सोमवार, 17 मई 2010

मटर पनीर की सब्ज़ी की तरह बनता है हमारा शरीर

     लेखमाला : मस्तिष्क की सत्ता - हमारा और अन्य सजीवों का शरीर कैसे बनता है -  
 
आपसे यदि पूछा जाये कि सजीवों के कुछ प्रमुख लक्षण बताइये तो आप क्या कहेंगे ? सजीव वही है जो जीवित है या जिसके पास एक जीवित देह है ।फिर पूछा जाये कि जीवित देह में क्या होता है तो आप कहेंगे ,, एक सिर दो हाथ ,दो पाँव, दो आँखें ,दो कान ,एक दिल, एक पेट वगैरह वगैरह । और बेशक एक दिमाग़ भी ..। मेरे जैसे कुछ कविनुमा लोग कुछ और कहेंगे ..मसलन कटीली आँखें , पत्थर जैसा दिल ,कुँये जैसा पेट आदि आदि । लेकिन माफ कीजिये , मैं सिर्फ मनुष्यों के बारे में थोड़े ही पूछ रहा हूँ । मेरा आशय तो हर उस शरीर से है जिसे हम सजीव कहते हैं ।  बिलकुल सही फरमाया आपने लेकिन यह शरीर जिसके हम मालिक हैं इसकी यह बेहद उबाऊ  ही सही लेकिन वैज्ञानिक परिभाषा जानना भी तो ज़रूरी है ।
आइये कुछ विस्तार से देखें सजीवों का यह शरीर कैसे बनता है और इसके प्रमुख लक्षण क्या क्या होते हैं । इनमे सबसे पहला है  जीव द्रव्य  : सजीवों का शरीर जीव द्रव्य से बनता है । इस जीव द्रव्य में मुख्यत: कार्बनिक व अकार्बनिक ठोस पदार्थ ,प्रोटीन वसा, कार्बोहाइड्रेटस नयूक्लीइक एसिड ,लवण तथा जल होता है । ये सभी यौगिक निर्जीव तत्वों से बनते हैं  । यह पारदर्शी ,चिपचिपा ,रवेदार ,जेलीनुमा ,अर्धतरल पदार्थ होता है । यह कोशिका की कोशिका झिल्ली के भीतर अवस्थित होता है ।  निर्जीव तत्वों से बने इन यौगिकों के एक विशेष तरह के अणु संग्रह में जीवन होता है । 
सजीवों का दूसरा लक्षणहै एक निश्चित शारीरिक संगठन : शरीर का निर्माण करने वाला जीव द्रव्य छोटे छोटे टुकडों में कोशिका कला से घिरकर शरीर की वह इकाई बनाता है जिसे कोशिका कहते हैं । कुछ जीवों का शरीर एक कोशिका से बना होता हैं । ये ‘ एक कोशिकीय जीव ‘ कहलाते है जिसे अमीबा,वालवॉक्स आदि । मनुष्य,अन्य जंतु व पौधे जो अनेक कोशिकाओं से बनते हैं ‘ बहुकोशिकीय जीव ‘ कहलाते हैं । इनके शरीर में असंख्य कोशिकाओं से मिलकर बनते हैं ‘ ऊतक ‘। विभिन्न ऊतकों से अंग बनते हैं। कई अंगो को मिलाकर तंत्र बनता है तथा तंत्रों के संगठन से शरीर का निर्माण होता है। इस तरह बने हुए शरीर की एक निश्चित पहचान होती है जैसे मनुष्य का शरीर,भैंस, हाथी , कुत्ता ,गाय .मख्खी और गधे आदि का शरीर । ऐसे ही पौधे की भी एक निश्चित आकृति होती है जिससे हम पहचानते हैं यह पीपल का पेड़ है या आम का ।
आइये इसे एक उदाहरण से समझते हैं । मटर पनीर की सब्ज़ी बनाने के लिये पहले कढाई में तेल डालते हैं । फिर उसमें जीरा , प्याज़,लहसुन ,अदरक,मिर्च,धनिया,हल्दी डाल देने से बनता है मसाला , इसमे पानी डाल दें तो बन जाती है तरी,उसमें मटर डाल दें तो कहलाती है मटर की सब्जी । अगर इसमें पनीर भी डाल दें तो कहलाती है मटर-पनीर की सब्जी । इसकी अपनी पहचान इसी नाम से  होती है और  अन्य तत्वों के नाम लुप्त हो जाते हैं ।
मैने अपने एक व्याख्यान के दौरान जब यह उदाहरण दिया तो एक महिला ने कहा “ सर ,आपने इतना भाषण दे दिया लेकिन इस क्रम में आपकी सब्ज़ी (मतलब मटर-पनीर की सब्ज़ी ) बन ही नहीं सकती । मैने पूछा "कैसे ?"तो उसने कहा " आपने गैस तो जलाई ही नही।  मैने कहा बिलकुल ठीक । मैं यह बताना भूल ही गया । सब्जी पकाने से पहले गैस जलाना ज़रूरी है ।अंत में यही एक बात कि जैसे पकाने के लिये उर्जा ज़रूरी है वैसे ही जीवन के निर्माण और सजीव को जैविक क्रियाओं के लिये भी उर्जा ज़रूरी है ।
अगली किश्त में देखेंगे सजीवों के अन्य लक्षण । 
आज उपसर्ग में प्रस्तुत है शरीर के लिये और जीवन के लिये ज़रूरी इस उर्जा या इस आग पर कवि निरंजन श्रोत्रिय की यह एक कविता ,उनके संग्रह "जुगलबंदी " से साभार ।

                आग

हमारा बहुत सारा जीवन
उसकी तलाश में निकल जाता है
जबकि वह मौजूद होती है
हमारे बहुत करीब

जब हम रगड़ते हैं दियासलाई
वह सिमटी होती है छ: हज़ार डिग्री सैल्सियस
धधकते सूरज से उतरी धूप के भीतर
जब हम ढूँढते हैं ठंडी राख के भीतर कोई अंगारा
वह दुबकी होती है टेसू के सिंदूरी –पीले रंग में

रात को ठंडी पड़ी भट्टी की ईटों और
गुस्से में उबलती कलम की नोंक में
छुपा होता है उसका संगीत

वह भरी हुई है मरी खाल के फ़ेफ़ड़े के भीतर
पिघलाने को बहुत सा लोहा
वह प्रतीक्षा कर रही है हथेलियोँ की रगड़ की

हम अपना सारा जीवन उसे इधर-उधर खोजने में लगा देंगे
और वह प्रकट हो जायेगी यूँ ही एक हल्की चोट में
वहाँ जहाँ चकमक पत्थरों से खेल रहे हैं बच्चे |
                
                       निरंजन श्रोत्रिय  

बुधवार, 5 मई 2010

मुझे नही पता ,आप ही बताइये यह जीवन क्या हैं ?


                                  
आप कहेंगे यह भी कोई सवाल है । सही है आप में से ऐसा कोई नहीं होगा जिसने कभी इस प्रश्न के बारे में न सोचा हो । अभी इस सवाल के उत्तर में आप धड़ाधड़ लिखना शुरू कर देंगे । कोई कहेगा ज़िन्दगी एक पहेली है कोई कहेगा जीवन पानी का बुलबुला है ,जीवन एक उड़ती हुई पतंग है,जीवन एक साँप है , जीवन एक सज़ा है  , एक उड़ता हुआ पंछी है ,वगैरह वगैरह ।जीवन के बारे में हर कवि ने दो चार पंक्तियाँ तो लिख ही डाली हैं मसलन ..”जीवन क्या है,चलता फिरता एक खिलौना है / दो आँखों में एक से हंसना एक से रोना है ।" मुझे भी जीवन के बारे में कविताएँ बहुत अच्छी लगती हैं और जीवन को परिभाषित करने वाली एक कविता तो मुझे बेहद पसन्द है ..” ज़िन्दगी क्या है जान जाओगे / रेत पे लाके मछलियाँ रख दो “
        चलिए कवियों को अपना काम करने दीजिये, हम जीवन की वैज्ञानिक परिभाषा देखते हैं ।   पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ हो चुका था लेकिन मानव जीवन के आगमन में अभी समय था । पेड़-पौधे ,कीड़े-मकोड़े, रेंगने वाले जीव तैरने वाले जीव और उड़ने वाले जीवों का आगमन हो रहा था । यह सब सजीव थे और इनमें जीवन के सभी लक्षण मौजूद थे । हमें तो मनुष्य के जीवन से मतलब है इसलिये मनुष्य के जन्म का समाचार जानने से पहले हम जान लें ,आखिर यह सजीव होना क्या है ?
जीव का अर्थ आत्मा नहीं होता - जीवन के बारे में अगर आप जानते हैं तो आपको यह भी पता ही होगा कि हम मनुष्य,अन्य प्राणि,कीट-पतंगे और पेड़-पौधे सभी सजीवों की श्रेणि में आते हैं । सजीवों के कुछ विशेष लक्षण होते हैं जैसे जन्म लेना,बढ़ना, सांस लेना, गति, उत्तेजना तथा संतानोपत्ति और अंतत: मृत्यु आदि। ये सजीव अपने आसपास से अपने जीवन के लिये आवश्यक वस्तुयें ग्रहण करते हैं । सजीवों के सभी लक्षण जीवन के फलस्वरुप ही होते हैं । सजीवों के शरीर में जीवन के लिये आवश्यक क्रियाशीलता बनी रहती है । यह क्रियाशीलता उनके पदार्थ जीव द्रव्य विभिन्न तत्वों तथा यौगिकों का विशिष्ट संगठन हैं। इस प्रकार जीव संगठित द्रव्य है तथा जीवन उसकी क्रियाशीलता । जीवन के होने के लिये एक शरीर आवश्यक है। शरीर से बाहर जीवन नहीं हो सकता । शरीर और जीवन का तालमेल ही एक सजीव को होने का अर्थ प्रदान करता है । जीवन को बेहतर तरीके से जानने के लिये जरूरी है शरीर को जानना । 
सजीवों के इन प्रमुख लक्षणों को तो हम अगली पोस्ट में देखेंगे , इस बार तो आप यह बताइये कि आप से अगर पूछा  जाये कि जीवन क्या है ? तो आप एक दो पंक्ति में इसका क्या उत्तर देंगे ? जीवन की आपकी अपनी परिभाषा जानने की प्रतीक्षा में - आपका -  शरद कोकास 
अरे हाँ उपसर्ग की कविता तो लिखना भूल ही गया , इस बार लीजिये पढ़िये कवि कुमार अम्बुज की यह कविता जिसमें आपको जीवन की प्रचलित परिभाषाओं से अलग जीवन का एक नया ही अर्थ दिखाई देगा ।श्री कुमार अम्बुज हिन्दी के बहुत प्रसिद्ध कवि हैं और भोपाल में रहते हैं । उनका एक ब्लॉग भी है , " कुमार अम्बुज "... इसे भी देखियेगा । 


                                    इस नश्वर संसार में

लाखों करोड़ों सालों से
इतना ही जीवित चला आ रहा है
यह नश्वर संसार

नश्वरता की घोषणा करने वाले
नष्ट हो गये
नश्वर संसार नष्ट नहीं हो रहा है

तमाम नश्वरता के बावज़ूद
भंगी अपनी झाड़ू बचा लेता है
धोबी अपने घाट का पत्थर
एक मिस्त्री बचा लेता है अपने औज़ार
और किसान गेहूँ की बाली
लोहार अपना घन
समय की छाती पर पटक देता है

तोते अपनी चोंच की लाली बचा लेते हैं
कोयल अपनी कूक
स्त्री अपनी मादकता बचा लेती है
पुरुष अपना ताप
काल के विकराल मुँह से छीन लेता है एक बच्चा
अपनी अमर हँसी

इस नश्वर संसार में
जीवन अमर हो रहा है लगातार
नश्वरवादियों के शवों पर
अट्टहास करता हुआ । 

                - कुमार अम्बुज 

चित्र गूगल से और कुमार अम्बुज की कविता उनके संग्रह " किवाड़ " से साभार ।तस्वीर मेरे मोबाइल कैमरे से ..-शरद कोकास  

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

कुत्ते जैसी हरकतें करने वाले इंसानों से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है ...

 लेखमाला मस्तिष्क की सत्ता -- जीवन में प्रोटीन और डी.एन.ए.  का अर्थ

पुरानी फिल्मों के दृश्यों को याद कीजिये ..कटघरे में एक स्त्री खड़ी है और वह चीख चीख कर कह रही है ..इस बच्चे का पिता यही है मी लॉर्ड” । दूसरे कटघरे में एक विलेन टाइप का पुरुष कुटिल मुस्कान के साथ खड़ा है । उसका वकील कह रहा है “ लेकिन इसका तुम्हारे पास क्या सबूत है ?” अब फिल्मों में ऐसा दृश्य नहीं होता इसलिये कि अब समय बदल गया है और विज्ञान ने साबित कर दिया है कि बच्चे के डी.एन.ए. से पिता का डी.एन.ए. मिलाकर यह जाना जा सकता है कि उसका वास्तविक पिता कौन है । अब तो टी.वी.धारावाहिक देखने वाले बच्चे भी इस बात को बखूबी जानते हैं कि बच्चे के पिता का पता लगाने के लिये दोनों के डी.एन.ए. का मिलान आवश्यक है ।
मनुष्य के व कुत्ते के तीन-चौथाई डी.एन.ए. एक जैसे हैं - इस तरह हम देखते हैं कि  जीवन के लिये दो रासायनिक व्यवस्थाएँ आवश्यक हैं प्रोटीन तथा डी.एन.ए ( डीआक्सीराइबो नयूक्लीइक एसिड )। हर व्यक्ति का डी.एन.ए. अलग होता है । आजकल के मानव शरीर के डी.एन.ए. अन्य प्राणियों के डी.एन.ए. से भी मिलते हैं जैसे चिम्पांजी और मनुष्य  के डी.एन.ए.  99.8 % मिलते हैं तथा कुत्ते व मनुष्य के 75% । (कुत्ते जैसी हरकतें करने वाले इंसानों से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है ) विभिन्न एमीनो एसिड्स के मेल से प्रोटीन बनता हैं तथा न्यूक्लीइक अम्ल न्यूक्लिओटाईड्स से बनता है । इनमें कार्बन नाइट्रोजन के यौगिक  शर्करा एवं फास्फेट से जुडे होते हैं । प्रोटीन जीवन की सुनियोजित संरचना का आधार है तथा  डी.एन.ए यह निर्धारित करता है कि शरीर में क्या बनाना है।
                    इस वैज्ञानिक सिद्धांत के प्रारम्भिक चरण में सन 1953 में मिलर नामक वैज्ञानिक ने एक प्रयोग किया था जिसमें उसने पृथ्वी के प्रांरभिक वायुमंडल में पाई जाने वाली जल वाष्प,मीथेन अमोनिया और हाइड्रोजन जैसी गैसों के मिश्रण में एक सप्ताह तक बिजली की चिनगारी प्रवाहित की जिसके फलस्वरूप एमिनो एसिड्स तैयार हुए । तत्पश्चात अनेक वैज्ञानिकों ने भी ऐसे ही प्रयोग किये जिससे राइबो शर्करा उनके फास्फेट तथा एडनिन जैसे अनेक जैव अणु तैयार हुए। ये अणु  न्यूक्लिओटाईड्स के मूल घटक हैं । इनके ही बहुलकीकरण  से  न्यूक्लीईक  एसिड बनता है ।
जल ही जीवन है क्यों कहा जाता है - हमारे सौर परिवार में केवल पृथ्वी पर ही जीवन सभंव हो सका इसका कारण यह है कि प्रोटीन की एंजाइमी किया के लिये मुक्तजल की उपस्थिति अनिवार्य थी । सूर्य से न अधिक दूर न अधिक पास होने की वजह से यहाँ वाष्पीकरण के  पश्चात भी काफी जल शेष रहता है । अब आप समझे वैज्ञानिक चन्द्रमा और मंगल  पर जीवन की सम्भावनाओं से पहले पानी की तलाश क्यों कर रहे हैं ।जब तक मनुष्य चन्द्रमा पर नहीं गया था वह चन्द्रमा पर दिखाई देने वाले धब्बों को पानी से भरी झीलें ही समझता था । पानी जीवन के लिये इतना ज़रूरी क्यों है यह अब आप जान गये होंगे।
उपसर्ग में आज प्रस्तुत है  कवि चन्द्रकांत देवताले की यह कविता " शब्दों की पवित्रता के बारे में "

                         शब्दों की पवित्रता के बारे में

रोटी सेंकती पत्नी से हँसकर कहा मैने 
अगला फुलका बिल्कुल चन्द्रमा की तरह बेदाग़ हो तो जानूँ 

उसने याद दिलाया बेदाग़ नहीं होता चन्द्रमा 

तो शब्दों की पवित्रता के बारे में सोचने लगा मै 
क्या शब्द रह सकते हैं प्रसन्न या उदास केवल अपने से 

वह बोली चकोटी पर पड़ी कच्ची रोटी को दिखाते 
यह है चन्द्रमा - जैसी दे दूँ इसे क्या बिना ही आँच दिखाये 

अवकाश में रहते हैं शब्द शब्दकोष में टंगे नंगे अस्थिपंजर 
शायद यही है पवित्रता शब्दों की 

अपने अनुभव से हम नष्ट करते हैं कौमार्य शब्दों का 
तब वे दहकते हैं और साबित होते हैं प्यार और आक्रमण करने लायक 

मैंने कहा सेंक दो रोटी तुम बढ़िया कड़क चुन्दड़ीवाली 
नहीं चाहिये मुझको चन्द्रमा जैसी ।

( कविता चन्द्रकांत देवताले के संग्रह " उसके सपने " से व चित्र गूगल से साभार )

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

पृथ्वी पर जीवन कैसे आया - एक लेख और एक नज़्म



जब हम कोई नाटक देखते हैं तो सबसे पहले रंगमंच पर एक या दो पात्रों का प्रवेश होता है ,फिर धीरे धीरे अन्य पात्रों का प्रवेश होता है और इस तरह नाटक चलता रहता है । यह बृह्माण्ड का रंगमंच भी कुछ इसी तरह का है । इस रंगमंच पर आकाशगंगायें आईं , सौरमण्डल  आये , ग्रह आये , उपग्रह आये यह सब तो आप देख चुके हैं । अब देखते हैं इस पृथ्वी पर घटित होने वाली एक महत्वपूर्ण घटना अर्थात पृथ्वी पर जीवन का प्रादुर्भाव । ना ना ... अभी हम मनुष्य के आगमन की बात नहीं कर रहे हैं ,मनुष्य के आने से पहले ही यहाँ बहुत कुछ हो चुका था ,पहले एक नज़र उसे तो देख लें ।
              इस तरह साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी तो बन गई ,समुद्र नदी,नाले, तालाब ,पहाड़ सब बन गये ,लेकिन यहाँ जीवन की शुरुआत होनी अभी शेष थी । भू वैज्ञानिकों द्वारा आस्ट्रेलिया ,अफ्रीका व ग्रीनलैंड में किये गये अध्ययनों के आधार पर यह सिध्द हो चुका है कि आज से साढ़े तीन अरब वर्ष पूर्व बैक्टीरिया के समान एक कोशीय जीव ,समुद्रतलों के छिछले पानी में शैलभितियाँ बना रहे थे । इनके पूर्वजों अर्थात सरल अविकसित जीवाणु की उपस्थिति भी लगभग 4 अरब वर्ष पूर्व रही होगी ।इस प्रकार यह प्रतीत होता हैं कि पृथ्वी के विकास के साथ साथ कहीं न कहीं जीवन का विकास भी हो रहा था ।                        
        जीवन की उत्पति कैसे हुई इसके विषय में प्राचीन मनुष्य की अपनी धारणाएँ हैं परंतु विज्ञान के आधार पर शोधकर्ताओं ने इस रहस्य को सुलझा लिया हैं । सन 1920 में एक रुसी वैज्ञानिक जे.बी एस . हाल्डेन ने ‘पृथ्वी पर निर्जीव रसायनों की पारस्पारिक प्रतिक्रिया से जीवन के उदभव’ का सिध्दांत प्रतिपादित किया । हाल्डेन ने कहा कि उस काल में कास्मिक किरणों , बिजली ( तड़ित ) व ज्वालामुखी के कारण हो रही तीक्ष्ण रासायनिक प्रक्रिया के फलस्वरुप कार्बन मूल के जैव अणुओं की उत्पत्ति हुई । ये अणु नदियों के साथ बहकर समुद्र में मिले , जिनसे समुद्र को उष्णता व गाढापन मिला ।
          ओपेरिन ने कहा कि आम कोशिकायें जेली ( श्लष ) जैसी छोटी छोटी बूंदें रही होगीं । समुद्रों के साथ रसायनों के आदान प्रदान के दौरान इन जेल सृदृश्य छोटी बूंदों ने ऐसे अणुओं का निर्माण किया होगा जिन्होने बाद में अपनी प्रतिकृतियाँ बनाई होंगी ।
          सन 1958 से इन धारणाओं को परखने की शुरुआत हुई । शिकागो विश्वविधालय के वैज्ञानिकों ने उन तमाम गैसों को एक फ्लास्क में लिया जो पृथ्वी के प्रांरभिक वायुमंडल मे विद्यमान थीं । उनमें विद्युत स्फुलिंगों को प्रवाहित कर बिजली पैदा की । इस तरह उन्हे एक सप्ताह पकाया गया । देखा गया कि एक सप्ताह बाद इन गैस भरे फ्लास्कों पर  एमीनो एसिडस की परतें चढ़ गई हैं । इन्ही एमीनो एसिडस के आपस में जुडने से प्रोटीन बनता हैं । इसी प्रयोग में जीवन के अन्य मौलिक रासायनिक घटकों का निर्माण होता देखा गया ।
          पृथ्वी पर जीवन के अविर्भाव के सम्बन्ध में कुछ वैज्ञानिकों की यह भी मान्यता है कि हो सकता है पृथ्वी पर जीवन अंतरिक्ष से आया हो । इसके लिये भी प्रयोग चल रहे हैं । यह तो विज्ञान है ,अभी तक इसने जीवन की उत्पत्ति के बारे में जो कुछ बताया है उसे हम मान लेते हैं ,आगे और कुछ नया बतायेगा तो उसे भी मान लेंगे ?
उपसर्ग में प्रस्तुत है इस बार प्रसिद्ध शायर जनाब निदा फाज़ली की यह मशहूर नज़्म .............
                                    ये ज़िन्दगी 
ये ज़िन्दगी 
आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी बड़ी नसों में 
मचल रही है 
तुम्हारे पैरों से चल रही है 
तुम्हारी आवाज़ में गले से 
निकल रही है 
तुम्हारे लफ्ज़ों में 
ढल रही है..... 
ये ज़िन्दगी..... 
जाने कितनी सदियों से 
यूँ ही शक्लें 
बदल रही है 

बदलती शक्लों
बदलते जिस्मों में
चलता-फिरता ये इक शरारा 
जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा ! 
इसी से सारी चहल -पहल है 
इसी से रोशन है हर नज़ारा 

सितारे तोड़ो 
या घर बसाओ
अलम उठाओ 
या सर झुकाओ 

तुम्हारी आँखों की रोशनी तक है 
खेल सारा 
ये खेल होगा नहीं दोबारा ।   

अलम=जंग का निशान 
 मित्रों पृथ्वी पर जीवन का यह  खेल सचमुच दोबारा नहीं होना है इसलिये क्यों न हम इस खेल को एक बार में ही समझ लें और जान लें अपने होने का अर्थ । अगली कड़ी में पढ़ेंगे जिन्दगी माने प्रोटीन और डी.एन.ए. -            
 शरद कोकास
(नज़्म , वाणी प्रकाशन से प्रकाशित निदा फाज़ली के संग्रह "खोया हुआ सा कुछ " से साभार । छवि गूगल से साभार)

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

चन्दामामा के नाना सूरज तो हमारे कौन ?


पिछली पोस्ट से इतना ज़रूर याद रखें -                                                                                 
          आइये ,इस सिद्धांत के आधार पर देखें कि हमारी पृथ्वी कैसे बनी । साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व सूर्य के निकट से एक पिन्ड गुजरा ,दोनों पिन्डों में आकर्षण हुआ । सूर्य से जो तंतु निकला कालांतर में उसके ठंडे  होने  पर तथा द्रव्य के शीतली करण के कारण उसके छोटे छोटे पिंड बने । ये तमाम पिंड उस सूर्य की परिक्रमा करने लगे जो उनका जनक था । यह सभी पिंड ग्रह कहलाये  जिनमें हमारी पृथ्वी भी एक ग्रह है और उसके भाई बहन हैं अन्य ग्रह । हमारे सबसे करीब यही ग्रह है जिस पर हम खड़े हैं लेकिन इसका हमारी कुंडली में कहीं कोई स्थान नहीं है । और वह पिन्ड जिसके आकर्षण के फलस्वरूप हमारे सौरमंडल की उत्पत्ति हुई हो सकता है अपनी संतानों के साथ बृह्मांड में कहीं विचरण कर रहा हो ।      
  और अब आज की कड़ी -  चन्दा का और हमारा रिश्ता मामा-भांजे का है यह बात हमे बचपन में ही बता दी जाती है ।बड़े होकर हम चांद सी महबूबा वगैरह ढूंढने लगते हैं । लड़कियाँ चांद सी सूरत पाने को बेताब रहती हैं वहीं लड़के भरी जवानी में सर पर चांद निकलने से घबरा जाते हैं । जो लोग बहुत महत्वाकांक्षी होते है उनके बारे में कहा जाता है कि वह चांद को छूने की कोशिश कर रहा है ।लेखक सुरेन्द्र वर्मा ने तो एक उपन्यास ही लिख डाला है “ मुझे चांद चाहिये “ ।इसी चांद के कैलेंडर पर हमारे सारे तीज त्योहार आधारित हैं ।“करवा चौथ " के चांद से तो आप भलिभाँति  परिचित हैं हमारी फिल्मों और धारावाहिकों ने इस पर्व का महत्व स्थापित कर दिया है । पति कैसा भी हो उसके लिये पत्नी व्रत ज़रूर रखती है । पत्नी के लिये पति द्वारा रखे जाने वाले व्रत का अभी तक अविष्कार नहीं हुआ है । यह भी आप जानते होंगे कि हिन्दू धर्म के अलावा इस्लाम में भी सारे त्योहार चांद के घटने - बढ़ने पर ही आधारित होते हैं ।चांद का कैलेंडर ही मनुष्य का पहला कैलेंडर था  ।  
चलिये देखते हैं कि जिस चांद का हमारे जीवन में इतना महत्व है उसका जन्म कैसे हुआ । सूर्य की बेटी पृथ्वी का जन्म हो चुका था फिर उसका अन्नप्राशन हुआ,नामकरण हुआ और वह धीरे धीरे बड़ी होने लगी । फिर उसकी भी संतान होने का समय आया । पृथ्वी और अन्य ग्रह अपनी उत्पत्ति के समय से ही अपने जनक सूर्य के चारों ओर एक कक्षा में परिक्रमा करने लगे थे । प्रारम्भ में  यह कक्षा पूरी तरह वृताकार या दीर्घ वृताकार नहीं थी, इसका कारण पिंडों का परस्पर आकर्षण व अन्य शक्तियों का होना था ।
यह कैसे हुआ होगा जानने के लिये चलिये एक धागे में कोई अंगूठी या भारी वस्तु लटकाईये और उसे गोल गोल घुमाईये,,हाथ सधने में कितनी देर लगती है देखिये । हाँ तो धीरे धीरे कक्षाएँ पूर्ण होती गईं । यह सम्भव है कि जब ग्रह सूर्य के चारों ओर अपूर्ण व अव्यवस्थित कक्षाओं में परिक्रमा लगा रहे थे , कोई ग्रह सूर्य के बहुत निकट पहुंच गया हो तथा गुरुत्वाकर्षण के कारण उसमें से कोई तंतु निकल पड़ा हो । कालांतर में यह तंतु ठंडा हुआ, उसके द्रव्य का शीतलीकरण हुआ तथा उसके छोटे छोटे पिंड बन गये । यही पिंड उपग्रह कहलाये जिस प्रकार ग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहे थे उसी तरह यह उपग्रह भी अपने ग्रह की परिक्रमा करने लगे । जैसे पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह चन्द्रमा जो पृथ्वी से चार लाख किलोमीटर दूर है अपनी जननी की परिक्रमा कर रहा है । शनि के उपग्रह उसकी परिक्रमा कर रहे हैं । पृथ्वी अपने जनक सूर्य की परिक्रमा कर रही है साथ ही अपने अक्ष पर भी परिक्रमा कर रही है । सभी ग्रह एक ही दिशा में सूर्य की परिक्रमा करते हैं तथा इनकी कक्षाएँ एक ही समतल में हैं ।
यह सब चक्कर हमारे जीवन में भी चलते है किसी काम को पूरा करवाने के लिये हम सरकारी दफ्तर में बाबू के चक्कर लगाते हैं, बाबू साहब के चक्कर लगाता है, साहब मंत्री के चक्कर लगाता है और मंत्री प्रधान मंत्री के चक्कर लगाता है । काम होता है या नहीं होता यह अलग विषय है ।
और हाँ.. आप आकाश में प्रतिदिन चांद की स्थिति देखना चाहते हैं तो ज़रा साइड बार में देखिये आपके आसमान पर आज चांद कैसा दिख रहा है दिख जायेगा ।


उपसर्ग में प्रस्तुत है एक गुमनाम से शायर शब्बीर अहमद ख़ान “ करार “ की यह कविता । करार साहब उन दिनों कामठी (महाराष्ट्र) में रहते थे और भोपाल के क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालय में एक वर्षीय बी.एड .के छात्र थे । उन दिनों कॉलेज की पत्रिका “प्रज्ञा” में यह कविता प्रकाशित हुई थी । इस पत्रिका के सम्पादक थे आज के प्रसिद्ध कवि श्री लीलाधर मण्डलोई । चांद पर मनुष्य की विजय पर तीखा व्यंग्य करती यह कविता पढ़िये ।

                                   धरती माँ के लाल गये थे
 
बहुत सभ्य कहलाने को
निज कौशल दर्शाने को
बुद्धि का लौह मनाने को
धरती माँ के लाल गये थे
चांद पे मिट्टी लाने को
धरती का बोझ बढ़ाने को ।

वियतकांग में आग लगाकर
जाने कितने बम बरसाकर
लाखों जीवन दीप बुझाकर
लाशों के अम्बार लगाकर
अपने ऐब छुपाने को
धरती माँ के लाल गये थे
चांद पे मिट्टी लाने को
धरती का बोझ बढ़ाने को ।

मिट्टी का पुतला मिट्टी से
जितनी दूर भी जायेगा
ऊपर-नीचे आगे-पीछे
मिट्टी ही तो पायेगा
मन मिट्टी हो जायेगा
करनी पर पछतायेगा
मिट्टी ही लेकर आयेगा
यह जग को समझाने को ।

धरती माँ के लाल गये थे
चांद पे मिट्टी लाने को
धरती का बोझ बढ़ाने को ॥

"मस्तिष्क की सत्ता "लेखमाला की यह कड़ी आपको कैसी लगी अवश्य बताइयेगा । - शरद कोकास
छवि गूगल से साभार

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

पृथ्वी पर रहने का किराया दो

इस बार कुछ देर हो गई । नवरात्रि पर अपने ब्लोग शरद कोकास पर विदेशी कवयित्रियों की कविता लगाने में व्यस्त रहा । इसके लिये क्षमा चाहता हूँ ।  खैर ..देर से ही सही प्रस्तुत है " मस्तिष्क की सत्ता " लेखमाला में इस बार  की यह कड़ी हमारी पृथ्वी पर ।                                                                                                          
पिछली पोस्ट से इतना ज़रूर याद रखेंमान लीजिये हमारी पृथ्वी की आबादी लगभग छह सौ करोड़  है ,इस तरह   हम हमारी पृथ्वी के 600 करोड़वें हिस्से हैं । हमारा सौर परिवार हमारी आकाशगंगा का 64 करोड़वाँ हिस्सा है तथा हमारी पृथ्वी हमारी आकाशगंगा का 25 हज़ार करोड़वाँ हिस्सा है । अब बताइये इस आकाशगंगा में हम कहाँ हुए ? फिर ऐसी करोड़ों आकाशगंगाएं बृह्मांड में हैं तो हम बृह्मांड में कहाँ हुए ? गणना छोड़िये , यह सोचिये कि जब हम बृह्मांड में इतने नगण्य हैं तो मामूली कुत्ते,बिल्ली,चीटीं और मच्छरकी क्या स्थिति होगी ? उनसे भी छोटे हैं कीटाणु जो आकार में मिलीमीटर के हज़ारवें भाग तक होते हैं जो केवल माईक्रोस्कोप से देखे जा सकते हैं और जिन्हे माईक्रोमीटर में नापते हैं। इनसे भी छोटे होते हैं अणु । अणु के विभिन्न हिस्से हैं परमाणु जो पदार्थ का सूक्ष्मतम भाग है। समस्त बृह्मांड इन्ही अणुओं से बना है। परमाणु को इलेक्ट्रोन ,प्रोटान व न्यूट्रान में विभाजित कर सकते हैं । ये मूलभूत कण हैं , इलेक्ट्रोन इनमें सबसे छोटा कण है ।
             पृथ्वी पर रहने का किराया दो                       

मकान खरीदने से पहले हम हमेशा जानना चाहते हैं यह  किसने बनाया है या ज़मीन खरीदने से पहले यह कि वह ज़मीन किसकी है । हम इस बात के प्रति आश्वस्त हो जाना चाहते हैं कि हम कहीं ठगे तो नहीं जा रहे । सही बात है , आखिर ज़मीन या मकान का पैसा दे रहे हैं भाई  । ज़मीन या मकान ही नहीं छोटी से छोटी वस्तु भी हम यदि खरीदते हैं या किराये पर लेते हैं तो उसकी बारे में जानना चाहते हैं ।ऐसा है तो फिर हम यह क्यों नहीं जानना चाहते कि जिस पृथ्वी पर अपने पुरखों के ज़माने से हम रह रहे हैं वह कहाँ से आई ? आप कहेंगे पृथ्वी हम खरीद थोड़े ही रहे हैं या इस पर रहने का किराया  थोड़े ही दे रहे हैं । सही है ,जो चीज़ मुफ्त में मिल रही हो या जिसके लिये किराया ना देना पड़ रहा हो उसके बारे में क्या पूछना । कहीं से भी आई हो पृथ्वी हमने तो इसे माल-ए-मुफ्त समझकर इसके टुकड़े टुकड़े कर बाँट लिया है । जो दिमाग से जितना चालाक उसका हिस्सा उतना बड़ा । जो बड़ा ज़मीन्दार उसके पास सैकड़ों एकड़ ज़मीन और जो सीधा-सादा गरीब उसके पास कुछ नहीं ।
चलिये सामाजिक विषमताओं की बात छोड़िये पृथ्वी कहाँ से आई यह देखते हैं । हर धर्म में पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धी ढेरों पौराणिक और प्राचीन मान्यताएँ हैं लेकिन फिलहाल इन्हे एक ओर रखकर इसका वैज्ञानिक उत्तर ढूंढते हैं । भौतिक विज्ञान के महत्वपूर्ण नियम गुरुत्वाकर्षण (जय हो बाबा न्यूटन) के नियमानुसार द्रव्य के दो पिंडों के बीच आकर्षण होता है । एक पिंड दूसरे पिन्ड को अपनी ओर खींचता है तथा उसके करीब पहुंचते पहुंचते यह आकर्षण बढ़ता जाता है व खिंचने की गति भी बढ़ जाती है । इस प्रकार जब दो पिंड एक दूसरे के बहुत निकट आ जाते हैं तो गुरुत्वाकर्षण के फलस्वरूप दोनों पिंडों से एक लम्बा तंतु निकलता है ।(ऐसा कीजिये आज रसोई में आटा गून्धिये । अपने दोनो हाथ मे अलग अलग आटे के गोले लीजिये फिर दोनो को मिलाइये और खींचकर देखिये तंतु ऐसे ही निकला होगा ) कालांतर में यह तंतु ठंडा होता है द्रव्य का शीतलीकरण होता है व छोटे छोटे पिंड बन जाते हैं इस प्रकार उत्पन्न पिंड अपने उत्पादक पिंड के चारों ओर चक्कर लगाते हैं । यह सिद्धांत सन 1916 में प्रसिद्ध ब्रिटिश वैज्ञानिक जेम्स जिंस ने स्थापित किया ।
          आइये ,इस सिद्धांत के आधार पर देखें कि हमारी पृथ्वी कैसे बनी । साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व सूर्य के निकट से एक पिन्ड गुजरा ,दोनों पिन्डों में आकर्षण हुआ । सूर्य से जो तंतु निकला कालांतर में उसके ठंडे  होने  पर तथा द्रव्य के शीतली करण के कारण उसके छोटे छोटे पिंड बने । ये तमाम पिंड उस सूर्य की परिक्रमा करने लगे जो उनका जनक था । यह सभी पिंड ग्रह कहलाये  जिनमें हमारी पृथ्वी भी एक ग्रह है और उसके भाई बहन हैं अन्य ग्रह । हमारे सबसे करीब यही ग्रह है जिस पर हम खड़े हैं लेकिन इसका हमारी कुंडली में कहीं कोई स्थान नहीं है । और वह पिन्ड जिसके आकर्षण के फलस्वरूप हमारे सौरमंडल की उत्पत्ति हुई हो सकता है अपनी संतानों के साथ बृह्मांड में कहीं विचरण कर रहा हो ।
          इस प्रकार यह पृथ्वी जन्म लेने के पश्चात प्रारम्भ में विभिन्न प्रकार की गैस से मिलकर बना एक विशालकाय पिंड थी जो अपने अक्ष पर घूमती हुई सूर्य की परिक्रमा कर रही थी । ताप के विकीरण के फलस्वरूप यह पिंड ठंडा हुआ ,द्रव्य व गैसों का शीतलीकरण हुआ तथा तरलीय व अर्धसान्द्रीय अवस्थाओं से होता हुआ वर्तमान अवस्था तक पहुंचा। बाहरी तल से घनीकरण प्रारम्भ हुआ,उपरी सतह पर  पपड़ी जमी जो भीतर की ओर मोटी होती गई।  गर्भ भाग में आकुंचन हुआ, पपड़ी में झुर्रियाँ व दरारें पड़ीं फलस्वरूप हिमालय जैसे पर्वत और नदियाँ बनीं । यह सब घटित होने में कई करोड़ साल लगे । 
                   दिमाग पर ज़्यादा ज़ोर मत लगाइये चलिए अपने घर में ठंडे होते हुए दूध पर मलाई जमते हुए देखिए और इस पर विचार कीजिए । और किराये की बात भी भूल जाईये यह तो एक बहुत बड़ा बाड़ा है जो जितना पुराना किरायेदार उसका उतना हक़ । वही किरायेदार वही मकान मालिक, जैसे अफ्रिका जैसे बड़े देश और हमारे जैसे छोटे ,फिर देश में  भी बड़े बड़े धन्ना सेठ और हमारे जैसे फूटपाथिये । इस धरती पर रहने की कीमत न वो देते है न हम । कीमत तो छोड़िये पृथ्वी पर रहकर हम पृथ्वी का ही नुकसान करते हैं,प्रदूषण फैलाते हैं ,जंगल काटते हैं, ज़मीन से पानी चूस लेते हैं और भी बहुत सा नुकसान करते हैं इस पृथ्वी का । मुम्बई की चालें देखी हैं ना जब तक धराशायी नहीं होती लोग खाली ही नहीं करते ,फिर कई लोग दब कर मर भी जाते हैं  । हम भी धीरे धीरे अपनी पृथ्वी को वहीं ले जा रहे हैं जहाँ न ये पृथ्वी रहेगी न हम ।आप कहेंगे  हमे क्या ? हमारी आनेवाली पीढ़ीयाँ जानें । हम तो चैन से रह ही लेंगे अपने जीते जी ।                                                                                  

  उपसर्ग में इस बार प्रस्तुत है शरद कोकास की लम्बी कविता " पुरातत्ववेत्ता " से यह नौ पंक्तियाँ         


दुख के दिनो सी कठोर है बीते समय की पीठ 
जिस पर खुदे हैं सहनशीलता के दस्तावेज़ 
जिसमें उन्माद है राह बदलती नदियों का 
बेचैनी में करवट बदलती धरती का अभिशाप 
सत्तालोलुपों के आक्रमण सिंहासन की अभिलाषा में 
मवेशियों के रेवड़ हासिल करने  के लिये
घास के मैदान पर पशुपालकों की जीत 
और इन्ही के बीच कहीं अस्पष्ट सी लिखावट में 
अपने अस्तित्व का अर्थ ढूँढते मनुष्य का संघर्ष ....                                                                                         
                                                                                                                                                         
पृथ्वी पर मनुष्य के इतिहास  का बयान करती यह पंक्तियाँ आपको कैसी लगीं ज़रूर बताइयेगा - शरद कोकास