं !!

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  8. ह्म्म इसे रोना कहा जाए या नहीं, पता नहीं लेकिन हां, बहुधा कुछ दृश्य ऐसे होते हैं कि आंखें भर आती हैं।
    जैसे तारे जमीन पर, पा और थ्री ईडियट्स देखते हुए ही कुछ दृश्यों के दौरान भर आईं आंखें।

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  9. @संगीता जी, क्या आप यह जानकारी दे सकती हैं कि अभी वह बालिका कहाँ है , क्या उसका वर्तमान पता कहीं से मिल सकता है ? टी.वी पर कितने मिनट का उसका यह प्रदर्शन था ? उस न्यूज़ के प्रोड्यूसर कौन थे? मैं यह इसलिये पूछ रहा हूँ कि हो सकता है इनसे आगे कुछ विश्लेषण हो सके ,वरना हमारे देश में क्षणिक प्रदर्शन के बाद सब भूल जाते हैं वह प्रदर्शन भी और उसके पीछे की स्टोरी भी ।

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  10. बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतिश कुमार के दरबार में वह बच्‍ची दो घंटे रही थी .. ऐसा किसी न्‍यूज चैनल के एक पत्रकार ने बताया था .. लाइव टेलीकास्‍ट में उसे मैने दो तीन मिनट देखा , पांच मिनट या दस मिनट .. ये भी मुझे याद नहीं .. पर उसके उच्‍चारण से मुझे ताज्‍जुब अवश्‍य हुआ था मुझे .. वह अपने ग्रामीण वेशभूषा वाले पिताजी के गोद में थी .. उसके पिताजी नितीश कुमार के यहां उसका प्रदर्शन करवाते हुए उसकी शिक्षा दीक्षा के लिए व्‍यवस्‍था करवाना चाह रहे थे .. पता नहीं उन्‍हें कुछ मिला भी या नहीं .. जब तर्क से हर बात का विश्‍लेषण करनेवाले स्‍वभाव वाली मैं अंधकार में रह जाती हूं .. तो नहीं पढे लिखे और तर्क न कर पाने वाले लोग तो अवश्‍य अंधेरे में रहेंगे .. बाकी जानकारी आपको पटना के ही कोई पत्रकार जानकारी दे सकते हैं .. आप इस बारे में पटना के पत्रकारों को संबोधित करते हुए एक आलेख लिख लें !!

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  11. मेरे विचार से कहानियां देख सुन कर रोना गलत नहीं,सही है..सही ही नहीं बल्कि यह बड़ा ही आवश्यक और उपयोगी है....जिस समय हमारे सामने सशक्त दृश्य श्रव्य रूप में कथाएं प्रदर्शित होते हैं,उन घटनाओं पात्रों के संग हम घुल मिल गए होते हैं और सुख दुःख के उनके क्षण हमारे क्षण हो जाते हैं...तो तदनुरूप भावों का संचार स्वाभाविक ही है....
    यदि ऐसा न हो तो मान लेना चाहिए कि व्यक्ति में संवेदनाओं की कमी है,जो कि किसी भी तरह परिवार समाज देश या दुनिया के लिए हितकारी नहीं है...

    हाँ,आस्था और अंधविश्वास में फर्क करना बहुत जरूरी है...जीवन के लिए आस्था आवश्यक भी है और यह अति स्वाभाविक भी है,चाहे यह विज्ञान पर ही क्यों न हो...परन्तु किसी पर भी अंधा विश्वास सदैव ही घातक होता है...

    चिंतन को खुराक देती इस सुन्दर प्रविष्टि के लिए साधुवाद...

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  12. sharad ji,bahut sahi likha hai apne.andhvishvas ki vajah se hi aj hamara desh itna pichda hua hai....
    post dimaag me bahut gahari chap chodte hue sochne pe majboor karti hai...
    poonam

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  13. हाँ! धारावाहिक तो नहीं ....हाँ ....फिल्में देखते हुए टी.वी. पे कई बार रोना आ जाता है....

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  14. andhvishwas ab bhi bahut strong hai
    chandra garahn ho yaa sury garahn yaa phir karvaan choth
    sab waise ke hi waise
    billi ka rasta katana tak hai sharad ji .....
    pata nahi kaise hatega ......

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  15. हाँ शरद भाई रोते तो हैं पर आप किसी को बतलाइगा मत प्लीज़। रोचक लेख है यह आपका। आभार इसके लिए। अंधविश्वास बहुत ही अच्छा काम है अगर न किया जावे तो। हा हा।

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  16. अन्धविश्वास और आस्था का तो पता नहीं ...पर कोई मर्मस्पर्शी फिल्म या धारावाहिक देखकर रोना संवेदनशीलता की निशानी है ....कहीं न कहीं हमारी अपनी भावनाए उनसे जुड़ जाती हैं और हम भावुक हो जाते हैं और रोना आ जाता है.इसमें कुछ बुरा नहीं.

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  17. बहुत ही सूक्ष्मता से आपने विश्लेषण किया है....और सारी बातों को तार्किक ढंग से समझाया है ताकि एक layman को भी समझ आ जाए...लेकिन कई बातों के पक्ष या विपक्ष में अभी ठोस रूप से प्रमाण नहीं मिले हैं...इसलिए लोग कई बार ना चाहते हुए भी विश्वास कर लेते हैं Brian L. Weiss की एक पुस्तक है Many Lives Many Masters....यह मनोवैज्ञानिकों के लिए एक must read book है .इसे पढने के बाद कई सारे तर्क परास्त हो जाते हैं.

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  18. श्रीलंका की रेशनल सोसाईटी ने ऐसे तमाम 'रहस्यों' पर से पर्दा उठाया है। जो रह्स्य आज नहीं सुलझे हैं कल सुलझ जायेंगे बशर्ते विज्ञान का दामन न छोड़ा जाये।

    वैसे भाई अपन तो उपन्यास पढ़ते-पढ़ते भी रो पड़ते हैं, कई बार कवितायें और आत्मकथायें पढ़ते-पढ़ते भी, हालत यह है कि चे की संस्मृतियों का अनुवाद अक्सर इसके बलि चढ़ जाता है। लिखते-लिखते इमोशनल हो जाते हैं और भूल जाते हैं कि अनुवाद करना था!!

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  19. @ अशोक ,बवाल , रंजना , संजीत ,महफूज़ और आप सब । मेरा यह कहना बिलकुल नहीं है कि धारावाहिक या फिल्म देखते हुए या उपन्यास व कविता पढ़ते हुए रोना नहीं चाहिये ।आपसी रिश्तों पर प्रेम और बिछोह पर ,सर्वहारा की स्थिति पर , उनके संघर्ष पर बहुत सारे दृश्य ऐसे होते हैं जिन पर बरबस आँसू निकल ही आते हैं । लेकिन भूत प्रेत के सीरियल्स , जादूटोना या चमत्कार के द्रश्य और उसमे मनुष्य को द्रवित किये जाने के प्रयास के मै विरोध मे हूँ । दर असल तकनीक का सहारा लेकर निर्मित किये गये ऐसे दृश्यों में डूब जाने पर होता यह है कि वह सीधे हमारे अवचेतन में आ जाता है और उस वक़्त हम तर्क नहीं कर पाते हैं । चालाक लोग इस तरह झूठ्को सच बनाकर हमारे मस्तिष्क में डाल देते हैं और फिर हम उस पर विश्वास कर उसके लिये आपस में लड़ते हैं या । ब्रेख़्त ने इस कैथोर्सिस या भावनाओं के विरेचन पर बहुत कुछ लिखा है । मै आगे के लेखों में इसका विस्तार से विवेचन करूंगा ।

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  20. हां, आप की इस बात से सहमत हूं।
    इस मुद्दे पर रायपुर के डॉ दिनेश मिश्र जी से भी बात हुई है कई बार, पता नहीं उन्हें याद भी होगा या नहीं।
    प्रतीक्षारत हूं इस मुद्दे पर आपके और लेखों की।

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  21. शरद जी आपके ब्लॉग पर पहली बार ही आना हुआ है ...आपने एक सार्थक लेख लिखा है ....सच यही है हम अपनी परम्पराओं का विरोध नहीं कर पातें हेँ जो भी गलत धारणाएं हमारी बन चुकी हैं लकीर के फकीर बने रहने में ही सुख पातें हेँ ...ये भी सच है की सच-झूट को आधा स्वीकार करके इस जिन्दगी में बिना कुछ सही जाने कूच कर जातें हेँ ...अच्छा लिखतें हेँ आप ...आप छत्तीसगढ़ से हेँ वहां तो जादू टोनही की परम्परा अभी भी है या उस पर काबू पाया जा सका है

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  22. बहुत ही बढ़िया लिखा है आपने! मेरा तो ये मानना है कि अगर सभी अंधविश्वास करना छोड़ दे तो हमारा देश प्रगति की ओर बढ सकेगा!

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    1. सर आपकी बात सही है ।पर 70 %लोग डर के कारण अन्ध विश्वास के चक्कर में पड़ जाते हैं ।कुछ सामान्य उच् निच हो जाए तो लोग कहेंगे देवी देवताओं को नहीं मानते हैं इसलिए बुरा हुआ है ।फिर डर से लोग कि फिर कुछ ना हो जाए ।डरने लगते हैं ।

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    2. सर आपकी बात सही है ।पर 70 %लोग डर के कारण अन्ध विश्वास के चक्कर में पड़ जाते हैं ।कुछ सामान्य उच् निच हो जाए तो लोग कहेंगे देवी देवताओं को नहीं मानते हैं इसलिए बुरा हुआ है ।फिर डर से लोग कि फिर कुछ ना हो जाए ।डरने लगते हैं ।

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  23. शरदजी, आपके पोस्ट की बातें रोचक और तथ्यात्मक हैं.

    मगर फ़िल्म / धारावाहिक देख कर रोने वालों की बात से मेल नहीं खाती ये पोस्ट.

    रोने वाले इसलिये नहीं रोते कि वे किसी अंध विश्वास से ग्रसित हैं. संवेदनशील मन अनुभूतियों से द्रवित हो कर, फ़िल्म या धारवाहिक की कथा से समरस हो कर, अपने आप को कहीं उस परिदृष्य में उपस्थित पाता है या आइडेंटिफ़ाई करता है, और रो देता है. यह संवेदनशीलता अलग अलग व्यक्तियों में कम ज़्यादह मात्रा में हो सकती है.

    रही बात अंधविश्वास की , तो यह भी मन पर संस्कार होते रहने के कारण ही गलत धारणाओं में मन घबराता है.

    अभी पिछले दिनों मिस्त्र में काहिरा में सडक पर जाते हुए बिल्ली नें रास्ता काट दिय. मेरे साथ चल रहे भारतीय मित्र नें ठहर कर रुकना चाहा तो मैं भी एक क्षण अपने बालजनित संस्कारों की वजह से पहले मिनट में ठिठक गया, और फ़िर आगे बढ गया. उसे समझाया कि हम विदेश में हैं इसलिये बिल्ली के रास्ता कातनें का असर नहीं होगा.

    वह मान गया!!!!

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  24. जर्मन में एक डियुरिंग नाम के विद्वान् हुए जिनका मत था कि अन्धविश्वास और भगवान जैसी चीजों का कोई आधार नहीं है. मजदूरों और उनके राज्य को इनका विरोध करना चाहिए. उस वक्त फ्रेडरिक एंगेल्स जिन्दा थे. उन्होंने ' डियुरिंग मत खंडन' नाम पुस्तक में डियुरिंग के उस मत का विरोध किया. क्यों ? क्योंकि जब तक भगवान और अन्धविश्वास के रहने का भौतिक आधार है, ये कैसे ख़त्म हो सकते हैं ? पूंजीपति को फ़िक्र होता है कि पता नहीं उसका माल बिक पायेगा या नहीं और मजदूर को फ़िक्र होता है कि पता नहीं उसे काम मिलेगा भी या नहीं. नतीजा, पूंजीपति और मजदूर दोनों भगवान और अन्धविश्वास की शरण में चले जाते हैं. फ्रेडरिक एंगेल्स का मानना था कि डियुरिंग भगवान और धर्म का खात्मा करके इसे "शहीद" का दर्जा दिला देना चाहते हैं.

    संगीता जी टी.वी बहुत देखती हैं और टी.वी चैनल और नीतीश कुमार जैसे गणमान्य व्यक्ति, इन दोनों के मिलन को सच का आधार मान लेती हैं. इनका कसूर भी क्या है? ईराक पर हमले के लिए अमेरिका का पुच्छ्लगू बनने के अपराध के लिए 'टोनीब्लेयर' साहेब पर कार्रवाई को बीबीसी पर एक मिनट की देरी से 'लाइव' दिखाया गया और टी.वी देखनेवाले ने मान लिया कि यही तरीका होता है सही सच जानने का. ऐसे ही एक बार किसी भारतीय चैनल पर एक बच्चे को दिखया गया था जो ग्रामीण प्रष्टभूमि का छट्टी-सातवीं कक्षा का एक मेधावी विद्यार्थी था जो पांच छह महीनों से स्कूल से गायब रहा और फिर एक टी.वी . चैनल पर प्रकट हुआ लेकिन अमेरिकन उच्चारण के कुछ रट्टे-रटाये वाक्यों के साथ. पता नहीं मुझे ऐसा क्यूं लगा कि उस टीवी चैनल या किसी शरारती प्रोफ़ेसर/अध्यापक ने जार्ज बर्नार्ड शा के नाटक 'पिग्मेलियन' जिसमें नाटक का मुख्य पात्र एक स्लम में रहनेवाली एक फूल बेचने वाली लड़की को तीन महीने की 'फोनेटीक्स' की ट्रेनिंग के बाद लन्दन के शरीफजादों की पार्टी में 'ब्ल्यू ब्लड में जन्मी होने का ख़िताब' जीतवा देता है, को ही सच कर दिखया हो.

    जार्ज बर्नार्ड शा और हमारे कुच्छ रैश्नैलिस्ट भाई भाषा, भगवान, अन्धविश्वास आदि को छोटे-बड़े लोगों के बीच बेरियर मानते हैं और केवल वैज्ञानिक शिक्षा, तार्किकता और बुद्धि बल से इसे ख़त्म कर देना चाहते हैं. उन्हें सपने देखने चाहिए. लेकिन कट्टु सत्य यह है कि इन पंक्तियों के लेखक का क़स्बा भारत के उन चुनिन्दा गांवों के बीच है यहाँ खेतीबाड़ी में पूंजीवाद ने सबसे अधिक मशीनीकरण किया है. लेकिन सच्चाई यह है कि मेरे कसबे के नब्बे फीसदी डॉ, प्रोफ़ेसर और अध्यापक मंदिरों में माथे रगड़ते हैं. आप के शहर के हालत क्या हैं आप बेहतर जानते हैं.

    इस टिपण्णी के पहले पैरे के आसपास आते हुए मेरा रैश्नेलिस्ट भाईयों से कहना है कि जुएँ तब तक नहीं मरेंगी जब तक भैंस जिन्दा है.

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अन्धविश्वासों के खिलाफ आगे आयें