बुधवार, 5 मई 2010

मुझे नही पता ,आप ही बताइये यह जीवन क्या हैं ?


                                  
आप कहेंगे यह भी कोई सवाल है । सही है आप में से ऐसा कोई नहीं होगा जिसने कभी इस प्रश्न के बारे में न सोचा हो । अभी इस सवाल के उत्तर में आप धड़ाधड़ लिखना शुरू कर देंगे । कोई कहेगा ज़िन्दगी एक पहेली है कोई कहेगा जीवन पानी का बुलबुला है ,जीवन एक उड़ती हुई पतंग है,जीवन एक साँप है , जीवन एक सज़ा है  , एक उड़ता हुआ पंछी है ,वगैरह वगैरह ।जीवन के बारे में हर कवि ने दो चार पंक्तियाँ तो लिख ही डाली हैं मसलन ..”जीवन क्या है,चलता फिरता एक खिलौना है / दो आँखों में एक से हंसना एक से रोना है ।" मुझे भी जीवन के बारे में कविताएँ बहुत अच्छी लगती हैं और जीवन को परिभाषित करने वाली एक कविता तो मुझे बेहद पसन्द है ..” ज़िन्दगी क्या है जान जाओगे / रेत पे लाके मछलियाँ रख दो “
        चलिए कवियों को अपना काम करने दीजिये, हम जीवन की वैज्ञानिक परिभाषा देखते हैं ।   पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ हो चुका था लेकिन मानव जीवन के आगमन में अभी समय था । पेड़-पौधे ,कीड़े-मकोड़े, रेंगने वाले जीव तैरने वाले जीव और उड़ने वाले जीवों का आगमन हो रहा था । यह सब सजीव थे और इनमें जीवन के सभी लक्षण मौजूद थे । हमें तो मनुष्य के जीवन से मतलब है इसलिये मनुष्य के जन्म का समाचार जानने से पहले हम जान लें ,आखिर यह सजीव होना क्या है ?
जीव का अर्थ आत्मा नहीं होता - जीवन के बारे में अगर आप जानते हैं तो आपको यह भी पता ही होगा कि हम मनुष्य,अन्य प्राणि,कीट-पतंगे और पेड़-पौधे सभी सजीवों की श्रेणि में आते हैं । सजीवों के कुछ विशेष लक्षण होते हैं जैसे जन्म लेना,बढ़ना, सांस लेना, गति, उत्तेजना तथा संतानोपत्ति और अंतत: मृत्यु आदि। ये सजीव अपने आसपास से अपने जीवन के लिये आवश्यक वस्तुयें ग्रहण करते हैं । सजीवों के सभी लक्षण जीवन के फलस्वरुप ही होते हैं । सजीवों के शरीर में जीवन के लिये आवश्यक क्रियाशीलता बनी रहती है । यह क्रियाशीलता उनके पदार्थ जीव द्रव्य विभिन्न तत्वों तथा यौगिकों का विशिष्ट संगठन हैं। इस प्रकार जीव संगठित द्रव्य है तथा जीवन उसकी क्रियाशीलता । जीवन के होने के लिये एक शरीर आवश्यक है। शरीर से बाहर जीवन नहीं हो सकता । शरीर और जीवन का तालमेल ही एक सजीव को होने का अर्थ प्रदान करता है । जीवन को बेहतर तरीके से जानने के लिये जरूरी है शरीर को जानना । 
सजीवों के इन प्रमुख लक्षणों को तो हम अगली पोस्ट में देखेंगे , इस बार तो आप यह बताइये कि आप से अगर पूछा  जाये कि जीवन क्या है ? तो आप एक दो पंक्ति में इसका क्या उत्तर देंगे ? जीवन की आपकी अपनी परिभाषा जानने की प्रतीक्षा में - आपका -  शरद कोकास 
अरे हाँ उपसर्ग की कविता तो लिखना भूल ही गया , इस बार लीजिये पढ़िये कवि कुमार अम्बुज की यह कविता जिसमें आपको जीवन की प्रचलित परिभाषाओं से अलग जीवन का एक नया ही अर्थ दिखाई देगा ।श्री कुमार अम्बुज हिन्दी के बहुत प्रसिद्ध कवि हैं और भोपाल में रहते हैं । उनका एक ब्लॉग भी है , " कुमार अम्बुज "... इसे भी देखियेगा । 


                                    इस नश्वर संसार में

लाखों करोड़ों सालों से
इतना ही जीवित चला आ रहा है
यह नश्वर संसार

नश्वरता की घोषणा करने वाले
नष्ट हो गये
नश्वर संसार नष्ट नहीं हो रहा है

तमाम नश्वरता के बावज़ूद
भंगी अपनी झाड़ू बचा लेता है
धोबी अपने घाट का पत्थर
एक मिस्त्री बचा लेता है अपने औज़ार
और किसान गेहूँ की बाली
लोहार अपना घन
समय की छाती पर पटक देता है

तोते अपनी चोंच की लाली बचा लेते हैं
कोयल अपनी कूक
स्त्री अपनी मादकता बचा लेती है
पुरुष अपना ताप
काल के विकराल मुँह से छीन लेता है एक बच्चा
अपनी अमर हँसी

इस नश्वर संसार में
जीवन अमर हो रहा है लगातार
नश्वरवादियों के शवों पर
अट्टहास करता हुआ । 

                - कुमार अम्बुज 

चित्र गूगल से और कुमार अम्बुज की कविता उनके संग्रह " किवाड़ " से साभार ।तस्वीर मेरे मोबाइल कैमरे से ..-शरद कोकास  

21 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन क्या है
    जिस दिन जान जायेंगे
    आपको ज़रूर बताएँगे

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  2. बहुत बढ़िया लिखा है आपने! जीवन की सठिक परिभाषा देना तो बहुत ही कठिन है और इस जीवन के बारे में कुछ कहना सही माइने में मुश्किल है!

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  3. आपाधापी का ही नाम जीवन है शायद.
    और फिर कुमार अम्बुज की यह रचना --- वाह
    इस नश्वर संसार में
    जीवन अमर हो रहा है लगातार
    नश्वरवादियों के शवों पर
    अट्टहास करता हुआ ।

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  4. कुमार अंबुज जी की रचना...वाह!

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  5. इसे कहतें हैं ह्रदय और मानस का द्वन्द जीतता तो कवि ही है न
    सच एक प्रभावी बात

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  6. जीवन क्या है इसका जवाब अभी तक तो नहीं मिला...........पर ये आलेख बेहद ही रोचक लगा. .

    regards

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  7. जीवन एक वजह है जिसके कारण मृत्यु आती है।

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  8. जीवन कि इस आपा धापी में कब समय मिला कि सोच सकूँ ..कि जीवन क्या है :)..बहुत अच्छा लिखा है आपने.

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  9. जीवन को रोचकता से परिभाषित किया है। कविता तो कमाल की है।

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  10. एक टिप्पणी स्वाति चढ्ढा की ओर से
    swati chadha to me
    show details 12:06 PM (10 hours ago)
    aadarneeya sharad ji
    aapka blog padha . bahut hi achha likte hai aap , jeevan kya hai lekh par tippani dene ki koshish ki , kintu kuchh error a raha tha , esliye aapko mail par tippani kar rahi hu
    ye lines maine kahi padhi thi..

    "a lot of things go unqustioned
    lot of questions go unanswerd,
    few words go unsaid ,few go unheard,
    some dreams buried alive,some born dead.
    that's life..."

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  11. काल के विकराल मुँह से छीन लेता है एक बच्चा
    अपनी अमर हँसी
    बहुत ही सुन्दर कविता
    और धैर्य से पढ़ रहें हैं ,इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

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  12. जीवन....जीवन वो सड़क है जो मौत तक जाती है!

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  13. इस नश्वर संसार में
    जीवन अमर हो रहा है लगातार
    नश्वरवादियों के शवों पर
    अट्टहास करता हुआ ।

    बहुत सुन्दर रचना...

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  14. क्या कहने साहब
    जबाब नहीं निसंदेह
    यह एक प्रसंशनीय प्रस्तुति है
    धन्यवाद..साधुवाद..साधुवाद
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

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  15. इस नश्वर संसार में
    जीवन अमर हो रहा है लगातार
    नश्वरवादियों के शवों पर
    अट्टहास करता हुआ ।
    bahut khoobsurat rachna man ko chhoo gayi .

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  16. कुमार अंबुज जी की कविता... भई वाह मजा आ गया...
    आपके इस ब्लोग पर पहली बार आया हूं, यकीन मानिये अभी रेगुलर विज़िटर होना पडेगा...

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  17. एक 'प्राचीन भारतीय' सोच यह भी है कि पृथ्वी पर जीवन एक परीक्षा थी, काल-चक्र में प्रवेश पाई आत्माओं की - कलियुग से सत्य युग तक (समुद्र-मंथन की कथा जैसे),,, यद्यपि हर आत्मा परमात्मा का ही स्वरुप थी...और किसी निर्धारित क्रम से, ८४ लाख योनियों से गुजर, किसी भी आत्मा विशेष के लिए केवल मानव रूप में ही इस परीक्षा में उत्तीर्ण होना संभव था, यदि विष्णु के अष्टम अवतार कृष्ण के प्रिय मित्र अर्जुन समान कोई साधना कर एक परमेश्वर के अस्तित्व को जान सके, यानी 'पक्षी की केवल आँख ही देख सके', या 'प्याले में घूमती मछली की आँख भेद सके',,,और अनुत्तीर्ण होने पर आत्मा फिर जन्म-मृत्यु-जन्म के चक्र में डल जाती थी,,, और यह चक्र इस प्रकार चलता ही रहता था, जब तक अंततोगत्वा हर आत्मा उत्तीर्ण नहीं हो जाती थी और भूतनाथ शिव में, यानि परमात्मा में, समां नहीं जाती थी...

    और 'हिन्दू मान्यतानुसार' भूतनाथ शिव (योगेश्वर विष्णु, अथवा नादबिन्दू) और उसी की अनंत आत्माओं द्वारा 'भूतकाल' में खेला गया नाटक माया के प्रभाव से किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान में खेला जा रहा है - किन्तु उल्टा,,, यानि परम ज्ञान की स्तिथि, सतयुग, से आरम्भ कर (जब कुछ भी कर पाना संभव है) घोर अज्ञान की स्तिथि, कलियुग, तक बार-बार... (जिस ओर 'मायावी फिल्म जगत' में बनी अनंत फिल्में भी संकेत करती प्रतीत होती हैं, और आत्मा की उत्पत्ति की ओर संकेत भी मिलता है 'अमिताभ बच्चन' नामक पात्र के द्वारा)...

    "हरी अनंत / हरी कथा अनंता..."

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