सोमवार, 15 नवंबर 2010

गर गले नहीं मिल सकता तो हाथ भी न मिला


             मस्तिष्क की कार्यप्रणाली

सोमेटोसेंसरी एरिया : मस्तिष्क का यह इंद्रीय संवेदों का केन्द्र है  । इस केन्द्र की कार्यप्रणाली को स्पष्ट करने के लिए मै आपको याद दिलाना चाहता हूँ एक मशहूर फ़िल्मी गीत की जो पिछले दिनों बहुत लोकप्रिय रहा है । यह एक आईटम सॉंग है .. बंगले के पीछे तेरी बेरी के नीचे  हाय रे काँटा लगा ..। इस मधुर गीत के रीमिक्स के दृश्य को कृपया याद न करें मैं केवल उस चुभन की ओर आपका ध्यान आकर्षित करवाना चाहता हूँ जो काँटा लगने पर होती है । हो सकता है काँटा चुभने का अनुभव आपको न हो लेकिन सुई या कोई नुकीली वस्तु चुभने का तो होगा ही । इस चुभन को हम मस्तिष्क के इसी केन्द्र द्वारा महसूस करते हैं ।
हमारे शरीर की त्वचा अत्यंत संवेदनशील होती है । इस बात का पता इससे भी चलता है कि कुछ लोग बैठे बैठे यहाँ वहाँ खुजाते रहते हैं । मस्तिष्क के इस केन्द्र तक शरीर के उस भाग से सूचना आती है और हाथ मस्तिष्क की आज्ञानुसार अपना काम करने कगता है । इस कार्यप्रणाली के कारण  जैसे ही हम कोई गरम या ठंडी चीज़ पकड़ते हैं या हमें मच्छर या कोई कीट काटता है तो हमे तुरंत पता चल  जाता  है । कोई हमें स्पर्श करता है तो हमें पता चल जाता है । यह बात अलग है कि कुछ स्पर्श सुखद होते हैं और कुछ दुखद । हाथ मिलाते हुए किसका हाथ कड़ा है और किसका हाथ नर्म है यह हमें यहीं से ज्ञात होता है । इसी तरह गले मिलने का सुख भी यहीं से मिलता है यह अलग बात है कि कोई गले मिलने के लिये गले मिलता है तो कोई गला काटने के लिये । अपने प्रिय से गले मिल कर हमें प्रसन्नता महसूस होती है । लेकिन कई लोग दिखावे के लिये भी गले मिलते हैं । ऐसे ही लोगों के लिये शायर जनाब बशीर बद्र ने लिखा है
      “ मोहब्बत  में  दिखावे  की  दोस्ती      मिला
       गर गले नहीं मिल सकता तो हाथ भी न मिला ।“
तो जनाब यह काँटा लगने ,मच्छर काटने, गले मिलने ,दर्द और खुजली आदि की अनुभूति हम मस्तिष्क के इसी इन्द्रीय संवेदों के केन्द्र से महसूस करते हैं । गाल पर ममत्व के दुलार का स्पर्श भी हम यहीं से महसूस करते है और गाल पर चाँटे का दुख भी यहीं से महसूस करते हैं । बचपन में यदि आपको मार पड़ी होगी तो उसे याद कीजिये , उस का दर्द आपने मस्तिष्क की इसी कार्यप्रणाली की वज़ह से महसूस किया था । 
यह भी एक अच्छी बात है कि हर अनुभूति संवेदना के स्तर पर हमारे मस्तिष्क में दर्ज हो जाती है । हम काँटे की चुभन जानते हैं इसलिये कंटक विहीन मार्ग से चलना चाहते हैं और दूसरों के लिए भी कामना करते हैं कि उनके मार्ग में कोई काँटा न आये ।  हम गर्म वस्तु या आग से जलने का कष्ट जानते हैं इसलिये आग से बचना चाहते हैं । उसी तरह हम स्पर्श या दुलार का सुख भी जानते हैं इसलिये बार बार उसे पाना चाहते हैं । 
( चित्र गूगल से साभार ) 

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी जानकारी ताकि लोग कुछ सीखे

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  2. .

    उसी तरह हम स्पर्श या दुलार का सुख भी जानते हैं इसलिये बार बार उसे पाना चाहते हैं ...

    So true !

    .

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  3. याद आया कि कैसे हमारी माँ ने हमें बताया कि उन्होंने रस्सी समझ सांप को उठा लिया था (जो उदाहरण आम तौर पर सत्य और भ्रम समझाने के लिए अधिकतर दिया जाता है)!
    उनको सुबह-सुबह के हलके प्रकाश में एक दिन फर्श पर कुछ रंग बिरंगी रस्सी सा पड़ा दिखा, और क्यूंकि उन दिनों वे पुरानी साड़ियों की रंगीन किनारी फाड़ के रस्सी के समान बांधने के काम में लाती थीं, सो उन्होंने उसे उठा लिया,,,और फिर उसके लिचलिचे स्पर्श से ज्ञांत हुआ कि वो रस्सी नहीं सांप था, तो उन्होंने घबरा के उसे तुरंत वहीं छोड़ दिया!

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  4. बहुत दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा! बढ़िया जानकारी मिली! धन्यवाद!

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  5. आज बहुत देर तक आपके ब्लागों की पोस्ट्स पढ़ती रही , खूब मन लगता रहा और बहुत अच्छा लगा - फिर आऊँगी . आपका आभार !

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