सोमवार, 19 अप्रैल 2010

पृथ्वी पर जीवन कैसे आया - एक लेख और एक नज़्म



जब हम कोई नाटक देखते हैं तो सबसे पहले रंगमंच पर एक या दो पात्रों का प्रवेश होता है ,फिर धीरे धीरे अन्य पात्रों का प्रवेश होता है और इस तरह नाटक चलता रहता है । यह बृह्माण्ड का रंगमंच भी कुछ इसी तरह का है । इस रंगमंच पर आकाशगंगायें आईं , सौरमण्डल  आये , ग्रह आये , उपग्रह आये यह सब तो आप देख चुके हैं । अब देखते हैं इस पृथ्वी पर घटित होने वाली एक महत्वपूर्ण घटना अर्थात पृथ्वी पर जीवन का प्रादुर्भाव । ना ना ... अभी हम मनुष्य के आगमन की बात नहीं कर रहे हैं ,मनुष्य के आने से पहले ही यहाँ बहुत कुछ हो चुका था ,पहले एक नज़र उसे तो देख लें ।
              इस तरह साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी तो बन गई ,समुद्र नदी,नाले, तालाब ,पहाड़ सब बन गये ,लेकिन यहाँ जीवन की शुरुआत होनी अभी शेष थी । भू वैज्ञानिकों द्वारा आस्ट्रेलिया ,अफ्रीका व ग्रीनलैंड में किये गये अध्ययनों के आधार पर यह सिध्द हो चुका है कि आज से साढ़े तीन अरब वर्ष पूर्व बैक्टीरिया के समान एक कोशीय जीव ,समुद्रतलों के छिछले पानी में शैलभितियाँ बना रहे थे । इनके पूर्वजों अर्थात सरल अविकसित जीवाणु की उपस्थिति भी लगभग 4 अरब वर्ष पूर्व रही होगी ।इस प्रकार यह प्रतीत होता हैं कि पृथ्वी के विकास के साथ साथ कहीं न कहीं जीवन का विकास भी हो रहा था ।                        
        जीवन की उत्पति कैसे हुई इसके विषय में प्राचीन मनुष्य की अपनी धारणाएँ हैं परंतु विज्ञान के आधार पर शोधकर्ताओं ने इस रहस्य को सुलझा लिया हैं । सन 1920 में एक रुसी वैज्ञानिक जे.बी एस . हाल्डेन ने ‘पृथ्वी पर निर्जीव रसायनों की पारस्पारिक प्रतिक्रिया से जीवन के उदभव’ का सिध्दांत प्रतिपादित किया । हाल्डेन ने कहा कि उस काल में कास्मिक किरणों , बिजली ( तड़ित ) व ज्वालामुखी के कारण हो रही तीक्ष्ण रासायनिक प्रक्रिया के फलस्वरुप कार्बन मूल के जैव अणुओं की उत्पत्ति हुई । ये अणु नदियों के साथ बहकर समुद्र में मिले , जिनसे समुद्र को उष्णता व गाढापन मिला ।
          ओपेरिन ने कहा कि आम कोशिकायें जेली ( श्लष ) जैसी छोटी छोटी बूंदें रही होगीं । समुद्रों के साथ रसायनों के आदान प्रदान के दौरान इन जेल सृदृश्य छोटी बूंदों ने ऐसे अणुओं का निर्माण किया होगा जिन्होने बाद में अपनी प्रतिकृतियाँ बनाई होंगी ।
          सन 1958 से इन धारणाओं को परखने की शुरुआत हुई । शिकागो विश्वविधालय के वैज्ञानिकों ने उन तमाम गैसों को एक फ्लास्क में लिया जो पृथ्वी के प्रांरभिक वायुमंडल मे विद्यमान थीं । उनमें विद्युत स्फुलिंगों को प्रवाहित कर बिजली पैदा की । इस तरह उन्हे एक सप्ताह पकाया गया । देखा गया कि एक सप्ताह बाद इन गैस भरे फ्लास्कों पर  एमीनो एसिडस की परतें चढ़ गई हैं । इन्ही एमीनो एसिडस के आपस में जुडने से प्रोटीन बनता हैं । इसी प्रयोग में जीवन के अन्य मौलिक रासायनिक घटकों का निर्माण होता देखा गया ।
          पृथ्वी पर जीवन के अविर्भाव के सम्बन्ध में कुछ वैज्ञानिकों की यह भी मान्यता है कि हो सकता है पृथ्वी पर जीवन अंतरिक्ष से आया हो । इसके लिये भी प्रयोग चल रहे हैं । यह तो विज्ञान है ,अभी तक इसने जीवन की उत्पत्ति के बारे में जो कुछ बताया है उसे हम मान लेते हैं ,आगे और कुछ नया बतायेगा तो उसे भी मान लेंगे ?
उपसर्ग में प्रस्तुत है इस बार प्रसिद्ध शायर जनाब निदा फाज़ली की यह मशहूर नज़्म .............
                                    ये ज़िन्दगी 
ये ज़िन्दगी 
आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी बड़ी नसों में 
मचल रही है 
तुम्हारे पैरों से चल रही है 
तुम्हारी आवाज़ में गले से 
निकल रही है 
तुम्हारे लफ्ज़ों में 
ढल रही है..... 
ये ज़िन्दगी..... 
जाने कितनी सदियों से 
यूँ ही शक्लें 
बदल रही है 

बदलती शक्लों
बदलते जिस्मों में
चलता-फिरता ये इक शरारा 
जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा ! 
इसी से सारी चहल -पहल है 
इसी से रोशन है हर नज़ारा 

सितारे तोड़ो 
या घर बसाओ
अलम उठाओ 
या सर झुकाओ 

तुम्हारी आँखों की रोशनी तक है 
खेल सारा 
ये खेल होगा नहीं दोबारा ।   

अलम=जंग का निशान 
 मित्रों पृथ्वी पर जीवन का यह  खेल सचमुच दोबारा नहीं होना है इसलिये क्यों न हम इस खेल को एक बार में ही समझ लें और जान लें अपने होने का अर्थ । अगली कड़ी में पढ़ेंगे जिन्दगी माने प्रोटीन और डी.एन.ए. -            
 शरद कोकास
(नज़्म , वाणी प्रकाशन से प्रकाशित निदा फाज़ली के संग्रह "खोया हुआ सा कुछ " से साभार । छवि गूगल से साभार)

17 टिप्‍पणियां:

  1. तुम्हारी आँखों की रोशनी तक है
    खेल सारा
    ये खेल होगा नहीं दोबारा ।
    सही है तभी तो इतना खेलते हैं कि जीना भी दुस्वार हो जाता है.
    बहुत सुन्दर आलेख भी और फाज़ली जी की रचना भी.

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  2. शरद जी, बहुत अच्छी श्रंखला आरंभ की है। इसे जारी रखिए। मैं भी इस विषय पर एक पूरे खंड काव्य को प्रस्तुत करना चाहता हूँ। पर टाइपिंग के बोझे से डरता रहा हूँ। आप की इस श्रंखला से प्रेरणा मिली है। कोशिश करूंगा कि उसे आरंभ कर सकूँ।

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  3. ये हुई न बात ! क्या किसी प्रयोग में एककोशीय जीवों को उत्पन्न करने में भी सफलता मिली ?
    पुरातत्त्ववेत्ता आर्य ! कहाँ गेल ..!!

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  4. तुम्हारी आँखों की रोशनी तक है
    खेल सारा
    ये खेल होगा नहीं दोबारा ....
    दिव्य चिंतन ..
    पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति रोचक विषय है ...रोचक श्रृंखला ...

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  5. बहुत बढ़िया और नज़्म के तो क्या कहने...आभार आपका!

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  6. बहुत सुन्दर आलेख भी और फाज़ली जी की रचना भी.

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  7. ये ज़िन्दगी.....
    जाने कितनी सदियों से
    यूँ ही शक्लें
    बदल रही है

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  8. वाह बहुत सुंदर लेख लिखा, चित्र भी अति सुंदर.
    धन्यवाद

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  9. बहुत सुन्दर आलेख भी और फाज़ली जी की रचना भी.

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  10. चित्र, लेख और नज़्म बहुत सुन्दर लगा! बेहतरीन प्रस्तुती! बधाई!

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  11. बेहतर संभावनाओं के साथ यह श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है।
    शुरू से ही नज़र में है।
    आपका यह प्रयास निस्संदेह सराहनीय है।

    शुक्रिया।

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  12. सितारे तोड़ो
    या घर बसाओ
    अलम उठाओ
    या सर झुकाओ
    तुम्हारी आँखों की रोशनी तक है
    खेल सारा
    ये खेल होगा नहीं दोबारा ।
    "आप की इस श्रंखला से प्रेरणा मिली |बेहतरीन प्रस्तुती! बधाई!
    ---- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

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  13. जानकारी तो अच्छी रही.. अब तो जो कहा गया है उसे माना है तो आगे भी माँ ही लेंगे.. और फाजली साहब का कहना भी सही है..

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  14. sir muje aapke association ke books padana chahtha hoon. muje bhi andhvishwas se nafrat hain. main bhi ek naasthik hoon. plz muje books padne ka irada hain.

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  15. शरद कोकास और निदा फ़ाज़ली जी को मेरा सलाम।

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