रविवार, 3 अक्तूबर 2010

राम कहने पर आपको किसका चेहरा याद आता है ?

2 : शब्दों का प्रतिमा में रुपांतरण : मस्तिष्क द्वारा किये जाने वाले अनेक कार्यों के अंतर्गत यह मस्तिष्क का एक और कार्य है । यह किस तरह होता है यह समझाने के लिए  मैं आपको कुछ शब्द दे रहा हूँ । जैसे ही आप उस शब्द को पढ़ेंगे आप को उस से जुड़ी प्रतिमा, इमेज या छवि याद आयेगी । जैसे मै कहता हूँ “ एक पेड़ । ” तो आपने जो भी पेड़ देखा होगा या जिस पेड़ की छवि आपकी स्मृति में होगी उस छवि की कल्पना आप करेंगे । हो सकता है बहुत से पेड़ आपने देखे हों लेकिन उनमें से कोई एक पेड़ ही आपको याद आयेगा । लेकिन मैं अगर कहूँ जंगल तो आपको बहुत से पेड़ों के अलावा पहाड़ , झरने या जंगल में जो कुछ भी आपने देखा हो याद आ जायेगा । हो सकता है कई लोगों को अब तक जंगल देखने का अवसर ना प्राप्त हुआ हो लेकिन अगर आपने जंगल को चित्र में देखा हो तो वह याद आयेगा ।उसी तरह मैं कहूंगा “ कम्प्यूटर “ तो आपको डेस्कटॉप या लैप टॉप , कम्प्यूटर का जो भी चित्र आपके मस्तिष्क मे होगा वह याद आ जायेगा ।
अब मैं आपसे कहता हूँ अपनी माँ को याद कीजिये । आपके मस्तिष्क में अपनी माँ की जो भी छवि है वह आपको दिखाई देगी । अब मैं आपसे कहूंगा श्रीमती ऐश्वर्या रॉय को याद कीजिये । जिस फिल्म में या चित्र में आपने उन्हे देखा होगा उस का आप स्मरण करेंगे । अब देखिये जैसे ही मैने माँ कहा आप सभी के मस्तिष्क में अपनी माता के चेहरों की छवियाँ उभरीं जो निश्चित रूप से एक दूसरे से अलग हैं इसलिये कि सगे भाई बहनों के अलावा सभी की मातायें अलग  अलग हैं । लेकिन मेरे ऐश्वर्या रॉय कहने पर एक ही चेहरे की छवि उभर कर आई । इस तरह हम बचपन से ही अपने मस्तिष्क में अंकित छवियों को एक पहचान दे देते हैं और जब भी उस पहचान से सम्बन्धित शब्द हम पढ़ते हैं या सुनते हैं वह छवि हमारे मानस में साकार हो जाती है ।
इसके विपरीत जिन छवियों की पहचान हमारे मस्तिष्क में शब्द के रूप में दर्ज़ नहीं है वह छवि हमें याद नहीं आयेगी, जैसे मै कहूँ  फ्लोरेंस नाईटिंगेल ‘, अब आप में से जिसने सेवा की इस मूर्ति का चित्र देखा होगा वे ही इसे याद कर सकेंगे । कई बार द्रश्य मध्यमों के द्वारा भी कुछ छवियाँ हमारे मस्तिष्क में आरोपित की जाती हैं जिन्हे हम सच समझने लगते हैं । जैसे कि मैं कहूँ “ राम “ तो आपको रामायण धारावाहिक में राम का अभिनय करने वाले अभिनेता अरुण गोविल का चेहरा नज़र आयेगा । इस धारावाहिक से पूर्व हम इस छवि को किस रूप में याद करते थे यह भी सोचने की बात है   एक और उदाहरण मान लीजिये मैं कहता हूँ “ एतो सबाक “ तो आप कहेंगे पता नहीं क्या कह रहा है और आप इस शब्द से कोई छवि निर्माण नहीं कर सकेंगे लेकिन जैसे ही मैं कहूंगा “ यह कुत्ता । “ आप के मस्तिष्क मे तुरंत कुत्ते की छवि आ जायेगी । भई मैने रशियन मे कहा था ‘ एतो सबाक ‘ यानि ‘ यह कुत्ता ‘ । इस तरह हम अपने सम्पर्क में दृश्य-श्रव्य माध्यम से आनेवाले हर शब्द की एक प्रतिमा निर्माण करते हैं यह कार्य मस्तिष्क के इस केन्द्र द्वारा सम्पन्न होता है ।   
उपसर्ग में प्रस्तुत है मस्तिष्क की इस क्षमता पर लिखी मेरी एक और कविता 

                          मस्तिष्क के क्रियाकलाप –तीन –कल्पना                         

    डार्करूम के अन्धेरे में तैरते
    अतीत और वर्तमान के तमाम चित्रों के साथ
    सैकड़ों चित्र भविष्य के तैरते हैं यहाँ ईथर में
    रूप रंग रस गन्ध और स्पर्श की अनुभूतियाँ
    यहाँ चित्रों में ढलती हैं
    आँखों के कैमरे में पलकों का शटर खुलता है
    और कैद हो जाता है सब कुछ  स्थायी रूप में

    फिर जॉर्ज बुश या ओबामा का नाम सुनते ही
    जेहन में उभरता है
    तथाकथित विश्वचौधरी का चेहरा
    अमिताभ  बच्चन का ज़िक्र होते ही
    एक एंग्री यंग मैन सम्वाद बोलता नज़र आता है
   कल्पना में शामिल होते हैं लोग दृष्य और वस्तुएँ
    जो कभी न कभी हमारे देखे सुने होते हैं
    अन्धों का हाथी ठीक इसी प्रक्रिया में
    खम्भे सूप और रस्सी में बदलता है  

     जैसे माँ शब्द सुनते या पढ़ते ही
    हमें याद आती है अपनी माँ
    जिसे हम होश सम्भालने के बाद पहचानते हैं
    माँ की कल्पना में वह छवि कहीं नहीं होती
    जिसमें हमे वह जन्म दे रही होती है
    या स्तनपान करा रही होती है
    ऐसी कल्पना तो देवताओं के लिये भी सम्भव नहीं

    यहाँ प्रकट होती है मस्तिष्क की सीमाएँ
   जिसकी क्षमता से किसी अन्य स्त्री के चित्र में
    माँ का चित्र आरोपित कर
    हम स्त्री में माँ का रूप देख सकते हैं
    यही तो है मस्तिष्क का कमाल
    जहाँ पढ़े हुए शब्दों
   और देखे सुने दृष्यों के आधार पर
   हम कल्पना कर सकते हैं आगत और विगत की
   पृथ्वी पर मनुष्य के जन्म की
   और मनुष्य के मन में जन्मी
   ईश्वर की कल्पना कर सकते हैं हम
    इसी मस्तिष्क से  

            -- शरद कोकास  

( चित्र : श्रीमती ऐश्वर्या राय , श्रीमती शीला कोकास , श्रीमती फ्लोरेंस नाइटिंगेल , श्री अरुण गोविल , गूगल से साभार )

31 टिप्‍पणियां:

  1. ultimate, kitne saral tarike se aapne puri baat udaharn ke saath samjhaa di.

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  2. " sir, aapne bahut hi saral tarike se samajaya hai ki " LAGE RAHO MUNNA BHAI " Ke nayak munna ke jaisa ye chemical locha hai...behatarin post sir khasker aapki kavita ..."

    plz visit here

    गाँधीजी - आओ जाने गाँधीजी की बंद किताब की बातें { जो दुर्लभ है }

    http://eksacchai.blogspot.com/2010/10/blog-post.html#links

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  3. कुछ समय पहले अपने लिखे 'आजादी के मायने' संस्‍मरण का एक अंश बतौर टिप्‍पणी लगा रहा हूं- 'मेरी पीढ़ी आजादी के मायने ढूढते हुए 15 अगस्‍त, 26 जनवरी, 2 अक्‍टूबर, जय स्‍तंभ, गांधीजी के माध्‍यम से जानने-पहचानने का प्रयास करते हुए पिछली पीढ़ी के संस्‍मरणों को अनुभूत करना चाहती थी. लेकिन उस उम्र की कच्‍ची समझ को राष्‍ट्र और उसकी स्‍वाधीनता को समझने के लिए किसी न किसी प्रतीक की जरूरत होती. डॉ. ज्‍वालाप्रसाद मिश्र जी की आरंभिक स्‍मृति मेरे और शायद मेरी पीढ़ी के बहुतेरों के लिए इसी तरह महत्‍वपूर्ण है, जिनमें आजादी के ऐसे मायने को सजीव महसूस किया जा सकता था. आमने-सामने चरखा चलाते मैंने पहली बार और एकमात्र उन्‍हें ही देखा'.

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  4. आपके ब्लाग पर आ कर प्रसन्नता हुई। एक ही बार में कई आलेखों का आस्वादन किया। मस्तिष्क की कार्य-प्रणाली विषयक लेख ज्ञान-वर्धक है। आस्था आँख पर पट्टी बाँध देती है। आस्था मनुष्य की सोचने-समझने की शाक्ति को कुंद कर देती है। आस्था के कारण व्यक्ति पर्दे की पीछे चल रहे ठगी के खेल को समझ नहीं पाता। आस्था के नशे में व्यक्ति लुटता रहता है और लुटेरे सबल होते रहते हैं। मनुष्य को गुलाम बनाने की यह एक सोची-समझी चाल है। गुलामी कई प्रकार की होती है परन्तु आस्था संबंधी गुलामी सबसे ख़तरनाक है। मेरे एक गीत की पंक्तियाँ हैं-----
    ==================================
    ’एक गुलामी तन की है,एक गुलामी धन की है.
    इन दोनों से जटिल गुलामी, बंधे हुए चिंतन की है,
    चिंतन का पट खुला सदा धरना ही धरना है,
    भ्रष्ट - व्यवस्था के चंगुल से पार उतरना है,’
    ==================================
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

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  5. राम को याद करने पर मुझे उनका जीवन चरित्र याद आने लगता है।

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  6. सही बात है शरद जी | कविता अच्छी लगी | रही बात मन के पटल पर छबि उभरने की तो आपकी यह बात ठीक है कि जो कुछ पहले से देखा होता है वह छवि दिखना स्वाभाविक है | लेकिन यह त्वरित प्रतिक्रया के तहत होता है | थोड़ा और ध्यान करने पर आपको राम की किसी कैलेण्डर पर बनी तस्वीर की छवि भी आ सकती है |

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  7. बहुत सुंदर लेख ओर सुंदर कविता के लिये धन्यवाद

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  8. आप जिस सदोद्देश्य को लेकर चले हैं ,
    आसन्न भविष्य में वह एक आन्दोलन का
    रूप धारण करे ऐसी मेरी अभिलाषा भी है
    और विश्वास भी ! शुभकामनाएं !

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  9. सुंदर आलेख ..
    कविता भी बढिया ..
    एतो सबाक ..
    रशियन भी जानने को मिला !!

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  10. अरे बाबा, इत्ता गहरा लिखते हैं आप.

    बहुत ही बढिया........

    सार्थक पोस्ट के लिए साधुवाद.

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  11. निहायत ही ज्ञानवर्धक आलेख और सुंदर कविता, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  12. मनोविज्ञान के आधार पर प्रस्तुत आलेख और कविता प्रभावशाली है.

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  13. सराहनीय पोस्ट के लिए बधाई .

    कृपया इसे भी पढ़े - -

    बीजेपी की वेबसाइट में हाथ साफ http://www.ashokbajaj.com

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  14. जिसकी क्षमता से किसी अन्य स्त्री के चित्र में
    माँ का चित्र आरोपित कर हम स्त्री में माँ का रूप देख सकते हैं...
    कमाल है ये पंक्तियाँ ..
    कई जानकारियां भी प्राप्त हुई
    आभार ..!

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  15. थोडा फलसफा हो जाए!

    तुलसीदास जी कह गए, "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन देखि तैसी",,,और जब मैं आज अपनी ही एल्बम में अपनी ही तस्वीरें देखता हूँ तो समझ नहीं आता कि मैं किसको 'मैं' कहूं? क्या इनमें से कोई असली मैं हूँ और शेष नकली? अथवा ये तस्वीरें किसी अनदेखे की हैं, जो मेरे और सबके भीतर भी रहता है और जो काल के साथ-साथ बदलता रूप प्रतिबिंबित करता है?

    जब से मैंने हिन्दू-मान्यता के अनुसार जाना कि मानव सौर-मंडल के ९ सदस्यों के माध्यम से महाशून्य का प्रतिबिम्ब है, जब कोई हिन्दू पौराणिक कहानियों में संदर्भित दोनों अलग-अलग काल में 'धनुर्धर' पात्रों, अर्जुन अथवा राम, कहता है तो मुझे सूर्य की याद आती है, जिससे तीर समान किरणें हर दिशा में फ़ैल रही हैं और जो एक राजा समान अपने सौर-मंडल को ४ अरब वर्षों से साक्षात् रूप में वर्तमान में भी रथ समान चलाता आ रहा है...

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  16. bahut khub,......
    मेरे ब्लॉग पर इस बार ....
    क्या बांटना चाहेंगे हमसे आपकी रचनायें...
    अपनी टिप्पणी ज़रूर दें...
    http://i555.blogspot.com/2010/10/blog-post_04.html

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  17. शरद जी, बिलकुल अनोखी अनुभूति करा गई आपकी यह पोस्ट। आभार एवं बधाई।
    ................
    …ब्लॉग चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।

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  18. राम का नाम लेने पर मुझे सीता त्याग याद आता है :).
    ज्ञान वर्धक लेख.

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  19. सुन्दर और ज्ञानवर्द्धक आलेख...मस्तिष्क के कार्य करने की प्रक्रिया को बड़ी सरलता से समझाया है...

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  20. मस्तिष्क की भी अपनी सीमाएं हैं-यह स्मरण रहना उच्चतर ऊर्जा की ओर अग्रसर होने में सहायक है।

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  21. What is the memory of brain in GB/TBs?

    Is there any such estimate?

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  22. कल्पना को बहुत खूबी से उकेरती है ये कविता ।
    कविता पढ़कर आनंद आ गया ।

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  23. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  24. देर आयी दुरुस्त आयी। गूढ ग्यान। आलेख सेर और कविता सवासेर्। धन्यवाद

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  25. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  26. कुछ लेख अपने आप में इतने पूर्ण होते है की इसके सिवा और कुछ लिख ही नहीं सकते है की बहुत अच्छा लीखा |

    हा एक बात और लिखनी है ये पाठको को बुलाने का भयानक तरीका बहुत पसंद आया वैसे ये थे कौन | :-)

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  27. वाकई में कभी ध्यान नहीं दिया था, मगर बात सही है.

    अपने अपने मन की कहानी है, और अर्थ या भावार्थ का खेल है. ए रिक्षा कहने से रिक्षा भी याद आ सकता है, या रिक्षावाला!!

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  28. सबसे बाद का लेख पढा तो पीछे जा कर और पढने को मन किया । मन में कुछ बिंब और शब्द साथ जुडे होते हैं शब्द सुनते ही वह तसवीर उभर आती है । कविता भी विषयानुरूप ।

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