मंगलवार, 12 मई 2009

आइये अपने मस्तिष्क में झाँकें



"शोले" में गब्बरसिंह का मशहूर संवाद है"गाँव में जब कोई बच्चा रोता है तो माँ कहती है चुप हो जा नही तो गब्बर आ जाएगा"इस तरह के संवादों ने गब्बर को खलनायक बनाकर महिमामंडित किया लेकिन वास्तविकता यही है.गाँव हो या शहर अब भी रोते हुए बच्चे को चुप कराने के लिए यही कहा जाता है "चुप हो जा नही तो भूत आ जाएगा ,चुप हो जा नही तो बाबा पकड़कर ले जाएगा,चुप नही तो पुलिस पकड़ लेगी या चुप हो जा नही तो अंधेरे में फेंक देंगे"भूत ,बाबा,पुलिस अंधेरे और अज्ञात के प्रति भय का भाव यहीं पर बच्चे के कोमल मस्तिष्क में जन्म लेता है और वह जीवन भर इनसे डरता रहता है.गाँव में किसी प्राकतिक विपदा या बीमारी फ़ैल जाने की वज़ह भी इसीलिए किसी ऐसी शक्ति को माना जाता है जिससे उसका कोई सम्बन्ध नही होता .यहाँ तक की डीहायड्रेशन ,डायरिया ,लू लगना ,या सामान्य पेटदर्द या बुखार जैसी बातों के लिए भी कहा जाता है की "इसे किसी की नज़र लग गई है"बीमारी से पशुओ की मौत हो ,अनावृष्टि या कीट की वज़ह से फसल सूख जाए इसके लिए भी कारणों की खोज न कर किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है. विपदा के लिए किसी पुरूष को दोष देना ज़रा मुश्किल है इसलिए किसी निरीह स्त्री पर यह दोष मढ़ दिया जाता है इसलिए की वह विरोध नही कर सकती .फ़िर शुरू होता है उसे टोनही या डायन कह कर उसे प्रताडित करने का सिलसिला .मारपीट,अवमानना,निर्वस्त्र करना तो सामान्य बात है ,भूत-प्रेत और अंधेरे से डरने वाला वह बच्चा बड़ा होकर उसकी हत्या करने से भी नही चूकता ।
यह गब्बरसिंह के अविर्भाव से पूर्व की बात नही है यह तो अब भी घटित हो रहा है और इसके लिए अनपढ़ और पढेलिखे सब बराबर के जिम्मेदार है, निरक्षर इसलिए की उन्हें कुछ नही पता और साक्षर इसलिए की पढ़लिखकर भी उन्होंने अपनी वैज्ञानिक दृष्टी का विकास नही किया .छत्तीसगढ़ में लागू टोनही निवारक कानून जैसी व्यवस्था इस बुराई को दूर करने में मदद अवश्य कर सकती है लेकिन ज़रूरत है अपने और औरों के मस्तिष्क के अवचेतन में बचपन में डाली गई उन भ्रांतियों को दूर करने की जो अपराध को जन्म देती है .आप प्रयास प्रारंभ तो करे. .फिलहाल शरद कोकास की यह एक कविता "डायन"जो इसी विषय पर लिखी गई है.यह कविता कवि विष्णु खरे को बहुत पसंद है और उन्होंने इसका अंग्रेजी में अनुवाद भी किया है।

डायन


वे उसे डायन कहते थे
गाँव में आन पड़ी तमाम विपदाओं के लिए
वही जिम्मेदार थी
उनका आरोप था
उसकी निगाहें बुरी है
उसके देखने से बच्चे बीमार हो जाते है
गर्भ गिर जाते है
बाढ़ के अंदेशे है उसकी नज़रों में
उसके सोचने से अकाल आते है

उसकी कहानी थी
एक रात तीसरे पहर
वह नदी का जल लेने गई थी
ऐसी ख़बर थी की उसके तन पर उस वक्त
एक भी कपड़ा न था

सर सर फैली यह ख़बर
कानाफूसियों में बढती गई
एक दिन
डायरिया से हुई एक बच्चे की मौत पर
वह डायन घोषित कर दी गई
किसी ने कोशिश नही की जानने की
उस रात नदी पर क्यों गई थी वह
दरअसल अपने नपुंसक पति पर
नदी का जल छिड़ककर
ख़ुद पर लगा
बाँझ का कलंक मिटाने के लिए
यह तरीका उसने अपनाया था
रास्ता किसी चालाक मान्त्रिक ने सुझाया था

एक पुरूष के पुरुषत्व के लिए
दुसरे पुरूष द्वारा बताया गया यह रास्ता था
जो एक स्त्री की देह से होकर गुजरता था
उस पर काले जादू का आरोप लगाया गया
उसे निर्वस्त्र कर दिनदहाडे
गलियों बाज़ारों में घुमाया गया
बच्चों ने जुलूस का समां बंधा
पुरुषों ने वर्जित दृश्य का मज़ा लिया
औरतों ने शर्म से सर झुका लिए

एक टिटहरी ने पंख फैलाए
चीखती हुई आसमान में उड़ गई
न धरती फटी
न आकाश से वस्त्रों की बारिश हुई.

शरद कोकास

4 टिप्‍पणियां:

  1. बच्चे तो बिलकुल निडर होते है लेकिन हमने ही इतने काल्पनिक चरित्र बना दिए है की वे भी डरने लगते है..बाकी जिसे दायां बताया जाता है वो भी किसी की माँ,बहिन या पत्नी होती है...

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  2. समाज में फैले हुए अंधविश्‍वास का नाश करके ही हम प्रगति के सोपान पर चढ सकते हैं। आप इस दिशा में सक्रिय हैं, जानकर प्रसन्‍नता हुई।


    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  3. पापा मै भी भूत- प्रेत नही मानती

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  4. कोपल, मैं तो बचपन में देर रात तक उन जगहों पर घूमने जाता था जहां भूतों के होने की बात लोग करते थे।
    आज तक तो कोई मिला नहीं। भूत-भविष्य-वर्तमान ज़रूर जानता हूं अपना..:)

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