सोमवार, 16 अगस्त 2010

मनुष्य के जीवन में संकेत की आवश्यकता


                                        इशारों इशारों में
इसी तरह प्रारंभिक काल में जब मनुष्य के पास कोई भाषा नहीं थी वह संप्रषेण के लिये संकेतों का प्रयोग करता था । वह सोच नहीं पाता था, क्योंकि सोचने के लिये भाषा अनिवार्य थी ।महाअरण्य में जब उसने हिंसक पशुओं को देखा तो उनसे स्वयं की तथा अपने समूह की रक्षा के लिये उसने हाव भाव व संकेतों का उपयोग किया । उसी तरह  शिकार के समय जानवरों का चुपचाप पीछा करने तथा उन्हे पकड़ने के लिये समझ में आने वाले संकेतों की आवश्यकता होती थी । इनकी मदद से वह साथियों को सतर्क कर सकता था तथा खामोश रख सकता था । परंतु वह अंधेरे में विवश हो जाता था , संकेतों का प्रयोग कर वह मात्र दिन में ही शिकार कर सकता था । अंधेरे में हिंसक पशुओं यथा शेर ,बाघ तथा जहरीले सापों से स्वंय की व समूह जनों की रक्षा कर पाना उसके लिये कठिन था ।उस समय तक अग्नि की खोज भी नहीं हुई थी ।
          इस आस्ट्रेलोपिथेकस मनुष्य की संकेत भाषा को जानने के लिये हम अपने संसर्ग में आने वाले पशुओं का निरीक्षण कर सकते है साथ ही ऐसे ही  मनुष्यों  का भी  निरीक्षण कर सकते हैं जो एक दूसरे की भाषा नहीं जानते तथा केवल संकेतों व भांगिमाओं से भाव व्यक्त कर सकते हैं । अंधेरे में संकेतों की निष्फलता के फलस्वरुप आदिम मनुष्य ने संकेतों के लिये गले का प्रयोग करना शुरु किया ।कुछ स्वरों व चीखों के माध्यम से उसने संकेतों का आदान प्रदान किया ।वह  दिन के प्रकाश में हाथों व चेहरे के संकेत का प्रयोग करता था तथा रात्रि में कुछ विशिष्ट स्वर संकेत निकालता था ।खतरे का स्वर निकालते ही वह देखता  सारे लोग सावधान हो जाते हैं ।अभी भी आप देख सकते हैं कि जब शेर जंगल में निकलता है तो पशु पक्षी कुछ विशिष्ट आवाजों से खतरे  के संकेत देने लगते हैं ।
          धीरे धीरे मनुष्य की यह क्षमता बढ़ी । उसने पिथिकेंथ्रोपस की अवस्था तक आते आते कुछ शब्दों का उपयोग करना सीख लिया। फिर नियंडरथल मानव की अवस्था तक वह सरल वाक्य बनाने लगा और आधुनिक मानव की अवस्था तक भाषा का बखूबी उपयोग करने लगा ।भाषा का यह संपूर्ण विकास उसके मस्तिष्क में दर्ज  होता गया ।यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि आस्ट्रेलोपिथेकस से पिथिकेंथ्रोपस मानव के मस्तिष्क के आयतन में डेढ़ गुनी तथा नियंडरथल मानव के मस्तिष्क तक मस्तिष्क के आयतन में ढाई गुनी वृध्दि हुई ।
उपसर्ग में प्रस्तुत है कवि केदारनाथ अग्रवाल की यह कविता ..यह केदार जी का जन्मशताब्दी वर्ष है   

सुबह से सूरह उजाला उगाये 
आँखें खोले शोभित शासन करता है 

ज़मीन और आसमान का भूगोल 
ऊग आये उजाले का आलिंगन करता है 

द्वन्द्व का नर्तक, काल 
नित्य और अनित्य का नर्तन करता है 

नाश और निर्माण का भागीदार आदमी 
शताब्दी के रंग रूप का परिवर्तन करता है ।
छवि गूगल से साभार

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

पत्थर उछालने से जानवर डरकर भागते हैं

मानव जाति के विकास में मस्तिष्क की भूमिका :
आज के मनुष्य की बनावट केवल 40000 वर्ष पूर्व की है लेकिन उससे पहले का मनुष्य धीरे धीरे इस  स्थिति तक पहुँचा था । एक समय ऐसा भी था जब मनुष्य और पशु में कोई विशेष भेद नहीं था । आज भी कई मनुष्य जानवरों जैसी हरकते करते हैं इसीलिये यह कहा जाता  है “रहे ना आखिर जानवर के जानवर ।“यह तो हमारा मस्तिष्क है जिसने हमें पशुओं से अलग पहचान दी ।320 लाख वर्ष पूर्व के स्तनधारी प्राणि के शरीर व मस्तिष्क के विकास के फलस्वरुप आज मानव इस  हाल   तक पहुँचा है । आज मनुष्य के शरीर व मस्तिष्क की जो बनावट है वह मात्र 40000 वर्ष पूर्व की है । एक समय ऐसा भी था जब मनुष्य और पशु के जीवन यापन का तरीका एक सा था , लेकिन कालांतर में मनुष्य में पशुओं की तुलना में कई भिन्नताएँ दिखाई देने लगीं । वह जहाँ दोनों हाथ व पैरों पर चलता था ,सीधा खड़ा होकर दो पैरों पर चलने लगा यह उसके जीवन में बहुत बड़ी क्रांति थी । इसका  सबसे अधिक लाभ स्त्री को हुआ, योनि अदृश्य हो जाने की वजह से वह अनुचित यौन शोषण से बच गई । मानव के हाथ व अंगूठे की रचना भिन्न प्रकार की थी , वह उनका उपयोग करने लगा ,अपने अनुभवों से लाभ उठाने लगा , मस्तिष्क का उपयोग कर स्मरण , मनन चिंतन द्वारा अपनी इच्छापूर्ति के उपाय व साधनों से अपना विकास करने लगा तथा कालांतर में पशुओं से पूरी तरह भिन्न हो गया ।
          मनुष्य के पास पहले पहल अपने हाथों के अलावा रक्षा का कोई साधन नहीं था। उसे शरीर ढांकना तक नहीं आता था । वह नंगा घूमा करता था । झोपड़ी बनाना भी उसे नहीं आता था । उसके पास गाय ,भैंस ,भेड़ बकरी कुत्ता कुछ न था । अनाज के बारे में उसे मालूम न था। कंद-मूल ,जंगली फल , पत्तियाँ ,जल जंतु व जानवरों का मांस उसका आहार थे । आदिम मनुष्य के मस्तिष्क का विकास होने से पूर्व उसके सामने अनेक कठिनाइयाँ थी । अन्न या शिकार की खोज में वह निकलता था, उसे डंडा पकड़ना तक नहीं आता था , पत्थर पकड़ना नहीं आता था , वह कंद मूल भी हाथों से खोदता था ।इसी प्रयास में एक दिन एक पत्थर उसके हाथ लग गया, उसने पत्थर पकड़ना सीखा फिर खोदने के लिये उस पत्थर का उपयोग किया । “अरे ! इससे तो इतने कम समय में आसानी से खोदा जा सकता है ।“ यह विचार उसके मस्तिष्क में दर्ज हो गया । इसके साथ ही वह अपने समूह का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति हो गया, आखिर उसके पास खोदने वाला पत्थर था । धीरे धीरे अन्य लोगों ने भी पत्थरों का उपयोग करना शुरु किया । इसी तरह हिंसक जानवरों से स्वयं की रक्षा करने के प्रयास में एक दिन उसने पत्थर उछाल दिया हिंसक पशु डरकर भाग गया । उसके मस्तिष्क में यह विचार अंकित हो गया कि “पत्थर उछालने से जानवर डरकर भागते  हैं ।
उपसर्ग  :  इस पोस्ट में हमने मनुष्य और जानवर में अंतर की बात की है कि किस तरह अपने मस्तिष्क की क्षमता के फलस्वरूप मनुष्य जानवर से अलग हो गया । पता नहीं क्यों मुझे चर्चित कवि कथाकार एवं ब्लॉगर उदयप्रकाश की "सुअर के बारे में कुछ कवितायें " श्रंखला की यह कविता याद आ रही है , उनके संग्रह  "सुनो कारीगर" से साभार ,आज के उपसर्ग में प्रस्तुत है -
                              सुअर (दो)


एक ऊंची इमारत से 
बिलकुल तड़के 
एक तन्दरुस्त सुअर निकला
और मगरमच्छ जैसी कार में 
बैठ कर
शहर की ओर चला गया 


शहर में जलसा था 
फ्लैश चमके
जै- जै हुई
कॉफी - बिस्कुट बंटे
मालाएँ उछलीं


अगली सुबह 
सुअर अखबार में 
मुस्करा रहा था 
उसने कहा था 
 हम विकास कर रहे हैं 


उसी रात शहर से 
चीनी और मिट्टी का तेल 
ग़ायब थे ।  


(निवेदन : अगर आपने उदयप्रकाश जी का ब्लॉग न देखा हो तो एक बार अवश्य देख लें .)

बुधवार, 14 जुलाई 2010

कहाँ से आया था वो......

अब तक बहुत सारे विषयों पर हम लोग बात चीत कर चुके हैं । यह बृह्मांड कैसे बना , सूर्य चाँद सितरे ,पृथ्वी कैसे बने , पृथ्वी पर जीवन कैसे आया । सजीव और निर्जीव में क्या फर्क़ होता है , सजीवों के क्या लक्षण होते हैं आदि आदि । अब देखते हैं कि इस पृथ्वी पर मानव का आगमन कहाँ से हुआ और कैसे हुआ ? 
                                     पृथ्वी पर मानव कैसे आया ?
          पृथ्वी पर जीवन के आगमन के पश्चात अब मानव के आगमन का समय हो चुका था । यह 3.5 अरब वर्ष पूर्व की बात है जब पृथ्वी का तापमान 840 सेंटीग्रेड था । पृथ्वी के निर्माण के पश्चात  मानव शरीर की बनावट के लिये जो आवश्यक तत्व थे वे पृथ्वी पर  स्थित  जल में बनना  शुरु हुए । ओजोन की परत के अभाव में अल्ट्रावायलेट , इनफ्रारेड किरणे सीधे पानी में गिरना शुरु हुई । । इन घटक पदार्थों के मेलजोल से सजीव अमीबा जैसी कोशिका तैयार हुई । लगभग 3 करोड़ वर्ष पूर्व यहाँ दलदल था । उथले जल में रसायनों से मिलकर पहली सजीव कोशिका बनी इनमें जल कीट थे, घोंघे थे, रेंगनें वाले जीव थे, जिससे आगे चलकर सस्तन प्राणियों की उत्पत्ति हुई और मनुष्य बना । इस तरह हमनें मछलियों से साँस लेना सीखा । हमारे यहाँ यह मान्यता है कि मनुष्य का शरीर पंचतत्वों का बना है । मरने के बाद इसे मिट्टी कहते हैं ।
मुर्गी पहले आई या अंडा  - यह एक सनातन सवाल है जो अक्सर पूछा जाता है और उत्तर देने वाला हमेशा चकरा जाता है । लेकिन इसमें परेशान होने की ज़रूरत नहीं है । इतना पढ़ने के बाद यह तो आप जान ही गये होंगे कि ना मुर्गी पहले आई ना अंडा । जीवन के क्रमिक विकास के तहत ही इनका उद्भव हुआ । सारे सजीव इसी तरह बने हैं । 
              चलिये फिर से इंसान की बात पर आ जाते हैं  । इंसान का जन्म भी इसी तरह जीवों के क्रमिक विकास के अंतर्गत हुआ है ।  आदि मानव के उदविकास के विभिन्न चरणों तथा उनकी निरपेक्ष तिथियों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि 40 लाख वर्ष पूर्व के मानव को आस्ट्रेलोपिथेकस कहा जाता था । यह मनुष्य पत्थरों का उपयोग करता था तत्पश्चात पिथिकेंथोप्रस मानव 20 लाख वर्ष पूर्व हुआ यह मानव दो पैरों पर चलना जानता था । नियेंडरथल मानव 2 लाख वर्ष पूर्व हुआ था तथा हमारे जैसे आधुनिक मानव की उत्पत्ति मात्र 40000 वर्ष पूर्व हुई है । यह समस्त क्रियाएँ विभिन्न चरणों में सम्पन्न हुई हैं इसलिये हम यह कह सकते हैं कि वह पहला मनुष्य आज के मनुष्य जैसा कतई नहीं दिखता था । उसके पास वह सब चीज़ें होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता जो आज हमारे पास हैं ।इसलिये उस मनुष्य से आज के मनुष्य की तुलना भी बेमानी है । हम क्या थे और आज क्या हो गये हैं जैसे ज़ुमले भी बेकार हैं । समय के अनुसार हर जीव में परिवर्तन होता रहता है । कौन कह सकता है कि आज से 10-20 हज़ार साल बाद का मनुष्य ऐसा ही दिखाई देगा ? उसके पास यह सब वस्तुएँ भी नहीं रहेंगी जो आज हमारे पास हैं । 
            चलिये अपना दिमाग़ लगाइये . और क्या क्या हो सकता है इतने हज़ार साल बाद ... इसलिये कि अगला लेख मैं दिमाग़ के बारे में ही लिखने वाला हूँ ।
उपसर्ग में  बाबा नागार्जुन की यह कविता ...इसका सन्दर्भ तो आप समझ ही सकते हैं ..
                              बाकी बच गया अंडा 
पाँच पूत भारत माता के , दुश्मन था खूँखार 
गोली खाकर एक मर गया बाक़ी रह गये चार 
चार पूत भारत माता के , चारों चतुर प्रवीन 
देश-निकाला मिला एक को , बाक़ी रह गये तीन 
तीन पूत भारत माता के , लड़ने लग गये वो
अलग हो गया उधर एक ,अब बाकी बच गये दो
दो बेटे भारत माता के , छोड़ पुरानी टेक 
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक
एक पूत भारत माता का . कन्धे पर है झंडा
पुलिस पकड़ के जेल ले गई, बाक़ी बच गया अंडा । 
  
छवि गूगल से साभार

बुधवार, 16 जून 2010

तरह तरह से आ रही है मृत्यु…


                                           सजीवों के अन्य लक्षण
          सजीवों के शरीर के निर्माण में जीवद्रव्य की भूमिका और सजीवों के एक निश्चित शारीरिक संगठन के बारे में जानने के पश्चात आप सजीवों के अन्य लक्षणों के बारे में भी जानना चाहेंगे । लीजिये प्रस्तुत हैं सजीवों के अन्य लक्षण ।
उपापचय : अपनी जैविक क्रियाओं के लिये सजीवों को उर्जा की आवश्यकता होती है । यह उर्जा कोशिकाओं में उपस्थित ग्लूकोज ,वसा अथवा प्रोटीन के आक्सीकरण से मिलती है । सजीवों की कोशिकाओं में होने वाली रासायनिक क्रिया उपापचय कहलाती है ।
पोषण : शरीर की वृध्दि , सुधार व उर्जा के लिये सजीवों को पोषण की आवश्यकता होती है । पोषक पदार्थ अवशोषित होकर कोशिकाओं में पहुंचते है । पोषण का विरुद्धार्थी शब्द होता है कुपोषण जिसका अर्थ आप भलिभाँति समझते हैं । पोषण आहार के नाम पर ग़रीब बच्चों को शाला में भोजन भी दिया जाता है इसलिये कि अधिकांश लोगों के बस में नहीं होता कि उन्हे आवश्यक मात्रा में पोषक आहार मिल सके । 
श्वसन : सजीव ऑक्सीजन लेते है तथा कार्बन डाय आक्साइड निकालते हैं ।हम मुँह से साँस लें या नाक से या और कहीं से भी , श्वसन क्रिया कोशिकाओं में ही सम्पन्न होती है ।
उत्सर्जन : कोशिकाओ में उपापचय के कारण जो अनुपयोगी व हानिकारक पदार्थ शेष रहते है या बनते हैं उन्हे बाहर निकालना उत्सर्जन  कहलाता है । अब उत्सर्जन हम कहाँ कहाँ से करते हैं यह आप बखूबी जानते हैं जैसे त्वचा से पसीना निकलना भी एक प्रकार का उत्सर्जन है।
वृध्दि : सभी सजीवों में वृध्दि होती है । उपापचय से जीव द्रव्य में वृध्दि होती है जीव द्रव्य से कोशिकाओं में वृध्दि होती है । एक सीमा के बाद यह कोशिकाएँ विभाजित हो जाती है तथा उसी अनुपात में ऊतक अंग व शरीर बढ़ता जाता हैं । परंतु सजीवों में यह वृध्दि आजीवन नहीं होती । जैसे कि शिशु एक सीमा तक बढ़ता है और सम्पूर्ण विकास के बाद उसका बढ़ना रुक जाता है । यह आपने  नहीं सुना होगा कि किसी बच्चे का बढ़ना रुक ही नहीं रहा ।

एक महानगर में दो मित्र बहुत दिनों बाद मिले । एक ने दूसरे से पूछा बच्चा कितना बड़ा हो गया है ? पहले ने दोनो हाथ ज़मीन के समानांतर फैलाये और कहा इतना बड़ा । दूसरे मित्र ने कहा “ यार सब लोग ज़मीन से ऊपर हाथ उठाकर बच्चे की लम्बाई बताते हैं तुम हाथ फैलाकर बता रहे हो ...। पहले मित्र ने कहा “ क्या बताऊँ जब मैं काम पर जाता हूँ वह सोता रहता है और जब लौटकर आता हूँ तब भी सोता रहता है ..सो उसकी लम्बाई मैं ऐसे ही बताऊँगा ना ?
 
गति व चलना : सभी सजीवों की गति होती है । कुछ में यह गति अंगों के व शरीर के हिलने डुलने तक सीमित रहती है जैसे पेड़ पौधों  में । मनुष्यों व पशु पक्षियों में यह गति चलने ,उड़ने में परिवर्तित हो जाती है ।मनुष्य के पास यदि पंख होते तो वह भी उड़ता लेकिन तब यह गीत नहीं बनता ..पंख होते तो उड़ आती रे.। हाँलाकि मनुष्य ने इसी इच्छा के चलते अपने मस्तिष्क का उपयोग करके एरोप्लेन का आविष्कार किया और उड़ने लगा ।  
प्रजनन : सजीव में अपने समान संतान उत्पन्न करने की क्षमता होती है । मानव की संतान मानव ही होती है । यद्यपि कुछ मानव अपनी संतान को गधा कहकर सम्बोधित करते हैं लेकिन यह उनका नीजि मामला है। निर्जीवों में प्रजनन क्षमता नही होती ,यह आपने नहीं सुना होगा कि एक मेज़ के पास दूसरी मेज़ रख दो तो कुछ दिन बाद एक बच्चा मेज़ पैदा हो जाती है ।
मृत्यु  : प्रत्येक सजीव की एक निश्चित जीवन की अवधि होती है । जो सजीव मर जाता है उसके शरीर से ‘जीवन ‘ के सभी लक्षण हमेशा के लिये समाप्त हो जाते हैं । गब्बर सिंह का मशहूर डॉयलॉग है..”जो डर गया समझो मर गया ।‘ मगर हमारे यहाँ सभी डरे हुए लोग शरीर से ज़िन्दा रहते हैं ,यह जानते हुए भी कि यह जीना भी कोई जीना है ।
                   इस प्रकार ये तमाम लक्षण सजीवों में ही होते हैं । निर्जीवों में इनमें से कोई लक्षण नहीं होता। जैसे निर्जीव तत्वों में ‘ जीव द्रव्य ‘ नहीं होता  । उनमें कोई शारीरिक संगठन नहीं होता । निर्जीवों को किसी पोषण की ज़रुरत नहीं होती । निर्जीवों में वृध्दि नहीं होती , वे प्रजनन नहीं करते । तथा निर्जीव कभी मृत नहीं होते क्योंकि उनमें ‘ जीवन ‘ नहीं होता  ।
उपसर्ग में प्रस्तुत है अग्निशेखर की यह कविता उनके संग्रह ‘ जवाहर टनल ‘ से
                                       स्मृतिलोप
तरह तरह से आ रही है मृत्यु
खत्म हो रही थीं चीज़ें
गायब हो रही थीं स्मृतियाँ
पेड़ों से झर रहे थे पत्ते
और हम धो रहे थे हाथ
मरते जा रहे थे हमारे पूर्वज
दूषित हो रही थीं भाषाएँ
हमारे संवाद
प्रतिरोध
उतर चुके थे जैसे दिमाग़ से

हम डूब रहे थे
तुच्छताओं की चमक में
उठ रहे थे विश्वास
जो ले आये थे हमें यहाँ तक

बची रही थी जिज्ञासा
निर्वासित थी संवेदनायें
नए शब्द हो रहे थे ईज़ाद
अर्थ नहीं थे उनमें
ध्वनियाँ नहीं थीं
रस,गन्ध,रूप नहीं था
स्पर्श नहीं था
उन्ही से गढ़ना था हमें
नया संसार

एक तरफ घोषित किये जा रहे थे
कई कई अंत
दूसरी तरफ
हम थे कुछ बचे हुए
ज़िद्दी और भावुक लोग
कुछ और भी थे हमारे जैसे
यहाँ वहाँ इस भूगोल पर
करते अवहेलनायें
लगातार                                                                         
 
छवि गूगल से साभार

सोमवार, 17 मई 2010

मटर पनीर की सब्ज़ी की तरह बनता है हमारा शरीर

     लेखमाला : मस्तिष्क की सत्ता - हमारा और अन्य सजीवों का शरीर कैसे बनता है -  
 
आपसे यदि पूछा जाये कि सजीवों के कुछ प्रमुख लक्षण बताइये तो आप क्या कहेंगे ? सजीव वही है जो जीवित है या जिसके पास एक जीवित देह है ।फिर पूछा जाये कि जीवित देह में क्या होता है तो आप कहेंगे ,, एक सिर दो हाथ ,दो पाँव, दो आँखें ,दो कान ,एक दिल, एक पेट वगैरह वगैरह । और बेशक एक दिमाग़ भी ..। मेरे जैसे कुछ कविनुमा लोग कुछ और कहेंगे ..मसलन कटीली आँखें , पत्थर जैसा दिल ,कुँये जैसा पेट आदि आदि । लेकिन माफ कीजिये , मैं सिर्फ मनुष्यों के बारे में थोड़े ही पूछ रहा हूँ । मेरा आशय तो हर उस शरीर से है जिसे हम सजीव कहते हैं ।  बिलकुल सही फरमाया आपने लेकिन यह शरीर जिसके हम मालिक हैं इसकी यह बेहद उबाऊ  ही सही लेकिन वैज्ञानिक परिभाषा जानना भी तो ज़रूरी है ।
आइये कुछ विस्तार से देखें सजीवों का यह शरीर कैसे बनता है और इसके प्रमुख लक्षण क्या क्या होते हैं । इनमे सबसे पहला है  जीव द्रव्य  : सजीवों का शरीर जीव द्रव्य से बनता है । इस जीव द्रव्य में मुख्यत: कार्बनिक व अकार्बनिक ठोस पदार्थ ,प्रोटीन वसा, कार्बोहाइड्रेटस नयूक्लीइक एसिड ,लवण तथा जल होता है । ये सभी यौगिक निर्जीव तत्वों से बनते हैं  । यह पारदर्शी ,चिपचिपा ,रवेदार ,जेलीनुमा ,अर्धतरल पदार्थ होता है । यह कोशिका की कोशिका झिल्ली के भीतर अवस्थित होता है ।  निर्जीव तत्वों से बने इन यौगिकों के एक विशेष तरह के अणु संग्रह में जीवन होता है । 
सजीवों का दूसरा लक्षणहै एक निश्चित शारीरिक संगठन : शरीर का निर्माण करने वाला जीव द्रव्य छोटे छोटे टुकडों में कोशिका कला से घिरकर शरीर की वह इकाई बनाता है जिसे कोशिका कहते हैं । कुछ जीवों का शरीर एक कोशिका से बना होता हैं । ये ‘ एक कोशिकीय जीव ‘ कहलाते है जिसे अमीबा,वालवॉक्स आदि । मनुष्य,अन्य जंतु व पौधे जो अनेक कोशिकाओं से बनते हैं ‘ बहुकोशिकीय जीव ‘ कहलाते हैं । इनके शरीर में असंख्य कोशिकाओं से मिलकर बनते हैं ‘ ऊतक ‘। विभिन्न ऊतकों से अंग बनते हैं। कई अंगो को मिलाकर तंत्र बनता है तथा तंत्रों के संगठन से शरीर का निर्माण होता है। इस तरह बने हुए शरीर की एक निश्चित पहचान होती है जैसे मनुष्य का शरीर,भैंस, हाथी , कुत्ता ,गाय .मख्खी और गधे आदि का शरीर । ऐसे ही पौधे की भी एक निश्चित आकृति होती है जिससे हम पहचानते हैं यह पीपल का पेड़ है या आम का ।
आइये इसे एक उदाहरण से समझते हैं । मटर पनीर की सब्ज़ी बनाने के लिये पहले कढाई में तेल डालते हैं । फिर उसमें जीरा , प्याज़,लहसुन ,अदरक,मिर्च,धनिया,हल्दी डाल देने से बनता है मसाला , इसमे पानी डाल दें तो बन जाती है तरी,उसमें मटर डाल दें तो कहलाती है मटर की सब्जी । अगर इसमें पनीर भी डाल दें तो कहलाती है मटर-पनीर की सब्जी । इसकी अपनी पहचान इसी नाम से  होती है और  अन्य तत्वों के नाम लुप्त हो जाते हैं ।
मैने अपने एक व्याख्यान के दौरान जब यह उदाहरण दिया तो एक महिला ने कहा “ सर ,आपने इतना भाषण दे दिया लेकिन इस क्रम में आपकी सब्ज़ी (मतलब मटर-पनीर की सब्ज़ी ) बन ही नहीं सकती । मैने पूछा "कैसे ?"तो उसने कहा " आपने गैस तो जलाई ही नही।  मैने कहा बिलकुल ठीक । मैं यह बताना भूल ही गया । सब्जी पकाने से पहले गैस जलाना ज़रूरी है ।अंत में यही एक बात कि जैसे पकाने के लिये उर्जा ज़रूरी है वैसे ही जीवन के निर्माण और सजीव को जैविक क्रियाओं के लिये भी उर्जा ज़रूरी है ।
अगली किश्त में देखेंगे सजीवों के अन्य लक्षण । 
आज उपसर्ग में प्रस्तुत है शरीर के लिये और जीवन के लिये ज़रूरी इस उर्जा या इस आग पर कवि निरंजन श्रोत्रिय की यह एक कविता ,उनके संग्रह "जुगलबंदी " से साभार ।

                आग

हमारा बहुत सारा जीवन
उसकी तलाश में निकल जाता है
जबकि वह मौजूद होती है
हमारे बहुत करीब

जब हम रगड़ते हैं दियासलाई
वह सिमटी होती है छ: हज़ार डिग्री सैल्सियस
धधकते सूरज से उतरी धूप के भीतर
जब हम ढूँढते हैं ठंडी राख के भीतर कोई अंगारा
वह दुबकी होती है टेसू के सिंदूरी –पीले रंग में

रात को ठंडी पड़ी भट्टी की ईटों और
गुस्से में उबलती कलम की नोंक में
छुपा होता है उसका संगीत

वह भरी हुई है मरी खाल के फ़ेफ़ड़े के भीतर
पिघलाने को बहुत सा लोहा
वह प्रतीक्षा कर रही है हथेलियोँ की रगड़ की

हम अपना सारा जीवन उसे इधर-उधर खोजने में लगा देंगे
और वह प्रकट हो जायेगी यूँ ही एक हल्की चोट में
वहाँ जहाँ चकमक पत्थरों से खेल रहे हैं बच्चे |
                
                       निरंजन श्रोत्रिय  

बुधवार, 5 मई 2010

मुझे नही पता ,आप ही बताइये यह जीवन क्या हैं ?


                                  
आप कहेंगे यह भी कोई सवाल है । सही है आप में से ऐसा कोई नहीं होगा जिसने कभी इस प्रश्न के बारे में न सोचा हो । अभी इस सवाल के उत्तर में आप धड़ाधड़ लिखना शुरू कर देंगे । कोई कहेगा ज़िन्दगी एक पहेली है कोई कहेगा जीवन पानी का बुलबुला है ,जीवन एक उड़ती हुई पतंग है,जीवन एक साँप है , जीवन एक सज़ा है  , एक उड़ता हुआ पंछी है ,वगैरह वगैरह ।जीवन के बारे में हर कवि ने दो चार पंक्तियाँ तो लिख ही डाली हैं मसलन ..”जीवन क्या है,चलता फिरता एक खिलौना है / दो आँखों में एक से हंसना एक से रोना है ।" मुझे भी जीवन के बारे में कविताएँ बहुत अच्छी लगती हैं और जीवन को परिभाषित करने वाली एक कविता तो मुझे बेहद पसन्द है ..” ज़िन्दगी क्या है जान जाओगे / रेत पे लाके मछलियाँ रख दो “
        चलिए कवियों को अपना काम करने दीजिये, हम जीवन की वैज्ञानिक परिभाषा देखते हैं ।   पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ हो चुका था लेकिन मानव जीवन के आगमन में अभी समय था । पेड़-पौधे ,कीड़े-मकोड़े, रेंगने वाले जीव तैरने वाले जीव और उड़ने वाले जीवों का आगमन हो रहा था । यह सब सजीव थे और इनमें जीवन के सभी लक्षण मौजूद थे । हमें तो मनुष्य के जीवन से मतलब है इसलिये मनुष्य के जन्म का समाचार जानने से पहले हम जान लें ,आखिर यह सजीव होना क्या है ?
जीव का अर्थ आत्मा नहीं होता - जीवन के बारे में अगर आप जानते हैं तो आपको यह भी पता ही होगा कि हम मनुष्य,अन्य प्राणि,कीट-पतंगे और पेड़-पौधे सभी सजीवों की श्रेणि में आते हैं । सजीवों के कुछ विशेष लक्षण होते हैं जैसे जन्म लेना,बढ़ना, सांस लेना, गति, उत्तेजना तथा संतानोपत्ति और अंतत: मृत्यु आदि। ये सजीव अपने आसपास से अपने जीवन के लिये आवश्यक वस्तुयें ग्रहण करते हैं । सजीवों के सभी लक्षण जीवन के फलस्वरुप ही होते हैं । सजीवों के शरीर में जीवन के लिये आवश्यक क्रियाशीलता बनी रहती है । यह क्रियाशीलता उनके पदार्थ जीव द्रव्य विभिन्न तत्वों तथा यौगिकों का विशिष्ट संगठन हैं। इस प्रकार जीव संगठित द्रव्य है तथा जीवन उसकी क्रियाशीलता । जीवन के होने के लिये एक शरीर आवश्यक है। शरीर से बाहर जीवन नहीं हो सकता । शरीर और जीवन का तालमेल ही एक सजीव को होने का अर्थ प्रदान करता है । जीवन को बेहतर तरीके से जानने के लिये जरूरी है शरीर को जानना । 
सजीवों के इन प्रमुख लक्षणों को तो हम अगली पोस्ट में देखेंगे , इस बार तो आप यह बताइये कि आप से अगर पूछा  जाये कि जीवन क्या है ? तो आप एक दो पंक्ति में इसका क्या उत्तर देंगे ? जीवन की आपकी अपनी परिभाषा जानने की प्रतीक्षा में - आपका -  शरद कोकास 
अरे हाँ उपसर्ग की कविता तो लिखना भूल ही गया , इस बार लीजिये पढ़िये कवि कुमार अम्बुज की यह कविता जिसमें आपको जीवन की प्रचलित परिभाषाओं से अलग जीवन का एक नया ही अर्थ दिखाई देगा ।श्री कुमार अम्बुज हिन्दी के बहुत प्रसिद्ध कवि हैं और भोपाल में रहते हैं । उनका एक ब्लॉग भी है , " कुमार अम्बुज "... इसे भी देखियेगा । 


                                    इस नश्वर संसार में

लाखों करोड़ों सालों से
इतना ही जीवित चला आ रहा है
यह नश्वर संसार

नश्वरता की घोषणा करने वाले
नष्ट हो गये
नश्वर संसार नष्ट नहीं हो रहा है

तमाम नश्वरता के बावज़ूद
भंगी अपनी झाड़ू बचा लेता है
धोबी अपने घाट का पत्थर
एक मिस्त्री बचा लेता है अपने औज़ार
और किसान गेहूँ की बाली
लोहार अपना घन
समय की छाती पर पटक देता है

तोते अपनी चोंच की लाली बचा लेते हैं
कोयल अपनी कूक
स्त्री अपनी मादकता बचा लेती है
पुरुष अपना ताप
काल के विकराल मुँह से छीन लेता है एक बच्चा
अपनी अमर हँसी

इस नश्वर संसार में
जीवन अमर हो रहा है लगातार
नश्वरवादियों के शवों पर
अट्टहास करता हुआ । 

                - कुमार अम्बुज 

चित्र गूगल से और कुमार अम्बुज की कविता उनके संग्रह " किवाड़ " से साभार ।तस्वीर मेरे मोबाइल कैमरे से ..-शरद कोकास  

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

कुत्ते जैसी हरकतें करने वाले इंसानों से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है ...

 लेखमाला मस्तिष्क की सत्ता -- जीवन में प्रोटीन और डी.एन.ए.  का अर्थ

पुरानी फिल्मों के दृश्यों को याद कीजिये ..कटघरे में एक स्त्री खड़ी है और वह चीख चीख कर कह रही है ..इस बच्चे का पिता यही है मी लॉर्ड” । दूसरे कटघरे में एक विलेन टाइप का पुरुष कुटिल मुस्कान के साथ खड़ा है । उसका वकील कह रहा है “ लेकिन इसका तुम्हारे पास क्या सबूत है ?” अब फिल्मों में ऐसा दृश्य नहीं होता इसलिये कि अब समय बदल गया है और विज्ञान ने साबित कर दिया है कि बच्चे के डी.एन.ए. से पिता का डी.एन.ए. मिलाकर यह जाना जा सकता है कि उसका वास्तविक पिता कौन है । अब तो टी.वी.धारावाहिक देखने वाले बच्चे भी इस बात को बखूबी जानते हैं कि बच्चे के पिता का पता लगाने के लिये दोनों के डी.एन.ए. का मिलान आवश्यक है ।
मनुष्य के व कुत्ते के तीन-चौथाई डी.एन.ए. एक जैसे हैं - इस तरह हम देखते हैं कि  जीवन के लिये दो रासायनिक व्यवस्थाएँ आवश्यक हैं प्रोटीन तथा डी.एन.ए ( डीआक्सीराइबो नयूक्लीइक एसिड )। हर व्यक्ति का डी.एन.ए. अलग होता है । आजकल के मानव शरीर के डी.एन.ए. अन्य प्राणियों के डी.एन.ए. से भी मिलते हैं जैसे चिम्पांजी और मनुष्य  के डी.एन.ए.  99.8 % मिलते हैं तथा कुत्ते व मनुष्य के 75% । (कुत्ते जैसी हरकतें करने वाले इंसानों से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है ) विभिन्न एमीनो एसिड्स के मेल से प्रोटीन बनता हैं तथा न्यूक्लीइक अम्ल न्यूक्लिओटाईड्स से बनता है । इनमें कार्बन नाइट्रोजन के यौगिक  शर्करा एवं फास्फेट से जुडे होते हैं । प्रोटीन जीवन की सुनियोजित संरचना का आधार है तथा  डी.एन.ए यह निर्धारित करता है कि शरीर में क्या बनाना है।
                    इस वैज्ञानिक सिद्धांत के प्रारम्भिक चरण में सन 1953 में मिलर नामक वैज्ञानिक ने एक प्रयोग किया था जिसमें उसने पृथ्वी के प्रांरभिक वायुमंडल में पाई जाने वाली जल वाष्प,मीथेन अमोनिया और हाइड्रोजन जैसी गैसों के मिश्रण में एक सप्ताह तक बिजली की चिनगारी प्रवाहित की जिसके फलस्वरूप एमिनो एसिड्स तैयार हुए । तत्पश्चात अनेक वैज्ञानिकों ने भी ऐसे ही प्रयोग किये जिससे राइबो शर्करा उनके फास्फेट तथा एडनिन जैसे अनेक जैव अणु तैयार हुए। ये अणु  न्यूक्लिओटाईड्स के मूल घटक हैं । इनके ही बहुलकीकरण  से  न्यूक्लीईक  एसिड बनता है ।
जल ही जीवन है क्यों कहा जाता है - हमारे सौर परिवार में केवल पृथ्वी पर ही जीवन सभंव हो सका इसका कारण यह है कि प्रोटीन की एंजाइमी किया के लिये मुक्तजल की उपस्थिति अनिवार्य थी । सूर्य से न अधिक दूर न अधिक पास होने की वजह से यहाँ वाष्पीकरण के  पश्चात भी काफी जल शेष रहता है । अब आप समझे वैज्ञानिक चन्द्रमा और मंगल  पर जीवन की सम्भावनाओं से पहले पानी की तलाश क्यों कर रहे हैं ।जब तक मनुष्य चन्द्रमा पर नहीं गया था वह चन्द्रमा पर दिखाई देने वाले धब्बों को पानी से भरी झीलें ही समझता था । पानी जीवन के लिये इतना ज़रूरी क्यों है यह अब आप जान गये होंगे।
उपसर्ग में आज प्रस्तुत है  कवि चन्द्रकांत देवताले की यह कविता " शब्दों की पवित्रता के बारे में "

                         शब्दों की पवित्रता के बारे में

रोटी सेंकती पत्नी से हँसकर कहा मैने 
अगला फुलका बिल्कुल चन्द्रमा की तरह बेदाग़ हो तो जानूँ 

उसने याद दिलाया बेदाग़ नहीं होता चन्द्रमा 

तो शब्दों की पवित्रता के बारे में सोचने लगा मै 
क्या शब्द रह सकते हैं प्रसन्न या उदास केवल अपने से 

वह बोली चकोटी पर पड़ी कच्ची रोटी को दिखाते 
यह है चन्द्रमा - जैसी दे दूँ इसे क्या बिना ही आँच दिखाये 

अवकाश में रहते हैं शब्द शब्दकोष में टंगे नंगे अस्थिपंजर 
शायद यही है पवित्रता शब्दों की 

अपने अनुभव से हम नष्ट करते हैं कौमार्य शब्दों का 
तब वे दहकते हैं और साबित होते हैं प्यार और आक्रमण करने लायक 

मैंने कहा सेंक दो रोटी तुम बढ़िया कड़क चुन्दड़ीवाली 
नहीं चाहिये मुझको चन्द्रमा जैसी ।

( कविता चन्द्रकांत देवताले के संग्रह " उसके सपने " से व चित्र गूगल से साभार )

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

पृथ्वी पर जीवन कैसे आया - एक लेख और एक नज़्म



जब हम कोई नाटक देखते हैं तो सबसे पहले रंगमंच पर एक या दो पात्रों का प्रवेश होता है ,फिर धीरे धीरे अन्य पात्रों का प्रवेश होता है और इस तरह नाटक चलता रहता है । यह बृह्माण्ड का रंगमंच भी कुछ इसी तरह का है । इस रंगमंच पर आकाशगंगायें आईं , सौरमण्डल  आये , ग्रह आये , उपग्रह आये यह सब तो आप देख चुके हैं । अब देखते हैं इस पृथ्वी पर घटित होने वाली एक महत्वपूर्ण घटना अर्थात पृथ्वी पर जीवन का प्रादुर्भाव । ना ना ... अभी हम मनुष्य के आगमन की बात नहीं कर रहे हैं ,मनुष्य के आने से पहले ही यहाँ बहुत कुछ हो चुका था ,पहले एक नज़र उसे तो देख लें ।
              इस तरह साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी तो बन गई ,समुद्र नदी,नाले, तालाब ,पहाड़ सब बन गये ,लेकिन यहाँ जीवन की शुरुआत होनी अभी शेष थी । भू वैज्ञानिकों द्वारा आस्ट्रेलिया ,अफ्रीका व ग्रीनलैंड में किये गये अध्ययनों के आधार पर यह सिध्द हो चुका है कि आज से साढ़े तीन अरब वर्ष पूर्व बैक्टीरिया के समान एक कोशीय जीव ,समुद्रतलों के छिछले पानी में शैलभितियाँ बना रहे थे । इनके पूर्वजों अर्थात सरल अविकसित जीवाणु की उपस्थिति भी लगभग 4 अरब वर्ष पूर्व रही होगी ।इस प्रकार यह प्रतीत होता हैं कि पृथ्वी के विकास के साथ साथ कहीं न कहीं जीवन का विकास भी हो रहा था ।                        
        जीवन की उत्पति कैसे हुई इसके विषय में प्राचीन मनुष्य की अपनी धारणाएँ हैं परंतु विज्ञान के आधार पर शोधकर्ताओं ने इस रहस्य को सुलझा लिया हैं । सन 1920 में एक रुसी वैज्ञानिक जे.बी एस . हाल्डेन ने ‘पृथ्वी पर निर्जीव रसायनों की पारस्पारिक प्रतिक्रिया से जीवन के उदभव’ का सिध्दांत प्रतिपादित किया । हाल्डेन ने कहा कि उस काल में कास्मिक किरणों , बिजली ( तड़ित ) व ज्वालामुखी के कारण हो रही तीक्ष्ण रासायनिक प्रक्रिया के फलस्वरुप कार्बन मूल के जैव अणुओं की उत्पत्ति हुई । ये अणु नदियों के साथ बहकर समुद्र में मिले , जिनसे समुद्र को उष्णता व गाढापन मिला ।
          ओपेरिन ने कहा कि आम कोशिकायें जेली ( श्लष ) जैसी छोटी छोटी बूंदें रही होगीं । समुद्रों के साथ रसायनों के आदान प्रदान के दौरान इन जेल सृदृश्य छोटी बूंदों ने ऐसे अणुओं का निर्माण किया होगा जिन्होने बाद में अपनी प्रतिकृतियाँ बनाई होंगी ।
          सन 1958 से इन धारणाओं को परखने की शुरुआत हुई । शिकागो विश्वविधालय के वैज्ञानिकों ने उन तमाम गैसों को एक फ्लास्क में लिया जो पृथ्वी के प्रांरभिक वायुमंडल मे विद्यमान थीं । उनमें विद्युत स्फुलिंगों को प्रवाहित कर बिजली पैदा की । इस तरह उन्हे एक सप्ताह पकाया गया । देखा गया कि एक सप्ताह बाद इन गैस भरे फ्लास्कों पर  एमीनो एसिडस की परतें चढ़ गई हैं । इन्ही एमीनो एसिडस के आपस में जुडने से प्रोटीन बनता हैं । इसी प्रयोग में जीवन के अन्य मौलिक रासायनिक घटकों का निर्माण होता देखा गया ।
          पृथ्वी पर जीवन के अविर्भाव के सम्बन्ध में कुछ वैज्ञानिकों की यह भी मान्यता है कि हो सकता है पृथ्वी पर जीवन अंतरिक्ष से आया हो । इसके लिये भी प्रयोग चल रहे हैं । यह तो विज्ञान है ,अभी तक इसने जीवन की उत्पत्ति के बारे में जो कुछ बताया है उसे हम मान लेते हैं ,आगे और कुछ नया बतायेगा तो उसे भी मान लेंगे ?
उपसर्ग में प्रस्तुत है इस बार प्रसिद्ध शायर जनाब निदा फाज़ली की यह मशहूर नज़्म .............
                                    ये ज़िन्दगी 
ये ज़िन्दगी 
आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी बड़ी नसों में 
मचल रही है 
तुम्हारे पैरों से चल रही है 
तुम्हारी आवाज़ में गले से 
निकल रही है 
तुम्हारे लफ्ज़ों में 
ढल रही है..... 
ये ज़िन्दगी..... 
जाने कितनी सदियों से 
यूँ ही शक्लें 
बदल रही है 

बदलती शक्लों
बदलते जिस्मों में
चलता-फिरता ये इक शरारा 
जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा ! 
इसी से सारी चहल -पहल है 
इसी से रोशन है हर नज़ारा 

सितारे तोड़ो 
या घर बसाओ
अलम उठाओ 
या सर झुकाओ 

तुम्हारी आँखों की रोशनी तक है 
खेल सारा 
ये खेल होगा नहीं दोबारा ।   

अलम=जंग का निशान 
 मित्रों पृथ्वी पर जीवन का यह  खेल सचमुच दोबारा नहीं होना है इसलिये क्यों न हम इस खेल को एक बार में ही समझ लें और जान लें अपने होने का अर्थ । अगली कड़ी में पढ़ेंगे जिन्दगी माने प्रोटीन और डी.एन.ए. -            
 शरद कोकास
(नज़्म , वाणी प्रकाशन से प्रकाशित निदा फाज़ली के संग्रह "खोया हुआ सा कुछ " से साभार । छवि गूगल से साभार)