सोमवार, 20 सितंबर 2010

मस्तिष्क की सत्ता - मस्तिष्क की गुलामी से मुक्त होने के लिए पहले मस्तिष्क को जानें

                                           यह मस्तिष्क कैसे काम करता है

      
हमारे शरीर में विभिन्न अंग हैं । हम दिन भर में कितनी बार उन अंगों का उपयोग करते हैं ,लेकिन क्या हम कभी सोचते हैं कि यह अंग किस तरह काम करते हैं ? यह कतई ज़रूरी नहीं है कि हाथ का उपयोग करने से पहले हम सोचे कि हाथ कैसे काम करता है ,या हमारे पाँव हमारे शरीर का भार किस तरह उठाते हैं । न दाँतों के बारे में सोचना ज़रूरी है कि वे अन्न किस तरह चबाते हैं और न आँखों के बारे में कि वे किस तरह देखती हैं । जब बाहरी अंगों के बारे में यह अनावश्यक है तो फिर भीतरी अंगों की कार्यप्रणाली के बारे में तो जानना तो बिलकुल भी आवश्यक नहीं है  । लेकिन यदि हम केवल मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के बारे मे ही जान लें तो समझ लीजिये कि आप आधे से अधिक तो जान ही गए क्योंकि बहुत सारे अंग तो इस मस्तिष्क से ही संचालित होते हैं । फिर मस्तिष्क की इस गुलामी से मुक्त होने के लिये भी हमें सबसे पहले जानना होगा कि मस्तिष्क कैसे काम करता है । विश्वास हो या अंधविश्वास यह हमारे मस्तिष्क में किस तरह घर करते हैं यह जानने के लिए भी हमें मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को जानना होगा । बेहतर होगा किसी बर्तन को खाली करने से पहले ,उसे भरा कैसे गया यह बात हम जान लें । लेकिन इस बात का आप बिलकुल टेंशन ना लें ,मैं आपको मेडिकल साईंस नहीं पढ़ाने जा रहा हूँ । मैं अत्यंत सरल भाषा में यह बताना चाहता हूँ कि हमारे दिन-प्रतिदिन के काम इस मस्तिष्क के द्वारा कैसे सम्पन्न किये जाते हैं । चलिए हम अपनी सुविधा के लिये सबसे पहले मस्तिष्क को कुछ भागों में विभाजित कर देते हैं ।     
           
मस्तिष्क के क्रियाकलाप: हम किस तरह देखते हैं         यह मस्तिष्क का एक रफ डायग्राम है जिसे मैने सरलता पूर्वक समझने के लिये बनाया है । कृपया इस आकृति का चिकित्सकीय मापदंडों के अनुसार विश्लेषण न करें । इसे हम एक चौकोर बॉक्स की तरह भी देख सकते हैं और कई कमरों वाले एक दफ़्तर की तरह भी । सबसे पहले हम पहले भाग पर नज़र डालते हैं यह है हमारा दृष्टि केन्द्र ,यह वह केन्द्र है जिसकी वज़ह से हम देख पाते हैं ।
1 देखना  : एक कक्षा में मैने सवाल किया हमें देखने के लिये क्या ज़रुरी है ? उत्तर मिला आँखें , किसी ने कहा दिमाग , किसीने और बढ़ कर कहा दृष्टि । एक छात्र ने और बढ़ा-चढ़ा कर कहा मन की आँखें । अंत में विज्ञान के एक छात्र ने सही उत्तर दिया देखने के लिये सबसे ज़्यादा ज़रूरी है प्रकाश । यह हम सभी जानते ही हैं कि प्रकाश के अभाव में आँखें होने के बावज़ूद भी हम नहीं देख पाते हैं । आपको यह भी पता होगा कि  यह कैसे होता है अगर आप जानते होंगे टी.वी पर चित्र कैसे आता है । हमारे दृष्टि केन्द्र में छवि निर्माण होने की भी ऐसी ही प्रक्रिया है । हमारी आँख में भी कैमरे की तरह ही एक लेंस होता है । किसी भी वस्तु पर जब रोशनी डाली जाती है वह रोशनी वस्तु से परावर्तित होकर नेत्र पटल पर पड़ती है , वहाँ से जैव रासायनिक  विद्युत संवेग द्वारा मस्तिष्क के इस केन्द्र में आती है और इस तरह हम उसे देख पाते हैं । अभी मैं केवल देखने की बात ही कर रहा हूँ उस वस्तु या दृश्य को हम किस तरह पहचान पाते हैं वह आगे की बात है । देखने और पहचानने के बाद ही समझने की बारी आती है । इसीलिये कहा जाता है कि देखा हुआ हमेशा सच नहीं होता ।



उपसर्ग : उपसर्ग में मैं अब तक  महत्वपूर्ण कवियों की कवितायें देता रहा हूँ । इस विषय पर काम करते हुए मस्तिष्क के क्रियाकलाप पर बारह कविताएँ मैंने लिखीं । उनमे से एक कविता मस्तिष्क के क्रियाकलाप - देखने पर यह कविता । एक नये विषय पर लिखी इस कविता श्रंखला पर आपकी राय जानना चाहूँगा - शरद कोकास 





मस्तिष्क के क्रियाकलाप – एक – दृष्टि 



एक बच्चे सा विस्मय था जब मनुष्य  की आँखों में
रात और दिन के साथ वह खेलता था आँख मिचौली
समय की प्रयोग शाला में सब कुछ अपने आप घट रहा था

देखने के लिये सिर्फ आँख का होना काफी था
और प्रकाश छिपा था अज्ञान के काले पर्दे में
पृथ्वी से अनेक प्रकाश वर्षों की दूरी के बावज़ूद
सूर्य लगातार भेज रहा था अपनी शुभाशंसाएँ

अब जबकि ऐसा घोषित किया जा रहा है
कि ज्ञान पर पड़े सारे पर्दे खींच दिये गये हैं
और चकाचौन्ध से भर गई है सारी दुनिया
समझ के पत्थर पर लिख दी गई हैं इबारतें
आँख प्रकाश और दिमाग़ के महत्व की
जैसे कि धुप्प अन्धेरे में हाथ को हाथ नहीं सूझता
अन्धेरे में बस दिखाई देता है अन्धेरा
कोई फर्क नहीं पड़ता आँखें खुली या बन्द होने से
यह मस्तिष्क ही है जो अन्धेरे से बाहर सोच पाता है

दृश्य और आँखों के बीच प्रकाश के रिश्तों में
अन्धेरे से बाहर झाँकता है विस्मय से भरा संसार
दृश्य के समुद्र में तैरता है वर्तमान

यह दृष्य में रोशनी की भूमिका है
जो अदृष्य है विचारों के दर्शन में
यहाँ रोशनी का आशय भौतिक होने में नहीं है

अन्धेरे में भटकते बेशुमार विचारों की भीड़ में
दृष्टि तलाश लेती है अक्सर कोई चमकता हुआ विचार

मानव मस्तिष्क के विशाल कार्यक्षेत्र में
जहाँ समाप्त होती है ऑप्टिक नर्व्स की भूमिका
वहाँ दृष्टि की भूमिका शुरू होती है
ज्ञान की उष्मा में छँटती जाती है असमंजस की धुन्ध
यहाँ मस्तिष्क प्रारम्भ करता है
दृश्य में दिखाई देते विचार का विश्लेषण

यही से शुरू होती है
मुक्तिबोध की कविता अन्धेरे में ।

                        --  शरद कोकास
 
 


(चित्र गूगल से साभार )



  






  

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

मानव मस्तिष्क के गुलाम होने की कहानी

                        फिर यह मस्तिष्क गुलाम कैसे हुआ ?
इस तरह मस्तिष्क की क्षमता का उपयोग कर मनुष्य द्वारा न केवल नये नये अविष्कार किये गये बल्कि इस तरह मनुष्यों ने आपसी संबंध भी कायम किये गए और पृथ्वी पर एक मनुष्य समाज की स्थापना हुई । सामाजिक विकास के साथ साथ मानव ने अपने मस्तिष्क की क्षमता पहचान ली थी और इसकी क्षमता का उपयोग वह न केवल अपने लिये सुख-सुविधायें जुटाने में कर रहा था अपितु समस्त प्राणियों के बीच अपना वर्चस्व कायम करने के लिये भी वह इसका उपयोग कर रहा था । यह तब भी होता था कि कुछ लोग जीवन को बेहतर बनाने के लिये मस्तिष्क का उपयोग करते थे और अन्य लोग उस जीवन का उपभोग करते थे । हालाँकि श्रम की महत्ता को नकारा नहीं गया लेकिन श्रम का बौद्धिक और शारीरिक रूप में विभाजन होने लगा था । जिन लोगों ने मस्तिष्क की क्षमता को पहचाना उन्हीके बीच ऐसे लोगों का उद्भव भी हुआ जिन्होने अन्य मनुष्यों पर शासन करने के लिये इसका उपयोग किया ।इस चालाक मनुष्य ने यह देखा कि समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जिन पर आसानी से शासन किया जा सकता है , तब उसने अपने बीच के मनुष्यों को ही अपना गुलाम बनाना शुरु किया । मनुष्यों में सत्ता की हवस , धन लोलुपता , जैसे विकारों ने जन्म लेना शुरु किया और घास के मैदानों और पशुओं के लिये किये जाने वाले युद्ध वर्चस्व की लड़ाई में तब्दील हो गए ।ऐसा दुनिया के हर समाज में हुआ ।
धीरे धीरे मनुष्यों में वर्ग विभाजन हुआ फिर काम के आधार पर जातियाँ बनीं ,हमारे यहाँ वर्ण व्यवस्था प्रारम्भ हुई सीधे-सादे मनुष्य को चालाक मनुष्य द्वारा यह बताया गया कि मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है इसलिये कि वह परमपिता के मुख से पैदा हुआ है । सभी सभ्यताओं में जो अमीर थे उन्होने गरीबों को दास बनाया और उन्हे अमीरों की सेवा करने का काम सौंपा । मनुष्य को अपने अधीन करने के लिये आवश्यक था कि उसके मस्तिष्क को काबू में किया जाये  । सभी तानाशाहों ने यही किया । मनुष्य के मस्तिष्क को धर्म , पाप पुण्य ,लोक-परलोक ,पुनर्जन्म,मोक्ष  कर्मफल जैसी अवधारणाओं के आधार पर गुलाम बनाने की कोशिश की गई । उसे यथास्थिति में जीने का उपदेश दिया गया । इस मस्तिष्क में अज्ञात शक्तियों के प्रति भय को हवा दी गई तथा अंधविश्वास ठूंसे गये । मनुष्य के सोचने समझने व तर्क करने की शक्ति कमजोर कर दी गई । ऐसा नहीं कि मनुष्य ने इस शोषण के खिलाफ कभी सर नहीं उठाया । विश्व के अनेक भागों मे क्रांतियाँ हुईं ,रूस में ज़ारशाही के खिलाफ क्रांति हुई,ब्रिटेन में फ्यूडल सिस्टम के खिलाफ क्रांति हुई, अमेरिका में , फ्रांस में क्रांति हुई,ग्रीस में स्पार्ट्कस की क्रांति हुई आदि आदि। कहीं यह सफल हुई कहीं असफल हुई यह अलग बात है । लेकिन हमारे देश में ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ । हमारे देश सहित विश्व के अनेक भू-भागों का मनुष्य आज पिछड़ा हुआ है या , दकियानुसी मान्यताओं से घिरा हुआ हैं तो उसके पीछे यही कारण है कि आज से हजारों वर्ष पूर्व मनुष्य के मस्तिष्क  को गुलाम कर दिया गया  है । भाग्यवाद के नाम पर् उसे अकर्मण्य  बना दिया गया है जाति व्यवस्था , वर्ण व्यवस्था व अर्थव्यवस्था के आधार पर  उसे टुकडों टुकडों में बाँट दिया गया है । हम सभी जो अपने देश के सच्चे नागरिक हैं आज भी संगठित होकर अन्याय के खिलाफ नहीं लड़ते
          यदि हमें अंधविश्वासों व अव्यवस्थाओं के खिलाफ अपनी लडाई लडनी है तो सबसे पहले मस्तिष्क  की गुलामी से मुक्त होना पडेगा। अपनी चेतना , तर्क शक्ति व सोच को पुन: धारदार बनाना पडेगा । अब्राहम लिंकन ने कहा है कि “गुलाम को उसकी गुलामी का अहसास दिला दो  तो वह बागी हो जाता है ।“ कहते हैं जब मनुष्य सोचना शुरू कर देता है तो वह तानाशाह के लिये खतरनाक हो जाता है । न सोचने वाला मनुष्य मृत व्यक्ति के समान होता है । कवि उदय प्रकाश की प्रसिद्ध कविता है
मरने के बाद आदमी कुछ नही बोलता
मरने के बाद आदमी कुछ नही सोचता
कुछ नहीं बोलने कुछ नहीं सोचने पर
आदमी मर जाता है
यदि यह बात हम समझ लें तो स्वतंत्र भारत का हर नागरिक मानसिक तौर पर  स्वतंत्र हो जाये क्योंकि जिस  तरह मानव विकास की हर प्रक्रिया का जन्म सबसे पहले मानव मस्तिष्क मे हुआ उसी तरह क्रांति या परिवर्तन भी सबसे पहले मानव मस्तिष्क में ही जन्म लेता है तत्पश्चात हम समाज में उसे प्रतिफलित होते देखते हैं ।जागृति के लिये हमें स्वयं शिक्षित होना होगा और लोगों को शिक्षित करना होगा । इसके लिये सबसे पहले ज़रूरी है मस्तिष्क की गुलामी से मुक्त होना ।
( छवि गूगल से साभार )

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

मस्तिष्क की सत्ता - मनुष्य जाति का शैशव काल


 विकास की पूरी फिल्म का ट्रेलर है छोटा बच्चा
मनुष्य की प्रारम्भिक अवस्था में भाषा के विकास को हम शिशु के भाषा ज्ञान के विकास के साथ जोड़कर देख सकते हैं । अपनी आयु के पहले वर्ष में शिशु सही सही शब्दों का उच्चारण नहीं कर पाता । दूसरे तीसरे वर्ष में वह शब्दों के साथ छोटे सरल वाक्य बोलना सीखता है तथा पाँच छह वर्ष की आयु तक पूरी तरह वाक्य रचना सीख जाता है ।बच्चा भाषा के पहले से बने मानकों को ग्रहण करता हैं ।वह उसे उस रुप में सीखता है जिस रुप में उसे उसका परिवेश प्रदान करता है ।उसी तरह प्रांरभिक वर्ष में शिशु पत्थर या कोई वस्तु ठीक से पकड़ नहीं सकता धीरे धीरे वह सीखता है । प्राचीन मानव का यह शैशव काल हजारों वर्षों तक चला । धीरे धीरे सब कुछ उसके मस्तिष्क में दर्ज होता गया ।
          उस प्रकार हाथ, जिव्हा व गले के प्रयोग के साथ साथ मनुष्य के मस्तिष्क की क्षमता भी बढ़ती गई ।उसने आग की खोज की, आग जलाकर तापना ,माँस भूनना ,खाल व पत्तियों से तन ढंकना उसने सीख लिया । हजारों वर्षों तक वह उसी  अवस्था  में रहा । फिर उसने पत्थर के औजार व हथियार बनाये । हडडी की चीजें ,बरछी  भाले ,सूजे, सूजियाँ बनाई । गुफाओं में चित्र बनाये  । तत्पश्चात वह पशुपालन व खेती की अवस्था तक आया ।
          तात्पर्य यह कि विकास के हर चरण के साथ साथ , पर्यावरण के साथ खुद को ढालते हुए वह अपने मस्तिष्क का विकास करता गया । आज हम मानव जीवन में मस्तिष्क की अहम भूमिका को स्वीकार करते हैं ।आज हमारी प्रत्येक क्रिया प्रतिक्रिया पर मस्तिष्क का सीधा नियंत्रण है । जिस मानव को पत्थर पकड़ना तक नहीं आता था वह यान में सवार होकर अनंत ब्रम्हांड के रहस्य खोजने निकला है ।वह बिजली जिसे आकाश में देखकर वह डर जाया करता था , उसका प्रयोग वह अपनी सुख सुविधाओं के लिये कर रहा है ।मनुष्य जाति की संपूर्ण प्रगति , समस्त परिवर्तन इसी मस्तिष्क की देन है । हर परिवर्तन के पीछे हमारे हाथ हैं जिन्हे हमारा मस्तिष्क संचालित करता है । टेलीविजन ,कम्प्यूटर या एरोप्लेन का अविष्कार ध्यानावस्था में नहीं हुआ, लगातार चलने वाले  प्रयोगों और मस्तिष्क की क्षमता की वज़ह से यह अविष्कार सम्भव हुए । हमारी इंद्रियों से प्राप्त सभी अनुभूतियाँ इस मस्तिष्क में दर्ज हुई जिससे कला साहित्य संस्कृति का विकास हुआ। सारी अच्छाईयाँ और बुराइयाँ भी इसी मस्तिष्क की उपज हैं । यदि मस्तिष्क नहीं होता तो हम सचमुच जानवर के जानवर रहते ।

सोमवार, 16 अगस्त 2010

मनुष्य के जीवन में संकेत की आवश्यकता


                                        इशारों इशारों में
इसी तरह प्रारंभिक काल में जब मनुष्य के पास कोई भाषा नहीं थी वह संप्रषेण के लिये संकेतों का प्रयोग करता था । वह सोच नहीं पाता था, क्योंकि सोचने के लिये भाषा अनिवार्य थी ।महाअरण्य में जब उसने हिंसक पशुओं को देखा तो उनसे स्वयं की तथा अपने समूह की रक्षा के लिये उसने हाव भाव व संकेतों का उपयोग किया । उसी तरह  शिकार के समय जानवरों का चुपचाप पीछा करने तथा उन्हे पकड़ने के लिये समझ में आने वाले संकेतों की आवश्यकता होती थी । इनकी मदद से वह साथियों को सतर्क कर सकता था तथा खामोश रख सकता था । परंतु वह अंधेरे में विवश हो जाता था , संकेतों का प्रयोग कर वह मात्र दिन में ही शिकार कर सकता था । अंधेरे में हिंसक पशुओं यथा शेर ,बाघ तथा जहरीले सापों से स्वंय की व समूह जनों की रक्षा कर पाना उसके लिये कठिन था ।उस समय तक अग्नि की खोज भी नहीं हुई थी ।
          इस आस्ट्रेलोपिथेकस मनुष्य की संकेत भाषा को जानने के लिये हम अपने संसर्ग में आने वाले पशुओं का निरीक्षण कर सकते है साथ ही ऐसे ही  मनुष्यों  का भी  निरीक्षण कर सकते हैं जो एक दूसरे की भाषा नहीं जानते तथा केवल संकेतों व भांगिमाओं से भाव व्यक्त कर सकते हैं । अंधेरे में संकेतों की निष्फलता के फलस्वरुप आदिम मनुष्य ने संकेतों के लिये गले का प्रयोग करना शुरु किया ।कुछ स्वरों व चीखों के माध्यम से उसने संकेतों का आदान प्रदान किया ।वह  दिन के प्रकाश में हाथों व चेहरे के संकेत का प्रयोग करता था तथा रात्रि में कुछ विशिष्ट स्वर संकेत निकालता था ।खतरे का स्वर निकालते ही वह देखता  सारे लोग सावधान हो जाते हैं ।अभी भी आप देख सकते हैं कि जब शेर जंगल में निकलता है तो पशु पक्षी कुछ विशिष्ट आवाजों से खतरे  के संकेत देने लगते हैं ।
          धीरे धीरे मनुष्य की यह क्षमता बढ़ी । उसने पिथिकेंथ्रोपस की अवस्था तक आते आते कुछ शब्दों का उपयोग करना सीख लिया। फिर नियंडरथल मानव की अवस्था तक वह सरल वाक्य बनाने लगा और आधुनिक मानव की अवस्था तक भाषा का बखूबी उपयोग करने लगा ।भाषा का यह संपूर्ण विकास उसके मस्तिष्क में दर्ज  होता गया ।यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि आस्ट्रेलोपिथेकस से पिथिकेंथ्रोपस मानव के मस्तिष्क के आयतन में डेढ़ गुनी तथा नियंडरथल मानव के मस्तिष्क तक मस्तिष्क के आयतन में ढाई गुनी वृध्दि हुई ।
उपसर्ग में प्रस्तुत है कवि केदारनाथ अग्रवाल की यह कविता ..यह केदार जी का जन्मशताब्दी वर्ष है   

सुबह से सूरह उजाला उगाये 
आँखें खोले शोभित शासन करता है 

ज़मीन और आसमान का भूगोल 
ऊग आये उजाले का आलिंगन करता है 

द्वन्द्व का नर्तक, काल 
नित्य और अनित्य का नर्तन करता है 

नाश और निर्माण का भागीदार आदमी 
शताब्दी के रंग रूप का परिवर्तन करता है ।
छवि गूगल से साभार

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

पत्थर उछालने से जानवर डरकर भागते हैं

मानव जाति के विकास में मस्तिष्क की भूमिका :
आज के मनुष्य की बनावट केवल 40000 वर्ष पूर्व की है लेकिन उससे पहले का मनुष्य धीरे धीरे इस  स्थिति तक पहुँचा था । एक समय ऐसा भी था जब मनुष्य और पशु में कोई विशेष भेद नहीं था । आज भी कई मनुष्य जानवरों जैसी हरकते करते हैं इसीलिये यह कहा जाता  है “रहे ना आखिर जानवर के जानवर ।“यह तो हमारा मस्तिष्क है जिसने हमें पशुओं से अलग पहचान दी ।320 लाख वर्ष पूर्व के स्तनधारी प्राणि के शरीर व मस्तिष्क के विकास के फलस्वरुप आज मानव इस  हाल   तक पहुँचा है । आज मनुष्य के शरीर व मस्तिष्क की जो बनावट है वह मात्र 40000 वर्ष पूर्व की है । एक समय ऐसा भी था जब मनुष्य और पशु के जीवन यापन का तरीका एक सा था , लेकिन कालांतर में मनुष्य में पशुओं की तुलना में कई भिन्नताएँ दिखाई देने लगीं । वह जहाँ दोनों हाथ व पैरों पर चलता था ,सीधा खड़ा होकर दो पैरों पर चलने लगा यह उसके जीवन में बहुत बड़ी क्रांति थी । इसका  सबसे अधिक लाभ स्त्री को हुआ, योनि अदृश्य हो जाने की वजह से वह अनुचित यौन शोषण से बच गई । मानव के हाथ व अंगूठे की रचना भिन्न प्रकार की थी , वह उनका उपयोग करने लगा ,अपने अनुभवों से लाभ उठाने लगा , मस्तिष्क का उपयोग कर स्मरण , मनन चिंतन द्वारा अपनी इच्छापूर्ति के उपाय व साधनों से अपना विकास करने लगा तथा कालांतर में पशुओं से पूरी तरह भिन्न हो गया ।
          मनुष्य के पास पहले पहल अपने हाथों के अलावा रक्षा का कोई साधन नहीं था। उसे शरीर ढांकना तक नहीं आता था । वह नंगा घूमा करता था । झोपड़ी बनाना भी उसे नहीं आता था । उसके पास गाय ,भैंस ,भेड़ बकरी कुत्ता कुछ न था । अनाज के बारे में उसे मालूम न था। कंद-मूल ,जंगली फल , पत्तियाँ ,जल जंतु व जानवरों का मांस उसका आहार थे । आदिम मनुष्य के मस्तिष्क का विकास होने से पूर्व उसके सामने अनेक कठिनाइयाँ थी । अन्न या शिकार की खोज में वह निकलता था, उसे डंडा पकड़ना तक नहीं आता था , पत्थर पकड़ना नहीं आता था , वह कंद मूल भी हाथों से खोदता था ।इसी प्रयास में एक दिन एक पत्थर उसके हाथ लग गया, उसने पत्थर पकड़ना सीखा फिर खोदने के लिये उस पत्थर का उपयोग किया । “अरे ! इससे तो इतने कम समय में आसानी से खोदा जा सकता है ।“ यह विचार उसके मस्तिष्क में दर्ज हो गया । इसके साथ ही वह अपने समूह का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति हो गया, आखिर उसके पास खोदने वाला पत्थर था । धीरे धीरे अन्य लोगों ने भी पत्थरों का उपयोग करना शुरु किया । इसी तरह हिंसक जानवरों से स्वयं की रक्षा करने के प्रयास में एक दिन उसने पत्थर उछाल दिया हिंसक पशु डरकर भाग गया । उसके मस्तिष्क में यह विचार अंकित हो गया कि “पत्थर उछालने से जानवर डरकर भागते  हैं ।
उपसर्ग  :  इस पोस्ट में हमने मनुष्य और जानवर में अंतर की बात की है कि किस तरह अपने मस्तिष्क की क्षमता के फलस्वरूप मनुष्य जानवर से अलग हो गया । पता नहीं क्यों मुझे चर्चित कवि कथाकार एवं ब्लॉगर उदयप्रकाश की "सुअर के बारे में कुछ कवितायें " श्रंखला की यह कविता याद आ रही है , उनके संग्रह  "सुनो कारीगर" से साभार ,आज के उपसर्ग में प्रस्तुत है -
                              सुअर (दो)


एक ऊंची इमारत से 
बिलकुल तड़के 
एक तन्दरुस्त सुअर निकला
और मगरमच्छ जैसी कार में 
बैठ कर
शहर की ओर चला गया 


शहर में जलसा था 
फ्लैश चमके
जै- जै हुई
कॉफी - बिस्कुट बंटे
मालाएँ उछलीं


अगली सुबह 
सुअर अखबार में 
मुस्करा रहा था 
उसने कहा था 
 हम विकास कर रहे हैं 


उसी रात शहर से 
चीनी और मिट्टी का तेल 
ग़ायब थे ।  


(निवेदन : अगर आपने उदयप्रकाश जी का ब्लॉग न देखा हो तो एक बार अवश्य देख लें .)

बुधवार, 14 जुलाई 2010

कहाँ से आया था वो......

अब तक बहुत सारे विषयों पर हम लोग बात चीत कर चुके हैं । यह बृह्मांड कैसे बना , सूर्य चाँद सितरे ,पृथ्वी कैसे बने , पृथ्वी पर जीवन कैसे आया । सजीव और निर्जीव में क्या फर्क़ होता है , सजीवों के क्या लक्षण होते हैं आदि आदि । अब देखते हैं कि इस पृथ्वी पर मानव का आगमन कहाँ से हुआ और कैसे हुआ ? 
                                     पृथ्वी पर मानव कैसे आया ?
          पृथ्वी पर जीवन के आगमन के पश्चात अब मानव के आगमन का समय हो चुका था । यह 3.5 अरब वर्ष पूर्व की बात है जब पृथ्वी का तापमान 840 सेंटीग्रेड था । पृथ्वी के निर्माण के पश्चात  मानव शरीर की बनावट के लिये जो आवश्यक तत्व थे वे पृथ्वी पर  स्थित  जल में बनना  शुरु हुए । ओजोन की परत के अभाव में अल्ट्रावायलेट , इनफ्रारेड किरणे सीधे पानी में गिरना शुरु हुई । । इन घटक पदार्थों के मेलजोल से सजीव अमीबा जैसी कोशिका तैयार हुई । लगभग 3 करोड़ वर्ष पूर्व यहाँ दलदल था । उथले जल में रसायनों से मिलकर पहली सजीव कोशिका बनी इनमें जल कीट थे, घोंघे थे, रेंगनें वाले जीव थे, जिससे आगे चलकर सस्तन प्राणियों की उत्पत्ति हुई और मनुष्य बना । इस तरह हमनें मछलियों से साँस लेना सीखा । हमारे यहाँ यह मान्यता है कि मनुष्य का शरीर पंचतत्वों का बना है । मरने के बाद इसे मिट्टी कहते हैं ।
मुर्गी पहले आई या अंडा  - यह एक सनातन सवाल है जो अक्सर पूछा जाता है और उत्तर देने वाला हमेशा चकरा जाता है । लेकिन इसमें परेशान होने की ज़रूरत नहीं है । इतना पढ़ने के बाद यह तो आप जान ही गये होंगे कि ना मुर्गी पहले आई ना अंडा । जीवन के क्रमिक विकास के तहत ही इनका उद्भव हुआ । सारे सजीव इसी तरह बने हैं । 
              चलिये फिर से इंसान की बात पर आ जाते हैं  । इंसान का जन्म भी इसी तरह जीवों के क्रमिक विकास के अंतर्गत हुआ है ।  आदि मानव के उदविकास के विभिन्न चरणों तथा उनकी निरपेक्ष तिथियों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि 40 लाख वर्ष पूर्व के मानव को आस्ट्रेलोपिथेकस कहा जाता था । यह मनुष्य पत्थरों का उपयोग करता था तत्पश्चात पिथिकेंथोप्रस मानव 20 लाख वर्ष पूर्व हुआ यह मानव दो पैरों पर चलना जानता था । नियेंडरथल मानव 2 लाख वर्ष पूर्व हुआ था तथा हमारे जैसे आधुनिक मानव की उत्पत्ति मात्र 40000 वर्ष पूर्व हुई है । यह समस्त क्रियाएँ विभिन्न चरणों में सम्पन्न हुई हैं इसलिये हम यह कह सकते हैं कि वह पहला मनुष्य आज के मनुष्य जैसा कतई नहीं दिखता था । उसके पास वह सब चीज़ें होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता जो आज हमारे पास हैं ।इसलिये उस मनुष्य से आज के मनुष्य की तुलना भी बेमानी है । हम क्या थे और आज क्या हो गये हैं जैसे ज़ुमले भी बेकार हैं । समय के अनुसार हर जीव में परिवर्तन होता रहता है । कौन कह सकता है कि आज से 10-20 हज़ार साल बाद का मनुष्य ऐसा ही दिखाई देगा ? उसके पास यह सब वस्तुएँ भी नहीं रहेंगी जो आज हमारे पास हैं । 
            चलिये अपना दिमाग़ लगाइये . और क्या क्या हो सकता है इतने हज़ार साल बाद ... इसलिये कि अगला लेख मैं दिमाग़ के बारे में ही लिखने वाला हूँ ।
उपसर्ग में  बाबा नागार्जुन की यह कविता ...इसका सन्दर्भ तो आप समझ ही सकते हैं ..
                              बाकी बच गया अंडा 
पाँच पूत भारत माता के , दुश्मन था खूँखार 
गोली खाकर एक मर गया बाक़ी रह गये चार 
चार पूत भारत माता के , चारों चतुर प्रवीन 
देश-निकाला मिला एक को , बाक़ी रह गये तीन 
तीन पूत भारत माता के , लड़ने लग गये वो
अलग हो गया उधर एक ,अब बाकी बच गये दो
दो बेटे भारत माता के , छोड़ पुरानी टेक 
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक
एक पूत भारत माता का . कन्धे पर है झंडा
पुलिस पकड़ के जेल ले गई, बाक़ी बच गया अंडा । 
  
छवि गूगल से साभार

बुधवार, 16 जून 2010

तरह तरह से आ रही है मृत्यु…


                                           सजीवों के अन्य लक्षण
          सजीवों के शरीर के निर्माण में जीवद्रव्य की भूमिका और सजीवों के एक निश्चित शारीरिक संगठन के बारे में जानने के पश्चात आप सजीवों के अन्य लक्षणों के बारे में भी जानना चाहेंगे । लीजिये प्रस्तुत हैं सजीवों के अन्य लक्षण ।
उपापचय : अपनी जैविक क्रियाओं के लिये सजीवों को उर्जा की आवश्यकता होती है । यह उर्जा कोशिकाओं में उपस्थित ग्लूकोज ,वसा अथवा प्रोटीन के आक्सीकरण से मिलती है । सजीवों की कोशिकाओं में होने वाली रासायनिक क्रिया उपापचय कहलाती है ।
पोषण : शरीर की वृध्दि , सुधार व उर्जा के लिये सजीवों को पोषण की आवश्यकता होती है । पोषक पदार्थ अवशोषित होकर कोशिकाओं में पहुंचते है । पोषण का विरुद्धार्थी शब्द होता है कुपोषण जिसका अर्थ आप भलिभाँति समझते हैं । पोषण आहार के नाम पर ग़रीब बच्चों को शाला में भोजन भी दिया जाता है इसलिये कि अधिकांश लोगों के बस में नहीं होता कि उन्हे आवश्यक मात्रा में पोषक आहार मिल सके । 
श्वसन : सजीव ऑक्सीजन लेते है तथा कार्बन डाय आक्साइड निकालते हैं ।हम मुँह से साँस लें या नाक से या और कहीं से भी , श्वसन क्रिया कोशिकाओं में ही सम्पन्न होती है ।
उत्सर्जन : कोशिकाओ में उपापचय के कारण जो अनुपयोगी व हानिकारक पदार्थ शेष रहते है या बनते हैं उन्हे बाहर निकालना उत्सर्जन  कहलाता है । अब उत्सर्जन हम कहाँ कहाँ से करते हैं यह आप बखूबी जानते हैं जैसे त्वचा से पसीना निकलना भी एक प्रकार का उत्सर्जन है।
वृध्दि : सभी सजीवों में वृध्दि होती है । उपापचय से जीव द्रव्य में वृध्दि होती है जीव द्रव्य से कोशिकाओं में वृध्दि होती है । एक सीमा के बाद यह कोशिकाएँ विभाजित हो जाती है तथा उसी अनुपात में ऊतक अंग व शरीर बढ़ता जाता हैं । परंतु सजीवों में यह वृध्दि आजीवन नहीं होती । जैसे कि शिशु एक सीमा तक बढ़ता है और सम्पूर्ण विकास के बाद उसका बढ़ना रुक जाता है । यह आपने  नहीं सुना होगा कि किसी बच्चे का बढ़ना रुक ही नहीं रहा ।

एक महानगर में दो मित्र बहुत दिनों बाद मिले । एक ने दूसरे से पूछा बच्चा कितना बड़ा हो गया है ? पहले ने दोनो हाथ ज़मीन के समानांतर फैलाये और कहा इतना बड़ा । दूसरे मित्र ने कहा “ यार सब लोग ज़मीन से ऊपर हाथ उठाकर बच्चे की लम्बाई बताते हैं तुम हाथ फैलाकर बता रहे हो ...। पहले मित्र ने कहा “ क्या बताऊँ जब मैं काम पर जाता हूँ वह सोता रहता है और जब लौटकर आता हूँ तब भी सोता रहता है ..सो उसकी लम्बाई मैं ऐसे ही बताऊँगा ना ?
 
गति व चलना : सभी सजीवों की गति होती है । कुछ में यह गति अंगों के व शरीर के हिलने डुलने तक सीमित रहती है जैसे पेड़ पौधों  में । मनुष्यों व पशु पक्षियों में यह गति चलने ,उड़ने में परिवर्तित हो जाती है ।मनुष्य के पास यदि पंख होते तो वह भी उड़ता लेकिन तब यह गीत नहीं बनता ..पंख होते तो उड़ आती रे.। हाँलाकि मनुष्य ने इसी इच्छा के चलते अपने मस्तिष्क का उपयोग करके एरोप्लेन का आविष्कार किया और उड़ने लगा ।  
प्रजनन : सजीव में अपने समान संतान उत्पन्न करने की क्षमता होती है । मानव की संतान मानव ही होती है । यद्यपि कुछ मानव अपनी संतान को गधा कहकर सम्बोधित करते हैं लेकिन यह उनका नीजि मामला है। निर्जीवों में प्रजनन क्षमता नही होती ,यह आपने नहीं सुना होगा कि एक मेज़ के पास दूसरी मेज़ रख दो तो कुछ दिन बाद एक बच्चा मेज़ पैदा हो जाती है ।
मृत्यु  : प्रत्येक सजीव की एक निश्चित जीवन की अवधि होती है । जो सजीव मर जाता है उसके शरीर से ‘जीवन ‘ के सभी लक्षण हमेशा के लिये समाप्त हो जाते हैं । गब्बर सिंह का मशहूर डॉयलॉग है..”जो डर गया समझो मर गया ।‘ मगर हमारे यहाँ सभी डरे हुए लोग शरीर से ज़िन्दा रहते हैं ,यह जानते हुए भी कि यह जीना भी कोई जीना है ।
                   इस प्रकार ये तमाम लक्षण सजीवों में ही होते हैं । निर्जीवों में इनमें से कोई लक्षण नहीं होता। जैसे निर्जीव तत्वों में ‘ जीव द्रव्य ‘ नहीं होता  । उनमें कोई शारीरिक संगठन नहीं होता । निर्जीवों को किसी पोषण की ज़रुरत नहीं होती । निर्जीवों में वृध्दि नहीं होती , वे प्रजनन नहीं करते । तथा निर्जीव कभी मृत नहीं होते क्योंकि उनमें ‘ जीवन ‘ नहीं होता  ।
उपसर्ग में प्रस्तुत है अग्निशेखर की यह कविता उनके संग्रह ‘ जवाहर टनल ‘ से
                                       स्मृतिलोप
तरह तरह से आ रही है मृत्यु
खत्म हो रही थीं चीज़ें
गायब हो रही थीं स्मृतियाँ
पेड़ों से झर रहे थे पत्ते
और हम धो रहे थे हाथ
मरते जा रहे थे हमारे पूर्वज
दूषित हो रही थीं भाषाएँ
हमारे संवाद
प्रतिरोध
उतर चुके थे जैसे दिमाग़ से

हम डूब रहे थे
तुच्छताओं की चमक में
उठ रहे थे विश्वास
जो ले आये थे हमें यहाँ तक

बची रही थी जिज्ञासा
निर्वासित थी संवेदनायें
नए शब्द हो रहे थे ईज़ाद
अर्थ नहीं थे उनमें
ध्वनियाँ नहीं थीं
रस,गन्ध,रूप नहीं था
स्पर्श नहीं था
उन्ही से गढ़ना था हमें
नया संसार

एक तरफ घोषित किये जा रहे थे
कई कई अंत
दूसरी तरफ
हम थे कुछ बचे हुए
ज़िद्दी और भावुक लोग
कुछ और भी थे हमारे जैसे
यहाँ वहाँ इस भूगोल पर
करते अवहेलनायें
लगातार                                                                         
 
छवि गूगल से साभार

सोमवार, 17 मई 2010

मटर पनीर की सब्ज़ी की तरह बनता है हमारा शरीर

     लेखमाला : मस्तिष्क की सत्ता - हमारा और अन्य सजीवों का शरीर कैसे बनता है -  
 
आपसे यदि पूछा जाये कि सजीवों के कुछ प्रमुख लक्षण बताइये तो आप क्या कहेंगे ? सजीव वही है जो जीवित है या जिसके पास एक जीवित देह है ।फिर पूछा जाये कि जीवित देह में क्या होता है तो आप कहेंगे ,, एक सिर दो हाथ ,दो पाँव, दो आँखें ,दो कान ,एक दिल, एक पेट वगैरह वगैरह । और बेशक एक दिमाग़ भी ..। मेरे जैसे कुछ कविनुमा लोग कुछ और कहेंगे ..मसलन कटीली आँखें , पत्थर जैसा दिल ,कुँये जैसा पेट आदि आदि । लेकिन माफ कीजिये , मैं सिर्फ मनुष्यों के बारे में थोड़े ही पूछ रहा हूँ । मेरा आशय तो हर उस शरीर से है जिसे हम सजीव कहते हैं ।  बिलकुल सही फरमाया आपने लेकिन यह शरीर जिसके हम मालिक हैं इसकी यह बेहद उबाऊ  ही सही लेकिन वैज्ञानिक परिभाषा जानना भी तो ज़रूरी है ।
आइये कुछ विस्तार से देखें सजीवों का यह शरीर कैसे बनता है और इसके प्रमुख लक्षण क्या क्या होते हैं । इनमे सबसे पहला है  जीव द्रव्य  : सजीवों का शरीर जीव द्रव्य से बनता है । इस जीव द्रव्य में मुख्यत: कार्बनिक व अकार्बनिक ठोस पदार्थ ,प्रोटीन वसा, कार्बोहाइड्रेटस नयूक्लीइक एसिड ,लवण तथा जल होता है । ये सभी यौगिक निर्जीव तत्वों से बनते हैं  । यह पारदर्शी ,चिपचिपा ,रवेदार ,जेलीनुमा ,अर्धतरल पदार्थ होता है । यह कोशिका की कोशिका झिल्ली के भीतर अवस्थित होता है ।  निर्जीव तत्वों से बने इन यौगिकों के एक विशेष तरह के अणु संग्रह में जीवन होता है । 
सजीवों का दूसरा लक्षणहै एक निश्चित शारीरिक संगठन : शरीर का निर्माण करने वाला जीव द्रव्य छोटे छोटे टुकडों में कोशिका कला से घिरकर शरीर की वह इकाई बनाता है जिसे कोशिका कहते हैं । कुछ जीवों का शरीर एक कोशिका से बना होता हैं । ये ‘ एक कोशिकीय जीव ‘ कहलाते है जिसे अमीबा,वालवॉक्स आदि । मनुष्य,अन्य जंतु व पौधे जो अनेक कोशिकाओं से बनते हैं ‘ बहुकोशिकीय जीव ‘ कहलाते हैं । इनके शरीर में असंख्य कोशिकाओं से मिलकर बनते हैं ‘ ऊतक ‘। विभिन्न ऊतकों से अंग बनते हैं। कई अंगो को मिलाकर तंत्र बनता है तथा तंत्रों के संगठन से शरीर का निर्माण होता है। इस तरह बने हुए शरीर की एक निश्चित पहचान होती है जैसे मनुष्य का शरीर,भैंस, हाथी , कुत्ता ,गाय .मख्खी और गधे आदि का शरीर । ऐसे ही पौधे की भी एक निश्चित आकृति होती है जिससे हम पहचानते हैं यह पीपल का पेड़ है या आम का ।
आइये इसे एक उदाहरण से समझते हैं । मटर पनीर की सब्ज़ी बनाने के लिये पहले कढाई में तेल डालते हैं । फिर उसमें जीरा , प्याज़,लहसुन ,अदरक,मिर्च,धनिया,हल्दी डाल देने से बनता है मसाला , इसमे पानी डाल दें तो बन जाती है तरी,उसमें मटर डाल दें तो कहलाती है मटर की सब्जी । अगर इसमें पनीर भी डाल दें तो कहलाती है मटर-पनीर की सब्जी । इसकी अपनी पहचान इसी नाम से  होती है और  अन्य तत्वों के नाम लुप्त हो जाते हैं ।
मैने अपने एक व्याख्यान के दौरान जब यह उदाहरण दिया तो एक महिला ने कहा “ सर ,आपने इतना भाषण दे दिया लेकिन इस क्रम में आपकी सब्ज़ी (मतलब मटर-पनीर की सब्ज़ी ) बन ही नहीं सकती । मैने पूछा "कैसे ?"तो उसने कहा " आपने गैस तो जलाई ही नही।  मैने कहा बिलकुल ठीक । मैं यह बताना भूल ही गया । सब्जी पकाने से पहले गैस जलाना ज़रूरी है ।अंत में यही एक बात कि जैसे पकाने के लिये उर्जा ज़रूरी है वैसे ही जीवन के निर्माण और सजीव को जैविक क्रियाओं के लिये भी उर्जा ज़रूरी है ।
अगली किश्त में देखेंगे सजीवों के अन्य लक्षण । 
आज उपसर्ग में प्रस्तुत है शरीर के लिये और जीवन के लिये ज़रूरी इस उर्जा या इस आग पर कवि निरंजन श्रोत्रिय की यह एक कविता ,उनके संग्रह "जुगलबंदी " से साभार ।

                आग

हमारा बहुत सारा जीवन
उसकी तलाश में निकल जाता है
जबकि वह मौजूद होती है
हमारे बहुत करीब

जब हम रगड़ते हैं दियासलाई
वह सिमटी होती है छ: हज़ार डिग्री सैल्सियस
धधकते सूरज से उतरी धूप के भीतर
जब हम ढूँढते हैं ठंडी राख के भीतर कोई अंगारा
वह दुबकी होती है टेसू के सिंदूरी –पीले रंग में

रात को ठंडी पड़ी भट्टी की ईटों और
गुस्से में उबलती कलम की नोंक में
छुपा होता है उसका संगीत

वह भरी हुई है मरी खाल के फ़ेफ़ड़े के भीतर
पिघलाने को बहुत सा लोहा
वह प्रतीक्षा कर रही है हथेलियोँ की रगड़ की

हम अपना सारा जीवन उसे इधर-उधर खोजने में लगा देंगे
और वह प्रकट हो जायेगी यूँ ही एक हल्की चोट में
वहाँ जहाँ चकमक पत्थरों से खेल रहे हैं बच्चे |
                
                       निरंजन श्रोत्रिय  

बुधवार, 5 मई 2010

मुझे नही पता ,आप ही बताइये यह जीवन क्या हैं ?


                                  
आप कहेंगे यह भी कोई सवाल है । सही है आप में से ऐसा कोई नहीं होगा जिसने कभी इस प्रश्न के बारे में न सोचा हो । अभी इस सवाल के उत्तर में आप धड़ाधड़ लिखना शुरू कर देंगे । कोई कहेगा ज़िन्दगी एक पहेली है कोई कहेगा जीवन पानी का बुलबुला है ,जीवन एक उड़ती हुई पतंग है,जीवन एक साँप है , जीवन एक सज़ा है  , एक उड़ता हुआ पंछी है ,वगैरह वगैरह ।जीवन के बारे में हर कवि ने दो चार पंक्तियाँ तो लिख ही डाली हैं मसलन ..”जीवन क्या है,चलता फिरता एक खिलौना है / दो आँखों में एक से हंसना एक से रोना है ।" मुझे भी जीवन के बारे में कविताएँ बहुत अच्छी लगती हैं और जीवन को परिभाषित करने वाली एक कविता तो मुझे बेहद पसन्द है ..” ज़िन्दगी क्या है जान जाओगे / रेत पे लाके मछलियाँ रख दो “
        चलिए कवियों को अपना काम करने दीजिये, हम जीवन की वैज्ञानिक परिभाषा देखते हैं ।   पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ हो चुका था लेकिन मानव जीवन के आगमन में अभी समय था । पेड़-पौधे ,कीड़े-मकोड़े, रेंगने वाले जीव तैरने वाले जीव और उड़ने वाले जीवों का आगमन हो रहा था । यह सब सजीव थे और इनमें जीवन के सभी लक्षण मौजूद थे । हमें तो मनुष्य के जीवन से मतलब है इसलिये मनुष्य के जन्म का समाचार जानने से पहले हम जान लें ,आखिर यह सजीव होना क्या है ?
जीव का अर्थ आत्मा नहीं होता - जीवन के बारे में अगर आप जानते हैं तो आपको यह भी पता ही होगा कि हम मनुष्य,अन्य प्राणि,कीट-पतंगे और पेड़-पौधे सभी सजीवों की श्रेणि में आते हैं । सजीवों के कुछ विशेष लक्षण होते हैं जैसे जन्म लेना,बढ़ना, सांस लेना, गति, उत्तेजना तथा संतानोपत्ति और अंतत: मृत्यु आदि। ये सजीव अपने आसपास से अपने जीवन के लिये आवश्यक वस्तुयें ग्रहण करते हैं । सजीवों के सभी लक्षण जीवन के फलस्वरुप ही होते हैं । सजीवों के शरीर में जीवन के लिये आवश्यक क्रियाशीलता बनी रहती है । यह क्रियाशीलता उनके पदार्थ जीव द्रव्य विभिन्न तत्वों तथा यौगिकों का विशिष्ट संगठन हैं। इस प्रकार जीव संगठित द्रव्य है तथा जीवन उसकी क्रियाशीलता । जीवन के होने के लिये एक शरीर आवश्यक है। शरीर से बाहर जीवन नहीं हो सकता । शरीर और जीवन का तालमेल ही एक सजीव को होने का अर्थ प्रदान करता है । जीवन को बेहतर तरीके से जानने के लिये जरूरी है शरीर को जानना । 
सजीवों के इन प्रमुख लक्षणों को तो हम अगली पोस्ट में देखेंगे , इस बार तो आप यह बताइये कि आप से अगर पूछा  जाये कि जीवन क्या है ? तो आप एक दो पंक्ति में इसका क्या उत्तर देंगे ? जीवन की आपकी अपनी परिभाषा जानने की प्रतीक्षा में - आपका -  शरद कोकास 
अरे हाँ उपसर्ग की कविता तो लिखना भूल ही गया , इस बार लीजिये पढ़िये कवि कुमार अम्बुज की यह कविता जिसमें आपको जीवन की प्रचलित परिभाषाओं से अलग जीवन का एक नया ही अर्थ दिखाई देगा ।श्री कुमार अम्बुज हिन्दी के बहुत प्रसिद्ध कवि हैं और भोपाल में रहते हैं । उनका एक ब्लॉग भी है , " कुमार अम्बुज "... इसे भी देखियेगा । 


                                    इस नश्वर संसार में

लाखों करोड़ों सालों से
इतना ही जीवित चला आ रहा है
यह नश्वर संसार

नश्वरता की घोषणा करने वाले
नष्ट हो गये
नश्वर संसार नष्ट नहीं हो रहा है

तमाम नश्वरता के बावज़ूद
भंगी अपनी झाड़ू बचा लेता है
धोबी अपने घाट का पत्थर
एक मिस्त्री बचा लेता है अपने औज़ार
और किसान गेहूँ की बाली
लोहार अपना घन
समय की छाती पर पटक देता है

तोते अपनी चोंच की लाली बचा लेते हैं
कोयल अपनी कूक
स्त्री अपनी मादकता बचा लेती है
पुरुष अपना ताप
काल के विकराल मुँह से छीन लेता है एक बच्चा
अपनी अमर हँसी

इस नश्वर संसार में
जीवन अमर हो रहा है लगातार
नश्वरवादियों के शवों पर
अट्टहास करता हुआ । 

                - कुमार अम्बुज 

चित्र गूगल से और कुमार अम्बुज की कविता उनके संग्रह " किवाड़ " से साभार ।तस्वीर मेरे मोबाइल कैमरे से ..-शरद कोकास